
उच्च न्यायालयों और इस संहिता से भिन्न किसी विधि के अधीन गठित न्यायालयों के अतिरिक्त, प्रत्येक राज्य में निम्नलिखित वर्गों के दंड न्यायालय होंगे, अर्थात् :-
I. सेशन न्यायालय ;
II. प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट ;
III. द्वितीय वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट ; और
IV. कार्यपालक मजिस्ट्रेट
1. प्रत्येक राज्य एक सेशन खंड होगा या सेशन खंडों से मिलकर बनेगा और प्रत्येक सेशन खंड इस संहिता के प्रयोजनों के लिए एक जिला होगा या जिलों से मिलकर बनेगा।
2. राज्य सरकार, उच्च न्यायालय से परामर्श के पश्चात्, ऐसे खंडों और जिलों की सीमाओं या संख्या में परिवर्तन कर सकेगी ।
3. राज्य सरकार, उच्च न्यायालय से परामर्श के पश्चात्, किसी जिले को उपखंडों में विभाजित कर सकेगी और ऐसे उपखंडों की सीमाओं या संख्या में परिवर्तन कर सकेगी।
4. किसी राज्य में, इस संहिता के प्रारंभ के समय विद्यमान सेशन खंड, जिले और उपखंड इस धारा के अधीन बनाए गए समझे जाएंगे ।
1. राज्य सरकार, प्रत्येक सेशन खंड के लिए एक सेशन न्यायालय स्थापित करेगी ।
2. प्रत्येक सेशन न्यायालय में एक न्यायाधीश पीठासीन होगा, जो उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त किया जाएगा ।
3. उच्च न्यायालय, अपर सेशन न्यायाधीशों को भी सेशन न्यायालय में अधिकारिता का प्रयोग करने के लिए नियुक्त कर सकता है।
4. उच्च न्यायालय द्वारा एक सेशन खंड के सेशन न्यायाधीश को दूसरे खंड का अपर सेशन न्यायाधीश भी नियुक्त किया जा सकेगा और ऐसी दशा में, वह मामलों को निपटाने के लिए दूसरे खंड के ऐसे स्थान या स्थानों में बैठ सकेगा, जो उच्च न्यायालय निदेश दे।
5. जहां किसी सेशन न्यायाधीश का पद रिक्त होता है वहां उच्च न्यायालय किसी अति आवश्यक आवेदन के, जो ऐसे सेशन न्यायालय के समक्ष किया जाता है या लंबित है, किसी अपर सेशन न्यायाधीश द्वारा या यदि अपर सेशन न्यायाधीश नहीं है तो सेशन खंड के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा निपटाए जाने के लिए व्यवस्था कर सकेगा और ऐसे प्रत्येक न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट को ऐसे आवेदन पर कार्यवाही करने की अधिकारिता होगी ।
6. सेशन न्यायालय सामान्यतः अपनी बैठक ऐसे स्थान या स्थानों पर करेगा जो उच्च न्यायालय अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे; किंतु यदि किसी विशेष मामले में, सेशन न्यायालय की यह राय है कि सेशन खंड में किसी अन्य स्थान में बैठक करने से पक्षकारों और साक्षियों को सुविधा होगी तो वह, अभियोजन और अभियुक्त की सहमति से उस मामले को निपटाने के लिए या उसमें किसी साक्षी या साक्षियों की परीक्षा करने के लिए उस स्थान पर बैठक कर सकेगा ।
7. सेशन न्यायाधीश समय-समय पर ऐसे अपर सेशन न्यायाधीशों के बीच कार्य के वितरण के संबंध में इस संहिता से संगत आदेश दे सकेगा ।
8. सेशन न्यायाधीश, अपनी अनुपस्थिति या कार्य करने में असमर्थता की दशा में, किसी अति आवश्यक आवेदन का अपर सेशन न्यायाधीश द्वारा या यदि कोई अपर सेशन न्यायाधीश न हो तो, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा निपटाए जाने के लिए भी व्यवस्था कर सकता है; और यह समझा जाएगा कि ऐसे न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट को ऐसे आवेदन पर कार्यवाही करने की अधिकारिता है ।
इस संहिता के प्रयोजनों के लिए "नियुक्ति" के अंतर्गत सरकार द्वारा संघ या किसी राज्य के कार्यकलापों के संबंध में किसी सेवा या पद पर किसी व्यक्ति की प्रथम नियुक्ति, तैनाती या प्रोन्नति नहीं है, जहां किसी विधि के अधीन ऐसी नियुक्ति, तैनाती या प्रोन्नति सरकार द्वारा किए जाने के लिए अपेक्षित है ।
1. प्रत्येक जिले में प्रथम वर्ग और द्वितीय वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेटों के इतने न्यायालय और ऐसे स्थानों में स्थापित किए जाएंगे जितने और जो राज्य सरकार, उच्च न्यायालय से परामर्श के पश्चात्, अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे :
परंतु राज्य सरकार, उच्च न्यायालय से परामर्श के पश्चात्, किसी स्थानीय क्षेत्र के लिए प्रथम वर्ग या द्वितीय वर्ग के न्यायिक मजिस्ट्रेटों के एक या अधिक विशेष न्यायालय, किसी विशेष मामले या विशेष वर्ग के मामलों का विचारण करने के लिए स्थापित कर सकेगी और जहां कोई ऐसा विशेष न्यायालय स्थापित किया जाता है उस स्थानीय क्षेत्र में मजिस्ट्रेट के किसी अन्य न्यायालय को किसी ऐसे मामले या ऐसे वर्ग के मामलों का विचारण करने की अधिकारिता नहीं होगी, जिनके विचारण के लिए न्यायिक मजिस्ट्रेट का ऐसा विशेष न्यायालय स्थापित किया गया है ।
2. ऐसे न्यायालयों के पीठासीन अधिकारी उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त किए जाएंगे |
3. उच्च न्यायालय जब कभी उसे यह समीचीन या आवश्यक प्रतीत हो, किसी सिविल न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में कार्यरत राज्य की न्यायिक सेवा के किसी सदस्य को प्रथम वर्ग या द्वितीय वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट की शक्तियां प्रदान कर सकेगा
1. उच्च न्यायालय, प्रत्येक जिले में किसी प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट नियुक्त करेगा।
2. उच्च न्यायालय किसी प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट को अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट नियुक्त कर सकेगा और ऐसे मजिस्ट्रेट को इस संहिता के अधीन या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की सभी या कोई शक्तियां होंगी, जिसका उच्च न्यायालय निदेश दें।
3. उच्च न्यायालय, जैसा अवसर अपेक्षित करे, किसी उपखंड में किसी प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट को उपखंड न्यायिक मजिस्ट्रेट के रूप में पदाभिहित कर सकेगा और उसे इस धारा में विनिर्दिष्ट उत्तरदायित्वों से मुक्त कर सकेगा।
4. मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के साधारण नियंत्रण के अधीन रहते हुए प्रत्येक उपखंड न्यायिक मजिस्ट्रेट को उपखंड में न्यायिक मजिस्ट्रेटों (अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेटों से भिन्न) के काम पर पर्यवेक्षण और नियंत्रण की ऐसी शक्तियां भी होंगी और वह उनका प्रयोग करेगा, जो उच्च न्यायालय साधारण या विशेष आदेश द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे।
1. यदि केद्रीय या राज्य सरकार द्वारा उच्च न्यायालय से ऐसा करने के लिए अनुरोध किया जाता है तो वह किसी व्यक्ति को जो सरकार के अधीन कोई पद धारण करता है या जिसने कोई पद धारण किया है, किसी स्थानीय क्षेत्र में, विशिष्ट मामलों या विशिष्ट वर्ग के मामलों के संबंध में प्रथम वर्ग या द्वितीय वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट को इस संहिता द्वारा या इसके अधीन प्रदत्त की गई या प्रदत्त की जा सकने वाली सभी या कोई शक्तियां प्रदत्त कर सकेगा:
परंतु ऐसी कोई शक्ति ऐसे किसी व्यक्ति को प्रदत्त नहीं की जाएगी जब तक उसके पास विधिक मामलों के संबंध में ऐसी अर्हता या अनुभव नहीं है जो उच्च न्यायालय, नियमों द्वारा विनिर्दिष्ट करे।
2. ऐसे मजिस्ट्रेट विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट कहलाएंगे और एक समय में एक वर्ष से अधिक की इतनी अवधि के लिए नियुक्त किए जाएंगे जो उच्च न्यायालय, साधारण या विशेष आदेश द्वारा निदेश दे।
1. उच्च न्यायालय के नियंत्रण के अधीन रहते हुए, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, समय- समय पर उन क्षेत्रों की स्थानीय सीमाएं परिनिश्चित कर सकेगा जिनके भीतर धारा 9 या धारा 11 के अधीन नियुक्त मजिस्ट्रेट उन सभी शक्तियों का या उनमें से किन्हीं का प्रयोग कर सकेंगे, जो इस संहिता के अधीन क्रमशः उनमें विनिहित की जाएं:
परंतु विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट का न्यायालय उस स्थानीय क्षेत्र के भीतर, जिसके लिए वह स्थापित किया गया है, किसी स्थान में अपनी बैठक कर सकेगा।
2. ऐसे परिनिश्चय द्वारा, जैसा उपबंधित है उसके सिवाय, प्रत्येक ऐसे मजिस्ट्रेट की अधिकारिता और शक्तियों का विस्तार जिले में सर्वत्र होगा।
3. जहाँ धारा 9 या धारा 11 के अधीन नियुक्त किसी मजिस्ट्रेट की स्थानीय अधिकारिता का विस्तार किसी उस जिले के, जिसमें वह मामूली तौर पर न्यायालय की बैठकें करता है, बाहर किसी क्षेत्र तक है वहां इस संहिता में सेशन न्यायालय या मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के प्रति किसी निर्देश का ऐसे मजिस्ट्रेट के संबंध में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह अपनी स्थानीय अधिकारिता के भीतर संपूर्ण क्षेत्र में उक्त जिला के संबंध में अधिकारिता का प्रयोग करने वाले, यथास्थिति, सेशन न्यायालय या मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के प्रति निर्देश है।
1. प्रत्येक मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, सेशन न्यायाधीश के अधीनस्थ होगा और प्रत्येक अन्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, सेशन न्यायाधीश के साधारण नियंत्रण के अधीन रहते हुए, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के अधीनस्थ होगा ।
2. मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, समय-समय पर अपने अधीनस्थ न्यायिक मजिस्ट्रेटों के बीच कार्य के वितरण के बारे में, इस संहिता से संगत नियम बना सकेगा या विशेष आदेश दे सकेगा।
1. राज्य सरकार, प्रत्येक जिले में उतने व्यक्तियों को, जितने वह उचित समझे, कार्यपालक मजिस्ट्रेट नियुक्त कर सकेगी और उनमें से एक को जिला मजिस्ट्रेट नियुक्त करेगी।
2. राज्य सरकार, किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट को अपर जिला मजिस्ट्रेट नियुक्त कर सकेगी, और ऐसे मजिस्ट्रेट को इस संहिता के अधीन या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन जिला मजिस्ट्रेट की ऐसी शक्तियां होंगी, जिसे राज्य सरकार निर्दिष्ट करे।
3. जब कभी, किसी जिला मजिस्ट्रेट के पद की रिक्ति के परिणामस्वरूप, कोई अधिकारी उस जिले के कार्यपालक प्रशासन के लिए अस्थायी रूप से उत्तरवर्ती होता है तो ऐसा अधिकारी, राज्य सरकार द्वारा आदेश दिए जाने तक, क्रमशः उन सभी शक्तियों का प्रयोग और उन सभी कर्तव्यों का पालन करेगा जो इस संहिता द्वारा जिला मजिस्ट्रेट को प्रदत्त और अधिरोपित की जाए।
4. राज्य सरकार, जैसा अवसर अपेक्षित करे, किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट को उपखंड का भारसाधक बना सकेगी और उसको भारसाधन से मुक्त कर सकेगी तथा इस प्रकार किसी उपखंड का भारसाधक बनाया गया मजिस्ट्रेट, उपखंड मजिस्ट्रेट कहलाएगा।
5. राज्य सरकार, साधारण या विशेष आदेश द्वारा तथा ऐसे नियंत्रण और निदेशों के अधीन रहते हुए, जो वह अधिरोपित करना ठीक समझे, उपधारा (4) के अधीन अपनी शक्तियां, जिला मजिस्ट्रेट को प्रत्यायोजित कर सकेगी।
6. इस धारा की कोई बात, तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन, कार्यपालक मजिस्ट्रेट की सभी शक्तियां या उनमें से कोई शक्ति पुलिस आयुक्त को प्रदत्त करने से राज्य सरकार को प्रवारित नहीं करेगी ।
राज्य सरकार, विशिष्ट क्षेत्रों के लिए या विशिष्ट कृत्यों का पालन करने के लिए कार्यपालक मजिस्ट्रेट या ऐसे किसी पुलिस अधिकारी को, जो पुलिस अधीक्षक की पंक्ति से नीचे का न हो या समतुल्य को, जो विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट के रूप में ज्ञात होंगे, इतनी अवधि के लिए जितनी वह उचित समझे, नियुक्त कर सकेगी और इस संहिता के अधीन कार्यपालक मजिस्ट्रेटों को प्रदत्त की जा सकने वाली शक्तियों में से ऐसी शक्तियां, जिन्हें वह उचित समझे, इन विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेटों को प्रदत्त कर सकेगी ।
1. राज्य सरकार के नियंत्रण के अधीन रहते हुए जिला मजिस्ट्रेट, समय-समय पर, उन क्षेत्रों की स्थानीय सीमाएं परिनिश्चित कर सकेगा जिनके भीतर कार्यपालक मजिस्ट्रेट उन सभी शक्तियों का या उनमें से किन्हीं का प्रयोग कर सकेंगे, जो इस संहिता के अधीन उनमें विनिहित की जाएं ।
2. ऐसे परिनिश्चय द्वारा, जैसा उपबंधित है उसके सिवाय, प्रत्येक ऐसे मजिस्ट्रेट की अधिकारिता और शक्तियों का विस्तार जिले में सर्वत्र होगा ।
1. सभी कार्यपालक मजिस्ट्रेट, जिला मजिस्ट्रेट के अधीनस्थ होंगे और किसी उपखंड में शक्तियों का प्रयोग करने वाला प्रत्येक कार्यपालक मजिस्ट्रेट (उपखंड मजिस्ट्रेट से भिन्न), जिला मजिस्ट्रेट के साधारण नियंत्रण के अधीन रहते हुए, उपखंड मजिस्ट्रेट के भी अधीनस्थ होगा ।
2. जिला मजिस्ट्रेट, समय-समय पर अपने अधीनस्थ कार्यपालक मजिस्ट्रेटों के बीच कार्य के वितरण या आबंटन के बारे में इस संहिता से संगत नियम बना सकेगा या विशेष आदेश दे सकेगा ।
1. प्रत्येक उच्च न्यायालय के लिए, केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार उस उच्च न्यायालय से परामर्श के पश्चात्, यथास्थिति, केंद्रीय या राज्य सरकार की ओर से ऐसे न्यायालय में किसी अभियोजन, अपील या अन्य कार्यवाही के संचालन के लिए एक लोक अभियोजक नियुक्त करेगी और एक या अधिक अपर लोक अभियोजक भी नियुक्त कर सकेगी:
परंतु राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र दिल्ली के संबंध में, केंद्रीय सरकार दिल्ली उच्च न्यायालय से परामर्श के पश्चात्, इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए लोक अभियोजक या अपर लोक अभियोजकों की नियुक्ति करेगी ।
2. केंद्रीय सरकार, किसी जिले या स्थानीय क्षेत्र में किसी मामले का संचालन करने के प्रयोजनों के लिए एक या अधिक लोक अभियोजक नियुक्त कर सकेगी ।
3. राज्य सरकार, प्रत्येक जिले के लिए, एक लोक अभियोजक नियुक्त करेगी और जिले के लिए एक या अधिक अपर लोक अभियोजक भी नियुक्त कर सकेगी :
परंतु एक जिले के लिए नियुक्त किया गया लोक अभियोजक या अपर लोक अभियोजक, किसी अन्य जिले के लिए भी, यथास्थिति, लोक अभियोजक या अपर लोक अभियोजक नियुक्त किया जा सकेगा ।
4. जिला मजिस्ट्रेट, सेशन न्यायाधीश के परामर्श से, ऐसे व्यक्तियों के नामों का एक पैनल तैयार करेगा जो उसकी राय में, उस जिले के लिए लोक अभियोजक या अपर लोक अभियोजक नियुक्त किए जाने के योग्य हैं ।
5. कोई व्यक्ति, राज्य सरकार द्वारा जिले के लिए लोक अभियोजक या अपर लोक अभियोजक तब तक नियुक्त नहीं किया जाएगा जब तक कि उसका नाम उपधारा (4) के अधीन जिला मजिस्ट्रेट द्वारा तैयार किए गए नामों के पैनल में न हो ।
6. उपधारा (5) में किसी बात के होते हुए भी, जहां किसी राज्य में अभियोजन अधिकारियों का नियमित काडर है वहां राज्य सरकार, ऐसा काडर गठित करने वाले व्यक्तियों में से ही लोक अभियोजक या अपर लोक अभियोजक नियुक्त करेगी :
परंतु जहां, राज्य सरकार की राय में ऐसे काडर में से कोई उपयुक्त व्यक्ति ऐसी नियुक्ति के लिए उपलब्ध नहीं है वहां वह सरकार उपधारा ( 4 ) के अधीन जिला मजिस्ट्रेट द्वारा तैयार किए गए नामों के पैनल में से, यथास्थिति, लोक अभियोजक या अपर लोक अभियोजक के रूप में किसी व्यक्ति को नियुक्त कर सकेगी ।
इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए,
क. “अभियोजन अधिकारियों का नियमित काडर" से अभियोजन अधिकारियों का वह काडर अभिप्रेत है, जिसमें लोक अभियोजक का पद सम्मिलित है, चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो और जिसमें सहायक लोक अभियोजक का उस पद पर प्रोन्नति के लिए उपबंध करता है, चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो ;
ख. “अभियोजन अधिकारी” से इस संहिता के अधीन लोक अभियोजक, विशेष लोक अभियोजक, अपर लोक अभियोजक या सहायक लोक अभियोजक के कृत्यों का पालन करने के लिए नियुक्त किया गया व्यक्ति अभिप्रेत है, चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो ।
7. कोई व्यक्ति उपधारा (1) या उपधारा (2) या उपधारा ( 3 ) या उपधारा ( 6 ) के अधीन लोक अभियोजक या अपर लोक अभियोजक नियुक्त किए जाने का पात्र तभी होगा जब वह कम से कम सात वर्ष तक अधिवक्ता के रूप में विधि व्यवसाय करता रहा हो ।
8. केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार किसी मामले या किसी वर्ग के मामलों के प्रयोजनों के लिए किसी व्यक्ति को, जो अधिवक्ता के रूप में कम से कम दस वर्ष तक विधि व्यवसाय करता रहा हो, विशेष लोक अभियोजक नियुक्त कर सकेगी:
परंतु न्यायालय इस उपधारा के अधीन पीड़ित को, अभियोजन की सहायता करने के लिए अपनी पसंद का अधिवक्ता रखने के लिए अनुज्ञात कर सकेगा ।
9. उपधारा (7) और उपधारा (8) के प्रयोजनों के लिए, वह अवधि, जिसके दौरान किसी व्यक्ति ने अधिवक्ता के रूप में विधि व्यवसाय किया है या लोक अभियोजक या अपर लोक अभियोजक या सहायक लोक अभियोजक या अन्य अभियोजन अधिकारी के रूप में, चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो, सेवा किया है (चाहे इस संहिता के प्रारंभ के पहले या पश्चात्) यह समझा जाएगा कि वह ऐसी अवधि है जिसके दौरान ऐसे व्यक्ति ने अधिवक्ता के रूप में विधि व्यवसाय किया है ।
1. राज्य सरकार, प्रत्येक जिले में मजिस्ट्रेटों के न्यायालयों में अभियोजन का संचालन करने के लिए एक या अधिक सहायक लोक अभियोजक नियुक्त करेगी ।
2. केंद्रीय सरकार, मजिस्ट्रेटों के न्यायालयों में किसी मामले या मामलों के वर्ग के संचालन के प्रयोजनों के लिए एक या अधिक सहायक लोक अभियोजक नियुक्त कर सकेगी ।
3. उपधारा (1) और उपधारा (2) में अंतर्विष्ट उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, जहां कोई सहायक लोक अभियोजक किसी विशिष्ट मामले के प्रयोजनों के लिए उपलब्ध नहीं है, वहां जिला मजिस्ट्रेट, राज्य सरकार को चौदह दिन की सूचना देने के पश्चात्, किसी अन्य व्यक्ति को उस मामले का भारसाधक सहायक लोक अभियोजक नियुक्त कर सकता है :
परंतु कोई पुलिस अधिकारी, सहायक लोक अभियोजक के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए पात्र नहीं होगा,-
क. यदि उसने उस अपराध के अन्वेषण में कोई भाग लिया है, जिसके संबंध अभियुक्त अभियोजित किया जा रहा है; या
ख. यदि वह निरीक्षक की पंक्ति से नीचे का है।
1. राज्य सरकार, -
क. राज्य में एक अभियोजन निदेशालय स्थापित कर सकेगी, जिसमें एक अभियोजन निदेशक और उतने अभियोजन उपनिदेशक हो सकेंगे, जैसा वह ठीक समझे और
ख. प्रत्येक जिले के जिला अभियोजन निदेशालय में उतने अभियोजन उप- निदेशक और अभियोजन सहायक निदेशक हो सकेंगे, जैसा वह ठीक समझे।
2. कोई व्यक्ति,-
क. अभियोजन निदेशक या अभियोजन उप-निदेशक के रूप में नियुक्ति के लिए तभी पात्र होगा यदि वह अधिवक्ता के रूप में कम-से-कम पंद्रह वर्ष तक व्यवसाय में रहा है, सेशन न्यायाधीश है या रहा है; और
ख. अभियोजन सहायक निदेशक के रूप में नियुक्ति के लिए तभी पात्र होगा यदि वह अधिवक्ता के रूप में कम से कम सात वर्ष तक व्यवसाय में रहा हो या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट रहा हो ।
3. अभियोजन निदेशालय का प्रधान अभियोजन निदेशक होगा, जो राज्य में गृह विभाग के प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन कृत्य करेगा ।
4. प्रत्येक अभियोजन उप-निदेशक या अभियोजन सहायक निदेशक, अभियोजन निदेशक के अधीनस्थ होगा; और प्रत्येक अभियोजन सहायक निदेशक, अभियोजन उप-निदेशक के अधीनस्थ होगा ।
5. उच्च न्यायालयों में मामलों का संचालन करने के लिए, धारा 18 की उपधारा (1) या उपधारा (8) के अधीन राज्य सरकार द्वारा नियुक्त प्रत्येक लोक अभियोजक, अपर लोक अभियोजक और विशेष लोक अभियोजक, अभियोजन निदेशक के अधीनस्थ होंगे
6. धारा 18 की उपधारा ( 3 ) या उपधारा ( 8 ) के अधीन जिला न्यायालयों में मामलों का संचालन करने के लिए राज्य सरकार द्वारा नियुक्त प्रत्येक लोक अभियोजक, अपर लोक अभियोजक और विशेष लोक अभियोजक, और धारा 19 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त प्रत्येक सहायक लोक अभियोजक, अभियोजन उप-निदेशक, अभियोजन सहायक निदेशक के अधीनस्थ होंगे ।
7. अभियोजन निदेशक की शक्तियाँ तथा कृत्य ऐसे मामलों का कार्यवाहियों के शीघ्र निपटारे और अपील फाइल करने पर राय देने के लिए मानीटर करना होगा, जिसमें अपराध दस वर्ष या उससे अधिक या आजीवन कारावास या मृत्यु से दंडनीय है ।
8. अभियोजन उप-निदेशक की शक्तियाँ और कृत्य ऐसे मामलों में जिनमें अपराध सात वर्ष या उससे अधिक के लिए दंडनीय है, किंतु दस वर्ष कम हो, उनके त्वरित निपटान को सुनिश्चित करने के लिए पुलिस रिपोर्ट की परीक्षा करना और संवीक्षा करना तथा मानीटर करना होगा ।
9. अभियोजन सहायक निदेशक के कृत्य ऐसे मामलों का मानीटर करना होगा, जिनमें कोई अपराध सात वर्ष से कम के लिए दंडनीय है |
10. उपधारा (7), उपधारा ( 8 ) और उपधारा ( 9 ) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, अभियोजन का निदेशक, उप-निदेशक या सहायक निदेशक इस संहिता के अधीन सभी कार्रवाइयों के लिए संव्यवहार करने की शक्ति होगी और उसके लिए दायी होंगे ।
11. अभियोजन निदेशक, अभियोजन उप-निदेशक या अभियोजन सहायक निदेशक की अन्य शक्तियां तथा कृत्य और वह क्षेत्र, जिसके लिए प्रत्येक अभियोजन उप-निदेशक या अभियोजन सहायक निदेशक नियुक्त किया गया है, वह होगा, जिसे राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा निर्दिष्ट करे।
12. इस धारा के उपबंध, लोक अभियोजक के कृत्यों का पालन करते समय, राज्य के महाधिवक्ता पर लागू नहीं होंगे ।