
1. जब जांच करने वाले मजिस्ट्रेट को यह विश्वास करने का कारण है कि वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध जांच की जा रही है विकृत चित्त है और परिणामतः अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ है तब मजिस्ट्रेट ऐसी चित्त - विकृति के तथ्य की जांच करेगा और ऐसे व्यक्ति की परीक्षा उस जिले के सिविल सर्जन या अन्य ऐसे चिकित्सा अधिकारी द्वारा कराएगा, जिसे राज्य सरकार निर्दिष्ट करे, और फिर ऐसे सिविल सर्जन या अन्य चिकित्सा अधिकारी की साक्षी के रूप में परीक्षा करेगा और उस परीक्षा को लेखबद्ध करेगा |
2. यदि सिविल सर्जन इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि अभियुक्त विकृत चित्त है तो वह ऐसे व्यक्ति को देखभाल, उपचार और अवस्था के पूर्वानुमान के लिए सरकारी अस्पताल या सरकारी आयुर्विज्ञान महाविद्यालय के मनश्चिकित्सक या रोग विषयक् मनोविज्ञानी को निर्दिष्ट करेगा और यथास्थिति, मनश्चिकित्सक या रोग विषयक् मनोविज्ञानी मजिस्ट्रेट को सूचित करेगा कि अभियुक्त चित्त - विकृति या बौद्धिक दिव्यांगता से ग्रस्त है या नहीं:
परंतु यदि अभियुक्त, यथास्थिति, मनश्चिकित्सक या रोग विषयक् मनोविज्ञानी द्वारा मजिस्ट्रेट को दी गई सूचना से व्यथित है तो वह चिकित्सा बोर्ड के समक्ष अपील कर सकेगा जो निम्नलिखित से मिलकर बनेगा, -
क. निकटतम सरकारी अस्पताल में मनश्चिकित्सा एकक प्रमुख; और
ख. निकटतम सरकारी आयुर्विज्ञान महाविद्यालय में मनश्चिकित्सा संकाय का सदस्य ।
3. ऐसी परीक्षा और जांच लंबित रहने तक मजिस्ट्रेट ऐसे व्यक्ति के बारे में धारा 369 के उपबंधों के अनुसार कार्यवाही कर सकता है।
4. यदि मजिस्ट्रेट को यह सूचना दी जाती है कि उपधारा (2) में निर्दिष्ट व्यक्ति विकृत चित्त व्यक्ति है तो मजिस्ट्रेट आगे यह अवधारित करेगा कि क्या चित - विकृति अभियुक्त को प्रतिरक्षा करने में असमर्थ बनाती है और यदि अभियुक्त इस प्रकार असमर्थ पाया जाता है तो मजिस्ट्रेट उस आशय का निष्कर्ष अभिलिखित करेगा और अभियोजन द्वारा पेश किए गए साक्ष्य के अभिलेख की परीक्षा करेगा तथा अभियुक्त के अधिवक्ता को सुनने के पश्चात् किंतु अभियुक्त से प्रश्न किए बिना, यदि वह इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि अभियुक्त के विरुद्ध प्रथमदृष्ट्या मामला नहीं बनता है तो वह जांच को मुल्तवी करने की बजाय अभियुक्त को उन्मोचित कर देगा और उसके संबंध में धारा 369 के अधीन उपबंधित रीति में कार्यवाही करेगा:
परंतु यदि मजिस्ट्रेट इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि उस अभियुक्त के विरुद्ध प्रथम दृष्ट्या मामला बनता है जिसके संबंध में चित्त- विकृति होने का निष्कर्ष निकाला गया है तो वह कार्यवाही को ऐसी अवधि के लिए मुल्तवी कर देगा जो मनश्चिकित्सक या रोग विषयक् मनोविज्ञानी की राय में अभियुक्त के उपचार के लिए अपेक्षित है और यह आदेश देगा कि अभियुक्त के संबंध में धारा 369 के अधीन उपबंधित रूप में कार्यवाही की जाए ।
5. यदि ऐसे मजिस्ट्रेट को यह सूचना दी जाती है कि उपधारा (2) में निर्दिष्ट व्यक्ति बौद्धिक दिव्यांगता से ग्रस्त व्यक्ति है तो
मजिस्ट्रेट आगे इस बारे में अवधारित करेगा कि बौद्धिक दिव्यांगता के कारण अभियुक्त व्यक्ति अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ है और यदि अभियुक्त इस प्रकार असमर्थ पाया जाता है, तो मजिस्ट्रेट जांच बंद करने का आदेश देगा और अभियुक्त के संबंध में धारा 369 के अधीन उपबंधित रीति में कार्यवाही करेगा ।
1. यदि किसी मजिस्ट्रेट या सेशन न्यायालय के समक्ष किसी व्यक्ति के विचारण के समय उस मजिस्ट्रेट या न्यायालय को वह व्यक्ति विकृत चित्त और परिणामस्वरूप अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ प्रतीत होता है, तो वह मजिस्ट्रेट या न्यायालय, प्रथमतः ऐसी चित्त - विकृति और असमर्थता के तथ्य का विचारण करेगा और यदि उस मजिस्ट्रेट या न्यायालय का ऐसे चिकित्सीय या अन्य साक्ष्य पर, जो उसके समक्ष पेश किया जाता है, विचार करने के पश्चात् उस तथ्य के बारे में समाधान हो जाता है तो वह उस भाव का निष्कर्ष अभिलिखित करेगा और मामले में आगे की कार्यवाही मुल्तवी कर देगा ।
2. यदि मजिस्ट्रेट या सेशन न्यायालय विचारण के दौरान इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि अभियुक्त विकृत चित्त है तो वह ऐसे व्यक्ति को देखभाल और उपचार के लिए मनश्चिकित्सक या रोग विषयक मनोविज्ञानी को निर्देशित करेगा और यथास्थिति, मनश्चिकित्सक या रोग विषयक् मनोविज्ञानी मजिस्ट्रेट या न्यायालय को रिपोर्ट करेगा कि अभियुक्त चित्त - विकृति से ग्रस्त है या नहीं :
परंतु यदि अभियुक्त, यथास्थिति, मनश्चिकित्सक या रोग विषयक मनोविज्ञानी द्वारा मजिस्ट्रेट को दी गई सूचना से व्यथित है तो वह चिकित्सा बोर्ड के समक्ष अपील कर सकेगा, जो निम्नलिखित से मिलकर बनेगा, -
क. निकटतम सरकारी अस्पताल में मनश्चिकित्सा एकक प्रमुख; और
ख. निकटतम सरकारी आयुर्विज्ञान महाविद्यालय में मनश्चिकित्सा संकाय का सदस्य ।
3. यदि ऐसे मजिस्ट्रेट या न्यायालय को सूचना दी जाती है कि उपधारा (2) में निर्दिष्ट व्यक्ति विकृत चित्त व्यक्ति है, तो मजिस्ट्रेट या न्यायालय आगे अवधारित करेगा कि चित्त-विकृति के कारण अभियुक्त व्यक्ति अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ है और यदि अभियुक्त इस प्रकार असमर्थ पाया जाता है तो मजिस्ट्रेट या न्यायालय उस आशय का निष्कर्ष अभिलिखित करेगा और अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य के अभिलेख की परीक्षा करेगा और अभियुक्त के अधिवक्ता को सुनने के पश्चात् किंतु अभियुक्त से प्रश्न पूछे बिना, यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि अभियुक्त के विरुद्ध कोई प्रथमदृष्ट्या मामला नहीं बनता है, तो वह विचारण को स्थगित करने की बजाय अभियुक्त को उन्मोचित कर देगा और उसके संबंध में धारा 369 के अधीन उपबंधित रीति में कार्यवाही करेगा:
परंतु यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि उस अभियुक्त के विरुद्ध प्रथमदृष्ट्या मामला बनता है जिसके संबंध में चित्त - विकृति होने का निष्कर्ष निकाला गया है तो वह विचारण को ऐसी अवधि के लिए मुल्तवी कर देगा जो मनश्चिकित्सक या रोग विषयक् मनोविज्ञानी की राय में अभियुक्त के उपचार के लिए अपेक्षित है ।
4. यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि अभियुक्त के विरुद्ध प्रथम दृष्ट्या मामला बनता है और वह बौद्धिक दिव्यांगता के कारण अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ है तो मजिस्ट्रेट या न्यायालय विचारण नहीं करेगा और यह आदेश देगा कि अभियुक्त के संबंध में धारा 369 के अनुसार कार्यवाही की जाए ।
1. जब कभी कोई व्यक्ति धारा 367 या धारा 368 के अधीन चित्त-विकृति या बौद्धिक दिव्यांगता के कारण अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ पाया जाता है तब, यथास्थिति, मजिस्ट्रेट या न्यायालय, चाहे मामला ऐसा हो जिसमें जमानत ली जा सकती है या ऐसा न हो, ऐसे व्यक्ति को जमानत पर छोड़े जाने का आदेश देगा:
परंतु अभियुक्त ऐसी चित्त - विकृति या बौद्धिक दिव्यांगता से ग्रस्त है जो अंतरंग रोगी उपचार के लिए समादेशित नहीं करती हो और कोई मित्र या नातेदार किसी निकटतम चिकित्सा सुविधा से नियमित बाह्य रोगी मन:चिकित्सा उपचार कराने और उसे अपने आपको या किसी अन्य व्यक्ति को क्षति पहुंचाने से निवारित रखने का वचन देता है।
2. यदि मामला ऐसा है जिसमें, यथास्थिति, मजिस्ट्रेट या न्यायालय की राय में, जमानत नहीं दी जा सकती या यदि कोई समुचित वचनबंध नहीं दिया गया है तो वह अभियुक्त को ऐसे स्थान में रखे जाने का आदेश देगा, जहां नियमित मनः चिकित्सा उपचार कराया जा सकता है और की गई कार्रवाई की रिपोर्ट राज्य सरकार को देगा :
परंतु लोक मानसिक स्वास्थ्य स्थापन में अभियुक्त को निरुद्ध किए जाने के लिए कोई आदेश राज्य सरकार द्वारा मानसिक स्वास्थ्य देख-रेख अधिनियम, 2017 (2017 का 10) के अधीन बनाए गए नियमों के अनुसार ही किया जाएगा, अन्यथा नहीं ।
3. जब कभी कोई व्यक्ति धारा 367 या धारा 368 के अधीन चित्त-विकृति या बौद्धिक दिव्यांगता के कारण अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ पाया जाता है तब, यथास्थिति, मजिस्ट्रेट या न्यायालय कारित किए गए कार्य की प्रकृति और चित्त - विकृति या बौद्धिक दिव्यांगता की सीमा को ध्यान में रखते हुए आगे यह अवधारित करेगा कि क्या अभियुक्त को छोड़ने का आदेश दिया जा सकता है:
परंतु यह है कि—
क. यदि चिकित्सा राय या किसी विशेषज्ञ की राय के आधार पर, यथास्थिति, मजिस्ट्रेट या न्यायालय धारा 367 या धारा 368 के अधीन उपबंधित रीति में अभियुक्त के उन्मोचन का आदेश करने का विनिश्चय करता है तो ऐसे छोड़े जाने का आदेश किया जा सकेगा, यदि पर्याप्त प्रतिभूति दी जाती है कि अभियुक्त को अपने आपको या किसी अन्य व्यक्ति को क्षति पहुंचाने से निवारित किया जाएगा;
ख. यदि, यथास्थिति, मजिस्ट्रेट या न्यायालय की यह राय है कि अभियुक्त के उन्मोचन का आदेश नहीं दिया जा सकता है तो अभियुक्त को चित्त - विकृति या बौद्धिक दिव्यांगता के व्यक्तियों के लिए आवासीय सुविधा में अंतरित करने का आदेश दिया जा सकता है जहां अभियुक्त की देखभाल की जा सके और समुचित शिक्षा और प्रशिक्षण जा सके ।
1. जब कभी जांच या विचारण को धारा 367 या धारा 368 के अधीन मुल्तवी किया गया है, तब, यथास्थिति, मजिस्ट्रेट या न्यायालय जांच या विचारण को संबद्ध व्यक्ति के विकृत चित्त न रहने पर किसी भी समय पुनः चालू कर सकता है और ऐसे मजिस्ट्रेट या न्यायालय के समक्ष अभियुक्त के हाजिर होने या लाए जाने की अपेक्षा कर सकता है ।
2. जब अभियुक्त धारा 369 के अधीन छोड़ दिया गया है और उसकी हाजिरी के लिए प्रतिभू उसे उस अधिकारी के समक्ष पेश करते हैं, जिसे मजिस्ट्रेट या न्यायालय ने इस निमित्त नियुक्त किया है, तब ऐसे अधिकारी का यह प्रमाणपत्र कि अभियुक्त अपनी प्रतिरक्षा करने में समर्थ है, साक्ष्य में लिए जाने योग्य होगा ।
1. जब अभियुक्त, यथास्थिति, मजिस्ट्रेट या न्यायालय के समक्ष हाजिर होता है या पुनः लाया जाता है, तब यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय का यह विचार है कि वह अपनी प्रतिरक्षा करने में समर्थ है तो, जांच या विचारण आगे चलेगा ।
2. यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय का यह विचार है कि अभियुक्त अभी अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ है तो मजिस्ट्रेट या न्यायालय, यथास्थिति, धारा 367 या धारा 368 के उपबंधों के अनुसार कार्यवाही करेगा और यदि अभियुक्त विकृत चित्त पाया जाता है और परिणामस्वरूप अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ पाया जाता है तो ऐसे अभियुक्त के बारे में वह धारा 369 के उपबंधों के अनुसार कार्यवाही करेगा ।
372. जब यह प्रतीत हो कि अभियुक्त स्वस्थचित्त रहा है
जब अभियुक्त जांच या विचारण के समय स्वस्थचित्त का प्रतीत होता है और मजिस्ट्रेट का अपने समक्ष दिए गए साक्ष्य से समाधान हो जाता है कि यह विश्वास करने का कारण है कि अभियुक्त ने ऐसा कार्य किया है, जो यदि वह स्वस्थचित्त होता तो अपराध होता और यह कि वह उस समय जब वह कार्य किया गया था चित्त - विकृति के कारण उस कार्य का स्वरूप या यह जानने में असमर्थ था, कि यह दोषपूर्ण या विधि के प्रतिकूल है, तब मजिस्ट्रेट मामले में आगे कार्यवाही करेगा और यदि अभियुक्त का विचारण सेशन न्यायालय द्वारा किया जाना चाहिए तो उसे सेशन न्यायालय के समक्ष विचारण के लिए सुपुर्द करेगा ।
जब कभी कोई व्यक्ति इस आधार पर दोषमुक्त किया जाता है कि उस समय जब यह अभिकथित है कि उसने अपराध किया वह चित्त - विकृति के कारण उस कार्य का स्वरूप, जिसका अपराध होना अभिकथित है, या यह कि वह दोषपूर्ण या विधि के प्रतिकूल है जानने में असमर्थ था, तब निष्कर्ष में यह विनिर्दिष्टतः कथित होगा कि उसने वह कार्य किया या नहीं किया ।
1. जब कभी निष्कर्ष में यह कथित है कि अभियुक्त व्यक्ति ने अभिकथित कार्य किया है तब वह मजिस्ट्रेट या न्यायालय, जिसके समक्ष विचारण किया गया है, उस दशा में जब ऐसा कार्य उस असमर्थता के न होने पर, जो पाई गई, अपराध होता,-
क. उस व्यक्ति को ऐसे स्थान में और ऐसी रीति से, जिसे ऐसा मजिस्ट्रेट या न्यायालय ठीक समझे, सुरक्षित अभिरक्षा में निरुद्ध करने का आदेश देगा ; या
ख. उस व्यक्ति को उसके किसी नातेदार या मित्र को सौंपने का आदेश देगा |
2. लोक मानसिक स्वास्थ्य स्थापन में अभियुक्त को निरुद्ध करने का उपधारा (1) के खंड (क) के अधीन कोई आदेश राज्य सरकार द्वारा मानसिक स्वास्थ्य देख-रेख अधिनियम, 2017 के अधीन बनाए गए, नियमों के अनुसार ही किया जाएगा अन्यथा नहीं
3. अभियुक्त को उसके किसी नातेदार या मित्र को सौंपने का उपधारा (1) के खंड (ख) के अधीन कोई आदेश उसके ऐसे नातेदार या मित्र के आवेदन पर और उसके द्वारा निम्नलिखित बातों की बाबत मजिस्ट्रेट या न्यायालय के समाधानप्रद प्रतिभूति देने पर ही किया जाएगा, अन्यथा नहीं-
क. सौंपे गए व्यक्ति की समुचित देख-रेख की जाएगी और वह अपने आपको या किसी अन्य व्यक्ति को क्षति पहुंचाने से निवारित रखा जाएगा ;
ख. सौंपा गया व्यक्ति ऐसे अधिकारी के समक्ष और ऐसे समय और स्थानों पर, जो राज्य सरकार द्वारा निदिष्ट किए जाएं, निरीक्षण के लिए पेश किया जाएगा ।
4. मजिस्ट्रेट या न्यायालय उपधारा (1) के अधीन की गई कार्रवाई की रिपोर्ट राज्य सरकार को देगा ।
राज्य सरकार उस जेल के भारसाधक अधिकारी को, जिसमें कोई व्यक्ति धारा 369 या धारा 374 के उपबंधों के अधीन परिरुद्ध है, धारा 376 या धारा 377 के अधीन कारागारों के महानिरीक्षक के सब कृत्यों का या उनमें से किसी का निर्वहन करने के लिए सशक्त कर सकती है ।
यदि कोई व्यक्ति धारा 369 की उपधारा (2) के उपबंधों के अधीन निरुद्ध किया जाता है और, जेल में निरुद्ध व्यक्ति की दशा में कारागारों का महानिरीक्षक या लोक मानसिक स्वास्थ्य स्थापन में निरुद्ध व्यक्ति की दशा में, मानसिक स्वास्थ्य देख-रेख अधिनियम, 2017 के अधीन गठित मानसिक स्वास्थ्य समीक्षा बोर्ड, प्रमाणित करें कि उसकी या उनकी राय में वह व्यक्ति अपनी प्रतिरक्षा करने में समर्थ है तो वह, यथास्थिति, मजिस्ट्रेट या न्यायालय के समक्ष उस समय, जिसे वह मजिस्ट्रेट या न्यायालय नियत करे, लाया जाएगा और वह मजिस्ट्रेट या न्यायालय उस व्यक्ति के बारे में धारा 371 के उपबंधों के अधीन कार्यवाही करेगा, और पूर्वोक्त महानिरीक्षक या परिदर्शकों का प्रमाणपत्र साक्ष्य के तौर पर ग्रहण किया जा सकेगा ।
1. यदि कोई व्यक्ति धारा 369 की उपधारा (2) या धारा 374 के उपबंधों के अधीन निरुद्ध है और ऐसा महानिरीक्षक या ऐसे परिदर्शक प्रमाणित करते हैं कि उसके या उनके विचार में वह अपने को या किसी अन्य व्यक्ति को क्षति पहुंचाने के खतरे के बिना छोड़ा जा सकता है तो राज्य सरकार तब उसके छोड़े जाने का या अभिरक्षा में निरुद्ध रखे जाने का या, यदि वह पहले ही लोक मानसिक स्वास्थ्य स्थापन नहीं भेज दिया गया है तो ऐसे स्थापन को अन्तरित किए जाने का आदेश दे सकती है और यदि वह उसे लोक मानसिक स्वास्थ्य स्थापन को अन्तरित करने का आदेश देती है तो वह एक न्यायिक और दो चिकित्सा अधिकारियों का एक आयोग नियुक्त कर सकती है |
2. ऐसा आयोग ऐसा साक्ष्य लेकर, जो आवश्यक हो, ऐसे व्यक्ति के चित्त की दशा की यथारीति जांच करेगा और राज्य सरकार को रिपोर्ट देगा, जो उसके छोड़े जाने या निरुद्ध रखे जाने का जैसा वह ठीक समझे, आदेश दे सकती है ।
1. जब कभी धारा 369 या धारा 374 के उपबंधों के अधीन निरुद्ध किसी व्यक्ति का कोई नातेदार या मित्र यह चाहता है कि वह व्यक्ति उसकी देख-रेख और अभिरक्षा में रखे जाने के लिए सौंप दिया जाए जब राज्य सरकार उस नातेदार या मित्र के आवेदन पर और उसके द्वारा ऐसी राज्य सरकार को समाधानप्रद प्रतिभूति इस बाबत दिए जाने पर कि
क. सौंपे गए व्यक्ति की समुचित देख-रेख की जाएगी और वह अपने आपको या किसी अन्य व्यक्ति को क्षति पहुंचाने से निवारित रखा जाएगा ;
ख. सौंपा गया व्यक्ति ऐसे अधिकारी के समक्ष और ऐसे समय और स्थानों पर, जो राज्य सरकार द्वारा निदिष्ट किए जाएं, निरीक्षण के लिए पेश किया जाएगा :
ग. सौंपा गया व्यक्ति, उस दशा में जिसमें वह धारा 369 की उपधारा (2) के अधीन निरुद्ध व्यक्ति है, अपेक्षा किए जाने पर ऐसे मजिस्ट्रेट या न्यायालय के समक्ष पेश किया जाएगा, ऐसे व्यक्ति को ऐसे नातेदार या मित्र को सौंपने का आदेश दे सकेगी ।
2. यदि ऐसे सौंपा गया व्यक्ति किसी ऐसे अपराध के लिए अभियुक्त है, जिसका विचारण उसके विकृत चित्त होने और अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ होने के कारण मुल्तवी किया गया है और उपधारा (1) के खंड (ख) में निर्दिष्ट निरीक्षण अधिकारी किसी समय मजिस्ट्रेट या न्यायालय के समक्ष यह प्रमाणित करता है कि ऐसा व्यक्ति अपनी प्रतिरक्षा करने में समर्थ है तो ऐसा मजिस्ट्रेट या न्यायालय उस नातेदार या मित्र से, जिसे ऐसा अभियुक्त सौंपा गया है, अपेक्षा करेगा कि वह उसे उस मजिस्ट्रेट या न्यायालय के समक्ष पेश करे और ऐसे पेश किए जाने पर वह मजिस्ट्रेट या न्यायालय धारा 371 के उपबंधों के अनुसार कार्यवाही करेगा और निरीक्षण अधिकारी का प्रमाणपत्र साक्ष्य के तौर पर ग्रहण किया जा सकता है ।