
1. यह अध्याय ऐसे अभियुक्त के संबंध में लागू होगा जिसके विरुद्ध-
क. पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा धारा 193 के अधीन यह अभिकथित करते हुए रिपोर्ट अग्रेषित की गई है कि उसके द्वारा ऐसे अपराध से भिन्न कोई अपराध किया गया प्रतीत होता है, जिसके लिए तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन मृत्यु या आजीवन या सात वर्ष से अधिक की अवधि के कारावास के दंड का उपबंध है ; या
ख. मजिस्ट्रेट ने परिवाद पर उस अपराध का संज्ञान ले लिया है जो उस अपराध से भिन्न है, जिसके लिए तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन मृत्यु या आजीवन कारावास या सात वर्ष से अधिक की अवधि के कारावास के दंड का उपबंध है और धारा 223 के अधीन परिवादी और साक्षी की परीक्षा करने के पश्चात् धारा 227 के अधीन आदेशिका जारी की है,
किंतु यह अध्याय वहां लागू नहीं होगा जहां ऐसा अपराध देश की सामाजिक-आर्थिक दशा को प्रभावित करता है या किसी महिला या बालक के विरुद्ध किया गया है ।
2. उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए, केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन वे अपराध अवधारित करेगी जो देश की सामाजिक-आर्थिक दशा को प्रभावित करते हैं ।
290. सौदा अभिवाक् के लिए आवेदन
1. किसी अपराध का अभियुक्त, आरोप की विरचना किए जाने की तारीख से तीस दिन की अवधि के भीतर व्यक्ति, सौदा अभिवाक् के लिए उस न्यायालय में आवेदन फाइल कर सकेगा जिसमें ऐसे अपराध का विचारण लंबित है ।
2. उपधारा (1) के अधीन आवेदन में उस मामले का संक्षिप्त वर्णन होगा जिसके संबंध में आवेदन फाइल किया गया है, और उसमें उस अपराध का वर्णन भी होगा जिससे वह मामला संबंधित है तथा उसके साथ अभियुक्त का शपथ पत्र होगा जिसमें यह कथित होगा कि उसने विधि के अधीन उस अपराध के लिए उपबंधित दंड की प्रकृति और सीमा को समझने के पश्चात् अपने मामले में स्वेच्छा से सौदा अभिवाक् दाखिल किया है और यह कि जिसमें उसे किसी न्यायालय द्वारा इससे पूर्व उसी अपराध में आरोपित ठहराया गया था, सिद्धदोष नहीं ठहराया गया है ।
3. न्यायालय उपधारा (1) के अधीन आवेदन प्राप्त होने के पश्चात् लोक अभियोजक या परिवादी को और साथ ही अभियुक्त को मामले में नियत तारीख को हाजिर होने के लिए सूचना जारी करेगा ।
4. जहां उपधारा (3) के अधीन नियत तारीख को लोक अभियोजक या मामले का परिवादी और अभियुक्त हाजिर होते हैं, वहां न्यायालय अपना समाधान करने के लिए कि अभियुक्त ने आवेदन स्वेच्छा से दाखिल किया है, अभियुक्त की बंद कमरे में परीक्षा करेगा, जहां मामले का दूसरा पक्षकार उपस्थित नहीं होगा और जहां-
क. न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि वह आवेदन अभियुक्त द्वारा स्वेच्छा से फाइल किया गया है, वहां वह लोक अभियोजक या परिवादी और अभियुक्त को मामले के पारस्परिक संतोषप्रद निपटारे के लिए साठ दिन से अनधिक का समय देगा जिसमें अभियुक्त द्वारा पीड़ित व्यक्ति को मामले के दौरान प्रतिकर और अन्य खर्च देना सम्मिलित है और तत्पश्चात् मामले की आगे सुनवाई के लिए तारीख नियत करेगा ;
ख. न्यायालय को यह पता चलता है कि आवेदन अभियुक्त द्वारा स्वेच्छा से फाइल नहीं किया गया है, या उसे किसी न्यायालय द्वारा किसी मामले में जिसमें उस पर उसी अपराध का आरोप था, सिद्धदोष ठहराया गया है तो वह इस संहिता के उपबंधों के अनुसार, उस प्रक्रम से जहां उपधारा (1) के अधीन ऐसा आवेदन फाइल किया गया है, आगे कार्यवाही करेगा ।
धारा 290 की उपधारा (4) के खंड (क) के अधीन पारस्परिक संतोषप्रद निपटारे के लिए, न्यायालय निम्नलिखित प्रक्रिया अपनाएगा, अर्थात् :-
क. पुलिस रिपोर्ट पर संस्थित किसी मामले में, न्यायालय, लोक अभियोजक, पुलिस अधिकारी, जिसने मामले का अन्वेषण किया है, अभियुक्त और मामले में पीड़ित व्यक्ति को, उस मामले का संतोषप्रद निपटारा करने के लिए बैठक में भाग लेने के लिए सूचना जारी करेगा :
परन्तु मामले के संतोषप्रद निपटारे की ऐसी संपूर्ण प्रक्रिया के दौरान न्यायालय का यह कर्तव्य होगा कि वह सुनिश्चित करे कि सारी प्रक्रिया बैठक में भाग लेने वाले पक्षकारों द्वारा स्वेच्छा से पूर्ण की गई है :
परन्तु यह और कि अभियुक्त, यदि ऐसी वांछा करे तो, मामले में लगाए गए अपने अधिवक्ता, यदि कोई हो, के साथ इस बैठक में भाग ले सकेगा ;
ख. पुलिस रिपोर्ट से अन्यथा संस्थित मामले में, न्यायालय, अभियुक्त और उस मामले में पीड़ित व्यक्ति को मामले के संतोषप्रद निपटारे के लिए की जाने वाली बैठक में भाग लेने के लिए सूचना जारी करेगा :
परन्तु न्यायालय का यह कर्तव्य होगा कि वह मामले का संतोषप्रद निपटारा करने की संपूर्ण प्रक्रिया के दौरान यह सुनिश्चित करे कि उसे बैठक में भाग लेने वाले पक्षकारों द्वारा स्वेच्छा से पूरा किया गया है :
परन्तु यह और कि यदि मामले में, पीड़ित व्यक्ति या अभियुक्त, यदि ऐसी वांछा करे, तो वह उस मामले में लगाए गए अपने अधिवक्ता के साथ उस बैठक में भाग ले सकेगा ।
जहां धारा 291 के अधीन बैठक में मामले का कोई संतोषप्रद निपटारा तैयार किया गया है, वहां न्यायालय ऐसे निपटारे की रिपोर्ट तैयार करेगा जिस पर न्यायालय के पीठासीन अधिकारी और उन अन्य सभी व्यक्तियों के हस्ताक्षर होंगे जिन्होंने बैठक में भाग लिया था और यदि ऐसा कोई निपटारा तैयार नहीं किया जा सका है तो न्यायालय ऐसा संप्रेक्षण लेखबद्ध करेगा और इस संहिता के उपबंधों के अनुसार उस प्रक्रम से आगे कार्यवाही करेगा, जहां से उस मामले में धारा 290 की उपधारा (1) के अधीन आवेदन फाइल किया गया है ।
जहां धारा 292 के अधीन मामले का कोई संतोषप्रद निपटारा तैयार किया गया है वहां न्यायालय मामले का निपटारा निम्नलिखित रीति से करेगा, अर्थात् :–
क. न्यायालय, पीड़ित व्यक्ति को धारा 292 के अधीन निपटारे के अनुसार प्रतिकर देगा और दंड की मात्रा, अभियुक्त को सदाचार की परिवीक्षा पर या धारा 401 के अधीन भर्त्सना के पश्चात्, छोड़ने या अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 (1958 का 20) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के उपबंधों के अधीन अभियुक्त के संबंध में कार्रवाई करने के विषय में पक्षकारों की सुनवाई करेगा और अभियुक्त पर दंड अधिरोपित करने के लिए पश्चात्वर्ती खंडों में विनिर्दिष्ट प्रक्रिया का पालन करेगा ;
ख. खंड (क) के अधीन पक्षकारों की सुनवाई के पश्चात् यदि न्यायालय का यह मत हो कि धारा 401 या अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 (1958 का 20) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के उपबंध अभियुक्त के मामले में आकृष्ट होते हैं, तो वह अभियुक्त को परिवीक्षा पर छोड़ सकेगा या ऐसी किसी विधि का लाभ दे सकेगा ;
ग. खंड (ख) के अधीन पक्षकारों को सुनने के पश्चात्, यदि न्यायालय को यह पता चलता है कि अभियुक्त द्वारा किए गए अपराध के लिए विधि में न्यूनतम दंड उपबंधित किया गया है तो वह अभियुक्त को ऐसे न्यूनतम दंड के आधे का दंड दे सकेगा और जहां अभियुक्त प्रथम अपराधी है और पूर्व में किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध नहीं ठहराया गया है, वह अभियुक्त को ऐसे न्यूनतम दंड के एक चौथाई का दंड दे सकेगा;
घ. खंड (ख) के अधीन पक्षकारों को सुनने के पश्चात्, यदि न्यायालय को पता चलता है कि अभियुक्त द्वारा किया गया अपराध खंड (ख) या खंड (ग) के अन्तर्गत नहीं आता है तो वह अभियुक्त को ऐसे अपराध के लिए उपबंधित या बढ़ाए जा सकने वाले दंड के एक-चौथाई का दंड दे सकेगा और जहां अभियुक्त प्रथम अपराधी है और पूर्व में किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध नहीं ठहराया गया है, वह अभियुक्त को ऐसे अपराध के लिए उपबंधित या विस्तारणीय दंड के 1/6 का दंड दे सकेगा ।
294. न्यायालय का निर्णय
न्यायालय, अपना निर्णय, धारा 293 के निबंधनों के अनुसार, खुले न्यायालय में देगा और उस पर न्यायालय के पीठासीन अधिकारी के हस्ताक्षर होंगे ।
295.निर्णय का अंतिम होना
न्यायालय द्वारा इस धारा के अधीन दिया गया निर्णय अंतिम होगा और उससे कोई अपील (संविधान के अनुच्छेद 136 के अधीन विशेष इजाजत याचिका और अनुच्छेद 226 और अनुच्छेद 227 के अधीन रिट याचिका के सिवाय) ऐसे निर्णय के विरुद्ध किसी न्यायालय में नहीं होगी ।
296. सौदा अभिवाक् में न्यायालय की शक्ति
न्यायालय के पास इस अध्याय के अधीन अपने कृत्यों का निर्वहन करने के प्रयोजन के लिए जमानत, अपराधों के विचारण और इस संहिता के अधीन ऐसे न्यायालय में किसी मामले के निपटारे से संबंधित अन्य विषयों के बारे में निहित सभी शक्तियां होंगी।
297.अभियुक्त द्वारा भोगी गई निरोध की अवधि का कारावास के दंडादेश के विरुद्ध मुजरा किया जाना
इस अध्याय के अधीन अधिरोपित कारावास के दंडादेश के विरुद्ध अभियुक्त द्वारा भोगी गई निरोध की अवधि का मुजरा किए जाने के लिए धारा 468 के उपबंध उसी रीति से लागू होंगे जैसे कि वे इस संहिता के किन्हीं अन्य उपबंधों के अधीन कारावास के संबंध में लागू होते हैं ।
298.व्यावृति
इस अध्याय के उपबंध इस संहिता के किन्हीं अन्य उपबंधों में अन्तर्विष्ट उनसे असंगत किसी बात के होते हुए भी प्रभावी होंगे और ऐसे अन्य उपबंधों में किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह इस अध्याय के किसी उपबंध के अर्थ को सीमित करती है ।
स्पष्टीकरण
इस अध्याय के प्रयोजनों के लिए, “लोक अभियोजक” पद का वही अर्थ होगा जो धारा 2 के खंड (फ) के अधीन उसका है और इसमें धारा 19 के अधीन नियुक्त सहायक लोक अभियोजक सम्मिलित है ।
299.अभियुक्त के कथनों का उपयोग न किया जाना
तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, किसी अभियुक्त द्वारा धारा 290 के अधीन फाइल किए गए सौदा अभिवाक् के लिए आवेदन में कथित कथनों या तथ्यों का, इस अध्याय के प्रयोजन के सिवाय किसी अन्य प्रयोजन के लिए उपयोग नहीं किया जाएगा ।
300. अध्याय का लागू होना
इस अध्याय की कोई बात, किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 (2016 का 2) की धारा 2 में
यथापरिभाषित किसी किशोर या बालक को लागू नहीं होगी।