धारा 56 से 93 अध्याय 5 भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023

धारा 56 से 93 अध्याय 5 भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023

अध्याय 5

दस्तावेजी साक्ष्य के विषय में

56. दस्तावेजों की अन्तर्वस्तु का सबूत- 

दस्तावेजों की अन्तर्वस्तु या तो प्राथमिक या द्वितीयक साक्ष्य द्वारा साबित की जा सकेगी।

57. प्राथमिक साक्ष्य-

प्राथमिक साक्ष्य से न्यायालय के निरीक्षण के लिए प्रस्तुत किया गया दस्तावेज स्वयं अभिप्रेत है।

स्पष्टीकरण 1-

जहां कोई दस्तावेज कई मूल प्रतियों में निष्पादित है वहां प्रत्येक मूल प्रति उस दस्तावेज का प्राथमिक साक्ष्य है।

स्पष्टीकरण 2-

जहां कोई दस्तावेज प्रतिलेख में निष्पादित है और प्रत्येक प्रतिलेख पक्षकारों में से केवल एक पक्षकार या कुछ पक्षकारों द्वारा निष्पादित किया गया है, वहां प्रत्येक प्रतिलेख उन पक्षकारों के विरुद्ध, जिन्होंने उसका निष्पादन किया है, प्राथमिक साक्ष्य है।

स्पष्टीकरण 3-

जहां अनेक दस्तावेज एकरूपात्मक प्रक्रिया द्वारा बनाए गए हैं जैसा कि मुद्रण, शिला मुद्रण या फोटो चित्रण में होता है, वहां उनमें से प्रत्येक शेष सबकी अन्तर्वस्तु का प्राथमिक साक्ष्य है, किन्तु जहां वे सब किसी एक ही मूल की प्रतियां हैं वहां वे मूल की अन्तर्वस्तु का प्राथमिक साक्ष्य नहीं है।

स्पष्टीकरण 4-

जहां कोई इलैक्ट्रॉनिक या डिजिटल अभिलेख सृजित या संग्रहित किया जाता है और ऐसा संग्रह एक साथ या पश्चातवर्ती रूप से अनेक फाइलों में किया जाता है, उनमें से प्रत्येक फाइल प्राथमिक साक्ष्य है।

स्पष्टीकरण 5-

जहां कोई इलैक्ट्रानिक या डिजिटल अभिलेख समुचित अभिरक्षा से प्रस्तुत किया जाता है, ऐसा इलैक्ट्रानिक और डिजिटल अभिलेख प्राथमिक साक्ष्य है, जब तक कि वह विवादग्रस्त नहीं है

स्पष्टीकरण 6-

जहां किसी वीडियो रिकार्डिंग को इलेक्ट्रॉनिक प्ररूप में एक साथ संग्रहित किया जाता है और किसी अन्य व्यक्ति को पारेषित या प्रसारित या अंतरित किया जाता है तो प्रत्येक संग्रहित रिकार्डिंग प्राथमिक साक्ष्य है।

स्पष्टीकरण 7-

जहां किसी इलैक्ट्रॉनिक या डिजिटल अभिलेख को किसी कंप्यूटर संसाधन में एक से अधिक संग्रहण स्थान में संग्रहित किया जाता है, ऐसा प्रत्येक स्वचालित संग्रहण, जिसके अंतर्गत अस्थायी फाइलें भी हैं, प्राथमिक साक्ष्य हैं।

दृष्टांत

यह दर्शित किया जाता है कि एक ही समय एक ही मूल से मुद्रित अनेक प्लेकार्ड किसी व्यक्ति के कब्जे में रखे हैं इन प्लेकार्डों में से कोई भी एक अन्य किसी की भी अन्तर्वस्तु का प्राथमिक साक्ष्य है किन्तु उनमें से कोई भी मूल की अन्तर्वस्तु का प्राथमिक साक्ष्य नहीं है।

58. द्वितीयक साक्ष्य -

द्वितीयक साक्ष्य के अन्तर्गत निम्नलिखित आते हैं-

i. इसमें इसके पश्चात् अन्तर्विष्ट उपवन्धों के अधीन दी हुई प्रमाणित प्रतियां;

ii. इसमें इसके पश्चात् अन्तर्विष्ट उपवन्धों के अधीन दी हुई प्रमाणित प्रतियां;

iii. मूल से बनाई गई या तुलना की गई प्रतियां;

iv. उन पक्षकारों के विरुद्ध, जिन्होंने उन्हें निष्पादित नहीं किया है, दस्तावेजों के प्रतिलेख;

v. किसी दस्तावेज की अन्तर्वस्तु का उस व्यक्ति द्वारा, जिसने स्वयं उसे देखा है, दिया हुआ मौखिक वृत्तांत;

vi. मौखिक स्वीकृतियां;

vii. लिखित स्वीकृतियां:

viii. किसी ऐसे व्यक्ति का साक्ष्य, जिसने किसी दस्तावेज की जांच की है, जिसके मूल में अनेक लेखे या अन्य दस्तावेज अंतर्विष्ट हैं, जिनकी सुविधाजनक रूप से न्यायालय में जांच नहीं की जा सकती है और जो ऐसे दस्तावेजों की जांच करने में कुशल है।

दृष्टांत

क. किसी मूल का फोटोचित्र, यद्यपि दोनों की तुलना की गई हो तथापि यदि यह साबित किया जाता है कि फोटोचित्रित वस्तु मूल थी, उस मूल की अन्तर्वस्तु का द्वितीयक साक्ष्य है।

ख. किसी पत्र की वह प्रति, जिसकी तुलना उस पत्र की, उस प्रति से कर ली गई है जो प्रतिलपि यंत्र द्वारा तैयार की गई है, उस पत्र की अन्तर्वस्तु का द्वितीयक साक्ष्य है, यदि यह दर्शित कर दिया जाता है कि प्रतिलिपि यंत्र द्वारा तैयार की गई प्रति मूल से गई थी।

ग. किसी प्रति की नकल करके तैयार की गई किन्तु तत्पश्चात् मूल से तुलना की हुई प्रतिलिपि द्वितीयक साक्ष्य है; किन्तु इस प्रकार तुलना नहीं की हुई प्रति मूल का द्वितीयक साक्ष्य नहीं है, यद्यपि उस प्रति की, जिससे वह नकल की गई है, मूल से तुलना की गई थी।

घ.  तो मूल से तुलना की हुई प्रति का मौखिक वृत्तान्त और मूल के किसी फोटोचित्र या यंत्रकृत प्रति का मौखिक वृत्तान्त मूल का द्वितीयक साक्ष्य है।

59. प्राथमिक साक्ष्य द्वारा दस्तावेजों का साबित किया जाना -

इसमें इसके पश्चात् वर्णित दशाओं के सिवाय, दस्तावेजों को प्राथमिक साक्ष्य द्वारा सावित करना होगा।

60. वे दशाएं, जिनमें दस्तावेजों के सम्बन्ध में द्वितीयक साक्ष्य दिया जा सकेगा-

किसी दस्तावेज के अस्तित्व, परिस्थिति या अन्तर्वस्तु का द्वितीयक साक्ष्य निम्नलिखित दशाओं में दिया जा सकेगा, अर्थात्-

(क) जबकि यह दर्शित कर दिया जाता है या प्रतीत होता है कि मूल ऐसे व्यक्ति के कब्जे में है या उसके अधिकार में है-

i. जिसके विरुद्ध उस दस्तावेज का साबित किया जाना वांछनीय है; या

ii. जो न्यायालय की आदेशिका की पहुंच से बाहर है, या ऐसी आदेशिका के अधीन नहीं है; या

iii. जो उसे प्रस्तुत करने के लिए विधि द्वारा आबद्ध है, और जब ऐसा व्यक्ति धारा 64 में वर्णित सूचना के पश्चात्, उसे प्रस्तुत नहीं करता है;

() जब मूल के अस्तित्व, परिस्थिति या अन्तर्वस्तु को उस व्यक्ति द्वारा, जिसके विरुद्ध उसे सावित किया जाना है या उसके हित प्रतिनिधि द्वारा लिखित रूप में स्वीकृत किया जाना साबित कर दिया गया है;

() जब मूल नष्ट हो गया है, या खो गया है, या जबकि उसकी अन्तर्वस्तु का साक्ष्य देने की प्रस्थापना करने वाला पक्षकार अपने स्वयं के व्यतिक्रम या उपेक्षा से उद्भूत होने वाले अन्य किसी कारण से उसे युक्तियुक्त समय में प्रस्तुत नहीं कर सकता है;

() जब मूल इस प्रकृति का है कि उसे आसानी से स्थानान्तरित नहीं किया जा सकता है;

(ङ) जव मूल धारा 74 के अर्थ के अन्तर्गत एक लोक दस्तावेज है;

(च) जबकि मूल ऐसी दस्तावेज है जिसकी प्रमाणित प्रति का साक्ष्य में दिया जाना इस अधिनियम द्वारा या भारत में प्रवृत्त किसी अन्य विधि द्वारा अनुज्ञात है;

() जब मूल ऐसे अनेक लेखाओं या अन्य दस्तावेजों से गठित है जिनकी न्यायालय में सुविधापूर्वक परीक्षा नहीं की जा सकती और वह तथ्य जिसे सावित किया जाना है, सम्पूर्ण संग्रह का साधारण परिणाम है।

स्पष्टीकरण-

i. खंड (), खंड () और खंड () के प्रयोजनों के लिए दस्तावेजों की अन्तर्वस्तु का कोई भी द्वितीयक साक्ष्य ग्राहय है।

ii. खंड () के प्रयोजनों के लिए लिखित स्वीकृति ग्राह्य है;

iii. खंड () या खंड () के प्रयोजनों के लिए, दस्तावेज की प्रमाणित प्रति ग्राह्य है, किन्तु अन्य किसी भी प्रकार का द्वितीयक साक्ष्य ग्राह्य नहीं है;

iv. खंड () के प्रयोजनों के लिए, दस्तावेजों के साधारण परिणाम का साक्ष्य ऐसे किसी व्यक्ति द्वारा दिया जा सकेगा जिसने उनकी परीक्षा की है और जो ऐसे दस्तावेज की परीक्षा करने में कुशल है।

61. इलैक्ट्रानिक या डिजिटल अभिलेख -

इस अधिनियम की कोई बात इस आधार पर साक्ष्य में किसी इलैक्ट्रानिक या डिजिटल साक्ष्य की ग्राह्यता से इंकार नहीं करेगी कि यह कोई इलैक्ट्रानिक या डिजिटल अभिलेख है और धारा 63 के अधीन रहते हुए ऐसे अभिलेख का, वही विधिक प्रभाव, विधिमान्यता और प्रवर्तनशीलता होगी, जो किसी अन्य अभिलेख की होती है।

62.इलैक्ट्रानिक अभिलेख से संबंधित साक्ष्य के बारे में विशेष उपबंध-

इलैक्ट्रानिक अभिलेख की अंतर्वस्तु धारा 63 के उपबंधों के अनुसार साबित की जा सकेगी।

63. इलैक्ट्रानिक अभिलेखों की ग्राहयता -

1. इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, किसी इलैक्ट्रानिक अभिलेख में अंतर्विष्ट किसी सूचना को भी, जो कंप्यूटर या किसी संसूचना डिवाइस या अन्यथा द्वारा संग्रहित, अभिलिखित या किसी इलैक्ट्रानिकी प्रारूप द्वारा उत्पादित और किसी कागज पर मुद्रित, प्रकाशीय या चुंबकीय मीडिया या अर्ध-चालक मेमोरी में संग्रहित, अभिलिखित या नकल की गई हो (जिसे इसमें इसके पश्चात् कंप्यूटर आउटपुट कहा गया है), तब कोई दस्तावेज समझा जाएगा, यदि प्रश्नगत सूचना और कंप्यूटर के संबंध में, इस धारा में उल्लिखित शर्तें पूरी कर दी जाती हैं और वह मूल की किसी अंतर्वस्तु या उसमें कथित किसी तथ्य के साक्ष्य के रूप में, जिसका प्रत्यक्ष साक्ष्य ग्राह्य होता, अतिरिक्त सबूत या मूल को प्रस्तुत किए बिना ही किन्हीं कार्यवाहियों में ग्राह्य होगा।

2. कंप्यूटर आउटपुट के संबंध में, उपधारा (1) में निर्दिष्त शर्तें निम्नलिखित होंगी, अर्थात्:–

क.सूचना से युक्त कंप्यूटर आउटपुट, कंप्यूटर या संसूचना डिवाइस द्वारा उस अवधि के दौरान उत्पादित किया गया था जिसमें उस व्यक्ति द्वारा, जिसका कंप्यूटर के उपयोग पर विधिपूर्ण नियंत्रण था, उस अवधि में नियमित रूप से किए गए किसी क्रियाकलाप के प्रयोजन के लिए सृजन, सूचना संग्रह करने या प्रोसेस करने के लिए नियमित रूप से कंप्यूटर या संसूचना डिवाइस का उपयोग किया गया था;

ख. उक्त अवधि के दौरान इलैक्ट्रानिक अभिलेख में अन्तर्विष्ट किस्म की सूचना या उस किस्म की जिससे इस प्रकार अन्तर्विष्ट सूचना व्युत्पन्न की जाती है, उक्त क्रियाकलापों के साधारण अनुक्रम में कंप्यूटर या संसूचना डिवाइस में नियमित रूप से भरी गई थी;

ग. उक्त अवधि के महत्वपूर्ण भाग में सर्वत्र, कंप्यूटर या संसूचना डिवाइस समुचित रूप से कार्य कर रही थी या नहीं तो, उस अवधि के संबंध में, जिसमें कंप्यूटर समुचित रूप से कार्य नहीं कर रहा था या वह उस अवधि के भाग के दौरान प्रचालन में नहीं था, ऐसी अवधि नहीं थी जिससे इलैक्ट्रॉनिक अभिलेख या उसकी अंतर्वस्तु की शुद्धता प्रभावित होती हो; और

घ. इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख में अन्तर्विष्ट सूचना ऐसी सूचना से पुनः उत्पादित या व्युत्पन्न की जाती है, जिसे उक्त क्रियाकलापों के साधारण अनुक्रम में कंप्यूटर या संसूचना डिवाइस में भरा गया था।

3. जहां किसी अवधि में, उपधारा (2) के खंड () में यथा उल्लिखित, उस अवधि के दौरान नियमित रूप से किए गए किन्हीं क्रियाकलापों के प्रयोजनों के लिए सूचना के सृजन, संग्रह या प्रोसेस का कार्य एक या अधिक कंप्यूटरों या संसूचना डिवाइस द्वारा नियमित रूप से किया गया था, चाहे वह-

क. एकल ढंग में : या

ख. किसी कंप्यूटर प्रणाली पर या

ग. किसी कंप्यूटर नेटवर्क पर; या

घ. सूचना को समर्थ बनाने, सूचना का सृजन या उपलब्ध कराने वाले, प्रोसेस और संग्रह करने वाले किसी कंप्यूटर साधन पर, और

ङ. किसी मध्यवर्ती के माध्यम से, उस अवधि के दौरान उस प्रयोजन के लिए उपयोग किए गए सभी कंप्यूटरों या संसूचना डिवाइस को इस धारा के प्रयोजनों के लिए एकल कंप्यूटर या संसूचना डिवाइस समझा जाएगा; और इस धारा में किसी कंप्यूटर या संसूचना डिवाइस के प्रति निर्देशों का अर्थ तद्नुसार किया जाएगा।

4. किन्हीं कार्यवाहियों में, जहां इस धारा के आधार पर साक्ष्य में विवरण दिया जाना वांछित है, निम्नलिखित बातों में से किसी बात को पूरा करते हुए प्रमाणपत्र को प्रत्येक बार इलैक्ट्रानिकी अभिलेख के साथ वहां प्रस्तुत किया जाएगा जहां इसे स्वीकृति के लिए प्रस्तुत किया गया है, अर्थात्:-

() विवरण से युक्त इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख की पहचान करना और उस रीति का वर्णन करना जिससे इसका उत्पादन किया गया था;

() उस इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख के उत्पादन में अन्तर्वलित किसी डिवाइस को ऐसी विशिष्टियां देना, जो यह दर्शित करने के प्रयोजन के लिए समुचित हों कि इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख का कंप्यूटर या उपधारा (3) के खंड () से खंड () में निर्दिष्ट किसी संसूचना डिवाइस द्वारा उत्पादन किया गया था;

() ऐसे विषयों में से किसी पर कार्रवाई करना, जिससे उपधारा (2) में उल्लिखित शर्तें संबंधित हैं, और किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षर किए जाने के लिए तात्पर्यित होना, जो कंप्यूटर या संसूचना-डिवाइस या सुसंगत क्रियाकलाप के प्रबंध (जो भी समुचित हो) का भारसाधक है तथा कोई विशेषज्ञ है, अनुसूची में विनिर्दिष्ट प्रमाणपत्र में कथित किसी विषय का साक्ष्य होगा; और इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए किसी ऐसे विषय के बारे में यह कथन पर्याप्त होगा कि कथन करने वाले व्यक्ति के सर्वोत्तम ज्ञान और विश्वास के आधार पर कहा गया है।

5. इस धारा के प्रयोजनों के लिए-

क. सूचना किसी कंप्यूटर या संसूचना डिवाइस को प्रदाय की गई समझी जाएगी यदि यह किसी समुचित रूप में प्रदाय की गई है, चाहे इस प्रकार किया गया प्रदाय सीधे (मानव मध्यक्षेप सहित या रहित) या किसी समुचित उपस्कर के माध्यम द्वारा किया गया हो;

ख. कंप्यूटर उत्पाद को कंप्यूटर या संसूचना डिवाइस द्वारा उत्पादित समझा जाएगा, चाहे यह इसके द्वारा सीधे उत्पादित हो (मानव मध्यक्षेप सहित या रहित) या उपधारा (3) के खंड () से खंड () में यथानिर्दिष्ट किसी समुचित उपस्कर या अन्य इलेक्ट्रॉनिक साधनों के माध्यम से हो।

64. प्रस्तुत करने की सूचना के बारे में नियम-

धारा 60 के खंड () में निर्दिष्ट दस्तावेजों की अन्र्तवस्तु का द्वितीयक साक्ष्य तब तक दिया जा सकेगा, जब तक ऐसे द्वितीयक साक्ष्य देने की प्रस्थापना करने वाले पक्षकार ने उस पक्षकार को, जिसके कब्जे में या अधिकार में वह दस्तावेज है या उसके अधिवक्ता या प्रतिनिधि को, उसे प्रस्तुत करने के लिए ऐसी सूचना, जैसा विधि द्वारा विहित है, और यदि विधि द्वारा कोई सूचना विहित नहीं हो तो ऐसी सूचना, जैसा न्यायालय मामले की परिस्थितियों के अधीन युक्तियुक्त समझता है, दे दिया होः

परन्तु ऐसी सूचना निम्नलिखित दशाओं में से किसी में या किसी भी अन्य दशा में, जिसमें न्यायालय उसके दिए जाने से अभिमुक्ति प्रदान करना उचित समझता है, द्वितीयक साक्ष्य को ग्राह्य बनाने के लिए अपेक्षित नहीं किया जाएगा,-

क. जब साबित किया जाने वाला दस्तावेज स्वयं एक सूचना है;

ख. जब प्रतिपक्षी को मामले की प्रकृति से यह जानना ही होगा कि उसे प्रस्तुत करने की उससे अपेक्षा की जाएगी,

ग. जब यह प्रतीत होता है या साबित किया जाता है कि प्रतिपक्षी ने मूल पर कब्जा कपट या बल द्वारा अभिप्राप्त कर लिया है;

घ. जब मूल, प्रतिपक्षी या उसके अभिकर्ता के पास न्यायालय में है;

ङ. जब प्रतिपक्षी या उसके अभिकर्ता ने दस्तावेज का खो जाना स्वीकार कर लिया है;

च. जब दस्तावेज पर कब्जा रखने वाला व्यक्ति न्यायालय की आदेशिका की पहुंच के बाहर है या ऐसी आदेशिका के अध्यधीन नहीं है।

65. उस व्यक्ति के हस्ताक्षर या हस्तलेख का साबित किया जाना जिसके बारे में अभिकथित है कि उसने प्रस्तुत किए गए दस्तावेज को हस्ताक्षरित किया था या लिखा था।

यदि कोई दस्तावेज, किसी व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षरित या पूर्णतः या भागतः लिखा गया अभिकथित है, तो यह साबित करना होगा कि वह हस्ताक्षर या उस दस्तावेज के उतने का हस्तलेख, जितने के बारे में यह अभिकथित है कि वह उस व्यक्ति के हस्तलेख में है, उसके हस्तलेख में है।

66. इलैक्ट्रानिक हस्ताक्षर के बारे में सबूत-

सुरक्षित इलैक्ट्रानिक हस्ताक्षर के मामले में के सिवाय, यदि यह अभिकथित है। कि किसी हस्ताक्षरकर्ता का इलैक्ट्रानिक हस्ताक्षर इलैक्ट्रानिक अभिलेख में नियत किया गया है तो यह तथ्य साबित किया जाना चाहिए कि ऐसा इलैक्ट्रानिक हस्ताक्षर हस्ताक्षरकर्ता का इलैक्ट्रानिक हस्ताक्षर है।

67. ऐसे दस्तावेज के निष्पादन का साबित किया जाना, जिसका अनुप्रमाणित होना विधि द्वारा अपेक्षित है-

यदि किसी दस्तावेज का अनुप्रमाणित होना विधि द्वारा अपेक्षित है, तो उसे साक्ष्य के रूप में उपयोग में नहीं लाया जाएगा, जब तक कम से कम एक अनुप्रमाणक साक्षी, यदि कोई अनुप्रमाणक साक्षी जीवित हो और न्यायालय की आदेशिका के अध्यधीन हो तथा साक्ष्य देने में समर्थ हो, उसका निष्पादन साबित करने के प्रयोजन से बुलाया गया होः

परन्तु ऐसे किसी दस्तावेज के निष्पादन को साबित करने के लिए, जो वसीयत नहीं है, और जो भारतीय रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) के उपबन्धों के अनुसार रजिस्ट्रीकृत है, किसी अनुप्रमाणक साक्षी को बुलाना आवश्यक नहीं होगा, जब तक उसका निष्पादन, उस व्यक्ति द्वारा जिसके द्वारा उसका निष्पादित होना तात्पर्पित है विनिर्दिष्ट रूप से इंकार किया गया हो।

68. जब किसी भी अनुप्रमाणक साक्षी का पता चले, तब सबूत-

यदि ऐसे किसी अनुप्रमाणक साक्षी का पता चल सके तो यह साबित करना होगा कि कम से कम एक अनुप्रमाणक साक्षी का अनुप्रमाण उसी के हस्तलेख में है, और यह कि दस्तावेज का निष्पादन करने वाले व्यक्ति का हस्ताक्षर उसी व्यक्ति के हस्तालेख में है

69. अनुप्रमाणित दस्तावेज के पक्षकार द्वारा निष्पादन की स्वीकृति-

अनुप्रमाणित दस्तावेज के किसी पक्षकार की अपने द्वारा उसका निष्पादन करने की स्वीकृति उस दस्तावेज के निष्पादन का उसके विरुद्ध पर्याप्त सबूत होगा, यद्यपि वह ऐसा दस्तावेज हो जिसका अनुप्रमाणित होना विधि द्वारा अपेक्षित है।

70. जब अनुप्रमाणक साक्षी निष्पादन से इंकार करता है, तब सबूत-

यदि अनुप्रमाणक साक्षी दस्तावेज के निष्पादन से इंकार करे या उसे उसके निष्पादन का स्मरण हो, तो उसका निष्पादन अन्य साक्ष्य द्वारा साबित किया जा सकेगा।

71. उस दस्तावेज का साबित किया जाना जिसका अनुप्रमाणित होना विधि द्वारा अपेक्षित नहीं है-

कोई अनुप्रमाणित दस्तावेज, जिसका अनुप्रमाणित होना विधि द्वारा अपेक्षित नहीं है, ऐसे साबित की जा सकेगा, मानो वह अनुप्रमाणित नहीं है।

72.  हस्ताक्षर, लेख या मुद्रा की तुलना अन्य से करना जो स्वीकृत या साबित हैं-

1. यह अभिनिश्चित करने के लिए कि क्या कोई हस्ताक्षर, लेख या मुद्रा उस व्यक्ति की है, जिसके द्वारा उसका लिखा या किया जाना तात्पर्यित है किसी हस्ताक्षर, लेख या मुद्रा की, जिसके बारे में यह स्वीकृत है या न्यायालय को समाधानप्रद रूप में साबित कर दिया गया है कि वह उस व्यक्ति द्वारा लिखा गया या किया गया था, उससे तुलना की जा सकेगी, जिसे साबित किया जाना है, यद्यपि वह हस्ताक्षर, लेख या मुद्रा किसी अन्य प्रयोजन के लिए प्रस्तुत या साबित नहीं की गई हो।

2. न्यायालय में उपस्थित किसी व्यक्ति को किन्हीं शब्दों या अंकों के लिखने का निदेश न्यायालय इस प्रयोजन से दे सकेगा कि ऐसे लिखे गए शब्दों या अंकों की किन्हीं ऐसे शब्दों या अंकों से तुलना करने के लिए न्यायालय समर्थ हो सके जिनके बारे में अभिकथित है कि वे उस व्यक्ति द्वारा लिखे गए थे।

3. यह धारा किन्हीं आवश्यक परिवर्तनों के साथ अंगुली छापों को भी लागू होती है।

73. डिजिटल हस्ताक्षर के सत्यापन के बारे में सबूत-

यह अभिनिश्चित करने के लिए कि क्या कोई डिजिटल हस्ताक्षर उस व्यक्ति का है जिसके द्वारा उसका किया जाना तात्पर्यित है, न्यायालय यह निदेश दे सकेगा कि-

क. वह व्यक्ति या नियंत्रक या प्रमाणकर्ता प्राधिकारी डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाणपत्र पेश करे;

ख. कोई अन्य व्यक्ति डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाणपत्र में सूचीबद्ध लोक कुंजी के लिए आवेदन करे और उस डिजिटल हस्ताक्षर को, जिसका उस व्यक्ति द्वारा किया जाना तात्पर्यित है, सत्यापित करे

लोक दस्तावेज

74. लोक और प्राइवेट दस्तावेज -

1. निम्नलिखित दस्तावेज, लोक दस्तावेज हैं-

क. वे दस्तावेज, जो-

i. प्रभुतासम्पन्न प्राधिकारी के;

ii. शासकीय निकायों और अधिकरणों के; और

iii. भारत के या किसी विदेश के विधायी, न्यायिक और कार्यपालक लोक अधिकारियों के, कार्यों के रूप में या कार्यों के अभिलेख के रूप में हैं;

ख. किसी राज्य या संघ राज्यक्षेत्र में रखे गए प्राइवेट दस्तावेजों के लोक अभिलेख|

2. उपधारा (1) में निर्दिष्ट दस्तावेजों के सिवाय अन्य सभी दस्तावेज प्राइवेट हैं।

75. लोक दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां-

प्रत्येक लोक अधिकारी, जिसकी अभिरक्षा में कोई ऐसा लोक दस्तावेज है, जिसका निरीक्षण करने का किसी भी व्यक्ति को अधिकार है, मांग किए जाने पर उस व्यक्ति को उसकी प्रति उसके लिए विधिक फीस के संदाय पर ऐसी प्रति के नीचे इस लिखित प्रमाणपत्र के सहित देगा कि वह, यथास्थिति, ऐसी दस्तावेज की या उसके भाग की शुद्ध प्रति है तथा ऐसा प्रमाणपत्र ऐसे अधिकारी द्वारा दिनांकित किया जाएगा और उसके नाम और पदाभिधान से हस्ताक्षरित किया जाएगा तथा जब कभी ऐसा अधिकारी विधि द्वारा किसी मुद्रा का उपयोग करने के लिए प्राधिकृत है तब मुद्रायुक्त किया जाएगा, तथा इस प्रकार प्रमाणित ऐसी प्रतियां प्रमाणित प्रतियां कहलाएंगी।

स्पष्टीकरण-

कोई अधिकारी, जो पदीय कर्तव्य के साधारण अनुक्रम में ऐसी प्रतियां परिदान करने के लिए प्राधिकृत है, वह इस धारा के अर्थ के अन्तर्गत ऐसे दस्तावेजों की अभिरक्षा रखता है, यह समझा जाएगा।

76. प्रमाणित प्रतियों को प्रस्तुत करने के द्वारा दस्तावेजों का सबूत-

ऐसी प्रमाणित प्रतियां, उन लोक दस्तावेजों की या उन लोक दस्तावेज के भागों की अन्तर्वस्तु के सबूत में प्रस्तुत की जा सकेंगी जिनकी वे प्रतियां होना तात्पर्थित हैं।

77. अन्य शासकीय दस्तावेजों का सबूत-

निम्नलिखित लोक दस्तावेज, निम्नलिखित रूप से साबित किए जा सकेंगे

क. केन्द्रीय सरकार के किसी मंत्रालय और विभाग के, या किसी राज्य सरकार के, या किसी राज्य सरकार या संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन के किसी विभाग के अधिनियम, आदेश या अधिसूचनाएं,-

i. उन विभागों के अभिलेखों द्वारा, जो क्रमशः उन विभागों के प्रमुख द्वारा प्रमाणित हैं; या

ii. किसी दस्तावेज द्वारा, जिसका ऐसी किसी सरकार के आदेश द्वारा मुद्रित होना तात्पर्थित है;

ख. संसद या किसी राज्य विधान मंडल की कार्यवाहियां, क्रमशः इन निकायों के जर्नलों द्वारा या प्रकाशित अधिनियमों या सारांशों द्वारा, या संबद्ध सरकार के आदेश द्वारा मुद्रित होना तात्पर्यित होने वाली प्रतियों द्वारा; 

ग. भारत के राष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल या संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासक या उपराज्यपाल द्वारा निकाली गई उद्घोषणाएं, आदेश या विनियम, राजपत्र में अंतर्विष्ट प्रतियों या उद्धरणों द्वारा;

घ. किसी विदेश की कार्यपालिका के कार्य या विधान मंडल की कार्यवाहियां, उनके प्राधिकार से प्रकाशित, या उस देश में सामान्यतः इस रूप में सामान्यतः प्राप्त, जर्नलों द्वारा, या उस देश या प्रभुत्वसंपन्न की मुद्रा के अधीन प्रमाणित प्रति द्वारा, या किसी केन्द्रीय अधिनियम में उनकी मान्यता द्वारा,

ङ. किसी राज्य के नगरपालिका या स्थानीय निकाय की कार्यवाहियां ऐसी कार्यवाहियों की ऐसी प्रति द्वारा, जो उनके विधिक पालक द्वारा प्रमाणित है, या ऐसे निकाय के प्राधिकार से प्रकाशित हुई तात्पर्यित होने वाली किसी मुद्रित पुस्तक द्वारा;

च. किसी विदेश का किसी अन्य प्रकार का लोक दस्तावेज, जो मूल द्वारा या उसके विधिक पालक द्वारा प्रमाणित किसी प्रति द्वारा, जिस प्रति के साथ किसी नोटरी पब्लिक की, या भारतीय कौंसल या राजनयिक अभिकर्ता की मुद्रा के अधीन यह प्रमाणपत्र है कि वह प्रति मूल की विधिक अभिरक्षा रखने वाले अधिकारी द्वारा सम्यक् रूप से प्रमाणित है, तथा उस दस्तावेज की प्रकृति उस विदेश की विधि के अनुसार साबित किए जाने के द्वारा।

दस्तावेजों के बारे में उपधारणाएं

78. प्रमाणित प्रतियों के असली होने के बारे में उपधारणा-

1. न्यायालय प्रत्येक ऐसी दस्तावेज का असली होना उपधारित करेगा, जो ऐसा प्रमाणपत्र, प्रमाणित प्रति या अन्य दस्तावेज होना तात्पर्यित है, जिसका किसी विशिष्ट तथ्य के साक्ष्य के रूप में ग्राह्य होना विधि द्वारा घोषित है और जिसका केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार के किसी अधिकारी द्वारा, सम्यक् रूप से प्रमाणित होना तात्पर्यित है:

परन्तु यह तब जबकि ऐसा दस्तावेज सारत: उस प्ररूप में हो तथा ऐसी रीति से निष्पादित हुआ तात्पर्यित हो जो विधि द्वारा उस निमित्त निदेशित है।

2. न्यायालय यह भी उपधारित करेगा कि कोई अधिकारी, जिसके द्वारा ऐसी दस्तावेज का हस्ताक्षरित या प्रमाणित होना तात्पर्यित है, वह पदीय हैसियत, जिसका वह ऐसे कागज में दावा करता है, उस समय रखता था, जब उसने उसे हस्ताक्षरित किया था।

79. साक्ष्य, आदि के अभिलेख के रूप में प्रस्तुत दस्तावेजों के बारे में उपधारणा-

जब कमी किसी न्यायालय के समक्ष कोई ऐसा दस्तावेज प्रस्तुत किया जाता है, जिसका किसी न्यायिक कार्यवाही में, या विधि द्वारा ऐसा साक्ष्य लेने के लिए प्राधिकृत किसी अधिकारी के समक्ष, किसी साक्षी द्वारा दिए गए साक्ष्य या साक्ष्य के किसी भाग का अभिलेख या ज्ञापन होना या किसी बंदी या अभियुक्त का विधि के अनुसार लिया गया कथन या संस्वीकृति होना तात्पर्यित है और जिसका किसी न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट द्वारा या पूर्वोक्त प्रकार के ऐसे किसी अधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित होना तात्पर्थित है, तव न्यायालय यह उपधारित करेगा कि,-

i. वह दस्तावेज असली है;

ii. उन परिस्थितियों के बारे में, जिनके अधीन वह लिया गया था, कोई भी कथन, जिनका उसको हस्ताक्षरित करने वाले व्यक्ति द्वारा किया जाना तात्पर्यत है, सत्य हैं और;

iii. ऐसा साक्ष्य, कथन या संस्वीकृति सम्यक् रूप से ली गई थी।

80. राजपत्रों, समाचारपत्रों और अन्य दस्तावेजों के बारे में उपधारणा-

न्यायालय प्रत्येक ऐसे दस्तावेज का असली होना उपधारित करेगा, जिसका राजपत्र होना, या समाचारपत्र या जर्नल होना तात्पर्यित है और प्रत्येक ऐसे दस्तावेज का, जिसका ऐसा दस्तावेज होना तात्पर्यित है, जिसका किसी व्यक्ति द्वारा रखा जाना किसी विधि द्वारा निदेशित है, यदि ऐसा दस्तावेज सारतः उस प्ररूप में रखा गया है, जो विधि द्वारा अपेक्षित है, और उचित अभिरक्षा में से प्रस्तुत किया गया है।

स्पष्टीकरण-

इस धारा और धारा 92 के प्रयोजनों के लिए, कोई दस्तावेज उचित अभिरक्षा में रखा गया कहा जाता है, यदि वह उस स्थान में रखा गया है, जिसमें उस व्यक्ति द्वारा उसका ध्यान रखा जाता है, जिसके पास ऐसा दस्तावेज रखा जाना अपेक्षित है; किंतु कोई अभिरक्षा अनुचित नहीं है, यदि इसका वैध उत्पन्न होना साबित होता है, या किसी विशेष मामले की परिस्थितियां ऐसी है, जो उस उत्पत्ति को प्रायिक बनाती है।

81. इलैक्ट्रानिक या डिजिटल अभिलेख में राजपत्र के बारे में उपधारणा-

न्यायालय, ऐसे प्रत्येक इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल अभिलेख का असली होना उपधारित करेगा, जिसका राजपत्र होना तात्पर्यित है, या जिसका ऐसा इलैक्ट्रॉनिक या डिजिटल अभिलेख होना तात्पर्यित है, जिसका किसी व्यक्ति द्वारा रखा जाना किसी विधि द्वारा निर्दिष्ट है, यदि ऐसा इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल अभिलेख सारतः उस रूप में रखा गया हो, जो विधि द्वारा अपेक्षित है और उचित अभिरक्षा से प्रस्तुत किया गया हो।

स्पष्टीकरण-

इस धारा और धारा 93 के प्रयोजन के लिए, कोई इलैक्ट्रॉनिक अभिलेख उचित अभिरक्षा में रखा गया कहा जाता है, यदि वह उस स्थान में रखा है, जिसमें उस व्यक्ति द्वारा उसका ध्यान रखा जाता है, जिसके पास ऐसा दस्तावेज रखा जाना अपेक्षित है; किंतु कोई अभिरक्षा अनुचित नहीं है, यदि इसका वैध उत्पन्न होना साबित होता हो, या किसी विशेष मामले की परिस्थितियां ऐसी है, जो ऐसी उत्पत्ति को प्रायिक बनाती है।

82.सरकार के प्राधिकार द्वारा बनाए गए मानचित्रों या रेखांकों के बारे में उपधारणा-

न्यायालय यह उपधारित करेगा कि वे मानचित्र या रेखांक, जो केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार के प्राधिकार द्वारा बनाए गए तात्पर्यित हैं, वैसे ही बताए गए थे और वे शुद्ध हैं, किन्तु किसी मामले के प्रयोजनों के लिए बनाए गए मानचित्रों या रेखांकों के बारे में यह साबित करना होगा कि वे सही हैं।

83.विधियों के संग्रह और विनिश्चयों की रिपोर्टों के बारे में उपधारणा -

न्यायालय, प्रत्येक ऐसी पुस्तक का, जिसका किसी देश की सरकार के प्राधिकार के अधीन मुद्रित या प्रकाशित होना और जिसमें उस देश की कोई विधि अन्तर्विष्ट होना तात्पर्यित है, तथा प्रत्येक ऐसी पुस्तक का, जिसमें उस देश के न्यायालय के विनिश्चयों की रिपोर्टें अन्तर्विष्ट होना तात्पर्यित है, असली होना उपधारित करेगा।

84. मुख्तारनामों के बारे में उपधारणा-

न्यायालय यह उपधारित करेगा कि प्रत्येक ऐसा दस्तावेज, जिसका मुख्तारनामा होना और नोटरी पब्लिक या किसी न्यायालय, न्यायाधीश, मजिस्ट्रेट, भारतीय कौंसल या उपकौंसल या केन्द्रीय सरकार के प्रतिनिधि के समक्ष निष्पादित होना और उसके द्वारा अधिप्रमाणीकृत होना तात्पर्थित है, ऐसे निष्पादित और अधिप्रमाणीकृत किया गया था।

85. इलैक्ट्रानिक करारों के बारे में उपधारणा -

न्यायालय यह उपधारणा करेगा कि प्रत्येक इलैक्ट्रानिक अभिलेख जो पक्षकारों के इलैक्ट्रानिक या डिजिटल हस्ताक्षर को अन्तर्विष्ट करने वाला ऐसा करार होना तात्पति है, इस प्रकार पक्षकारों के इलैक्ट्रानिक या डिजिटल हस्ताक्षर के साथ दिया गया था।

86.इलैक्ट्रानिक अभिलेखों और इलैक्ट्रानिक हस्ताक्षर के बारे में उपधारणा-

1. किन्हीं ऐसी कार्यवाहियों में, जिनमें सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख अंतर्वलित है, जब तक इसके प्रतिकूल साबित नहीं कर दिया जाता, न्यायालय यह उपधारित करेगा कि सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख को, किसी ऐसे विनिर्दिष्ट समय से, जिससे सुरक्षित प्रास्थिति संबंधित है, परिवर्तित नहीं किया गया है।

2. किसी ऐसी कार्यवाहि में, जिनमें सुरक्षित इलैक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर अन्तर्वलित है, जब तक इसके प्रतिकूल सावित नहीं कर दिया जाता, न्यायालय यह उपधारित करेगा कि, -

क. उपयोगकर्ता द्वारा सुरक्षित इलैक्ट्रानिक हस्ताक्षर इलैक्ट्रानिक अभिलेख को चिह्नित या अनुमोदित करने के आशय से किया गया है;

ख. सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख या सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर की दशा में के सिवाय, इस धारा की कोई बात इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख या इलैक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर की अधिप्रमाणिकता और समग्रता से संबंधित किसी उपधारणा का सृजन नहीं करेगी।

87. इलैक्ट्रानिक हस्ताक्षर प्रमाणपत्रों के बारे में उपधारणा-

जब तक इसके प्रतिकूल साबित नहीं कर दिया जाता, न्यायालय, यह उपधारित करेगा कि यदि उपयोगकर्ता द्वारा प्रमाणपत्र को स्वीकार किया गया था तो इलैक्ट्रानिक हस्ताक्षर प्रमाणपत्र में सूचीबद्ध सूचना सही है, सिवाय उस सूचना के जो उपयोगकर्ता की सूचना के रूप में विनिर्दिष्ट है जिसे सत्यापित नहीं किया गया है

88. विदेशी न्यायिक अभिलेखों की प्रमाणित प्रतियों के बारे में उपधारणा-

1. न्यायालय यह उपधारित कर सकेगा कि भारत के बाहर ऐसे किसी देश के न्यायिक अभिलेख की प्रमाणित प्रति तात्पर्यित होने वाला कोई दस्तावेज असली और शुद्ध है, यदि वह दस्तावेज किसी ऐसी रीति से प्रमाणित होना तात्पर्यित हो जिसका न्यायिक अभिलेखों की प्रतियों के प्रमाणन के लिए उस देश में साधारणतः काम में लाई जाने वाली रीति होना ऐसे देश में या उसके लिए केन्द्रीय सरकार के किसी प्रतिनिधि द्वारा प्रमाणित है।

2. ऐसा अधिकारी, जो भारत के बाहर ऐसे किसी राज्यक्षेत्र या स्थान के लिए, साधारण खण्ड अधिनियम, 1897 (1897 का 10) की धारा 3 के खण्ड (43) में यथा परिभाषित राजनैतिक अभिकर्ता है, वह इस धारा के प्रयोजनों के लिए केन्द्रीय सरकार का उस देश में, और उस देश के लिए प्रतिनिधि समझा जाएगा, जिसमें वह राज्यक्षेत्र या स्थान समाविष्ट है।

89. पुस्तक, मानचित्रों और चार्टी के बारे में उपधारणा-

न्यायालय यह उपधारित कर सकेगा कि कोई पुस्तक, जिसे वह लोक या साधारण हित सम्बन्धी विषयो की जानकारी के लिए देखे और कोई प्रकाशित मानचित्र या चार्ट का कथन सुसंगत तथ्य हैं, और जो उसके निरीक्षणार्थ प्रस्तुत किया गया है, उस व्यक्ति द्वारा तथा उस समय और उस स्थान पर लिखा गया था और प्रकाशित किया गया था जिसके द्वारा या जिस समय या स्थान पर उसका लिखा जाना या प्रकाशित होना तात्पर्थित है।

90. इलैक्ट्रानिक संदेशों के बारे में उपधारणा-

न्यायालय यह उपधारित कर सकेगा कि आरंभकर्ता द्वारा ऐसे प्रेषिती को किसी इलैक्ट्रॉनिक मेल सर्वर के माध्यम से अग्रेषित कोई इलैक्ट्रॉनिक संदेश, जिसे ऐसे संदेश का संबोधित किया जाना तात्पर्थित है, उस संदेश के समरूप है, जो पारेषण के लिए उसके कंप्यूटर में भरा गया था; किंतु न्यायालय, उस व्यक्ति के बारे में, जिसके द्वारा ऐसा संदेश भेजा गया था, कोई उपधारणा नहीं करेगा।

91. प्रस्तुत नहीं किए गए दस्तावेजों के सम्यक् निष्पादन, आदि के बारे में उपधारणा-

न्यायालय यह उपधारित करेगा कि प्रत्येक ऐसा दस्तावेज, जिसे प्रस्तुत करने की अपेक्षा की गई थी और जो प्रस्तुत करने की सूचना के पश्चात् प्रस्तुत नहीं किया गया है, विधि द्वारा अपेक्षित रीति में अनुप्रमाणित, स्टाम्पित और निष्पादित किया गया था।

92. तीस वर्ष पुराने दस्तावेजों के बारे में उपधारणा-

जहां कोई दस्तावेज, जिसका तीस वर्ष पुराना होना तात्पर्यित है या सावित किया गया है, ऐसी किसी अभिरक्षा में से, जिसे न्यायालय उस विशिष्ट मामले में उचित समझता है, प्रस्तुत किया गया है, वहां न्यायालय यह उपधारित कर सकेगा कि ऐसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर और उसका प्रत्येक अन्य भाग, जिसका किसी विशिष्ट व्यक्ति के हस्तलेख में होना तात्पर्यित है, उस व्यक्ति के हस्तलेख में है, और निष्पादित या अनुप्रमाणित दस्तावेज होने की दशा में यह उपधारित कर सकेगा कि वह उन व्यक्तियों द्वारा सम्यक् रूप में निष्पादित और अनुप्रमाणित किया गया था, जिनके द्वारा उसका निष्पादित और अनुप्रमाणित होना तात्पर्यित है।

स्पष्टीकरण-

धारा 80 का स्पष्टीकरण इस धारा को भी लागू होगा।

दृष्टांत

क.  भू-सम्पत्ति पर दीर्घकाल से कब्जा रखता आया है यह उस भूमि सम्बन्धी विलेख, जिनसे उस भूमि पर उसका हक दर्शित है, अपनी अभिरक्षा में से प्रस्तुत करता है यह अभिरक्षा उचित होगी

ख.  उस भू-सम्पत्ति से सम्बद्ध विलेख, जिनका वह बन्धकदार है, प्रस्तुत करता है। बंधककर्ता सम्पत्ति पर कब्जा रखता है। यह अभिरक्षा उचित होगी।

ग.  का संबंधी , के कब्जे वाली भूमि से सम्बन्धित विलेख प्रस्तुत करता है, जिन्हें ने उसके पास सुरक्षित अभिरक्षा के लिए जमा किया था। यह अभिरक्षा उचित होगी। 

93.पांच वर्ष पुराने इलैक्ट्रानिक अभिलेखों के बारे में उपधारणा -

जहां कोई इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख, जिसका पांच वर्ष पुराना होना तात्पर्यित है या साबित किया गया है, ऐसी किसी अभिरक्षा से जिसे न्यायालय उस विशिष्ट मामले में उचित समझता है, प्रस्तुत किया गया है, वहां न्यायालय, यह उपधारित कर सकेगा कि ऐसा इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर, जिसका किसी विशिष्ट व्यक्ति का निक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर होना तात्पर्थित है, उसके द्वारा या उसकी ओर से इस निमित्त प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा किया गया था।

स्पष्टीकरण-

धारा 81 का स्पष्टीकरण इस धारा को भी लागू होगा।

 

 

 

 

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