धारा 140 से 168 अध्याय 10 भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023

धारा 140 से 168 अध्याय 10 भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023

अध्याय 10

साक्षियों की परीक्षा के विषय में

140. साक्षियों की प्रस्तुत करने और उनकी परीक्षा का क्रम-

साक्षियों की प्रस्तुत करने और उनकी परीक्षा का क्रम, क्रमशः सिविल और दण्ड प्रक्रिया से तत्समय सम्बन्धित विधि और पद्धति द्वारा, तथा ऐसी किसी विधि के अभाव में न्यायालय के विवेक द्वारा, विनियमित होगा।

141.न्यायाधीश साक्ष्य की ग्राहयता के बारे में निश्चय करेगा-

1. जब दोनों में से कोई पक्षकार किसी तथ्य का साक्ष्य देने की प्रस्थापना करता है, तब न्यायाधीश साक्ष्य देने की प्रस्थापना करने वाले पक्षकार से पूछ सकेगा कि अभिकथित तथ्य, यदि वह साबित हो जाए, किस प्रकार सुसंगत होगा और यदि न्यायाधीश यह समझता है कि वह तथ्य यदि साबित हो गया तो सुसंगत होगा, तो वह उस साक्ष्य को ग्रहण करेगा, अन्यथा नहीं।

2. यदि यह तथ्य, जिसका साबित करना प्रस्थापित है, ऐसा है जिसका साक्ष्य किसी अन्य तथ्य के साबित होने पर ही ग्राह्य होता है, तो ऐसा अन्तिम वर्णित तथ्य प्रथम वर्णित तथ्य का साक्ष्य दिए जाने के पूर्व साबित करना होगा, जब तक कि पक्षकार ऐसे तथ्य को साबित करने का वचन दे और न्यायालय ऐसे वचन से संतुष्ट हो जाए।

3. यदि एक अभिकथित तथ्य की सुसंगति अन्य अभिकथित तथ्य के प्रथम साबित होने पर निर्भर हो, तो न्यायाधीश अपने विवेकानुसार या तो दूसरे तथ्य के साबित होने के पूर्व प्रथम तथ्य का साक्ष्य दिया जाना अनुज्ञात कर सकेगा, या प्रथम तथ्य का साक्ष्य दिए जाने के पूर्व द्वितीय तथ्य का साक्ष्य दिए जाने की अपेक्षा कर सकेगा

दृष्टांत

क. यह प्रस्थापना की गई है कि किसी व्यक्ति के, जिसका मृत होना अभिकथित है, सुसंगत तथ्य के बारे में कचन को, जो कि धारा 26 के अधीन सुसंगत है, साबित किया जाए। इससे पूर्व कि उस कथन का साक्ष्य दिया जाए उस कथन को साबित करने की प्रस्थापना करने वाले व्यक्ति को यह तथ्य साबित करना होगा कि वह व्यक्ति मर गया है।

ख. यह प्रस्थापना की गई है कि एक ऐसी दस्तावेज की अन्तर्वस्तु को, जिसका खो गया होना कथित है, प्रतिलिपि द्वारा सावित किया जाए। यह तथ्य कि मूल खो गया है प्रतिलिपि प्रस्तुत करने की प्रस्थापना करने वाले व्यक्ति को वह प्रतिलिपि प्रस्तुत करने से पूर्व साबित करना होगा।

ग.  चुराई हुई सम्पति को यह जानते हुए कि वह चुराई हुई है, प्राप्त करने का अभियुक्त है। यह साबित करने की प्रस्थापना की गई है कि उसने उस सम्पति के कब्जे का इंकार किया। इस इंकार की सुसंगति सम्पत्ति की पहचान पर निर्भर है। न्यायालय अपने विवेकानुसार या तो कब्जे के इंकार के साबित होने से पूर्व सम्पत्ति की पहचान की जानी अपेक्षित कर सकेगा, या सम्पत्ति की पहचान किए जाने के पूर्व कब्जे के इंकार को साबित किए जाने की अनुज्ञा दे सकेगा।

घ. किसी तथ्य के, जिसका किसी विवाद्यक तथ्य का हेतुक या परिणाम होना कथित है, सावित करने की प्रस्थापना की गई है। कई मध्यान्तरिक तथ्य , और हैं, जिनका, इससे पूर्व कि तथ्य उस विवाद्यक तथ्य का हेतुक या परिणाम माना जा सके, अस्तित्व में होना दर्शित किया जाना आवश्यक है। न्यायालय या तो , या के साबित किए जाने के पूर्व के साबित किए जाने की अनुज्ञा दे सकेगा, या का साबित किया जाना अनुज्ञात करने के पूर्व , और का सावित किया जाना अपेक्षित कर सकेगा।

142.साक्षियों की परीक्षा -

1. किसी साक्षी की उस पक्षकार द्वारा परीक्षा, जो उसे बुलाता है, उसकी मुख्य परीक्षा कहलाएगी।

2. किसी साक्षी की प्रतिपक्षी द्वारा की गई परीक्षा उसकी प्रतिपरीक्षा कहलाएगी।

3. किसी साक्षी की प्रतिपरीक्षा के पश्चात् उसकी उस पक्षकार द्वारा परीक्षा, जिसने उसे बुलाया था, उसकी पुनः परीक्षा कहलाएगी।

143.परीक्षाओं का क्रम-

1. साक्षियों से प्रथमतः मुख्यपरीक्षा होगी, तत्पश्चात् (यदि प्रतिपक्षी ऐसा चाहे तो) प्रतिपरीक्षा होगी, तत्पश्चात् (यदि उसे बुलाने वाला पक्षकार ऐसा चाहे तो) पुनः परीक्षा होगी

2. मुख्यपरीक्षा और प्रतिपरीक्षा, सुसंगत तथ्यों से सम्बन्धित होनी चाहिए, किन्तु प्रतिपरीक्षा का उन तथ्यों तक सीमित रहना आवश्यक नहीं है, जिनकी साक्षी ने अपनी मुख्यपरीक्षा में परिसाक्ष्य दिया है।

3. पुनः परीक्षा उन बातों के स्पष्टीकरण के प्रति निदेशित होगी, जो प्रतिपरीक्षा में निर्दिष्ट हुए हों, तथा यदि पुनः परीक्षा में न्यायालय की अनुमति से कोई नई बात प्रविष्ट की गई है, तो प्रतिपक्षी उस बात के बारे में अतिरिक्त प्रतिपरीक्षा कर सकेगा।

144. किसी दस्तावेज को प्रस्तुत करने के लिए बुलाए गए व्यक्ति की प्रतिपरीक्षा-

किसी दस्तावेज को प्रस्तुत करने के लिए समनित व्यक्ति केवल इस तथ्य के कारण कि वह उसे प्रस्तुत करता है साक्षी नहीं हो जाता जब तक कि वह साक्षी के तौर पर बुलाया नहीं जाता, उसकी प्रतिपरीक्षा नहीं की जा सकती

145. शील का साक्ष्य देने वाले साक्षी-

शील का साक्ष्य देने वाले साक्षियों की प्रतिपरीक्षा और पुनः परीक्षा की जा सकेगी।

146. सूचक प्रश्न-

1. कोई प्रश्न, जो उस उत्तर को सुझाता है, जिसे पूछने वाला व्यक्ति पाना चाहता है या पाने की आशा करता है, सूचक प्रश्न कहा जाता है।

2. सूचक प्रश्न मुख्यपरीक्षा में या पुनः परीक्षा में, यदि विरोधी पक्षकार द्वारा आक्षेप किया जाता है, न्यायालय की अनुज्ञा के बिना नहीं पूछे जाने चाहिएं।

3. न्यायालय उन बातों के बारे में, जो पुनःस्थापना के रूप में या निर्विवाद है या जो उसकी राय में पहले से ही पर्याप्त रूप से साबित हो चुकी हैं, सूचक प्रश्नों के लिए अनुमति देगा।

4. सूचक प्रश्न प्रतिपरीक्षा में पूछे जा सकेंगे।

147.लेखबद्ध विषयों के बारे में साक्ष्य-

किसी साक्षी से, जब वह परीक्षाधीन है, यह पूछा जा सकेगा कि क्या कोई संविदा, अनुदान या सम्पत्ति का अन्य व्ययन, जिसके बारे में वह साक्ष्य दे रहा है, किसी दस्तावेज में अन्तर्विष्ट नहीं था, और यदि वह कहता है कि वह था, या यदि वह किसी ऐसी दस्तावेज की अन्तर्वस्तु के बारे में कोई कथन करने ही वाला है, जिसे न्यायालय की राय में पेश किया जाना चाहिए, तो प्रतिपक्षी आक्षेप कर सकेगा कि ऐसा साक्ष्य तब तक नहीं दिया जाए जब तक ऐसा दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर दिया जाता, या जय तक ये तथ्य साबित नहीं कर दिए जाते, जो उस पक्षकार को, जिसने साक्षी को बुलाया है, उसका द्वितीयक साक्ष्य देने का हक देते हैं।

स्पष्टीकरण-

कोई साक्षी उन कथनों का, जो दस्तावेजों की अन्तर्वस्तु के बारे में अन्य व्यक्तियों द्वारा किए गए थे, मौखिक साक्ष्य दे सकेगा, यदि ऐसे कथन स्वयमेव सुसंगत तथ्य हैं।

दृष्टांत

प्रश्न यह है कि क्या ने पर हमला किया अभिसाक्ष्य देता है कि उसने को से यह कहते सुना है कि " ने मुझे एक पत्र लिखा था जिसमें मुझ पर चोरी का अभियोग लगाया था और मैं उससे बदला लूंगा" यह कथन हमले के लिए का आशय दर्शित करने वाला होने के नाते सुसंगत है और उसका साक्ष्य दिया जा सकेगा, चाहे पत्र के बारे में कोई अन्य साक्ष्य भी दिया गया हो

148. पूर्व लेखबद्ध कथनों के बारे में प्रतिपरीक्षा-

किसी साक्षी की, उन पूर्व कथनों के बारे में, जो उसने लिखित रूप में किए हैं या जो लेखबद्ध किए गए हैं और जो प्रश्नगत बातों से सुसंगत हैं, ऐसा लेख उसे दिखाए बिना, या ऐसे लेख साबित हुए बिना, प्रतिपरीक्षा की जा सकेगी; किन्तु यदि उस लेख द्वारा उसका खण्डन करने का आशय है तो उस लेख को साबित किए जा सकने के पूर्व उसका ध्यान उस लेख के उन भागों की ओर आकर्षित करना होगा जिनका उपयोग उसका खण्डन करने के प्रयोजन से किया जाना है।

149.प्रतिपरीक्षा में विधिपूर्ण प्रश्न-

जब किसी साक्षी से प्रतिपरीक्षा की जाती है, तब उससे इसमें इसके पूर्व निर्दिष्ट प्रश्नों के अतिरिक्त ऐसे कोई भी प्रश्न पूछे जा सकेंगे, जिनकी प्रवृत्ति-

क. उसकी सत्यवादिता परखने की है; या

ख. यह पता चलाने की है कि वह कौन है और जीवन में उसकी स्थिति क्या है; या

ग. उसके शील को दोष लगाकर उसकी विश्वसनीयता को धक्का पहुंचाने की है, चाहे ऐसे प्रश्नों का उत्तर उसे प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः अपराध में फंसाने की प्रवृत्ति रखता हो, या उसे किसी शास्ति या जब्ती के लिए अनावृत्त करता हो या प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः अनावृत्त करने की प्रवृत्ति रखता होः

परन्तु भारतीय न्याय संहिता, 2023 (2023 का 45) की धारा 64, धारा 65, धारा 66, धारा 67, धारा 68, धारा 69, धारा 70 या धारा 71 के अधीन किसी अपराध के लिए या ऐसे किसी अपराध के किए जाने का प्रयत्न करने के लिए किसी अभियोजन में, जहां सम्मति का प्रश्न विवाद्य है वहां पीड़िता की प्रतिपरीक्षा में उसके साधारण व्यभिचार या ऐसी पीड़िता के किसी व्यक्ति के साथ पूर्व लैंगिक अनुभव के बारे में ऐसी सम्मति या सम्मति के स्वरूप के लिए साक्ष्य देना या प्रश्नों को पूछने की अनुमति नहीं होगा।

150. साक्षी को उत्तर देने के लिए कब विवश किया जाए-

यदि ऐसा कोई प्रश्न उस वाद या कार्यवाही से सुसंगत किसी बात से संबंधित है, तो धारा 137 के उपबन्ध उसको लागू होंगे।

151. न्यायालय विनिश्चित करेगा कि कब प्रश्न पूछा जाएगा और साक्षी को उत्तर देने के लिए कब विवश किया जाएगा-

1. यदि ऐसा कोई प्रश्न ऐसी बात से संबंधित है, जो उस बात या कार्यवाही से वहां तक के सिवाय, जहां तक कि वह साक्षी के शील को दोष लगाकर उसकी विश्वसनीयता पर प्रभाव डालती है, सुसंगत नहीं है, तो न्यायालय विनिश्चित करेगा कि साक्षी को उत्तर देने के लिए विवश किया जाए या नहीं और यदि वह ठीक समझे, तो साक्षी को सचेत कर सकेगा कि वह उसका उत्तर देने के लिए आबद्ध नहीं है।

2. अपने विवेक का प्रयोग करने में, न्यायालय निम्नलिखित विचारों को ध्यान में रखेगा, अर्थात्:-

क.ऐसे प्रश्न उचित हैं, यदि वे ऐसी प्रकृति के हैं कि उनके द्वारा प्रवहण किए गए लांछन की सत्यता उस विषय में, जिसका वह साक्षी परिसाक्ष्य देता है, साक्षी की विश्वसनीयता के बारे में न्यायालय की राय पर गम्भीर प्रभाव डालेगी;

ख. ऐसे प्रश्न अनुचित हैं, यदि उनके द्वारा व्यक्त किया गया लांछन ऐसी बातों के संबंध में है जो समय में उतनी अतीत हैं या जो इस प्रकार की है कि लांछन की सत्यता उस विषय में, जिसका वह साक्षी परिसाक्ष्य देता है, साक्षी की विश्वसनीयता के बारे में न्यायालय की राय पर प्रभाव नहीं डालेगी या बहुत थोड़ी मात्रा में प्रभाव डालेगी,

ग. ऐसे प्रश्न अनुचित हैं, यदि साक्षी के शील के विरुद्ध किए गए लांछन के महत्व और उसके साक्ष्य के महत्व के बीच भारी विषमता है;

घ. न्यायालय, यदि वह ठीक समझे, साक्षी के उत्तर देने से इंकार करने पर यह अनुमान लगा सकेगा कि उत्तर यदि दिया जाता तो, प्रतिकूल होता।

152.युक्तियुक्त आधारों के बिना प्रश्न नहीं पूछा जाएगा-

कोई भी ऐसा प्रश्न, जैसा धारा 151 में निर्दिष्ट है, नहीं पूछा जाना चाहिए, जब तक कि पूछने वाले व्यक्ति के पास यह सोचने के लिए युक्तियुक्त आधार हो कि ऐसा लांछन, जो वह व्यक्त करता है, सुआधारित है।

दृष्टांत

क.किसी अधिवक्ता को किसी दूसरे अधिवक्ता द्वारा अनुदेश दिया गया है कि एक महत्वपूर्ण साक्षी डकैत है उस साक्षी से यह पूछने के लिए कि क्या वह डकैत है, यह युक्तियुक्त आधार है।

ख. किसी अधिवक्ता को न्यायालय में किसी व्यक्ति द्वारा जानकारी दी जाती है कि एक महत्वपूर्ण साक्षी डकैत है। अधिवक्ता द्वारा प्रश्न किए जाने पर जानकारी देने वाला अपने कथन के लिए समाधानप्रद कारण बताता है। उस साक्षी से यह पूछने के लिए कि क्या वह डकैत है, यह युक्तियुक्त आधार है।

ग. किसी साक्षी से, जिसके बारे में कुछ भी ज्ञात नहीं है, यादृच्छिक यह पूछा जाता है कि क्या वह डकैत है यहां इस प्रश्न के लिए कोई युक्तियुक्त आधार नहीं है

घ. कोई साक्षी, जिसके बारे में कुछ भी ज्ञात नहीं है, अपने जीवन के ढंग और जीविका के साधनों के बारे में पूछे जाने पर असमाधानप्रद उत्तर देता है। उससे यह पूछने का कि क्या यह डकैत है यह युक्तियुक्त आधार हो सकता है।

153. युक्तियुक्त आधारों के बिना प्रश्न पूछे जाने की दशा में न्यायालय की प्रक्रिया-

यदि न्यायालय की यह राय हो कि ऐसा कोई प्रश्न युक्तियुक्त आधारों के बिना पूछा गया था, तो यदि वह किसी अधिवक्ता द्वारा पूछा गया था, तो वह मामले की परिस्थितियों की उच्च न्यायालय को या अन्य प्राधिकारी को, जिसके अधीन अधिवक्ता अपनी वृत्ति के पालन में है, रिपोर्ट कर सकेगा।

154. अशिष्ट और कलंकात्मक प्रश्न-

न्यायालय किन्हीं प्रश्नों का या पूछताछों का, जिन्हें वह अशिष्ट या कलंकात्मक समझता है, चाहे ऐसे प्रश्न या पूछताछ न्यायालय के समक्ष प्रश्नों को कुछ प्रभावित करने की प्रवृत्ति रखते हों, निषेध कर सकेगा, जब तक कि वे विवाद्यक तथ्यों के या उन विषयों के संबंध में हों, जिनका ज्ञात होना यह अवधारित करने के लिए आवश्यक है कि विवाद्यक तथ्य विद्यमान थे या नहीं।

155. अपमानित या क्षुब्ध करने के लिए आशयित प्रश्न-

न्यायालय ऐसे प्रश्न का निषेध करेगा, जो उसे ऐसा प्रतीत होता है कि वह अपमानित या क्षुब्ध करने के लिए आशयित है, या जो यद्यपि स्वयं में उचित है, तथापि रूप में न्यायालय को ऐसा प्रतीत होता है कि वह अनावश्यक रूप से आपत्तिजनक है।

156. सत्यवादिता परखने के प्रश्नों के उत्तरों का खण्डन करने के लिए साक्ष्य का अपवर्जन-

किसी साक्षी से ऐसा कोई प्रश्न पूछा गया है, जो जांच से केवल वहीं तक सुसंगत है जहां तक कि वह उसके शील को क्षति पहुंचा कर उसकी विश्वसनीयता को धक्का पहुंचाने की प्रवृत्ति रखता है, और उसने उसका उत्तर दे दिया हो, तब उसका खण्डन करने के लिए कोई साक्ष्य नहीं दिया जाएगा; किन्तु यदि वह मिथ्या उत्तर देता है, तो तत्पश्चात् उस पर मिथ्या साक्ष्य देने का आरोप लगाया जा सकेगा।

अपवाद 1-

यदि किसी साक्षी से पूछा जाए कि क्या वह पूर्व में किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध हुआ था और वह उसे इंकार करे, तो उसकी पूर्व दोषसिद्धि का साक्ष्य दिया जा सकेगा।

अपवाद 2-

यदि किसी साक्षी से उसकी निष्पक्षता पर दोषारोपण करने की प्रवृत्ति रखने वाला कोई प्रश्न पूछा जाए और वह सुझाए हुए तथ्यों को इंकार करते हुए उसका उत्तर देता है, तो उसका खण्डन किया जा सकेगा।

दृष्टांत

क. किसी अंडरराइटर के विरुद्ध एक दावे का प्रतिरोध कपट के आधार पर किया जाता है। दावेदार से पूछा जाता है कि क्या उसने पिछले किसी संव्यवहार में कपटपूर्ण दावा नहीं किया था। वह इससे इंकार करता है। यह दर्शित करने के लिए साक्ष्य प्रस्थापित किया जाता है कि उसने ऐसा दावा सचमुच किया था। यह साक्ष्य अग्राह्य है।

ख. किसी साक्षी से पूछा जाता है कि क्या वह किसी ओहदे से बेईमानी के लिए पदच्युत नहीं किया गया था। वह इससे इंकार करता है। यह दर्शित करने के लिए कि वह बेईमानी के लिए पदच्युत किया गया था साक्ष्य प्रतिस्थापित किया जाता है। यह साक्ष्य ग्राह्य नहीं है।

ग.  अभिपुष्ट करता है कि उसने अमुक दिन को गोवा में देखा। से पूछा जाता है कि क्या वह स्वयं उस दिन वाराणसी में नहीं था। वह इससे इंकार करता है। यह दर्शित करने के लिए कि उस दिन वाराणसी में था साक्ष्य प्रस्थापित किया जाता है। यह साक्ष्य ग्राह्य है, इस नाते नहीं कि वह का एक तथ्य के बारे में खण्डन करता है जो उसकी विश्वसनीयता पर प्रभाव डालता है, बल्कि इस नाते कि वह इस अभिकथित तथ्य का खण्डन करता है कि प्रश्नगत दिन गोवा में देखा गया था। इनमें से हर एक मामले में साक्षी पर, यदि उसका इंकार करना मिथ्या था, मिथ्या साक्ष्य देने का आरोप लगाया जा सकेगा।

घ.  से पूछा जाता है कि क्या उसके कुटुम्ब और के, जिसके विरुद्ध वह साक्ष्य देता है, कुटुम्ब में कुल वैर नहीं रहा था। वह इसे इंकार करता है। उसका खण्डन इस आधार पर किया जा सकेगा कि यह प्रश्न उसकी निष्पक्षता पर दोषारोपण करने की प्रवृत्ति रखता है।

157. पक्षकार द्वारा अपने ही साक्षी से प्रश्न-

1. न्यायालय उस व्यक्ति को, जो साक्षी को बुलाता है, उस साक्षी से कोई ऐसे प्रश्न करने की अपने विवेकानुसार अनुमति दे सकेगा, जो प्रतिपक्षी द्वारा प्रतिपरीक्षा में किए जा सकते हैं

2. इस धारा की कोई बात, उपधारा (1) के अधीन इस प्रकार अनुमति दिए गए व्यक्ति को ऐसे साक्षी के किसी भाग का अवलंब लेने के हक से वंचित नहीं करेगी

158. साक्षी की विश्वसनीयता पर अधिक्षेप-

किसी साक्षी की विश्वसनीयता पर प्रतिपक्षी द्वारा, या न्यायालय की सम्मति से उस पक्षकार द्वारा, जिसने उसे बुलाया है, निम्नलिखित प्रकारों से अधिक्षेप किया जा सकेगा-

क. उन व्यक्तियों के साक्ष्य द्वारा, जो यह परिसाक्ष्य देते हैं कि साक्षी के बारे में अपने ज्ञान के आधार पर, वे उसे विश्वसनीयता का अपात्र समझते हैं;

ख. इस सबूत द्वारा कि साक्षी को रिश्वत दी गई है या उसने रिश्वत की प्रस्थापना स्वीकार कर ली हे या उसे अपना साक्ष्य देने के लिए कोई अन्य भ्रष्ट उत्प्रेरणा मिली है;

ग. उसके साक्ष्य के किसी ऐसे भाग से असंगत पिछले कथनों के सबूत द्वारा, जिसका खण्डन किया जा सकता है।

स्पष्टीकरण-

कोई साक्षी जो किसी अन्य साक्षी को विश्वसनीयता के लिए अपात्र घोषित करता है, उससे की गई मुख्य परीक्षा में उसके विश्वास के कारणों को चाहे बताए, किन्तु प्रतिपरीक्षा में उससे उनके कारणों को पूछा जा सकेगा, और उन उत्तरों का, जिन्हें वह देता है, खण्डन नहीं किया जा सकता, तथापि यदि वे मिथ्या है, तो तत्पश्चात् उस पर मिथ्या साक्ष्य देने का आरोप लगाया जा सकेगा।

क.  को बेचे गए और परिदान किए गए माल के मूल्य के लिए पर वाद लाता है। कहता है कि उसने को माल का परिदान किया। यह दर्शित करने के लिए साक्ष्य प्रस्थापित किया जाता है कि किसी पूर्व अवसर पर उसने कहा था कि उसने उस माल का परिदान को नहीं किया था। यह साक्ष्य ग्राह्य है।

ख. , की हत्या का अभियुक्त है कहता है कि ने मरते समय घोषित किया था कि ने को यह घाव किया था, जिससे वह मर गया यह दर्शित करने के लिए साक्ष्य प्रस्थापित किया जाता है कि किसी पूर्व अवसर पर ने कहा था कि ने मृत्यु के समय यह घोषित नहीं किया कि ने को वह घाव दिया था, जिससे उसकी मृत्यु हुई यह साक्ष्य ग्राह्य है।

159. सुसंगत तथ्य के साक्ष्य की सम्पुष्टि करने की प्रवृत्ति रखने वाले प्रश्न ग्राह्य होंगे-

जब कोई साक्षी, जिसकी सम्पुष्टि करना आशयित हो, किसी सुसंगत तथ्य का साक्ष्य देता है, तब उससे ऐसी अन्य किन्हीं भी परिस्थितियों के बारे में प्रश्न किया जा सकेगा, जिन्हें उसने उस समय या स्थान पर, या उसके निकट अवलोकन किया, जिस पर ऐसा सुसंगत तथ्य घटित हुआ, यदि न्यायालय की यह राय हो कि ऐसी परिस्थितियां, यदि वे साबित हो जाएं, साक्षी के उस सुसंगत तथ्य के बारे में, जिसका वह साक्ष्य देता है, परिसाक्ष्य को सम्पुष्ट करेंगी।

दृष्टांत

किसी सह-अपराधी को किसी लूट का वृत्तान्त देता है, जिसमें उसने भाग लिया था, यह लूट से असंबद्ध विभिन्न घटनाओं का वर्णन करता है जो उस स्थान को और जहां कि वह लूट की गई थी, जाते हुए और वहां से आते हुए मार्ग में पटित हुई थी। इन तथ्यों का स्वतंत्र साक्ष्य स्वयं उस लूट के बारे में उसके साक्ष्य को सम्पुष्ट करने के लिए दिया जा सकेगा।

160. उसी तथ्य के बारे में पश्चात्वर्ती अभिसाक्ष्य की संपुष्टि करने के लिए साक्षी के पूर्वतन कथन साबित किए जा सकेंगे-

किसी साक्षी के परिसाक्ष्य की सम्पुष्टि करने के लिए ऐसे साक्षी द्वारा उसी तथ्य से संबंधित, उस समय पर या के लगभग जब वह तथ्य घटित हुआ था, किया हुआ, या उस तथ्य का अन्वेषण करने के लिए विधि द्वारा सक्षम किसी प्राधिकारी के समक्ष किया हुआ कोई पूर्वतन कथन साबित किया जा सकेगा।

161. साबित कथन के बारे में, जो कथन धारा 26 या धारा 27 के अधीन सुसंगत है, कौन सी बातें साबित की जा सकेंगी-

जब कभी कोई कथन, जो धारा 26 या धारा 27 के अधीन सुसंगत है, साबित कर दिया जाए, तब चाहे उसके खण्डन के लिए या संपुष्टि के लिए या जिसके द्वारा वह किया गया था उस व्यक्ति की विश्वसनीयता को दोषारोपण या अभिपुष्ट करने के लिए वे सभी बातें साबित की जा सकेंगी, जो यदि वह व्यक्ति साक्षी के रूप में बुलाया गया होता और उसने प्रतिपरीक्षा में सुझाई हुई बात की सत्यता से इंकार किया होता, तो साबित की जा सकती।

162.स्मृति ताजी करना-

1. कोई साक्षी, जब वह परीक्षा के अधीन है, किसी ऐसे लेख को देख करके, जो कि स्वयं उसने उस संव्यवहार के समय जिसके संबंध में उससे प्रश्न किया जा रहा है, या इतने शीघ्र पश्चात् हो कि न्यायालय इसे संभाव्य समझता हो कि वह संव्यवहार उस समय उसकी स्मृति में ताजा था, अपनी स्मृति को ताजा कर सकेगाः

परंतु साक्षी किसी ऐसे लेख को भी देख सकेगा जो किसी अन्य व्यक्ति द्वारा तैयार किया गया है और उस साक्षी द्वारा उपर्युक्त समय के भीतर पढ़ा गया है, यदि वह उस लेख का, उस समय जबकि उसने उसे पढ़ा था, सही होना जानता था।

2. जब कभी कोई साक्षी अपनी स्मृति किसी दस्तावेज को देखने से ताजी कर सकता है, तब वह न्यायालय की अनुज्ञा से ऐसे दस्तावेज की प्रतिलिपि को देख सकेगा:

परन्तु यह तव जबकि न्यायालय का समाधान हो गया है कि मूल को प्रस्तुत नहीं करने का पर्याप्त कारण हैः

परंतु यह और कि विशेषज्ञ अपनी स्मृति वृत्तिक पुस्तकों को देख कर ताजी कर सकेगा।

163. धारा 162 में वर्णित दस्तावेज में कथित तथ्यों के लिए परिसाक्ष्य-

कोई साक्षी किसी ऐसे दस्तावेज में वर्णित तथ्यों का भी, जैसा धारा 162 में वर्णित है, चाहे उसे स्वयं उन तथ्यों का विनिर्दिष्ट स्मरण हो, परिसाक्ष्य दे सकेगा, यदि वह आश्वस्त है कि वे तथ्य उस दस्तावेज में ठीक-ठीक अभिलिखित थे।

दृष्टांत

कोई लेखाकार कारबार के अनुक्रम में नियमित रूप से रखी जाने वाली बहियों में उसके द्वारा अभिलिखित तथ्यों का परिसाक्ष्य दे सकेगा, यदि वह जानता हो कि बहियां ठीक-ठीक रखी गई थीं, यद्यपि वह प्रविष्ट किए गए विशिष्ट संव्यवहारों को भूल गया हो।

164.स्मृति ताजी करने के लिए प्रयुक्त लेख के बारे में प्रतिपक्षी का अधिकार-

पूर्ववर्ती अन्तिम दो धाराओं के उपबन्धों के अधीन निर्दिष्ट किए गए किसी लेख को प्रस्तुत किया जाएगा और प्रतिपक्षी को दिखाया जाएगा, यदि वह उसकी अपेक्ष करे। ऐसा पक्षकार, यदि वह चाहे, तो उस साक्षी से उसके बारे में प्रतिपरीक्षा कर सकेगा।

165. दस्तावेजों का प्रस्तुत किया जाना-

1. किसी दस्तावेज को प्रस्तुत करने के लिए समन किए गए साक्षी, यदि वह उसके कब्जे में या अधिकार के अधीन हो, ऐसे किसी आक्षेप के होने पर भी, जो उसे प्रस्तुत करने या उसकी ग्राहयता के बारे में हो, उसे न्यायालय में लाएगाः

परंतु ऐसे किसी आक्षेप की विधिमान्यता न्यायालय द्वारा विनिश्चित की जाएगी।

2. न्यायालय, यदि वह ठीक समझे, तो उस दस्तावेज का निरीक्षण कर सकेगा, यदि वह राज्य की बातों से संबंधित नहीं है, या स्वय को उसकी ग्राह्यता अवधारित करने में समर्थ बनाने के लिए अन्य साक्ष्य ले सकेगा।

3. यदि ऐसे प्रयोजन के लिए किसी दस्तावेज का अनुवाद कराना आवश्यक हो तो न्यायालय, यदि वह ठीक समझे, तो अनुवादक को निदेश दे सकेगा कि वह उसकी अन्तर्वस्तु को गुप्त रखे, सिवाय जबकि दस्तावेज को साक्ष्य में दिया जाना हो; और यदि अनुवादक ऐसे निदेश की अवज्ञा करे, तो यह धारित किया जाएगा कि उसने भारतीय न्याय संहिता, 2023 (2023 का 45) की धारा 198 के अधीन अपराध किया हैः

परंतु कोई न्यायालय, मंत्रियों और भारत के राष्ट्रपति के बीच हुई किसी संसूचना को इसके समक्ष प्रस्तुत करने की अपेक्षा नहीं करेगा।

166. मंगाए गई और सूचना पर प्रस्तुत किए गए दस्तावेज का साक्ष्य के रूप में दिया जाना-

जब कोई पक्षकार किसी दस्तावेज को जिसे प्रस्तुत करने का उसने दूसरे पक्षकार को सूचना दी है, मंगाता है और ऐसा दस्तावेज प्रस्तुत किया जाता है और उस पक्षकार द्वारा, जिसने उसके प्रस्तुत करने की मांग की थी, निरीक्षित हो जाता है, तव यदि उसे प्रस्तुत करने वाला पक्षकार उससे ऐसा करने की अपेक्षा करता है, तो वह उसे साक्ष्य के रूप में देने के लिए आबद्ध होगा।

167. सूचना पाने पर जिस दस्तावेज के प्रस्तुत करने से इंकार कर दिया गया है उसको साक्ष्य के रूप में उपयोग में लाना-

जब कोई पक्षकार ऐसे किसी दस्तावेज को प्रस्तुत करने से इन्कार कर देता है, जिसे प्रस्तुत करने की उसे सूचना मिल चुकी है, तब वह तत्पश्चात् उस दस्तावेज को दूसरे पक्षकार की सम्मति के या न्यायालय के आदेश के बिना साक्ष्य के रूप में उपयोग में नहीं ला सकेगा।

दृष्टांत

पर किसी करार के आधार पर वाद लाता है और वह को उसे प्रस्तुत करने की सूचना देता है। विचारण में उस दस्तावेज की मांग करता है और उसे प्रस्तुत करने से इंकार करता है। उसकी अन्तर्वस्तु का द्वितीयक साक्ष्य देता है। द्वारा दिए हुए द्वितीयक साक्ष्य का खण्डन करने के लिए या यह दर्शित करने के लिए कि वह करार स्टाम्पित नहीं है, दस्तावेज को ही प्रस्तुत करना चाहता है। वह ऐसा नहीं कर सकता।

168. प्रश्न करने या प्रस्तुत करने का आदेश देने की न्यायाधीश की शक्ति-

न्यायाधीश सुसंगत तथ्यों का पता चलाने के लिए या उनका सबूत अभिप्राप्त करने के लिए, किसी भी रूप में किसी भी समय किसी भी साक्षी या पक्षकारों से किसी भी तथ्य के बारे में कोई भी प्रश्न, जो वह आवश्यक समझे, पूछ सकेगा, तथा किसी भी दस्तावेज या चीज को प्रस्तुत करने का आदेश दे सकेगा; और तो पक्षकार और उनके प्रतिनिधि हकदार होंगे कि वह किसी भी ऐसे प्रश्न या आदेश के प्रति कोई भी आक्षेप करें, ऐसे किसी भी प्रश्न के प्रत्युत्तर में दिए गए किसी भी उत्तर पर किसी भी साक्षी की न्यायालय की अनुमति के बिना प्रतिपरीक्षा करने के हकदार होंगेः

परन्तु निर्णय, उन तथ्यों पर आधारित होना चाहिए, जो इस अधिनियम द्वारा सुसंगत घोषित किए गए हैं और जो सम्यक् रूप से साबित किए गए हों:

परन्तु यह और कि तो यह धारा न्यायाधीश को, किसी साक्षी को किसी ऐसे प्रश्न का उत्तर देने के लिए या किसी ऐसे दस्तावेज को प्रस्तुत करने को विवश करने के लिए प्राधिकृत करेगी, जिसका उत्तर देने से या जिसे प्रस्तुत करने से, यदि प्रतिपक्षी द्वारा यह प्रश्न पूछा गया होता या वह दस्तावेज मंगाया गया होता, तो ऐसा साक्षी धारा 127 से धारा 136, दोनों सहित, के अधीन उत्तर देने या प्रस्तुत करने से इंकार करने का हकदार होता; और न्यायाधीश कोई ऐसा प्रश्न पूछेगा जिसका पूछना किसी अन्य व्यक्ति के लिए धारा 151 या धारा 152 के अधीन अनुचित होता; और वह इसमें इसके पूर्व अपवादित दशाओं के सिवाय, किसी भी दस्तावेज के प्राथमिक साक्ष्य का दिया जाना अभिमुक्त करेगा।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Free Judiciary Coaching
Free Judiciary Notes
Free Judiciary Mock Tests
Bare Acts