
किसी वाद या कार्यवाही में प्रत्येक विवाद्यक तथ्य के और ऐसे अन्य तथ्यों के, जिन्हें इसमें इसके पश्चात् सुसंगत घोषित किया गया है, अस्तित्व या अनस्तित्व का साक्ष्य दिया जा सकेगा, किसी अन्य का नहीं।
यह धारा किसी व्यक्ति को ऐसे तथ्य का साक्ष्य देने हेतु समर्थ नहीं बनाएगी, जिससे सिविल प्रक्रिया से सम्बन्धित किसी तत्समय प्रवृत्त विधि के किसी उपबन्ध द्वारा वह साबित करने के हक से वंचित कर दिया गया है।
(क) ख की मृत्यु कारित करने के आशय से उसे लाठी से मारकर उसकी हत्या कारित करने के लिए क का विचारण किया जाता है।
क के विचारण में निम्नलिखित तथ्य विवादय है:-
क द्वारा ख को लाठी से मारना;
क का ऐसी मार द्वारा ख की मृत्यु कारित करना;
ख की मृत्यु कारित करने का क का आशय।
(ख) एक वादकर्ता अपने साथ वह बन्धपत्र, जिस पर वह निर्भर करता है, मामले की पहली सुनवाई पर अपने साथ नहीं लाता और प्रस्तुत करने के लिए तैयार नहीं रखता । यह धारा उसे समर्थ नहीं बनाती कि सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) द्वारा विहित शर्तों के अनुसार से अन्यथा, वह उस कार्यवाही के उत्तरवर्ती प्रक्रम में उस बन्धपत्र को प्रस्तुत कर सके या उसकी अन्तर्वस्तु को साबित कर सके।
जो तथ्य विवाद्य न होते हुए भी किसी विवाद्यक तथ्य या सुसंगत तथ्य से इस प्रकार संसक्त है कि वे एक ही संव्यवहार के भाग हैं, वे तथ्य सुसंगत हैं, चाहे वे उसी समय और स्थान पर या विभिन्न समयों और स्थानों पर घटित हुए हो।
(क) ख को पीटकर उसकी हत्या करने का क अभियुक्त है। क या ख या पास खड़े लोगों द्वारा जो कुछ भी पिटाई के समय या उससे इतने अल्पकाल पूर्व या पश्चात् कहा था या किया गया था कि वह उसी संव्यवहार का भाग बन गया है, वह सुसंगत तथ्य है ।
(ख) क एक सशस्त्र विद्रोह में भाग लेकर, जिसमें सम्पति नष्ट की जाती है, फौजों पर आक्रमण किया जाता है और जेलें तोड़ कर खोली जाती हैं, भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध करने का अभियुक्त है। इन तथ्यों का घटित होना साधारण संव्यवहार का भाग होने के नाते सुसंगत है, चाहे क उन सभी में उपस्थित न रहा हो।
(ग) क एक पत्र में, जो किसी पत्राचार का भाग है, अन्तर्विष्ट अपमान-लेख के लिए ख पर वाद लाता है। जिस विषय में अपमान-लेख उद्भूत हुआ है, उससे संबंधित पक्षकारों के बीच जितने पत्र उस पत्राचार के भाग हैं जिसमें वह अन्तर्विष्ट, वे सुसंगत तथ्य हैं, चाहे उनमें वह अपमान - लेख स्वयं अन्तर्विष्ट न हो।
(घ) प्रश्न यह है कि क्या ख से आदिष्ट अमुक माल क को दिया गया था । वह माल, अनुक्रमश: कई मध्यवर्ती व्यक्तियों को दिया गया था। हर एक परिदान सुसंगत तथ्य है।
वे तथ्य सुसंगत हैं, जो सुसंगत तथ्यों के या विवादयक तथ्यों के आसन्न या अन्यथा प्रसंग, हेतुक या परिणाम हैं, या जो उस वस्तुस्थिति को गठित करते हैं, जिसके अन्तर्गत वे घटित हुए या जिसने उनके घटित होने या संव्यवहार का अवसर दिया।
(क) प्रश्न यह है कि क्या क ने ख को लूटा । ये तथ्य सुसंगत हैं कि लूट के थोड़ी देर पहले ख अपने कब्जे में धन लेकर किसी मेले में गया, और उसने दूसरे व्यक्तियों को उसे दिखाया या उनसे इस तथ्य का कि उसके पास धन है, उल्लेख किया ।
(ख) प्रश्न यह है कि क्या क ने ख की हत्या की। उस स्थान पर जहां हत्या की गई थी या उसके समीप भूमि पर गुत्थम-गुत्था होने से बने हुए चिह्न सुसंगत तथ्य हैं।
(ग) प्रश्न यह है कि क्या क ने ख को विष दिया। विष से उत्पन्न कहे जाने वाले लक्षणों के पूर्व ख के स्वास्थ्य की दशा और क को ज्ञात ख की वे आदतें जिनसे विष देने का अवसर मिला, सुसंगत तथ्य हैं।
1. कोई भी तथ्य, जो किसी विवादयक तथ्य या सुसंगत तथ्य का हेतु या तैयारी दर्शित या गठित करता है, सुसंगत है।
2. किसी वाद या कार्यवाही के किसी पक्षकार या किसी पक्षकार के अभिकर्ता का ऐसे वाद या कार्यवाही के बारे में या उसमें विवादयक तथ्य या उससे सुसंगत किसी तथ्य के बारे में आचरण और किसी ऐसे व्यक्ति का आचरण, जिसके विरुद्ध कोई अपराध किसी कार्यवाही का विषय है, सुसंगत है, यदि ऐसा आचरण किसी विवादयक तथ्य या सुसंगत तथ्य को प्रभावित करता है या उससे प्रभावित होता है, चाहे वह उससे पूर्व का हो या पश्चात् का।
इस धारा में "आचरण" शब्द के अन्तर्गत कथन नहीं आते, जब तक कि वे कथन उन कथनों से भिन्न कार्यों के साथ-साथ और उन्हें स्पष्ट करने वाले न हों, किन्तु इस अधिनियम की किसी अन्य धारा के अधीन उन कथनों की सुसंगति पर इस स्पष्टीकरण का प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
जब किसी व्यक्ति का आचरण सुसंगत है, तब उससे, या उसकी उपस्थिति और श्रवणगोचरता में किया गया कोई भी कथन, जो उस आचरण पर प्रभाव डालता है, सुसंगत है।
(क) ख की हत्या के लिए क का विचारण किया जाता है। ये तथ्य कि क ने ग की हत्या की, कि ख जानता था कि क ने ग की हत्या की है और कि ख ने अपनी इस जानकारी को सार्वजनिक करने की धमकी देकर क से धन उद्यापित करने का प्रयत्न किया था, सुसंगत है ।
(ख) क बन्धपत्र के आधार पर धन के संदाय के लिए ख पर वाद लाता है। ख इस बात से इंकार करता है कि उसने बन्धपत्र लिखा । यह तथ्य कि उस समय, जब बन्धपत्र का लिखा जाना अभिकथित है, ख को किसी विशिष्ट प्रयोजन के लिए धन की आवश्यकता भी सुसंगत है।
(ग) विष द्वारा ख की हत्या करने के लिए क का विचारण किया जाता है । यह तथ्य सुसंगत है कि ख की मृत्यु के पूर्व क ने ख को दिए गए विष के जैसा विष उपाप्त किया था।
(घ) प्रश्न यह है कि क्या अमुक दस्तावेज क की वसीयत है। ये तथ्य अभिकथित वसीयत की तारीख से थोड़े दिन पहले क ने उन विषयों की जांच की थी, जिनसे अभिकथित वसीयत के उपबन्धों का सम्बन्ध है, कि उसने वह वसीयत करने के बारे में अधिवक्ताओं से परामर्श किया और उसने अन्य वसीयतों के प्रारूप बनवाए जिन्हें उसने अनुमोदित नहीं किया, सुसंगत है।
(ङ) क किसी अपराध का अभियुक्त है। ये तथ्य कि अभिकथित अपराध से पूर्व या अपराध करने के समय या पश्चात् क ने ऐसे साक्ष्य का प्रबन्ध किया जिसकी प्रवृत्ति ऐसी थी कि मामले के तथ्य उसके अनुकूल प्रतीत हों या कि उसने साक्ष्य को नष्ट किया या छिपाया या कि उन व्यक्तियों की, जो साक्षी हो सकते थे, उपस्थिति निवारित की या अनुपस्थिति उपाप्त की या लोगों को उसके सम्बन्ध में मिथ्या साक्ष्य देने के लिए तैयार किया, सुसंगत है ।
(च) प्रश्न यह है कि क्या क ने ख को लूटा ये तथ्य कि ख के लूटे जाने के पश्चात् ग ने क की उपस्थिति में कहा कि "ख को लूटने वाले व्यक्ति को खोजने के लिए पुलिस आ रही है," और यह कि उसके तुरन्त पश्चात् क भाग गया, सुसंगत हैं।
(छ) प्रश्न यह है कि क्या ख के प्रति क दस हजार रुपए का देनदार है। यह तथ्य कि क ने ग से धन उधार मांगा और कि घ ने ग से क की उपस्थिति और श्रवणगोचरता में कहा कि "मैं तुम्हें सलाह देता हूं कि तुम क पर भरोसा मत करो क्योंकि वह ख के प्रति दस हजार रुपए का देनदार है, और कि क कोई उत्तर दिए बिना चला गया, सुसंगत हैं।
(ज) प्रश्न यह है कि क्या क ने अपराध किया है। यह तथ्य कि क एक पत्र पाने के पश्चात्, जिसमें क को चेतावनी दी गई थी कि अपराधी के लिए जांच की जा रही है, फरार हो गया और उस पत्र की अन्तर्वस्तु, सुसंगत हैं।
(झ) क किसी अपराध का अभियुक्त है। ये तथ्य कि अभिकथित अपराध के किए जाने के पश्चात् क फरार हो गया या कि उस अपराध से अर्जित सम्पत्ति या सम्पति के आगम उसके कब्जे में थे या कि उसने उन वस्तुओं को, जिनसे वह अपराध किया गया था, या किया जा सकता था, छिपाने का प्रयत्न किया, सुसंगत हैं।
(ञ) प्रश्न यह है कि क्या क के साथ बलात्संग किया गया । यह तथ्य कि अभिकथित बलात्संग के अल्पकाल पश्चात् क ने अपराध के बारे में परिवाद किया, वे परिस्थितियां जिनके अधीन तथा वे शब्द जिनमें वह परिवाद किया गया, सुसंगत हैं। यह तथ्य कि क ने परिवाद के बिना कहा कि मेरे साथ बलात्संग किया गया है, इस धारा के अधीन आचरण के रूप में सुसंगत नहीं है। यद्यपि वह धारा 26 के खण्ड (क) के अधीन मृत्युकालिक कथन या धारा 160 के अधीन सम्पोषक साक्ष्य के रूप में सुसंगत हो सकता है।
(ट) प्रश्न यह है कि क्या क को लूटा गया । यह तथ्य कि अभिकथित लूट के तुरन्त पश्चात् क ने अपराध के सम्बन्ध में परिवाद किया, वे परिस्थितियां जिनके अधीन तथा वे शब्द, जिनमें वह परिवाद किया गया, सुसंगत हैं। यह तथ्य कि क ने कोई परिवाद किए बिना कहा कि मुझे लूटा गया है इस धारा के अधीन आचरण के रूप में सुसंगत नहीं है, यद्यपि वह धारा 26 के खण्ड (क) के अधीन मृत्युकालिक कथन या धारा 160 के अधीन सम्पोषक साक्ष्य के रूप में सुसंगत हो सकता है।
वे तथ्य, जो विवाद्यक तथ्य या सुसंगत तथ्य के स्पष्टीकरण या पुर: स्थापन के लिए आवश्यक हैं या जो किसी विवाद्यक तथ्य या सुसंगत तथ्य द्वारा सुझाए गए अनुमान का समर्थन या खण्डन करते हैं या जो किसी वस्तु या व्यक्ति की, जिसकी पहचान सुसंगत है, पहचान स्थापित करते हैं या वह समय या स्थान नियत करते हैं जब या जहां कोई विवाद्यक तथ्य या सुसंगत तथ्य घटित हुआ या जो उन पक्षकारों का सम्बन्ध दर्शित करते हैं जिनके द्वारा ऐसे किसी तथ्य का संव्यवहार किया गया था, वहां तक सुसंगत हैं जहां तक वे उस प्रयोजन के लिए आवश्यक हो।
(क) प्रश्न यह है कि क्या कोई विशिष्ट दस्तावेज क की वसीयत है। अभिकथित विल की तारीख पर क की सम्पत्ति की अवस्था और उसके कुटुम्ब की अवस्था सुसंगत तथ्य हो सकेगी।
(ख) क पर निकृष्ट आचरण का लांछन लगाने वाले अपमान-लेख के लिए ख पर क वाद लाता है । ख प्र अभिपुष्ट करता है कि वह बात, सच है जिसका अपमान-लेख होना अभिकथित है। पक्षकारों की उस समय की स्थिति और सम्बन्ध, जब अपमान लेख प्रकाशित हुआ था, विवाद्यक तथ्यों की पुर: स्थापना के रूप में सुसंगत तथ्य हो सकेगा। क और ख के बीच किसी ऐसी बात के विषय में विवाद की विशिष्टियां, जो अभिकथित अपमान- लेख से असबद्ध हैं, विसंगत है, यद्यपि यह तथ्य कि कोई विवाद हुआ था, यदि उससे क और ख के बीच सम्बन्धों पर प्रभाव पड़ा है, सुसंगत हो सकेगा।
(ग) क किसी अपराध का अभियुक्त है। यह तथ्य कि, उस अपराध के किए जाने के तुरन्त पश्चात् क अपने घर से फरार हो गया, धारा 6 के अधीन विवादयक तथ्यों के पश्चात्वर्ती और उनसे प्रभावित आचरण के रूप में सुसंगत है। यह तथ्य कि उस समय, जब वह घर से चला था, क का उस स्थान में, जहां वह गया था, अचानक और अति-आवश्यक कार्य था, उसके अचानक घर से चले जाने के तथ्य के स्पष्टीकरण की प्रवृत्ति रखने के कारण सुसंगत है । जिस काम के लिए वह चला उसका ब्यौरा सुसंगत नहीं है सिवाय इसके कि जहां तक वह यह दर्शित करने के लिए आवश्यक हो कि वह काम अचानक और अति-आवश्यक था।
(घ) क के साथ की गई सेवा की संविदा को भंग करने के लिए ग को उत्प्रेरित करने के कारण ख पर क वाद लाता है। क की सेवा को छोड़ते समय क से ग कहता है कि "मैं तुम्हें छोड़ रहा हूं क्योंकि ख ने मुझे तुमसे अधिक अच्छी प्रस्थापना की है ।" यह कथन ग के आचरण को, जो विवाद्यक तथ्य होने के रूप में सुसंगत है, स्पष्ट करने वाला होने के कारण सुसंगत है।
(ड) चौरी का अभियुक्त क चुराई हुई सम्पति ख को देते हुए देखा जाता है, जो उसे क की पत्नी को देते हुए देखा जाता है। ख उसे परिदान करते हुए कहता है कि "क ने कहा है कि तुम इसे छिपा दो" । ख का कथन उस संव्यवहार का भाग होने वाले तथ्य को स्पष्ट करने वाला होने के कारण सुसंगत है।
(च) बलवा करने के लिए क का विचारित किया जा रहा है और भीड़ का नेतृत्व करते हुए उसका चलना साबित हो चुका है । भीड़ की आवाजें, इस संव्यवहार की प्रकृति को स्पष्ट करने वाली होने के कारण सुसंगत हैं ।
जहां यह विश्वास करने का युक्तियुक्त आधार है कि दो या अधिक व्यक्तियों ने कोई अपराध या वादयोग्य दोष करने के लिए मिलकर पड्यंत्र किया है, वहां उनके सामान्य आशय के बारे में उनमें से किसी एक व्यक्ति द्वारा उस समय के पश्चात्, जब ऐसा आशय उनमें से किसी एक ने प्रथम बार मन में धारण किया, कही गई, की गई, या लिखी गई कोई बात उन व्यक्तियों में से प्रत्येक व्यक्ति के विरुद्ध, जिनके बारे में विश्वास किया जाता है कि उन्होंने इस प्रकार पड्यंत्र किया है, पड्यंत्र का अस्तित्व साबित करने के प्रयोजन के लिए उसी प्रकार सुसंगत तथ्य है जिस प्रकार यह दर्शित करने के प्रयोजन के लिए कि ऐसा कोई व्यक्ति उसका पक्षकार था।
यह विश्वास करने का युक्तियुक्त आधार है कि क राज्य के विरुद्ध युद्ध करने के षड्यंत्र में सम्मिलित हुआ है।
ख ने उस षड्यंत्र के प्रयोजन के लिए यूरोप में आयुध उपाप्त किए, ग ने वैसे ही उद्देश्य से कोलकाता में धन संग्रह किया, घ ने मुम्बई में लोगों को उस पड्यंत्र में सम्मिलित होने के लिए प्रेरित किया, ङ ने आगरा में उस उद्देश्य के पक्षपोषण में लेख प्रकाशित किए और ग द्वारा कोलकाता में संगृहीत धन को च ने दिल्ली से छ के पास सिंगापुर भेजा। इन तथ्यों और उस षड्यंत्र का वृत्तान्त देने वाले ज द्वारा लिखित पत्र की अन्तर्वस्तु में से प्रत्येक षड्यंत्र का अस्तित्व साबित करने के लिए और उसमें क की सह-अपराधिता साबित करने के लिए भी सुसंगत है, चाहे वह उन सभी के बारे में अनभिज्ञ रहा हो, तथा चाहे उन्हें करने वाले व्यक्ति उसके लिए अपरिचित रहे हों, तथा चाहे वे उसके षड्यंत्र में सम्मिलित होने से पूर्व या उसके षड्यंत्र से अलग हो जाने के पश्चात् घटित हुए हों।
वे तथ्य, जो अन्यथा सुसंगत नहीं हैं, कब सुसंगत हैं:-
1. यदि वे किसी विवाद्यक तथ्य या सुसंगत तथ्य से असंगत हैं;
2. यदि वे स्वयंमेव या अन्य तथ्यों के संसर्ग में किसी विवादयक तथ्य या सुसंगत तथ्य का अस्तित्व या अनस्तित्व अत्यन्त अधिसम्भाव्य या अनधिसम्भाव्य बनाते हैं।
(क) प्रश्न यह है कि क्या क ने किसी अमुक दिन चेन्नई में अपराध किया । यह तथ्य कि क उस दिन लद्दाख में था, सुसंगत है । यह तथ्य कि जब अपराध किया गया था उस समय के लगभग क उस स्थान से, जहां कि वह अपराध किया गया था, इतनी दूरी पर था कि क द्वारा उस अपराध का किया जाना यदि असम्भव नहीं, तो अत्यन्त अनधिसम्भाव्य था, सुसंगत है।
(ख) प्रश्न यह है कि क्या क ने अपराध किया है। परिस्थितियां ऐसी हैं कि वह अपराध क, ख, ग, या घ में से किसी एक के द्वारा अवश्य किया गया होगा । वह प्रत्येक तथ्य जिससे यह दर्शित होता है कि वह अपराध किसी अन्य के द्वारा नहीं किया जा सकता था, और वह ख, ग या घ में से किसी के द्वारा नहीं किया गया था, सुसंगत है।
उन वादों में, जिनमें नुकसानी का दावा किया गया है, कोई भी तथ्य सुसंगत है जिससे न्यायालय नुकसानी की वह रकम अवधारित करने के लिए समर्थ हो जाए, जो अधिनिर्णीत की जानी चाहिए।
जहां कि किसी अधिकार या रूढ़ि के अस्तित्व के बारे में प्रश्न है, वहां निम्नलिखित तथ्य सुसंगत हैं-
(क) कोई संव्यवहार, जिसके द्वारा प्रश्नगत अधिकार या रूढ़ि सृजित, दावाकृत, उपांतरित, मान्यकृत, दृढ़कथित की गई या इंकार की गई थी या जो उसके अस्तित्व से असंगत थाः
(ख) वे विशिष्ट उदाहरण, जिनमें वह अधिकार या रूढ़ि दावाकृत, मान्य या प्रयुक्त की गई थी या जिनमें उसका प्रयोग विवादग्रस्त था दृढ़कथन किया गया था या उसका अनुसरण नहीं किया गया था।
प्रश्न यह है कि क्या क का एक मत्स्य क्षेत्र पर अधिकार है। क के पूर्वजों को मत्स्य क्षेत्र प्रदान करने वाला विलेख, क के पिता द्वारा उस मत्स्य क्षेत्र का बन्धक, क के पिता द्वारा उस बन्धक से अनमेल मत्स्य क्षेत्र का पश्चातवर्ती अनुदान, विशिष्ट उदाहरण जिनमें क के पिता ने अधिकार का प्रयोग किया, या जिनमें अधिकार का प्रयोग क के पड़ोसियों द्वारा रोका गया था, सुसंगत तथ्य हैं।
मन की कोई भी दशा जैसे आशय, ज्ञान, सद्भाव, उपेक्षा, उतावलापन किसी विशिष्ट व्यक्ति के प्रति वैमनस्य या सदिच्छा दर्शित करने वाले या शरीर की या शारीरिक संवेदना की किसी दशा का अस्तित्व दर्शित करने वाले तथ्य तव सुसंगत हैं, जब ऐसे मन की या शारीरिक संवेदना की किसी ऐसी दशा का अस्तित्व विवाद्य या सुसंगत है।
जो तथ्य इस नाते सुसंगत हैं कि वह मन की सुसंगत दशा के अस्तित्व को दर्शित करता है इससे यह दर्शित होना ही चाहिए कि मन की वह दशा साधारणतः नहीं, अपितु प्रश्नगत विशिष्ट विषय के बारे में, अस्तित्व में है।
किन्तु जहां किसी अपराध के अभियुक्त व्यक्ति के विचारण में इस धारा के अर्थ के अन्तर्गत उस अभियुक्त द्वारा किसी अपराध का कभी पहले किया जाना सुसंगत हो, तब ऐसे व्यक्ति की पूर्व दोपसिद्धि भी सुसंगत तथ्य होगी।
(क) क चुराया हुआ माल यह जानते हुए कि वह चाया हुआ है, प्राप्त करने का अभियुक्त है। यह सावित कर दिया जाता है कि उसके कब्जे में कोई विशिष्ट चुराई हुई वस्तु थी। यह तथ्य कि उसी समय उसके कब्जे में कई अन्य चुराई हुई वस्तुएं थीं यह दर्शित करने की प्रवृत्ति रखने वाला होने के नाते सुसंगत है कि जो वस्तुएं उसके कब्जे में थीं उनमें से प्रत्येक और सब के बारे में वह जानता था कि यह चुराई हुई हैं।
(ख) क पर किसी अन्य व्यक्ति को कूटकृत मुद्रा के कपटपूर्वक परिदान करने का अभियोग है, जिसे वह परिदान करते समय जानता था कि वह कूटकृत है। यह तथ्य कि उसके परिदान के समय क के कब्जे में वैसे ही दूसरे कटकृत मुद्रा थी सुसंगत है। यह तथ्य कि क एक कूटकृत मुद्रा को, यह जानते हुए कि वह मुद्रा कूटकृत है, उसे असली के रूप में किसी अन्य व्यक्ति को परिदान करने के लिए पहले भी दोषसिद्ध हुआ था, सुसंगत है।
(ग) ख के कुत्ते द्वारा, जिसका उग्र होना ख जानता था, किए गए नुकसान के लिए ख पर क वाद लाता हैं। ये तथ्य कि कुत्ते ने पहले भी भ, म और य को काटा था और यह कि उन्होंने ख से शिकायतें की थीं, सुसंगत हैं।
(घ) प्रश्न यह है कि क्या विनिमयपत्र का प्रतिगृहीता क यह जानता था कि उसके पाने वाले का नाम काल्पनिक है। यह तथ्य कि क ने उसी प्रकार से लिखित अन्य विनिमयपत्रों को इसके पहले कि वे पाने वाले द्वारा, यदि पाने वाला वास्तविक व्यक्ति होता तो, उसको पारेपित किए जा सकते, स्वीकृत किया था, यह दर्शित करने के नाते सुसंगत है कि क यह जानता था कि पाने वाला व्यक्ति काल्पनिक है।
(ङ) क पर ख की ख्याति की अपहानि करन के आशय से एक लांउन प्रकाशित करके ख की मानहानि करने का अभियोग है। यह तथ्य कि ख के बारे में क ने पूर्व प्रकाशन किए, जिनसे ख के प्रति क का वैमनस्य दर्शित होता है, इस कारण सुसंगत है कि उससे प्रश्नगत विशिष्ट प्रकाशन द्वारा ख की ख्याति की अपहानि करने का क का आशय सावित होता है। ये तथ्य कि क और ख के बीच पहले कोई झगड़ा नहीं हुआ और कि क ने परिवादगत वात को जैसा सुना था वैसा ही दुहरा दिया था, यह दर्शित करने के नाते कि क का आशय ख की ख्याति की अपहानि करना नहीं था. सुसंगत हैं।
(च) क पर ख द्वारा यह वाद लाया जाता है कि ग के बारे में क ने ख से यह कपटपूर्वक निरूपण किया किग ऋण चुकाने में समर्थ है जिससे उत्प्रेरित होकर ख ने ग का, जो दिवालिया था, भरोसा किया और हानि उठाई। यह तथ्य कि जब क ने ग को ऋण चुकाने में समर्थ निरूपित किया था, तब ग को उसके पड़ोसी और उससे व्यौहार करने वाले व्यक्ति ऋण चुकाने में समर्थ समझते थे, यह दर्शित करने के नाते कि क ने ऐसा निरूपण सद्भापूर्वक किया था, सुसंगत है।
(छ) क पर ख द्वारा उस काम की कीमत के लिए वाद लाया जाता है जो ठेकेदार ग के आदेश से किसी घर पर, जिसका क स्वामी है, ख ने काम किया था। क का प्रतिवाद है कि ख का ठेका ग के साथ था।यह तथ्य कि क ने प्रश्नगत काम के लिए ग को कीमत दे दी इसलिए सुसंगत है कि उससे यह साबित होता है कि क ने सद्भावपूर्वक ग को प्रश्नगत काम का प्रवन्ध दे दिया था, जिससे कि ख के साथ ग अपने ही निमित्त, न कि क के अभिकर्ता के रूप में, संविदा करने की स्थिति में था।
(ज) क ऐसी सम्पत्ति का, जो उसने पड़ी पाई थी, बेइमानी से दुर्विनियोग करने का अभियुक्त है और प्रश्न यह है कि क्या जब उसने उसका विनियोग किया उसे सद्भावपूर्वक विश्वास था कि वास्तविक स्वामी मिल नहीं सकता। यह तथ्य कि सम्पत्ति के खो जाने की सार्वजनिक सूचना उस स्थान में, जहां क था, दी जा चुकी थी, यह दर्शित करने के नाते सुसंगत है कि क को सद्भावपूर्वक यह विश्वास नहीं था कि उस सम्पत्ति का वास्तविक स्वामी मिल नहीं सकता। यह तथ्य कि क यह जानता था या उसके पास यह विश्वास करने का कारण था कि सूचना कपटपूर्वक ग द्वारा दी गई थी जिसने संपत्ति की हानि के बारे में सुन रखा था और जो उस पर मिथ्या दावा करने का इच्छुक था यह दर्शित करने के नाते सुसंगत है कि क का सूचना के बारे में ज्ञान क के सद्भाव को नासाबित नहीं करता।
(झ) क पर ख को मार डालने के आशय से उस पर गोली मारने का अभियोग है। क का आशय दर्शित करने के लिए यह तथ्य साबित किया जा सकेगा कि क ने पहले भी ख को गोली मारी थी।
(ञ) क पर ख को धमकी भरे पत्र भेजने का आरोप है। इन पत्रों का आशय दर्शित करने के नाते क द्वारा ख को पहले भेजे गए धमकी भरे पत्र साबित किए जा सकेंगे।
(ट) प्रश्न यह है कि क्या क अपनी पत्नी ख के प्रति क्रूरता का दोषी रहा है। अभिकथित क्रूरता के थोड़ी देर पहले या पीछे उनके एक दूसरे के प्रति भावना की अभिव्यक्तियां सुसंगत तथ्य हैं।
(ठ) प्रश्न यह है कि क्या क की मृत्यु विष से कारित की गई थी। अपनी बीमारी के दौरान क द्वारा अपने लक्षणों के बारे में किए हुए कथन सुसंगत तथ्य हैं।
(ड) प्रश्न यह है कि क के स्वास्थ्य की दशा उस समय कैसी थी जिस समय उसके जीवन का बीमा कराया गया था। प्रश्नगत समय पर या उसके लगभग अपने स्वास्थ्य की दशा के बारे में क द्वारा किए गए कथन सुसंगत तथ्य हैं।
(ढ) क ऐसी उपेक्षा के लिए ख पर वाद लाता है जिसने उसे ऐसी कार भाड़े पर दी, जो युक्तियुक्त रूप से उपयोग के लिए ठीक नहीं थी, जिससे क को क्षति हुई। यह तथ्य कि उस विशिष्ट कार की त्रुटि की ओर अन्य अवसरों पर भी ख का ध्यान आकृष्ट किया गया था, सुसंगत है। यह तथ्य कि ख उन कारों के बारे में, जिन्हें वह भाड़े पर देता था, अभ्यासतः उपेक्षावान था, विसंगत है।
(ण) क साशय गोली मार कर ख की मृत्यु करने के कारण हत्या के लिए विचारित है। यह तथ्य कि क ने अन्य अवसरों पर ख को गोली मारी थी, क का ख को गोली मारने का आशय दर्शित करने के नाते सुसंगत है। यह तथ्य कि क लोगों पर उनकी हत्या करने के आशय से गोली मारने का अभ्यासी था, विसंगत है।
(त) क का किसी अपराध के लिए विचारण किया जाता है। यह तथ्य कि उसने कोई बात कही जिससे उस विशिष्ट अपराध के करने का आशय उपदर्शित होता है, सुसंगत है। यह तथ्य कि उसने कोई बात कही जिससे उस प्रकार के अपराध करने की उसकी साधारण प्रवृत्ति उपदर्शित होती है, विसंगत है।
जब प्रश्न यह है कि कार्य आकस्मिक या साशय था, या किसी विशिष्ट ज्ञान या आशय से किया गया था, तब यह तथ्य कि ऐसा कार्य समरूप घटनाओं की आवली का भाग था जिनमें से प्रत्येक घटना के साथ वह कार्य करने वाला व्यक्ति संबद्ध था, सुसंगत है।
(क) क पर यह अभियोग है कि अपने गृह के बीमे का धन अभिप्राप्त करने के लिए उसने उसे जला दिया। ये तथ्य कि क कई गृहों में एक के पश्चात् दूसरे में रहा, जिनमें से प्रत्येक का उसने बीमा कराया, जिनमें से प्रत्येक में आग लगी और जिन अग्निकांडों में से प्रत्येक के उपरान्त क को किसी भिन्न बीमा कंपनी से बीमा धन मिला, इस नाते सुसंगत हैं कि उनसे यह दर्शित होता है कि वे अग्निकांड आकस्मिक नहीं थे।
(ख) ख के ऋणियों से धन प्राप्त करने के लिए क नियोजित है। क का यह कर्तव्य है कि वही में अपने द्वारा प्राप्त रकमों को दर्शित करने वाली प्रविष्टियां करे। वह एक प्रविष्टि करता है जिससे यह दर्शित होता है कि किसी विशिष्ट अवसर पर उसे वास्तव में प्राप्त राशि से कम रकम प्राप्त हुई। प्रश्न यह है कि क्या यह मिथ्या प्रविष्टि आकस्मिक थी या साशय। ये तथ्य कि उसी बही में क द्वारा की हुई अन्य प्रविष्टियां मिथ्या हैं और कि प्रत्येक अवस्था में मिथ्या प्रविष्टि क के पक्ष में है, सुसंगत है।
(ग) ख को कपटपूर्वक कूटकृत करेंसी का परिदान करने का क अभियुक्त है। प्रश्न यह है कि क्या करेंसी का परिदान आकस्मिक था। यह तथ्य कि ख को परिदान के तुरन्त पहले या तुरंत पश्चात् क ने ग, घ और ङ को कूटकृत करेंसी का परिदान किया था इस नाते सुसंगत हैं कि उनसे यह दर्शित होता है कि ख को किया गया परिदान आकस्मिक नहीं था।
जबकि प्रश्न यह है कि क्या कोई विशिष्ट कार्य किया गया था, तब कारवार के ऐसे किसी भी अनुक्रम का अस्तित्व, जिसके अनुसार वह कार्य स्वभावतः किया जाता, सुसंगत तथ्य है।
(क) प्रश्न यह है कि क्या एक विशिष्ट पत्र प्रेषित किया गया था। ये तथ्य कि कारवार का यह साधारण अनुक्रम था कि वे सभी पत्र, जो किसी अमुक स्थान में रख दिए जाते थे, डाक में डाले जाने के लिए ले जाए जाते थे और कि वह पत्र उस स्थान में रख दिया गया था, सुसंगत हैं।
(ख) प्रश्न यह है कि क्या कोई विशिष्ट पत्र क को मिला। ये तथ्य कि वह सम्यक् अनुक्रम में डाक में डाला गया था, और कि वह पुनः प्रेषण केन्द्र द्वारा लौटाया नहीं गया था, सुसंगत है।
स्वीकृति वह मौखिक या दस्तावेजी या इलेक्ट्रॉनिक प्ररूप में अंतर्विष्ट कथन है, जो किसी विवाद्यक तव्य या सुसंगत तथ्य के बारे में कोई अनुमान इंगित करता है और जो ऐसे व्यक्तियों में से किसी के द्वारा और ऐसी परिस्थितियों में किया गया है जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है।
1. वे कथन स्वीकृतियां हैं, जिन्हें कार्यवाही के किसी पक्षकार ने किया है, या ऐसे किसी पक्षकार के ऐसे किसी अभिकर्ता द्वारा किया गया है, जिसे न्यायालय मामले की परिस्थितियों में उन कथनों को करने के लिए उस पक्षकार द्वारा अभिव्यक्त या विवक्षित रूप से प्राधिकृत किया हुआ मानता है।
2. वे कथन स्वीकृतियां हैं, जो-
i. वाद के ऐसे पक्षकारों द्वारा, जो प्रतिनिधिक हैसियत में वाद ला रहे हैं या जिन पर प्रतिनिधिक हैसियत में वाद लाया जा रहा है, तय तक स्वीकृतियां नहीं हैं, जब तक कि वे उस समय न किए गए हों जबकि उनको करने वाला पक्षकार वैसी हैसियत धारण करता था; या
(क) ऐसे व्यक्तियों द्वारा किए गए हैं, जिनका कार्यवाही की विषय-वस्तु में कोई साम्पत्तिक या धन संबंधी हित है और जो इस प्रकार हितबद्ध व्यक्तियों की हैसियत में वह कथन करते हैं; या
(ख) ऐसे व्यक्तियों द्वारा किए गए हैं, जिनसे वाद के पक्षकारों का वाद की विषय-वस्तु में अपना हित व्युत्पन्न हुआ है, यदि वे कथन उन्हें करने वाले व्यक्तियों के हित के बने रहने के दौरान में किए गए हैं।
वे कथन, जो उन व्यक्तियों द्वारा किए गए हैं जिनकी स्थिति या दायित्व, वाद के किसी पक्षकार के विरुद्ध सावित करना आवश्यक है, स्वीकृतियां हैं, यदि ऐसे कथन ऐसे व्यक्तियों द्वारा, या उन पर लाए गए वाद में ऐसी स्थिति या दायित्व के संबंध में ऐसे व्यक्तियों के विरुद्ध सुसंगत होते और यदि वे उस समय किए गए हैं जबकि उन्हें करने वाला व्यक्ति ऐसी स्थिति ग्रहण किए हुए हैं या ऐसे दायित्व के अधीन हैं।
ख के लिए किराया-संग्रह करने का दायित्व क लेता है। ग द्वारा ख को देय किराया-संग्रह न करने के लिए क पर ख वाद लाता है। क इस बात से इंकार करता है कि ग से ख को किराया देय था। ग द्वारा यह कथन कि उस पर ख को किराया देय है स्वीकृति है, और यदि क इस बात से इन्कार करता है कि ग द्वारा ख को किराया देय था तो वह क के विरुद्ध सुसंगत तथ्य है।
वे कथन, जो उन व्यक्तियों द्वारा किए गए हैं जिनको वाद के किसी पक्षकार ने किसी विवादग्रस्त विषय के बारे में जानकारी के लिए अभिव्यक्त रूप से निर्दिष्ट किया है, स्वीकृतियां हैं।
यह प्रश्न है कि क्या क द्वारा ख को बेचा हुआ घोड़ा अच्छा है।
ख से क कहता है कि "जा कर ग से पूछ लो, ग इस बारे में सब कुछ जानता है" । ग का कथन स्वीकृति है।
स्वीकृतियां, उन्हें करने वाले व्यक्ति के या उसके हित प्रतिनिधि के विरुद्ध सुसंगत हैं और साबित की जा सकेंगी, किन्तु उन्हें करने वाले व्यक्ति द्वारा या उसकी ओर से या उसके हित प्रतिनिधि द्वारा, निम्नलिखित अवस्थाओं में के सिवाय, वे साबित नहीं की जा सकेगी, अर्थात्ः-
1. कोई स्वीकृति उसे करने वाले व्यक्ति द्वारा या उसकी ओर से तब सावित की जा सकेगी, जब वह इस प्रकृति की है कि यदि उसे करने वाला व्यक्ति मर गया होता, तो वह अन्य व्यक्तियों के बीच धारा 26 के अधीन सुसंगत होती ।
2. कोई स्वीकृति उसे करने वाले व्यक्ति द्वारा या उसकी ओर से तब सावित की जा सकेगी, जबकि वह मन या शरीर की सुसंगत या विवाद्य किसी दशा के अस्तित्व का ऐसा कथन है जो उस समय या उसके लगभग किया गया था जब मन या शरीर की ऐसी दशा विद्यमान थी और ऐसे आचरण के साथ है जो उसकी असत्यता को अनधिसम्भाव्य कर देता है।
3. कोई स्वीकृति उसे करने वाले व्यक्ति द्वारा या उसकी ओर से सावित की जा सकेगी, यदि वह स्वीकृति के रूप में नहीं किन्तु अन्यथा सुसंगत है।
(क) क और ख के बीच प्रश्न यह है कि अमुक विलेख कूटरचित है या नहीं। क अभिपुष्ट करता है कि वह असली है, ख अभिपुष्ट करता है कि वह कूटरचित है। ख का कोई कथन कि विलेख असली है, क साबित कर सकेगा तथा क का कोई कथन कि विलेख कूटरचित है, ख साबित कर सकेगा, किन्तु क अपना यह कथन कि विलेख असली है, साबित नहीं कर सकेगा और न ख ही अपना यह कथन कि विलेख कूटरचित है, साबित कर सकेगा।
(ख) किसी पोत के कप्तान क का विचारण, उस पोत को संत्यक्त करने के लिए किया जाता है। यह दर्शित करने के लिए साक्ष्य दिया जाता है कि पोत अपने उचित मार्ग से बाहर ले जाया गया था। क अपने कारबार के साधारण अनुक्रम में अपने द्वारा रखी जाने वाली वह पुस्तक प्रस्तुत करता है जिसमें वे टिप्पणियां दर्शित हैं, जिनके बारे में यह अभिकथित है कि वे दिन प्रतिदिन किए गए थे और जिनसे यह उपदर्शित है कि पोत अपने उचित मार्ग से बाहर नहीं ले जाया गया था। क इन कथनों को साबित कर सकेगा क्योंकि, यदि उसकी मृत्यु हो गई होती तो वे कथन अन्य व्यक्तियों के बीच धारा 26 के खंड (ख) के अधीन ग्राह्य होते।
(ग) क कोलकाता में किए गए अपराध का अभियुक्त है। वह अपने द्वारा लिखित और उसी दिन चेन्नई में दिनांकित और उसी दिन का चेन्नई का डाक चिह्न धारण करने वाला एक पत्र प्रस्तुत करता है। पत्र की तारीख में, का कथन ग्राह्य है क्योंकि, यदि क की मृत्यु हो गई होती, तो वह धारा 26 के खंड (ख) के अधीन ग्राह्य होता।
(घ) क चुराए हुए माल को यह जानते हुए कि वह चुराया हुआ है प्राप्त करने का अभियुक्त है। वह यह साबित करने की प्रस्थापना करता है कि उसने उसे उसके मूल्य से कम दाम में बेचने से इन्कार किया था। क इन कथनों को साबित कर सकेगा, यद्यपि ये स्वीकृक्तियाँ हैं क्योंकि ये विवाद्यक तथ्यों से प्रभावित उसके आचरण के स्पष्टीकारक हैं।
(ङ) क अपने कब्जे में कूटकृत मुद्रा, कपटपूर्वक रखने का अभियुक्त है, जिसका कूटकृत होना वह जानता था, वह यह साबित करने की प्रस्थापना करता है कि उसने एक कुशल व्यक्ति से उस मुद्रा की जांच करने को कहा था, क्योंकि उसे इस बात का संदेह था कि वह कूटकृत है या नहीं और उस व्यक्ति ने उसकी जांच की तथा उससे कहा कि वह असली है। क इन तथ्यों को साबित कर सकेगा।
किसी दस्तावेज की अन्तर्वस्तु के बारे में मौखिक स्वीकृतियां तब तक सुसंगत नहीं होती, जब तक कि उन्हें साबित करने की प्रस्थापना करने वाला पक्षकार यह दर्शित न कर दे कि ऐसे दस्तावेज की अन्तर्वस्तुओं का द्वितीयक साक्ष्य देने का वह इसमें इसके पश्चात् अन्तर्विष्ट नियमों के अधीन हकदार है या जब तक प्रस्तुत किए गए दस्तावेज का असली होना प्रश्नगत न हो।
सिविल मामलों में कोई भी स्वीकृति सुसंगत नहीं है, यदि वह या तो इस अभिव्यक्त शर्त पर की गई है कि उसका साक्ष्य नहीं दिया जाएगा, या ऐसी परिस्थितियों के अधीन दी गई है जिनसे न्यायालय यह अनुमान कर सके कि पक्षकार इस बात पर परस्पर सहमत हो गए थे कि उसका साक्ष्य नहीं दिया जाना चाहिए।
इस धारा की कोई भी बात, किसी अधिवक्ता को किसी ऐसी वात का साक्ष्य देने से छूट देने वाली नहीं मानी जाएगी जिसका साक्ष्य देने के लिए धारा 132 की उपधारा (1) और उपधारा (2) के अधीन उसे विवश किया जा सकेगा।
अभियुक्त व्यक्ति द्वारा की गई संस्वीकृति दाण्डिक कार्यवाही में विसंगत होती है, यदि उसके किए जाने के बारे में न्यायालय को प्रतीत होता है कि अभियुक्त व्यक्ति के विरुद्ध आरोप के बारे में वह ऐसी उठोरणा, धमकी, प्रपीड़न या वचन द्वारा कराई गई है जो प्राधिकारवान व्यक्ति की ओर से दिया गया है और जो न्यायालय की राय में इसके लिए पर्याप्त है कि वह अभियुक्त व्यक्ति को यह अनुमान करने के लिए उसे युक्तियुक्त प्रतीत होने वाले आधार देती है कि उसके करने से वह अपने विरुद्ध कार्यवाहियों के बारे में नोकिक रूप का कोई फायदा उठाएगा या किसी बुराई का परिवर्जन कर लेगाः
परंतु यदि संस्वीकृति ऐसी किसी उत्प्रेरणा, धमकी, प्रपीड़न या वचन से कारित प्रभाव के पूर्णतः दूर हो जाने के पश्चात् की गई है, तो वह सुसंगत हैः
परंतु यह और कि यदि ऐसी संस्वीकृति अन्यथा सुसंगत है, तो वह केवल इसलिए विसंगत नहीं हो जाती कि वह गुप्त रखने के वचन के अधीन या उसे अभिप्राप्त करने के प्रयोजन के लिए अभियुक्त व्यक्ति से की गई प्रवंचना के परिणामस्वरूप, या उस समय जब कि वह मदोन्मत्त था, की गई थी या इसलिए की वह ऐसे प्रश्नों के, चाहे उनका रूप कैसा ही क्यों न रहा हो, उत्तर में की गई थी जिनका उत्तर देना उसके लिए आवश्यक नहीं था, या केवल इसलिए की उसे यह चेतावनी नहीं दी गई थी कि वह ऐसी संस्वीकृति करने के लिए आवद्ध नहीं था और कि उसके विरुद्ध उसका साक्ष्य दिया जा सकेगा।
1. किसी पुलिस अधिकारी से की गई कोई भी संस्वीकृति, किसी अपराध के अभियुक्त व्यक्ति के विरुद्ध साबित नहीं की जाएगी।
2. कोई भी संस्वीकृति, जो किसी व्यक्ति ने उस समय की हो जब वह पुलिस अधिकारी की अभिरक्षा में है, उसके विरुद्ध तब तक साबित नहीं की जाएगी, जब तक कि वह मजिस्ट्रेट की साक्षात उपस्थिति में न की गई होः
परन्तु जब किसी तथ्य के बारे में यह अभिसाक्ष्य दिया जाता है कि किसी अपराध के अभियुक्त व्यक्ति से, जो पुलिस अधिकारी की अभिरक्षा में है, प्राप्त जानकारी के परिणामस्वरूप उसका पता चला है, तब ऐसी जानकारी में से, उतनी चाहे वह संस्वीकृति की कोटि में आती हो या नहीं, जितनी पता चले हुए तथ्य से स्पष्टतया संबंधित है, साबित की जा सकेगी।
जब एक से अधिक व्यक्ति एक ही अपराध के लिए संयुक्त रूप से विचारित हैं और ऐसे व्यक्तियों में से किसी एक के द्वारा, अपने को और ऐसे व्यक्तियों में से किसी अन्य को प्रभावित करने वाली की गई संस्वीकृति को साबित किया जाता है, तब न्यायालय ऐसी संस्वीकृति को ऐसे अन्य व्यक्ति के विरुद्ध तथा ऐसे संस्वीकृति करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध विचार में ले सकेगा।
इस धारा में प्रयुक्त "अपराध" शब्द के अन्तर्गत, उस अपराध का दुष्प्रेरण या उसे करने का प्रयत्न आता है।
एक से अधिक व्यक्तियों का विचारण किसी ऐसे अभियुक्त की अनुपस्थिति में किया जाता है, जो भगोड़ा है या जो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (2023 का 46) की धारा 84 के अधीन जारी उद्घोषणा का अनुपालन करने में असफल रहता है, इस धारा के प्रयोजन के लिए संयुक्त विचारण समझा जाएगा।
(क) क और ख को ग की हत्या के लिए संयुक्ततः विचारण किया जाता है। यह सावित किया जाता है कि क ने कहा कि "ख और मैंने ग की हत्या की है।" ख के विरुद्ध इस संस्वीकृति के प्रभाव पर न्यायालय विचार कर सकेगा।
(ख) ग की हत्या करने के लिए क का विचारण हो रहा है। यह दर्शित करने के लिए साक्ष्य है कि ग की हत्या क और ख द्वारा की गई थी और यह कि ख ने कहा था कि "क और मैंने ग की हत्या की है"। न्यायालय इस कथन को क के विरुद्ध विचार में नहीं ले सकेगा, क्योंकि ख का संयुक्ततः विचारण नहीं हो रहा है।
स्वीकृतियां, स्वीकृत विषयों का निश्चायक सबूत नहीं हैं, किन्तु वे इसमें इसके पश्चात् अन्तर्विष्ट उपबन्धों के अधीन विबंध के रूप में प्रवर्तित हो सकेंगी।
सुसंगत तथ्यों के लिखित या मौखिक कथन, जो ऐसे व्यक्ति द्वारा किए गए थे, जो मर गया है या मिल नहीं सकता है या जो साक्ष्य देने के लिए असमर्थ हो गया है या जिसकी उपस्थिति इतने विलम्व या व्यय के बिना उपाप्त नहीं की जा सकती, जितना मामले की परिस्थितियों में न्यायालय को अयुक्तियुक्त प्रतीत होता है. निम्नलिखित दशाओं में स्वयमेव सुसंगत तथ्य है, अर्थात्ः-
(क) जब वह कथन किसी व्यक्ति द्वारा अपनी मृत्यु के कारण के बारे में या उस संव्यवहार की किसी परिस्थिति के बारे में किया गया है जिसके फलस्वरूप उसकी मृत्यु हुई, तब उन मामलों में, जिनमें उस व्यक्ति की मृत्यु का कारण प्रश्नगत है। ऐसे कथन सुसंगत हैं चाहे उस व्यक्ति को, जिसने उन्हें किया है, उस समय जब वे किए गए थे मृत्यु की प्रत्याशंका थी या नहीं और चाहे उस कार्यवाही की, जिसमें उस व्यक्ति की मृत्यु का कारण प्रश्नगत होता है, प्रकृति कैसी ही क्यों न हो;
(ख) जब वह कथन ऐसे व्यक्ति द्वारा कारबार के साधारण अनुक्रम में किया गया था और विशेषतः जब वह, उसके द्वारा कारबार के साधारण अनुक्रम में या वृत्तिक कर्तव्य के निर्वहन में रखी जाने वाली पुस्तकों में उसके द्वारा की गई किसी प्रविष्टि या किए गए ज्ञापन के रूप में है; या उसके द्वारा धन, माल, प्रतिभूतियों या किसी भी किस्म की सम्पत्ति की प्राप्ति की लिखित या हस्ताक्षरित अभिस्वीकृत है, या वाणिज्य में उपयोग में आने वाले उसके द्वारा लिखित या हस्ताक्षरित किसी दस्तावेज के रूप में है; या किसी पत्र या अन्य दस्तावेज की तारीख के रूप में है, जो उसके द्वारा प्रायः दिनांकित, लिखित या हस्ताक्षरित की जाती थी;
(ग) जब वह कथन उसे करने वाले व्यक्ति के धन सम्वन्धी या साम्पत्तिक हित के विरुद्ध है या जब, यदि वह सत्य है, तो उसके कारण उस पर दाण्डिक अभियोजन या नुकसानी का वाद लाया जा सकता है या लाया जा सकता था;
(घ) जब उस कथन में ऐसे किसी व्यक्ति की राय किसी ऐसे लोक अधिकार या रूढ़ि या लोक या साधारण हित के विषयों के अस्तित्व के बारे में है, जिसके अस्तित्व से, यदि वह अस्तित्व में होता तो, उससे उस व्यक्ति का अवगत होना सम्भाव्य होता और जब ऐसा कथन ऐसे किसी अधिकार, रूढ़ि या वात के बारे में किसी विवाद के उत्पन्न होने से पहले किया गया था;
(ङ) जब वह कथन किन्हीं ऐसे व्यक्तियों के वीच रक्त, विवाह या दत्तकग्रहण पर आधारित किसी नातेदारी के अस्तित्व के सम्बन्ध में है, जिन व्यक्तियों की रक्त, विवाह या दत्तकग्रहण पर आधारित नातेदारी के बारे में उस व्यक्ति के पास, जिसने वह कथन किया है, ज्ञान के विशेष साधन थे और जब वह कथन विवादग्रस्त प्रश्न के उठाए जाने से पूर्व किया गया था;
(च) जब वह कथन मृत व्यक्तियों के बीच रक्त, विवाह या दत्तकग्रहण पर आधारित किसी नातेदारी के अस्तित्व के सम्बन्ध में है और उस कुटुम्ब की बातों से, जिसका ऐसा मृत व्यक्ति संबंधित था, संबंधित किसी वसीयत या विलेख में या किसी कुटुम्ब वंशावली में या किसी समाधि-पत्थर, कुटुम्ब चित्र या अन्य चीजों पर जिन पर ऐसे कथन प्रायः किए जाते हैं, किया गया है, तथा जब ऐसा कथन विवादग्रस्त प्रश्न के उठाए जाने से पूर्व किया गया था;
(छ) जब वह कथन किसी ऐसे विलेख, वसीयत या अन्य दस्तावेज में अन्तर्विष्ट है, जो किसी ऐसे संव्यवहार से सम्बन्धित है जैसा धारा 11 के खण्ड (क) में विनिर्दिष्ट है;
(ज) जब वह कथन कई व्यक्तियों द्वारा किया गया था और प्रश्नगत बात से सुसंगत उनकी भावनाओं या धारणाओं को अभिव्यक्त करता है।
(क) प्रश्न यह है कि क्या क की हत्या ख द्वारा की गई थी, या क की मृत्यु किसी संव्यवहार में हुई क्षतियों से ही जाती है, जिसके अनुक्रम में उससे वलात्संग किया गया था प्रश्न यह है कि क्या उससे ख द्वारा बलात्संग किया गया था, या प्रश्न यह है कि क्या क, ख द्वारा ऐसी परिस्थितियों में मारा गया था कि क की विधवा द्वारा ख के विरुद्ध वाद लाया जा सकता है। अपनी मृत्यु के कारण के बारे में क द्वारा किए गए वे कथन, जो उसने क्रमश विचाराधीन हत्या, वलात्संग और वादयोग्य दोष को निर्देशित करते हुए किए है, सुसंगत तथ्य हैं।
(ख) प्रश्न क के जन्म की तारीख के बारे में है। एक मृत शल्य चिकित्सक की अपने कारवार के साधारण अनुक्रम में नियमित रूप से रखी जाने वाली डायरी में इस कथन की प्रविष्टि, कि अमुक दिन उसने क की माता की परिचर्या की और उसे पुत्र का प्रसव कराया, सुसंगत तथ्य है।
(ग) प्रश्न यह है कि क्या क अमुक दिन नागपुर में था। कारवार के साधारण अनुक्रम में नियमित रूप से रखी गई एक मृत सालिसिटर की डायरी में यह कथन, कि अमुक दिन वह सालिसिटर नागपुर में एक वर्णित स्थान पर विनिर्दिष्ट कारवार के बारे में विचार-विमर्श करने के प्रयोजन के लिए क के पास रहा, सुसंगत तथ्य है।
(घ) प्रश्न यह है कि क्या कोई पोत मुम्बई बन्दरगाह से अमुक दिन रवाना हुआ। किसी वाणिज्यिक फर्म के, जिसके द्वारा वह पोत भाड़े पर लिया गया था, मृत सदस्य द्वारा चेन्नई स्थित अपने सम्पर्कियों को जिन्हें वह स्थोरा परेषित किया गया था, यह कथन करने वाला पत्र कि पोत मुम्बई पत्तन से अमुक दिन चल दिया, सुसंगत तथ्य है।
(ङ) प्रश्न यह कि क्या क को अमुक भूमि का किराया दिया गया था। क के मृत अभिकर्ता का क के नाम पत्र जिसमें यह कथन है कि उसने क के निमित्त किराया प्राप्त किया है और वह उसे क के आदेश के अधीन रखे हुए है, सुसंगत तथ्य है।
(च) प्रश्न यह है कि क्या क और ख का विवाह वैध रूप से हुआ था। एक मृत पादरी का यह कथन कि उसने उनका विवाह ऐसी परिस्थितियों में कराया था, जिनमें उसका कराया जाना अपराध होता, सुसंगत है।
(छ) प्रश्न यह है कि क्या एक व्यक्ति क ने, जो मिल नहीं सकता अमुक दिन एक पत्र लिखा था। यह तथ्य कि उसके द्वारा लिखित एक पत्र पर उस दिन की तारीख दिनांकित है, सुसंगत है।
(ज) प्रश्न यह है कि किसी पोत के ध्वंस का कारण क्या है। कप्तान द्वारा, जिसकी उपस्थिति उपाप्त नहीं की जा सकती, किया गया ऐसा प्रतिवाद, सुसंगत तथ्य है।
(झ) प्रश्न यह है कि क्या अमुक सड़क लोक-मार्ग है। ग्राम के मृत प्रधान क द्वारा किया गया कथन कि वह सड़क लोक-मार्ग है, सुसंगत तथ्य है।
(ञ) प्रश्न यह है कि विशिष्ट बाजार में अमुक दिन अनाज की क्या कीमत थी। एक मृत व्यवसायी द्वारा अपने कारबार के साधारण अनुक्रम में किया गया कीमत का कथन सुसंगत तथ्य है।
(ट) प्रश्न यह है कि क्या क, जो मर चुका है, ख का पिता था। क द्वारा किया गया यह कथन कि ख उसका पुत्र है, सुसंगत तथ्य है।
(ठ) प्रश्न यह है कि क के जन्म की तारीख क्या है। क के मृत पिता द्वारा किसी मित्र को लिखा हुआ पत्र, जिसमें यह बताया गया है कि क का जन्म अमुक दिन हुआ, सुसंगत तथ्य है।
(ड) प्रश्न यह है कि क्या और कब क और ख का विवाह हुआ था। ख के मृत पिता ग द्वारा किसी याददाश्त पुस्तिका में अपनी पुत्री का क के साथ अमुक तारीख को विवाह होने की प्रविष्टि सुसंगत तथ्य है।
(ढ) दुकान की खिड़की में अभिदर्शित रंगित व्यंगचित्र में अभिव्यक्त अपमान-लेख के लिए ख पर क वाद लाता है। प्रश्न व्यंगचित्र की समरूपता और उसके अपमान-लेखीय प्रकृति के बारे में है। इन बातों पर दर्शकों की भीड़ की टिप्पणियां साबित की जा सकेंगी।
वह साक्ष्य, जो किसी साक्षी ने किसी न्यायिक कार्यवाही में, या विधि द्वारा उसे लेने के लिए प्राधिकृत किसी व्यक्ति के समक्ष दिया है, उन तथ्यों की सत्यता को, जो उस साक्ष्य में कथित हैं, किसी पश्चातवर्ती न्यायिक कार्यवाही में या उसी न्यायिक कार्यवाही के आगामी प्रक्रम में साबित करने के प्रयोजन के लिए तव सुसंगत है, जब कि वह साक्षी मर गया है या मिल नहीं सकता है या वह साक्ष्य देने के लिए असमर्थ है या प्रतिपक्षी द्वारा उसे पहुंच के बाहर कर दिया गया है या यदि उसकी उपस्थिति इतने विलम्ब या व्यय के विना, अभिप्राप्त नहीं की जा सकती, जितना कि मामले की परिस्थितियों में न्यायालय अयुक्तियुक्त समझता हैः
परन्तु वह तब जब कि वह कार्यवाही उन्हीं पक्षकारों या उनके हित प्रतिनिधियों के बीच में थी, प्रथम कार्यवाही में प्रतिपक्षी को प्रतिपरीक्षा का अधिकार और अवसर था, तथा विवाद्य प्रश्न प्रथम कार्यवाही में सारतः वही थे जो द्वितीय कार्यवाही में हैं।
दाण्डिक विचारण या जांच, इस धारा के अर्थ के अन्तर्गत अभियोजक और अभियुक्त के बीच की कार्यवाही समझी जाएगी।
कारबार के अनुक्रम में नियमित रूप से रखी गई लेखा-पुस्तकों की प्रविष्टियां, जिनके अन्तर्गत वे भी हैं जो इलैक्ट्रॉनिक प्ररूप में रखी गई हैं, जब कभी वे ऐसे विषय का निर्देश करती हैं जिसमें न्यायालय को जांच करनी है, सुसंगत हैं, किन्तु अकेले ऐसे कथन ही किसी व्यक्ति को दायित्व से भारित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं होंगे।
ख पर क एक हजार रुपए के लिए वाद लाता है और अपनी लेखा यहियों की वे प्रवष्टियां दर्शित करता है, जिनमें ख को इस रकम के लिए उसका ऋणी दर्शित किया गया है। ये प्रविष्टियां सुसंगत हैं किन्तु ऋण साबित करने के लिए अन्य साक्ष्य के बिना पर्याप्त नहीं हैं।
किसी लोक या अन्य राजकीय पुस्तक, रजिस्टर या अभिलेख या इलैक्ट्रॉनिक अभिलेख में की गई प्रविष्टि, जो किसी विवाद्यक या सुसंगत तथ्य का कथन करती है और किसी लोक सेवक द्वारा अपने पदीय कर्तव्य के निर्वहन में या उस देश की, जिसमें ऐसी पुस्तक, रजिस्टर या अभिलेख या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख रखा जाता है, विधि द्वारा, विशेष रूप से व्यादिष्ट कर्तव्य के पालन में किसी अन्य व्यक्ति द्वारा की गई है, स्वयं सुसंगत तथ्य है।
विवाद्यक तथ्यों या सुसंगत तथ्यों के वे कथन, जो प्रकाशित मानचित्रों या चाटों में, जो लोक विक्रय के लिए साधारणतः प्रस्थापित किए जाते हैं या केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार के प्राधिकार के अधीन बनाए गए मानचित्रों या रेखांकों में किए गए हैं, उन विषयों के बारे में जो ऐसे मानचित्रों, चार्टी या रेखांकों में प्रायः निरूपित या कथित होते हैं, स्वयं सुसंगत तथ्य हैं।
जब न्यायालय को किसी लोक प्रकृति के किसी तथ्य के अस्तित्व के वारे में राय बनानी है तब किसी केन्द्रीय अधिनियम या राज्य अधिनियम में या संबंधित राजपत्र में वर्णित केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा की गई अधिसूचना में तात्पर्यित होने वाले किसी मुद्रित पत्र या इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल प्ररूप में अन्तर्विष्ट वृतांत में किया गया, उसका कोई कथन सुसंगत तथ्य है।
जब न्यायालय को किसी देश की विधि के बारे में राय वनानी है, तब ऐसी विधि का कोई भी कथन, जो ऐसी किसी पुस्तक में अन्तर्विष्ट है जो ऐसे देश की सरकार के प्राधिकार के अधीन मुद्रित या प्रकाशित जिसके अंतर्गत इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल प्ररूप भी है और ऐसी किसी विधि को अन्तर्विष्ट करने वाली सात्यर्थित है, तथा ऐसे देश के न्यायालयों के किसी विनिर्णय की कोई रिपोर्ट, जो ऐसी विनिर्णयो की रिपोर्ट में तात्पर्पित होने वाली किसी पुस्तक, जिसके अंतर्गत इलैक्ट्रॉनिक या डिजिटल प्ररूप भी है, में अन्तर्विष्ट सुसंगत है।
जब कोई कथन, जिसका साक्ष्य दिया जाता है, किसी वृहत्तर कथन का या किसी बातचीत का भाग है या किसी एकल दस्तावेज का भाग है या किसी ऐसी दस्तावेज में अन्तर्विष्ट है जो किसी पुस्तक का या पत्रों या कागज-पत्रों की संसक्त आवली का भाग है या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख के भाग में अंतर्विष्ट है तब उस रुवन, बातचीत, दस्तावेज, इलैक्ट्रॉनिक अभिलेख, पुस्तक या पत्रों या कागज-पत्रों की आवली के उतने का ही. न कि उतने से अधिक का साक्ष्य दिया जाएगा, जितना न्यायालय उस कथन की प्रकृति और प्रभाव को तवा उन परिस्थितियों को, जिनके अधीन यह किया गया था, पूर्णतः समझने के लिए उस विशिष्ट मामले में आवश्यक विचार करता है।
किसी ऐसे निर्णय, आदेश या डिक्री का अस्तित्व, जो किसी न्यायालय को किसी वाद के संज्ञान से या कोई विचारण करने से विधि द्वारा निवारित करता है, सुसंगत तथ्य है जब प्रश्न यह हो कि क्या ऐसे न्यायालय को ऐसे वाद का संज्ञान या ऐसा विचारण करना चाहिए।
1. किसी सक्षम न्यायालय या अधिकरण के संप्रमाण-विषयक, विवाह-विषयक, नावधिकरण-विषयक या दिवाला-विषयक अधिकारिता के प्रयोग में दिया हुआ अन्तिम निर्णय, आदेश या डिक्री, जो किसी व्यक्ति को, कोई विधिक हैसियत प्रदान करती हैं या उससे ले लेती है या जो पूर्ण रूप से न कि किसी विनिर्दिष्ट व्यक्ति के विरुद्ध किसी व्यक्ति को ऐसी किसी हैसियत का हकदार या किसी विनिर्दिष्ट चीज का हकदार घोषित करती है, तब सुसंगत हैं जब किसी ऐसी विधिक हैसियत, या किसी ऐसी चीज पर किसी ऐसे व्यक्ति के हक का अस्तित्व सुसंगत है।
2. ऐसा निर्णय, आदेश या डिक्री इस बात का निश्चायक सबूत है कि-
I. कोई विधिक हैसियत, जो वह प्रदत्त करती है, उस समय प्रोदभूत हुई जब ऐसा निर्णय, आदेश या डिक्री प्रवर्तन में आई;
II. कोई विधिक हैसियत, जिसके लिए वह किसी व्यक्ति को हकदार घोषित करती है, उस व्यक्ति को उस समय प्रोदभूत हुई जब ऐसे निर्णय, आदेश या डिक्री द्वारा घोषित है कि उस समय यह उस व्यक्ति को प्रोदभूत हुई;
III. कोई विधिक हैसियत, जिसे वह किसी ऐसे व्यक्ति से ले लेती है उस समय खत्म हुई जिस समय ऐसे निर्णय, आदेश या डिक्री द्वारा घोषित है कि उस समय से वह हैसियत खत्म हो गई थी या खत्म हो जानी चाहिए थी; और
IV. कोई चीज जिसके लिए वह किसी व्यक्ति को ऐसा हकदार घोषित करती है उस व्यक्ति की उस समय सम्पत्ति थी जो उस समय ऐसे निर्णय, आदेश या डिक्री द्वारा घोषित है कि उस समय से वह चीज उसकी सम्पत्ति थी या होनी चाहिए थी।
वे निर्णय, आदेश या डिक्रियां, जो धारा 35 में वर्णित से भिन्न हैं, यदि वे जांच में सुसंगत लोक प्रकृति की बातों से सम्बन्धित हैं, तो वे सुसंगत हैं, किन्तु ऐसे निर्णय, आदेश या डिक्रियां उन बातों का निश्चायक सबूत नहीं हैं जिनका वे कथन करती हैं।
क अपनी भूमि पर अतिचार के लिए ख पर वाद लाता है। ख उस भूमि पर मार्ग के लोक अधिकार का अस्तित्व अभिकथित करता है जिसका क इंकार करता है। क द्वारा ग के विरुद्ध उसी भूमि पर अतिचार के लिए किसी वाद में, जिसमें ग ने उसी मार्ग के अधिकार का अस्तित्व अभिकथित किया था, प्रतिवादी के पक्ष में डिक्री का अस्तित्व सुसंगत है, किन्तु वह इस बात का निश्चायक सबूत नहीं है कि वह मार्ग का अधिकार अस्तित्व में है।
धारा 34, धारा 35 और धारा 36 में वर्णित से भिन्न निर्णय, आदेश या डिक्रियां विसंगत हैं जब तक हि ऐसे निर्णय, आदेश या डिक्री का अस्तित्व विवाद्यक तथ्य न हो या वह इस अधिनियम के किसी अन्य पवन्ध के अन्तर्गत सुसंगत न हो।
(क) क और ख किसी अपमान-लेख के लिए, जो उनमें से प्रत्येक पर लांछन लगाता है, ग पर पृथक-पृथक् वाद लाते हैं। प्रत्येक मामले में ग कहता है कि वह बात, जिसका अपमान-लेखीय होना अभिकथित है, सत्य है और परिस्थितियां ऐसी हैं कि वह अधिसम्भाव्यतः या तो प्रत्येक मामले में सत्य है या किसी में नहीं। ग के विरुद्ध क इस आधार पर नुकसानी की डिक्री अभिप्राप्त करता है कि ग अपना न्यायोचित सावित करने में असफल रहा है। यह तथ्य ख और ग के बीच विसंगत है।
(ख) ख का अभियोजन क इसलिए करता है कि उसने क की गाय चाई है। ख दोपसिद्ध किया जाता है। तत्पश्चात् क उस गाय के लिए, ग पर वाद लाता है। जिसे ख ने दोपसिद्धि होने से पूर्व ग को बेच दिया था। ख के विरुद्ध यह निर्णय क और ग के बीच विसंगत है।
(ग) क ने ख के विरुद्ध भूमि के कब्जे की डिक्री अभिप्राप्त की है। ख का पुत्र ग परिणामस्वरूप क की हत्या करता है। उस निर्णय का अस्तित्व अपराध का हेतु दर्शित करने के नाते सुसंगत है।
(घ) क पर चोरी और चोरी के लिए पहले से ही दोपसिद्धि का आरोप है। पूर्व दोषसिद्धि विवाद्यक तथ्य होने के नाते सुसंगत है।
(ङ) ख की हत्या के लिए क विचारित किया जाता है। यह तथ्य कि ख ने क पर अपमान-लेख के लिए अभियोजन चलाया था और क दोषसिद्ध और दण्डित किया गया था, धारा 6 के अधीन विवाद्यक तथ्य का हेतु दर्शित करने के नाते सुसंगत है।
वाद या अन्य कार्यवाही का कोई भी पक्षकार यह दर्शित कर सकेगा कि कोई निर्णय, आदेश या डिक्री, तो धारा 34, धारा 35 या धारा 36 के अधीन सुसंगत है और जो प्रतिपक्षी द्वारा साबित की जा चुकी है, ऐसे न्यायालय द्वारा दी गई थी जो उसे देने के लिए अक्षम था या जिसे कपट या सांठ-गांठ द्वारा अभिप्राप्त की गई थी।
1. जब न्यायालय को, विदेशी विधि की या विज्ञान की या कला या किसी अन्य क्षेत्र की किसी बात पर या हस्तलेख या अंगुली-चिह्नों की पहचान के बारे में राय बनानी है तव उस बात पर ऐसी विदेशी विधि, विज्ञान या कला या किसी अन्य क्षेत्र में या हस्तलेख या अंगुली-चिह्नों की पहचान विषयक प्रश्नों में, विशेष कुशल व्यक्तियों की रायें सुसंगत तथ्य हैं और ऐसे व्यक्तियों को विशेषज्ञ कहा जाता हैं।
(क) प्रश्न यह है कि क्या क की मृत्यु विष द्वारा कारित हुई। जिस विष के बारे में यह अनुमान है कि उससे क की मृत्यु हुई है, उस विप से पैदा हुए लक्षणों के बारे में विशेषज्ञों की रायें सुसंगत हैं।
(ख) प्रश्न यह है कि क्या क अमुक कार्य करने के समय चित्त-विकृत के कारण उस कार्य की प्रकृति, या यह कि जो कुछ वह कर रहा है वह या तो दोषपूर्ण या विधि के प्रतिकूल है, जानने में असमर्थ था। इस प्रश्न पर विशेषज्ञों की रायें सुसंगत हैं कि क्या क द्वारा प्रदर्शित लक्षणों से चित्त-विकृत सामान्यतः दर्शित होती है और क्या ऐसी चित्त-विकृति व्यक्तियों को उन कार्यों की प्रकृति, जिन्हें वे करते हैं, या वह कि जो कुछ वे करते हैं वह या तो दोषपूर्ण या विधि के प्रतिकूल हैं, जानने में प्रायः असमर्थ बना देती है।
(ग) प्रश्न यह है कि क्या अमुक दस्तावेज क द्वारा लिखा गया था। एक अन्य दस्तावेज प्रस्तुत किया जाता है जिसका क द्वारा लिखा जाना सावित या स्वीकृत है। इस प्रश्न पर विशेषज्ञों की रायें सुसंगत हैं कि क्या दोनों दस्तावेज एक ही व्यक्ति द्वारा या विभिन्न व्यक्तियों द्वारा लिखे गए थे।
2. जब न्यायालय को किसी कार्यवाही में किसी कंप्यूटर संसाधन या किसी अन्य इलैक्ट्रॉनिक या डिजिटल रूप में पारेषित या संग्रहीत किसी सूचना के संबंध में कोई राय बनानी हो तब सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (2000 का 21) की धारा 79क में निर्दिष्ट इलैक्ट्रॉनिक साक्ष्य के परीक्षक की राय एक सुसंगत तथ्य है।
इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य का परीक्षक एक विशेषज्ञ होगा।
वे तथ्य, जो अन्यथा सुसंगत नहीं हैं, सुसंगत होते हैं यदि वे विशेषज्ञों की रायों का तब समर्थन करते हों या उनसे असंगत हों जब उनकी ऐसी रायें सुसंगत हैं।
(क) प्रश्न यह है कि क्या क को अमुक विष दिया गया था। यह तथ्य सुसंगत है कि अन्य व्यक्तियों में भी, जिन्हें वह विष दिया गया था, अमुक लक्षण प्रकट हुए थे, जिनका उस विष के लक्षण होने के बारे में विशेषज्ञ अभिपुष्टि करते हैं या उससे इंकार करते हैं।
(ख) प्रश्न यह है कि क्या किसी बन्दरगाह में कोई बाधा अमुक समुद्र-भित्ति से कारित हुई है। यह तथ्य कि अन्य बन्दरगाह, जो अन्य दृष्टियों से वैसे ही स्थित थे, किन्तु जहां ऐसी समुद्र-भित्तियां नहीं थी, लगभग उसी समय बाधित होने लगे थे सुसंगत है।
1. जब न्यायालय को किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में राय बनानी हो जिसके द्वारा कोई दस्तावेज लिखा या हस्ताक्षरित किया गया था, तब उस व्यक्ति के हस्तलेख से, जिसके द्वारा वह लिखा या हस्ताक्षरित किया गया अनुमानित किया जाता है, किसी परिचित व्यक्ति की यह राय कि वह उस व्यक्ति द्वारा लिखा या हस्ताक्षरित किया गया था अथवा लिखा या हस्ताक्षरित नहीं किया गया था, सुसंगत तथ्य है।
कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के हस्तलेख से परिचित हुआ तब कहा जाता है, जब उसने उस व्यक्ति को लिखते देखा है या जब उसने स्वयं अपने द्वारा या अपने प्राधिकार के अधीन लिखित और उस व्यक्ति को संबोधित दस्तावेजों के उत्तर में उस व्यक्ति द्वारा लिखे जाने के लिए तात्पर्यित होने वाले दस्तावेज प्राप्त किए हैं, या जब कारवार के साधारण अनुक्रम में उस व्यक्ति द्वारा लिखे जाने के लिए तात्पर्यित होने वाले दस्तावेज उसके समक्ष प्रायः रखे जाते हैं।
प्रश्न यह है कि क्या अमुक पत्र ईटानगर के एक व्यापारी क द्वारा लिखा गया है। ख बंगलूरु में एक व्यापारी है. जिसने क को संबोधित पत्र लिखे हैं और उसके द्वारा लिखे जाने के लिए तात्पर्पित होने वाले पत्र प्राप्त किए हैं। ग, घ का लिपिक है, जिसका कर्तव्य ख के पत्र-व्यवहार को देखना और फाइल करना था। ख का दलाल घ है जिसके समक्ष क द्वारा लिखे जाने के लिए तात्पर्पित होने वाले पत्रों को उनके बारे में उससे सलाह देने के प्रयोजन के लिए ख प्रायः प्रस्तुत करता था। ख, ग और घ की इस प्रश्न पर ये रायें कि क्या वह पत्र क के हस्तलेख में है, सुसंगत हैं, यद्यपि न तो ख ने, नगने, न घने इसे क को लिखते हुए कभी देखा था।
2. जब न्यायालय को किसी व्यक्ति के इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर के बारे में राय बनानी हो तो प्रमाणकर्ता प्राधिकारी की राय में, जिसने इलैक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर प्रमाणपत्र जारी किया है, सुसंगत तथ्य है।
जब न्यायालय को किसी साधारण रूढ़ि या अधिकार के अस्तित्व के बारे में राय बनानी हो, तब ऐसी रूढ़ि या अधिकार के अस्तित्व के वारे में उन व्यक्तियों की रायें सुसंगत हैं, जो यदि उसका अस्तित्व होता तो संभाव्यतः उसे जानते होते।
"साधारण रूढ़ि या अधिकार" पद के अन्तर्गत ऐसी रूढ़ियां या अधिकार आते हैं जो व्यक्तियों के किसी काफी बड़े वर्ग के लिए सामान्य हैं।
किसी विशिष्ट ग्राम के ग्रामीणों का विशिष्ट कूप के पानी का उपयोग करने का अधिकार इस धारा के अर्थ के अन्तर्गत साधारण अधिकार है।
जब न्यायालय को-
I. मनुष्यों के किसी निकाय या कुटुम्ब की प्रथाओं और सिद्धांतों के;
II. किसी धार्मिक या पूर्त प्रतिष्ठान के गठन और शासन के;
III. विशिष्ट जिले या विशिष्ट वर्गों के लोगों द्वारा प्रयुक्त शब्दों या पदों के अर्थ के बारे में राय बनानी हो, तब उनके संबंध में,
जब न्यायालय को एक व्यक्ति की किसी अन्य के साथ नातेदारी के बारे में राय बनानी हो, तब ऐसी नातेदारी के अस्तित्व के बारे में ऐसे किसी व्यक्ति के आचरण द्वारा अभिव्यक्त राय, जिसके पास कुटुम्ब के सदस्य के रूप में या अन्यथा उस विषय के संबंध में ज्ञान के विशेष साधन हैं, सुसंगत तथ्य हैः
परन्तु भारतीय विवाह विच्छेद अधिनियम, 1869 (1869 का 4) के अधीन कार्यवाहियों में या भारतीय न्याय सहिता, 2023 (2023 का 45) की धारा 82 और धारा 84 के अधीन अभियोजन में ऐसी राय विवाह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं होगी।
(क) प्रश्न यह है कि क्या क और ख विवाहित थे। यह तथ्य कि उनको अपने मित्रों द्वारा पति और पत्नी के रूप में प्रायः स्वीकार किया जाता था और उन्हें उसी रूप में माना जाता था, सुसंगत है।
(ख) प्रश्न यह है कि क्या क, ख का धर्मज पुत्र है। यह तथ्य कि कुटुम्ब के सदस्यों द्वारा क की सदैव उस रूप में माना जाता था, सुसंगत है।
जब कभी किसी जीवित व्यक्ति की राय सुसंगत है, तब वे आधार, जिन पर वह आधारित है, भी सुसंगत हैं।
कोई विशेषज्ञ अपनी राय बनाने के प्रयोजन के लिए उसके द्वारा किए हुए प्रयोगों का विवरण दे सकता है।
सिविल मामलों में यह तथ्य कि किसी संबंधित व्यक्ति का शील ऐसा है कि जो उस पर लांछित किसी आचरण को अधिसंभाव्य या अनधिसंभाव्य बना देता है, वहां तक के सिवाय विसंगत है, जहां तक कि ऐसा शील अन्यथा सुसंगत तथ्यों से प्रकट होता है।
दाण्डिक कार्यवाहियों में यह तथ्य कि अभियुक्त व्यक्ति अच्छे शील का है, सुसंगत है।
भारतीय न्याय संहिता, 2023 (2023 का 45) की धारा 64, धारा 65, धारा 66, धारा 67, धारा 68, धारा 69, धारा 70, धारा 71, धारा 74, धारा 75, धारा 76, धारा 77 या धारा 78 के अधीन किसी अपराध के लिए या किसी ऐसे अपराध के किए जाने का प्रयत्न करने के लिए, किसी अभियोजन में जहां सम्मति का प्रश्न विवाद्य है वहां पीड़ित के शील या ऐसे व्यक्ति का किसी व्यक्ति के साथ पूर्व लैंगिक अनुभव का साक्ष्य ऐसी सम्मति या सम्मति की गुणवत्ता के मुद्दे पर सुसंगत नहीं होगा।
दाण्डिक कार्यवाहियों में, यह तथ्य कि अभियुक्त व्यक्ति चुरे शील का है, तब तक विसंगत है, जब तक कि इस बात का साक्ष्य न दिया गया हो कि वह अच्छे शील का है, जिस मामले में वह सुसंगत हो जाता है।
यह धारा उन मामलों के संबंध में लागू नहीं होती है जिनमें किसी व्यक्ति का बुरा शील स्वयं विवाद्यक तथ्य है।
पूर्व दोपसिद्ध बुरे शील के साक्ष्य के रूप में सुसंगत है।
सिविल मामलों में, यह तथ्य कि किसी व्यक्ति का शील ऐसा है जिससे नुकसानी की रकम पर, जो उसे मिलनी चाहिए, प्रभाव पड़ता है, सुसंगत है।
इस धारा में और धारा 46, धारा 47 तथा धारा 49 में "शील" शब्द के अन्तर्गत ख्याति और स्वभाव दोनों आते हैं, किन्तु धारा 49 में यथा उपबंधित के सिवाय केवल साधारण ख्याति और साधारण स्वभाव का ही साक्ष्य दिया जा सकेगा न कि ऐसे विशिष्ट कार्यों का, जिनके द्वारा, ख्याति या स्वभाव को दर्शाया गया है।