धारा 18 अध्याय 10 बिहार मद्यनिषेध और उत्पाद नियमावली, 2021

धारा 18 अध्याय 10 बिहार मद्यनिषेध और उत्पाद नियमावली, 2021

अध्याय-10

गिरफ्तारी एवं अभियोजन की प्रक्रिया।

"18. शराब के उपभोग के लिए गिरफ्तारी और जाँच आदिः-

(1) जब कभी कोई व्यक्ति इस अधिनियम की धारा-37 के अधीन पहली बार गिरफ्तार किया जाता है तो उसे पुलिस पदाधिकारी या उत्पाद पदाधिकारी द्वारा तुरत सम्यक् रूप से प्राधिकृत कार्यपालक मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा।

(2) सम्बद्ध पुलिस पदाधिकारी या उत्पाद पदाधिकारी जाँच करेगा तथा प्रपत्र VI में एक रिपोर्ट समर्पित करेगा। जाँच करते समय सम्बद्ध पदाधिकारी अभियुक्त की पहचान, उसके पहचान-पत्र आदि का अभिनिश्चय करेगा और उल्लिखित करेगा कि क्या अभियुक्त गिरफ्तारी के दौरान सहयोग किया है, चिकित्सीय जाँच या श्वसन (ब्रेथ) विश्लेषण हेतु अपने को समर्पित किया है और क्या वह सार्वजनिक उपद्रव करते हुए या उग्र व्यवहार करते हुए पाया गया था।

(3) रिपोर्ट तथा कार्यपालक मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रपत्र VIक में अभियुक्त द्वारा दिये गये बयान के आधार पर अभियुक्त को कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा न्यूनतम 2000 रूपये तथा अधिकतम 5000 रूपये के जुर्माने के भुगतान या अभियुक्त द्वारा भुगतान नहीं करने की दशा में 30 दिनों के साधारण कारावास का दंडादेश दिया जा सकेगा। कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा प्रयोग किए जाने के लिए प्रपत्र VII में आदेश-पत्र का फार्मेट दिया गया है।

परन्तु जहाँ पुलिस / उत्पाद पदाधिकारी अपने रिपोर्ट में प्रार्थना करता है कि अभियुक्त को जुर्माने के भुगतान पर नहीं छोड़ा जाय तथा उसका कारण देता है तो कार्यपालक मजिस्ट्रेट अपनी संतुष्टि के अधीन अभियुक्त को 30 दिनों के साधारण कारावास के लिए सुपुर्द करेगा।

(4) इस अधिनियम की धारा-37 के अधीन यदि किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाता है और जहाँ यह कार्यपालक मजिस्ट्रेट की नोटिस में आता है कि उक्त व्यक्ति को धारा-37 के अधीन पूर्व में दोषसिद्ध किया गया है तो कार्यपालक मजिस्ट्रेट पुलिस / उत्पाद पदाधिकारी के रिपोर्ट के आधार पर अभियुक्त को एक वर्ष की अवधि के साधारण कारावास का दंडादेश देगा।

(5) प्रथम बार के लिये दोषसिद्ध व्यक्ति द्वारा तुरत जुर्माना भुगतान करने में असमर्थ होने तथा राशि की व्यवस्था के लिए कुछ अतिरिक्त समय देने के लिए अनुरोध करने की दशा में कार्यपालक मजिस्ट्रेट उसे तबतक ऐसी अवधि के लिए न्यायिक हिरासत में सुपुर्द करेगा जब तक दोषसिद्ध व्यक्ति जुर्माने के भुगतान की व्यवस्था न कर ले। जुर्माने की राशि के भुगतान के तुरत बाद उक्त व्यक्ति को छोड़ दिया जाएगा।

(6) ऐसी शास्ति, विचारण यदि कोई हो, के परिणाम को ध्यान में रखे बिना विशेष न्यायालय के समक्ष वापसी योग्य नहीं होगी।

(7) जहाँ आरोपी शराब पीते हुए या नशे की अवस्था में पाए जाने के अलावा कुछ शराब / मादक द्रव्य को रखे हुए पाया जाता है तो कार्यपालक मजिस्ट्रेट यदि कलक्टर द्वारा प्राधिकृत हो, अधिनियम की धारा-57 और 57क के अधीन उक्त शराब / मादक द्रव्य को नष्ट करवा सकेगा। कोई वाहन / परिसर जहाँ से उक्त शराब / मादक द्रव्य बरामद किया गया हो वह इस अधिनियम तथा इन नियमों के उपबंध के अनुसार विभिन्न कार्यवाही के रूप में शास्ति या अधिहरण के अधीन होगा।

"18क. विशेष न्यायालयों से धारा-37 के अधीन मामलों का अंतरणः-

(1) इस अधिनियम के संशोधन के अनुसरण में धारा-37 के अधीन अपराध अब ऐसे कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा निपटाया जाएगा जिसे पटना उच्च न्यायालय द्वारा द्वितीय श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट की शक्ति प्रदत्त हो। ऐसे मामले अब विशेष न्यायालयों में दाखिल नहीं किए जायेंगे।

(2) कार्यपालक मजिस्ट्रेट को शक्तियाँ प्रदान करने के प्रयोजनार्थ जिला मजिस्ट्रेट कार्यपालक मजिस्ट्रेटों के नाम के साथ उनकी अधिकारिता की अनुशंसा तुरत राज्य सरकार से करेगा। तत्पश्चात् राज्य सरकार इन कार्यपालक मजिस्ट्रेट को शक्तियाँ प्रदान करने के लिए पटना उच्च न्यायालय को प्रस्ताव भेजेगी।

(3) जब पटना उच्च न्यायालय इन कार्यपालक दण्डाधिकारियों को शक्तियाँ प्रदान कर देगा तब इन नियमों के प्रख्यापित होने की तिथि से विशेष न्यायालयों के समक्ष धारा-37 के अधीन लंबित ऐसे सभी मामले को जिला मजिस्ट्रेट ग्रहण कर लेगा। इस प्रयोजन के लिए जिला मजिस्ट्रेट, जिला एवं सत्र न्यायाधीश के परामर्श से ऐसे मामलों की एक सूची बनाएगा। मामलों की ऐसी सूचीबद्धता और ग्रहण करने का कार्य पटना उच्च न्यायालय द्वारा शक्ति प्रदान किये जाने की तिथि से 30 दिनों के अन्दर किया जाएगा।

(4) जिला मजिस्ट्रेट तब इन मामलों को ऐसे कार्यपालक मजिस्ट्रेटों को वितरित करेगा जो पटना उच्च न्यायालय द्वारा सम्यक् रूप से सशक्त हों।

(5) कार्यपालक मजिस्ट्रेट, अधिनियम के उपबंधों के अनुसार इन अंतरित मामलों का निपटान करेंगे। ऐसे अंतरित मामलों में जहाँ अभियुक्त पहले ही 30 दिनों का कारावास भोग चुके हों, कार्यपालक मजिस्ट्रेट अभियुक्त को सम्यक् रूप से समन जारी करने के पश्चात् ऐसी कार्यवाहियों को बंद कर देगा। जहाँ कहीं अभियुक्त 30 दिनों का कारावास पूरा नहीं किया हो तो कार्यपालक मजिस्ट्रेट अभियुक्त को समन जारी कर सकेगा तथा निदेशानुसार ऐसी शास्ति की राशि को जमा करने के अधीन कार्यवाहियों को बंद कर सकेगा।

(6) उच्च न्यायालय, पटना द्वारा इन कार्यपालक दण्डाधिकारी को शक्ति प्रदान करने तक विशेष न्यायालय 01 अप्रैल, 2022 को अथवा उसके बाद धारा-37 के अधीन दायर वादो की सुनवाई पूर्व की भाँति जारी रखेगा। वह ऐसे शास्ति / दण्ड अधिरोपित करने के लिए सक्षम होगा जैसा कि नियम-18 में वर्णित है। विशेष न्यायालय 01 अप्रैल, 2022 के पूर्व दायर वादों को नियम-18, सह-पठित उपरोक्त खण्ड-(5) के अनुसार निपटारा तब तक करता रहेगा जब तक इन वादों का कार्यपालक दण्डाधिकारी प्रभार ग्रहण नहीं कर लेते हैं।

"18ख. धारा-37 से भिन्न सभी मामलों के लिए गिरफ्तारी और अन्वेषण आदिः-

इस अधिनियम और इन नियमों में अभिव्यक्त रूप से जैसा अन्यथा उपबंधित है के सिवाय दंड प्रक्रिया संहिता 1973, भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872, और बिहार पुलिस मैनुअल के उपबंध धारा-37 को छोड़कर उन सभी मामलों पर लागू होंगे जिनका संबंध गिरफ्तारी, आदि से हों।"

 

 

 

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