धारा 100 से 146 अध्याय 6 (मानव शरीर पर प्रभाव डालने वाले अपराधों के विषयो मे) भारतीय न्याय संहिता , 2023

धारा 100 से 146 अध्याय 6 (मानव शरीर पर प्रभाव डालने वाले अपराधों के विषयो मे) भारतीय न्याय संहिता , 2023

अध्याय- 6

मानव शरीर पर प्रभाव डालने वाले अपराधों के विषयो मे

जीवन पर प्रभाव डालने वाले अपराधों के विषय में

100. आपराधिक मानव वध-

जो कोई, मृत्यु कारित करने के आशय से, या ऐसी शारीरिक क्षति कारित करने के आशय से, जिससे मृत्यु कारित हो जाना सम्भाव्य है, या यह ज्ञान रखते हुए कि यह सम्भाव्य है कि वह उस कार्य से मृत्यु कारित कर दे, कोई कार्य करके, मृत्यु कारित कर देता है, वह आपराधिक मानव वध का अपराध करता है।

दृष्टांत

() एक गड्‌ढे पर लकड़ियां और घास इस आशय से बिछाता है कि उसके द्वारा मृत्यु कारित करे या यह ज्ञान रखते हुए बिछाता है कि सम्भाव्य है कि उसके द्वारा मृत्यु कारित हो। यह विश्वाप्त करते हुए कि वह भूमि सुदृढ़ है उस पर चलता है, उसमें गिर पड़ता है और मारा जाता है। ने आपराधिक मानव वध का अपराध किया है।

() यह जानता है कि एक झाड़ी के पीछे है। यह नहीं जानता। की मृत्यु करने के आशय से या यह जानते हुए कि उससे की मृत्यु कारित होना सम्भाव्य है, को उस झाड़ी पर गोली चलाने के लिए उत्प्रेरित करता है। गोली चलाता है और को मार डालता है। यहां यह हो सकता है कि किसी भी अपराध का दोषी हो, किन्तु ने आपराधिक मानव वध का अपराध किया है।

() एक मुर्गे को मार डालने और उसे चुरा लेने के आशय से उस पर गोली चलाकर को, जो एक झाड़ी के पीछे है, मार डालता है, किन्तु यह नहीं जानता था कि वहां है। यहां, यद्यपि विधिविरुद्ध कार्य कर रहा था, तथापि, वह आपराधिक मानव वध का दोषी नहीं है क्योंकि उसका आशय को मार डालने का, या कोई ऐसा कार्य करके, जिससे मृत्यु कारित करना वह सम्भाव्य जानता हो, मृत्यु कारित करने का नहीं था।

स्पष्टीकरण 1—

कोई व्यक्ति, जो किसी दूसरे व्यक्ति को, जो किसी विकार, रोग या अंगशैथिल्य से ग्रस्त है, शारीरिक क्षति कारित करता है और उसके द्वारा उस दूसरे व्यक्ति की मृत्यु त्वरित कर देता है. उसकी मृत्यु कारित करता है, यह समझा जाएगा।

स्पष्टीकरण 2–

जहाँ शारीरिक क्षति से मृत्यु कारित की गई हो, वहाँ जिस व्यक्ति ने, ऐसी शारीरिक क्षति कारित की हो, उसने वह मृत्यु कारित की है, यह समझा जाएगा, यद्यपि उचित उपचार और कौशलपूर्ण चिकित्सा करने से वह मृत्यु रोकी जा सकती थी।

स्पष्टीकरण 3–

मां के गर्भ में स्थित किसी शिशु की मृत्यु कारित करना मानव वध नहीं है। किन्तु किसी जीवित शिशु की मृत्यु कारित करना आपराधिक मानव वध की कोटि में सकेगा, यदि उस शिशु का कोई भाग बाहर निकल आया हो, यद्यपि उस शिशु ने श्वास नहीं ली हो या उसने पूर्णतः जन्म लिया हो।

101. हत्या-

इसमें इसके पश्चात्, अपवादित दशाओं को छोड़कर, आपराधिक मानव वध हत्या है, -

() यदि वह कार्य, जिसके द्वारा मृत्यु कारित की गई है, मृत्यु कारित करने के आशय से किया गया है; या

() यदि वह कार्य, जिसके द्वारा मृत्यु कारित की गई है, वह ऐसी शारीरिक क्षति कारित करने के आशय से किया गया है, जिसे अपराधी जानता है कि उस व्यक्ति को मृत्यु कारित करना सम्भाव्य है, जिसको वह अपहानि कारित की गई है; या

() यदि वह कार्य, जिसके द्वारा मृत्यु कारित की गई है, वह किसी व्यक्ति को शारीरिक क्षति कारित करने के आशय से किया गया है और वह शारीरिक क्षति, जिसे कारित करने का आशय हो, प्रकृति के साधारण अनुक्रम में मृत्यु कारित करने के लिए पर्याप्त है; या

() यदि वह कार्य, जिसके द्वारा मृत्यु कारित की गई है, करने वाला व्यक्ति यह जानता है कि वह कार्य इतना आसन्नसंकट है कि पूरी अधिसम्भाव्यता है कि वह मृत्यु कारित कर ही देगा या ऐसी शारीरिक क्षति कारित कर ही देगा जिससे मृत्यु कारित होना सम्भाव्य है और वह मृत्यु कारित करने या पूर्वोक्त रूप की क्षति कारित करने की जोखिम उठाने के लिए किसी प्रतिहेतु के बिना ऐसा कार्य करे।

दृष्टांत

() को मार डालने के आशय से उस पर गोली चलाता है, परिणामस्वरूप की मृत्यु हो जाती है। हत्या करता है।

() यह जानते हुए कि ऐसे रोग से ग्रस्त है कि सम्भाव्य है कि एक प्रहार उसकी मृत्यु कारित कर दे, शारीरिक क्षति कारित करने के आशय से उस पर आघात करता है। उस प्रहार के परिणामस्वरूप की मृत्यु हो जाती है। हत्या का दोषी है, यद्यपि वह प्रहार किसी अच्छे स्वस्थ व्यक्ति की मृत्यु करने के लिए प्रकृति के साधारण अनुक्रम में पर्याप्त नहीं होता। किन्तु यदि , यह जानते हुए कि किसी रोग से ग्रस्त है, उस पर ऐसा प्रहार करता है, जिससे कोई अच्छा स्वस्थ व्यक्ति प्रकृति के साधारण अनुक्रम में नहीं मरता, तो यहां, , यद्यपि शारीरिक क्षति कारित करने का उसका आशय हो, हत्या का दोषी नहीं है, यदि उसका आशय मृत्यु कारित करने का या ऐसी शारीरिक क्षति कारित करने का नहीं था, जिससे प्रकृति के साधारण अनुक्रम में मृत्यु कारित हो जाए।

() को तलवार या लाठी से ऐसा घाव साशय करता है, जो प्रकृति के साधारण अनुक्रम में किसी मनुष्य की मृत्यु कारित करने के लिए पर्याप्त है। परिणामस्वरूप की मृत्यु कारित हो जाती है, यहाँ हत्या का दोषी है, यद्यपि उसका आशय की मृत्यु कारित करने का रहा हो।

() किसी प्रतिहेतु के बिना व्यक्तियों के एक समूह पर भरी हुई तोप चलाता है और उनमें से एक का वध कर देता है। हत्या का दोषी है, यद्यपि किसी विशिष्ट व्यक्ति की मृत्यु कारित करने की उसकी पूर्वचिन्तित परिकल्पना रही हो।

अपवाद 1 –

आपराधिक मानव वध हत्या नहीं है, यदि अपराधी उस समय जब वह गम्भीर और अचानक प्रकोपन से आत्मसंयम की शक्ति से वंचित हो, उस व्यक्ति की, जिसने कि वह प्रकोपन दिया था, मृत्यु कारित करे या किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु भूल या दुर्घटनावश कारित करे :

परन्तु प्रकोपन, —

() किसी व्यक्ति का वध करने या अपहानि करने के लिए अपराधी द्वारा प्रतिहेतु के रूप में वांछनीय हो या स्वेच्छया प्रकोपित हो;

() किसी ऐसी बात द्वारा दिया गया हो, जो विधि के पालन में या लोक सेवक द्वारा ऐसे लोक सेवक की शक्तियों के विधिपूर्ण प्रयोग में की गई हो;

() किसी ऐसी बात द्वारा दिया गया हो, जो प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के विधिपूर्ण प्रयोग में की गई हो।

स्पष्टीकरण

प्रकोपन इतना गम्भीर और अचानक था या नहीं कि अपराध को हत्या की कोटि में जाने से बचा दे, यह तथ्य का प्रश्न है।

दृष्टांत

() द्वारा दिए गए प्रकोपन के कारण प्रदीप्त आवेश के असर में का, जो का शिशु है, साशय वध करता है। यह हत्या है, क्योंकि प्रकोपन उस शिशु द्वारा नहीं दिया गया था और उस शिशु की मृत्यु उस प्रकोपन से किए गए कार्य को करने में दुर्घटना या दुर्भाग्य से नहीं हुई है।

() को गम्भीर और अचानक प्रकोपन देता है। इस प्रकोपन से पर पिस्तौल चलाता है, जिसमें तो उसका आशय का, जो समीप ही है किन्तु दृष्टि से बाहर है, वध करने का है, और वह यह जानता है कि सम्भाव्य है कि वह का वध कर दे। , का वध करता है। यहाँ ने हत्या नहीं की है, किन्तु केवल आपराधिक मानव वध किया है।

() द्वारा, जो एक बेलिफ है, को विधिपूर्वक गिरफ्तार किया जाता है। उस गिरफ्तारी के कारण को अचानक और तीव्र आवेश जाता है और वह का वध कर देता है। यह हत्या है, क्योंकि प्रकोपन ऐसी बात द्वारा दिया गया था, जो एक लोक सेवक द्वारा उसकी शक्ति के प्रयोग में की गई थी।

() के समक्ष, जो एक मजिस्ट्रेट है, साक्षी के रूप में उपस्थित होता है। यह कहता है कि वह के अभिसाक्ष्य के एक शब्द पर भी विश्वास नहीं करता और यह कि ने शपथ-भंग किया है। को इन शब्दों से अचानक आवेश जाता है और वह का वध कर देता है। यह हत्या है।

() की नाक खींचने का प्रयत्न करता है। प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के प्रयोग में ऐसा करने से रोकने के लिए को पकड़ लेता है। परिणामस्वरूप को अचानक और तीव्र आवेश जाता है और वह का वध कर देता है। यह हत्या है, क्योंकि प्रकोपन ऐसी बात द्वारा दिया गया था, जो प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के प्रयोग में की गई थी।

() पर आघात करता है। को इस प्रकोपन से तीव्र क्रोध जाता है। , जो निकट ही खड़ा हुआ है, के क्रोध का लाभ उठाने और उससे का वध कराने के आशय से उसके हाथ में एक चाकू उस प्रयोजन के लिए दे देता है। उस चाकू से का वध कर देता है, यहाँ ने चाहे केवल आपराधिक मानव वध ही किया हो, किन्तु हत्या का दोषी है।

अपवाद 2 –

आपराधिक मानव वध हत्या नहीं है, यदि अपराधी, शरीर या सम्पत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार को स‌द्भावपूर्वक प्रयोग में लाते हुए विधि द्वारा उसे दी गई शक्ति का अतिक्रमण कर दे, और पूर्वचिन्तन के बिना और ऐसी प्रतिरक्षा के प्रयोजन से जितनी अपहानि करना आवश्यक है उससे अधिक अपहानि करने के किसी आशय के बिना उस व्यक्ति की मृत्यु कारित कर दे, जिसके विरुद्ध वह प्रतिरक्षा का ऐसा अधिकार प्रयोग में ला रहा है।

दृष्टांत

को चाबुक मारने का प्रयत्न करता है, किन्तु इस प्रकार नहीं कि को घोर उपहति कारित हो। एक पिस्तौल निकाल लेता है। हमले को चालू रखता है। सद्भावपूर्वक यह विश्वास करते हुए कि वह अपने को चाबुक लगाए जाने से किसी अन्य साधन द्वारा नहीं बचा सकता है गोली से का वध कर देता है। ने हत्या नहीं की है, किन्तु केवल आपराधिक मानव वध किया है।

अपवाद 3 –

आपराधिक मानव वध हत्या नहीं है, यदि अपराधी ऐसा लोक सेवक होते हुए, या ऐसे लोक सेवक को मदद देते हुए, जो लोक न्याय की अग्रसरता में कार्य कर रहा है, उसे विधि द्वारा दी गई शक्ति से आगे बढ़ जाए, और कोई ऐसा कार्य करके जिसे वह विधिपूर्ण और ऐसे लोक सेवक के नाते उसके कर्त्तव्य के सम्यक् निर्वहन के लिए आवश्यक होने का स‌द्भावपूर्वक विश्वास करता है, और उस व्यक्ति के प्रति, जिसकी मृत्यु कारित की गई हो, वैमनस्य के बिना मृत्यु कारित करे।

अपवाद 4—

आपराधिक मानव वध हत्या नहीं है, यदि वह मानव वध अचानक झगड़ा जनित आवेश की तीव्रता में हुई अचानक लड़ाई में पूर्वचिन्तन के बिना और अपराधी द्वारा अनुचित लाभ उठाए बिना या क्रूरतापूर्ण या अप्रायिक रीति से कार्य किए बिना किया गया है।

स्पष्टीकरण

ऐसी दशाओं में यह तत्वहीन है कि कौन पक्ष प्रकोपन देता है या पहला हमला करता है

अपवाद 5 –

आपराधिक मानव वध हत्या नहीं है, यदि वह व्यक्ति जिसकी मृत्यु कारित की जाती है, अठारह वर्ष से अधिक आयु का होते हुए, अपनी सम्मति से मृत्यु होना सहन करे, या मृत्यु की जोखिम उठाए।

दृष्टांत

को, जो एक शिशु है, उकसाकर उससे स्वेच्छया आत्महत्या करवाता है। यहां, कम उम्र होने के कारण अपनी मृत्यु के लिए सम्मति देने में असमर्थ था, इसलिए, ने हत्या का दुष्प्रेरण किया है।

102. जिस व्यक्ति की मृत्यु कारित करने का आशय था उससे भिन्न व्यक्ति की मृत्यु करके आपराधिक मानव वध -

यदि कोई व्यक्ति, किसी ऐसे कृत्य के द्वारा, जिससे उसका आशय मृत्यु कारित करना हो, या जिससे वह जानता हो कि मृत्यु कारित होना सम्भाव्य है, किसी व्यक्ति की मृत्यु कारित करके, जिसको मृत्यु कारित करने का तो उसका आशय है और वह यह सम्भाव्य जानता है कि वह उसकी मृत्यु कारित करेगा, आपराधिक मानव वध करे, तो अपराधी द्वारा किया गया आपराधिक मानव वध उस भांति का होगा, जिस भांति का वह होता, यदि वह उस व्यक्ति की मृत्यु कारित करता जिसकी मृत्यु कारित करना उसके द्वारा आशयित था या वह जानता था कि उसके द्वारा उसकी मृत्यु कारित होना सम्भाव्य है।

103. हत्या के लिए दण्ड-

1. जो कोई हत्या करेगा, वह मृत्यु या आजीवन कारावास से दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

2. जब पांच या पांच से अधिक व्यक्तियों का कोई समूह मिलकर मूलवंश, जाति या समुदाय, लिंग, जन्म स्थान, भाषा, वैयक्तिक विश्वास या किसी अन्य समरूप आधार पर हत्या कारित करते हैं तो ऐसे समूह का प्रत्येक सदस्य मृत्यु या आजीवन कारावास के दण्ड से दण्डनीय होगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

104. आजीवन सिद्धदोष द्वारा हत्या के लिए दण्ड -

जो कोई, आजीवन कारावास के दण्डादेश के अधीन होते हुए हत्या करेगा, वह मृत्यु या आजीवन कारावास, जिससे उस व्यक्ति का शेष प्राकृत जीवनकाल के लिए कारावास अभिप्रेत होगा, से दण्डित किया जाएगा।

105. हत्या की कोटि में आने वाले आपराधिक मानव वध के लिए दण्ड -

जो कोई, ऐसा आपराधिक मानव वध करता है, जो हत्या की कोटि में नहीं आता है, यदि यदि वह कार्य जिसके द्वारा मृत्यु कारित की गई है, ई है, मृत्यु या ऐसी शारीरिक क्षति, जिससे मृत्यु होना सम्भाव्य है, कारित करने के आशय से किया जाता है, तो वह आजीवन कारावास से, या दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि पांच वर्ष से कम नहीं होगी, किन्तु जो दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा, या यदि वह कार्य इस आशय के साथ कि उससे मृत्यु कारित करना संभाव्य है, किन्तु मृत्यु या ऐसी शारीरिक क्षति, जिससे मृत्यु कारित करना संभाव्य है, कारित करने के किसी आशय के बिना किया जाए, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से दण्डित किया जाएगा।

106. उपेक्षा द्वारा मृत्यु कारित करना-

1. जो कोई, उतावलेपन से या उपेक्षांपूर्ण किसी ऐसे कार्य से किसी व्यक्ति की मृत्यु कारित करता है, जो आपराधिक मानव वध की कोटि में नहीं आता है, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा और यदि ऐसा कृत्य किसी रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी द्वारा, जब वह चिकित्सीय प्रक्रिया संपादित कर रहा है, कारित किया जाता है तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

 स्पष्टीकरण -

इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, "रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी" से ऐसा चिकित्सा व्यवसायी अभिप्रेत है जिसके पास राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग अधिनियम, 2019 (2019 का 30) के अधीन मान्यताप्राप्त कोई चिकित्सा अर्हता है और जिसका नाम उस अधिनियम के अधीन राष्ट्रीय चिकित्सा रजिस्टर या किसी राज्य चिकित्सा रजिस्टर में प्रविष्ट किया गया है।

2. जो कोई, वाहन के उतावलेपन या उपेक्षापूर्ण चलाने से, किसी व्यक्ति की मृत्यु कारित करता है, जो आपराधिक मानव वध की कोटि में नहीं आता है और घटना के तत्काल पश्चात्, इसे पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट को रिपोर्ट किए बिना, भाग जाता है, तो वह दोनों में से किसी भी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

107. शिशु या विकृत चित्त व्यक्ति की आत्महत्या का दुष्प्रेरण-

यदि कोई शिशु, विकृत चित्त व्यक्ति, कोई उन्मत्त व्यक्ति या मत्तता की अवस्था में कोई व्यक्ति आत्महत्या करता है जो कोई, ऐसी आत्महत्या करने के लिए दुष्प्रेरण करता है, तो वह मृत्यु या आजीवन कारावास या ऐसी अवधि के कारावास से, जो दस वर्ष से अधिक की नहीं होगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

108. आत्महत्या का दुष्प्रेरण-

यदि कोई व्यक्ति आत्महत्या करता है, तो जो कोई ऐसी आत्महत्या का दुष्प्रेरण करता है, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

109. हत्या करने का प्रयत्न-

1. जो कोई, किसी कृत्य को ऐसे आशय या ज्ञान से और ऐसी परिस्थितियों में करता है कि यदि वह उस कृत्य द्वारा मृत्यु कारित कर देता तो वह हत्या का दोषी होता, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा, और यदि ऐसे कार्य द्वारा किसी व्यक्ति को उपहति कारित हो जाए, तो वह अपराधी या तो आजीवन कारावास से या ऐसे दण्ड से दण्डनीय होगा, जैसा इसमें इसके पूर्व वर्णित है।

2. जब उपधारा (1) के अधीन अपराध करने वाला कोई व्यक्ति आजीवन कारावास के दण्डादेश के अधीन है, तब यदि उपहति कारित करता है, तो वह मृत्यु या आजीवन कारावास, जिससे उस व्यक्ति के शेष प्राकृत जीवनकाल के लिए कारावास अभिप्रेत होगा, से दण्डित किया जाएगा।

दृष्टांत

() का वध करने के आशय से उस पर ऐसी परिस्थितियों में गोली चलाता है कि यदि मृत्यु हो जाती, तो हत्या का दोषी होता। इस धारा के अधीन दण्डनीय है।

() सुकुमार अवस्था के किसी शिशु की मृत्यु करने के आशय से उसे एक निर्जन स्थान में अरक्षित छोड़ देता है। ने इस धारा द्वारा परिभाषित अपराध किया है, यद्यपि परिणामस्वरूप उस शिशु की मृत्यु नहीं होती।

() की हत्या का आशय रखते हुए एक बन्दूक खरीदता है और उसको भरता है। ने अभी तक अपराध नहीं किया है। पर बन्दूक चलाता है। उसने इस धारा में परिभाषित अपराध किया है, और यदि इस प्रकार गोली मार कर वह को घायल कर देता है, तो वह उपधारा (1) के पश्चात्वर्ती भाग द्वारा उपबन्धित दण्ड से दण्डनीय है।

() विष द्वारा की हत्या करने का आशय रखते हुए विष खरीदता है, और उसे उस भोजन में मिला देता है, जो के अपने पास रहता है ने इस धारा में परिभाषित अपराध अभी तक नहीं किया है। उस भोजन को की मेज पर रखता है, या उसको की मेज पर रखने के लिए के सेवकों को परिदत्त करता है। ने इस धारा में परिभाषित अपराध किया है।

110. आपराधिक मानव वध करने का प्रयत्न -

जो कोई, किसी कार्य को ऐसे आशय या ज्ञान से और ऐसी परिस्थितियों में करता है कि यदि उस कार्य से वह मृत्यु कारित कर देता, तो यह हत्या की कोटि में आने वाले आपराधिक मानव वध का दोषी होता, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा; और यदि ऐसे कार्य द्वारा किसी व्यक्ति को उपहति हो जाए तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

दृष्टांत

गम्भीर और अचानक प्रकोपन पर, ऐसी परिस्थितियों में, पर पिस्तौल चलाता है कि यदि इसके द्वारा वह मृत्यु कारित कर देता तो वह हत्या की कोटि में आने वाले आपराधिक मानव वध का दोषी होता। ने इस धारा में परिभाषित अपराध किया है।

111. संगठित अपराध-

1. किसी संगठित अपराध सिंडिकेट के सदस्य के रूप में या ऐसे सिंडिकेट की ओर से अकेले या संयुक्त रूप से सामान्य मति से कार्य करते हुए किसी व्यक्ति द्वारा या व्यक्तियों के किसी समूह द्वारा कोई सतत् विधिविरुद्ध क्रियाकलाप किया जाता है, जिसमें व्यपहरण, डकैती, यान चोरी, उद्दापन, भूमि हथियाना, संविदा पर हत्या करना, आर्थिक अपराध, साइबर अपराध, व्यक्तियों, औषधियों, हथियारों या अवैध माल या सेवाओं का दुर्व्यापार, वेश्यावृत्ति या फिरौती के लिए मानव दुर्व्यापार शामिल है, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से तात्विक फायदा, जिसके अन्तर्गत वित्तीय फायदा भी है, प्राप्त करने के लिए हिंसा का प्रयोग, हिंसा की धमकी, अभित्रास, प्रपीड़न या अन्य विधिविरुद्ध साधनों द्वारा कारित करता है, वह संगठित अपराध गठित करेगा।

स्पष्टीकरण

इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए-

i. "संगठित अपराध सिंडिकेट" से दो या अधिक व्यक्तियों का कोई समूह अभिप्रेत है जो एक सिंडिकेट या टोली के रूप में या तो अकेले या सामूहिक रूप से कार्य करते हुए किसी सत्तत् विधिविरुद्ध क्रियाकलाप में लिप्त है।

ii. "सतत् विधिविरुद्ध क्रियाकलाप" से विधि द्वारा प्रतिषिद्ध ऐसा क्रियाकलाप अभिप्रेत है जो तीन या अधिक वर्ष के कारावास से दण्डनीय संज्ञेय अपराध है, जो किसी व्यक्ति द्वारा या तो अकेले या संयुक्त रूप से, किसी संगठित अपराध सिंडिकेट के सदस्य के रूप में या ऐसे सिंडिकेट की ओर से जिसके सम्बन्ध में एक से अधिक आरोप पत्र दस वर्ष की पूर्ववर्ती अवधि के भीतर सक्षम न्यायालय के समक्ष दाखिल किए गए हैं, द्वारा किया गया है और उस न्यायालय ने ऐसे अपराध का संज्ञान कर लिया है और इसमें आर्थिक अपराध भी शामिल हैं;

iii. "आर्थिक अपराध में आपराधिक न्यासभंग, कूटरचना, करेंसी नोट, बैंक नोट और सरकारी स्टाम्पों का कूटकरण, हवाला संव्यवहार, बड़े पैमाने पर विपणन कपट या किसी प्ररूप में धनीय फायदा प्राप्त करने के लिए विभिन्न व्यक्तियों के साथ कपट करने के लिए कोई स्कीम चलाना या किसी बैंक या वित्तीय संस्था या किसी अन्य संस्था या संगठन को कपट करने की दृष्टि से किसी रीति में, कोई कृत्य करना शामिल है।

2. जो कोई, संगठित अपराध कारित करेगा, -

i. यदि ऐसे अपराध के परिणामस्वरूप किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तो यह मृत्यु या आजीवन कारावास से दण्डनीय होगा और ऐसे जुर्माने का भी दायी होगा, जो दस लाख रुपए से कम का नहीं होगा;

ii. किसी अन्य मामले में, वह ऐसी अवधि के कारावास से दण्डनीय होगा, जो पांच वर्ष से कम का नहीं होगा, किन्तु आजीवन कारावास तक हो सकेगा और ऐसे जुर्माने का भी दायी होगा, जो पांच लाख रुपए से कम का नहीं होगा।

3. जो कोई, संगठित अपराध का दुष्प्रेरण, प्रयत्न, षड्यंत्र करता है या यह जानते हुए कारित किया जाना सुकर बनाता है या संगठित अपराध के किसी प्रारम्भिक कार्य में अन्यथा नियोजित होता है, वह ऐसी अवधि के कारावास से दण्डनीय होगा, जो पांच वर्ष से कम का नहीं होगा, किन्तु जो आजीवन कारावास तक का हो सकेगा और ऐसे जुर्माने का भी दायी होगा, जो पांच लाख रुपए से कम का नहीं होगा।

4. कोई व्यक्ति, जो संगठित अपराध सिंडिकेट का सदस्य है, वह ऐसी अवधि के कारावास से दण्डनीय होगा, जो पांच वर्ष से कम का नहीं होगा, किन्तु आजीवन कारावास तक हो सकेगा और ऐसे जुर्माने के लिए भी दायी होगा जो पांच लाख रुपए से कम का नहीं होगा।

5. जो कोई, किसी व्यक्ति को, जिसने संगठित अपराध कारित किया है, साशयपूर्वक संश्रय देता है या छिपाता है, वह ऐसी अवधि के कारावास से दण्डनीय होगा, जो तीन वर्ष से कम का नहीं होगा, किन्तु आजीवन कारावास तक हो सकेगा, और ऐसे जुर्माने का भी दायी होगा, जो पांच लाख रुपए से कम का नहीं होगा :

परन्तु यह उपधारा उस दशा में लागू नहीं होगी, जिसमें संश्रय या छिपाना अपराधी के पति या पत्नी द्वारा किया जाता है।

6. जो कोई, संगठित अपराध कारित किए जाने से या किसी संगठित अपराध के आगमों से, व्युत्पन्न या अभिप्राप्त या संगठित अपराध के माध्यम से अर्जित की गई किसी सम्पत्ति पर कब्जा रखता है, वह ऐसी अवधि के कारावास से दण्डनीय होगा, जो तीन वर्ष से कम का नहीं होगा, किन्तु आजीवन कारावास तक हो सकेगा और ऐसे जुर्माने का भी दायी होगा, जो दो लाख रुपए से कम का नहीं होगा।

7. यदि संगठित अपराध सिंडिकेट के सदस्य की ओर से कोई व्यक्ति या किसी भी समय ऐसी किसी चल या अचल सम्पत्ति को कब्जे में रखता है, जिसका वह समाधानप्रद लेखा नहीं दे सकता है, वह ऐसी अवधि के कारावास से दण्डनीय होगा, जो तीन वर्ष से कम का नहीं होगा, किन्तु जो दस वर्ष तक हो सकेगा और ऐसे जुर्माने का भी दायी होगा, जो एक लाख रुपए से कम का नहीं होगा।

112. छोटे संगठित अपराध-

1. जो कोई, समूह या टोली का सदस्य होते हुए, या तो अकेले या संयुक्त रूप से चोरी, झपटमारी, छल, टिकटों का अप्राधिकृत रूप से विक्रय, अप्राधिकृत शर्त लगाने या जुआ खेलने, लोक परीक्षा प्रश्नपत्रों का विक्रय या कोई अन्य समरूप आपराधिक कृत्य कारित करता है, तो वह छोटा संगठित अपराध कारित करता है।

स्पष्टीकरण

इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, "चोरी" में चालाकी से चोरी, वाहन, निवास-घर या कारबार परिसर से चोरी, कार्गो से चोरी, पाकेट मारना, कार्ड स्किमिंग, शॉपलिफ्टिंग के माध्यम से चोरी और स्वचालित टेलर मशीन की चोरी शामिल है।

2. जो कोई, छोटा संगठित अपराध कारित करता है वह ऐसी अवधि के कारावास से दण्डनीय होगा, जो एक वर्ष से कम का नहीं होगा, किन्तु सात वर्ष तक हो सकेगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

113. आतंकवादी कृत्य-

1. जो कोई, भारत की एकता, अखंडता, सम्प्रभुता, सुरक्षा या आर्थिक सुरक्षा या भारत में या किसी विदेश में जनता या जनता के किसी वर्ग में आतंक फैलाने या आतंक फैलाने की संभावना के आशय से, -

() बम डाइनामाइट या अन्य विस्फोटक पदार्थ या ज्वलनशील पदार्थ या अग्न्यायुधों या अन्य प्रागहर आयुधों या विषों या अपायकर गैसों या अन्य रसायनों या परिसंकटमय प्रकृति के किसी अन्य पदार्थ का (चाहे वह जैविक रेडियोधर्मी, नाभिकीय यां अन्यथा हो) या किसी भी प्रकृति के किन्हीं अन्य साधनों का उपयोग करके ऐसा कोई कार्य करता है, जिससे, -

i. किसी व्यक्ति या व्यक्तियों की मृत्यु होती है या उन्हें क्षति होती है या होने की संभावना है या:

ii. संपत्ति की हानि या उसका नुकसान या विनाश होता हैं या होने की संभावना है

iii. भारत में या किसी विदेश में समुदाय के जीवन के लिए अनिवार्य किन्हीं प्रदायों या सेवाओं में विघ्न पैदा करता है या होने की संभावना है; या

iv. सिक्के या किसी अन्य सामग्री की कूटकृत भारतीय कागज करेंसी के निर्माण या उसकी तस्करी या परिचालन के माध्यम से भारत की आर्थिक स्थिरता को नुकसान होता है या होने की संभावना है; या

v. भारत की प्रतिरक्षा या भारत सरकार, किसी राज्य सरकार या उनके किन्हीं अभिकरणों के किन्हीं अन्य प्रयोजनों के सम्बन्ध में उपयोग की गई या उपयोग किए जाने के लिए आशयित भारत में या विदेश में किसी सम्पत्ति का नुकसान या विनाश होता है या होने की संभावना है; या

() किसी लोक कृत्यकारी को आपराधिक बल के द्वारा या आपराधिक बल का प्रदर्शन करके आतंकित करता है या ऐसा करने का प्रयत्न करता है या किसी लोक कृत्यकारी की मृत्यु कारित करता है या किसी लोक कृत्यकारी की मृत्यु कारित करने का प्रयत्न करता है; या

() किसी व्यक्ति को निरुद्ध करता है, उसका व्यपहरण या अपहरण करता है या ऐसे व्यक्ति को मारने या क्षति पहुँचाने की धमकी देता है या भारत सरकार, किसी राज्य की सरकार या किसी विदेश की सरकार या किसी अन्तर्राष्ट्रीय या अंतर-सरकारी संगठन या किसी अन्य व्यक्ति को कोई कार्य करने या उसे करने के लिए बाध्य करने हेतु कोई अन्य कार्य करता है, तो वह आतंकवादी कृत्य करता है।

स्पष्टीकरण

इस उपधारा के प्रयोजन के लिए -

() "लोक कृत्यकारी" से संवैधानिक प्राधिकारी या केन्द्रीय सरकार द्वारा राजपत्र में लोक कृत्यकारी के रूप में अधिसूचित कोई अन्य कृत्यकारी अभिप्रेत है;

() "कूटकृत भारतीय करेंसी" से ऐसी कूटकृत करेंसी अभिप्रेत है, जो किसी प्राधिकृत या अधिसूचित न्याय सम्वन्धी प्राधिकारी द्वारा यह परीक्षा करने के पश्चात् कि ऐसी करेंसी भारतीय करेंसी के मुख्य सुरक्षा विशेषताओं की अनुकृति है या उसके अनुरूप है, उस रूप में घोषित की जाए।

2.  जो कोई, आतंकवादी का कृत्य कारित करेगा,-

() यदि ऐसे अपराध के परिणामस्वरूप किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तो वह मृत्यु या आजीवन कारावास से दंडित किया जायेगा और जुर्माने के लिए भी दायी होगा ;

() किसी अन्य मामले में, वह कारावास से, जिसकी अवधि, पांच वर्ष से कम नहीं होगी, किंतु आजीवन कारावास तक की हो सकेगी और जुर्माने का भी दायी होगा

3. जो कोई, आतंकवादी कृत्य करने या आतंकवादी कृत्य करने की तैयारी करने का षड्यंत्र करता है या प्रयत्न करता है या दुष्प्रेरण करता है, पक्षपोषण करता है, सलाह देता है या उत्तेजित करता है या ऐसे कार्य का किया जाना प्रत्यक्षतः या जानबूझकर सुकर बनाता है वह कारावास से, जिसकी अवधि पांच वर्ष से कम की नहीं होगी, किन्तु आजीवन कारावास तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

4. जो कोई, आतंकवादी कृत्य का प्रशिक्षण देने के लिए किसी शिविर या किन्हीं शिविरों का आयोजन करता है या आयोजन करवाता है या आतंकवादी कृत्य को कारित करने के लिए किसी व्यक्ति या किन्हीं व्यक्तियों को भर्ती करता है या भर्ती करवाता है, तो वह कारावास से, जिसकी अवधि पांच वर्ष से कम की नहीं होगी, किन्तु आजीवन कारावास तक हो सकेगी और जुर्माने का भी दायी होगा।

5. कोई व्यक्ति, जो आतंकवादी संगठन का सदस्य है, और आतंकवादी कृत्य में शामिल है, वह ऐसी अवधि के कारावास से, जो आजीवन कारावास तक हो सकेगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

6. जो कोई, ऐसे किसी व्यक्ति को यह जानते हुए कि ऐसे व्यक्ति ने किसी आतंकवादी कृत्य का अपराध किया है, स्वेच्छया संश्रय देता है या छिपाता है या संश्रय देने या छिपाने का प्रयत्न करता है, वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष से कम की नहीं होगी, किन्तु आजीवन कारावास तक की हो सकेगी और जुर्माने का भी दायी होगा :

परन्तु यह उपधारा ऐसे मामलों को लागू नहीं होगी, जिसमें संश्रय देने या छिपाने का कार्य अपराधी के पति या पत्नी द्वारा किया गया है।

7. जो कोई, किसी आतंकवादी कृत्य करने से प्राप्त या अभिप्राप्त या आतंकवादी कृत्य करने के माध्यम से अर्जित किसी सम्पत्ति को जानते हुए कब्जे में रखता है, वह ऐसी अवधि के कारावास से, जो आजीवन कारावास तक हो सकेगी और जुर्माने का भी दायी होगा।

स्पष्टीकरण

शंकाओं को दूर करने के लिए, यह घोषित किया जाता है कि पुलिस अधीक्षक की पंक्ति से अन्यून पंक्ति का अधिकारी यह विनिश्चय करेगा कि क्या इस धारा के अधीन या विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1967 (1967 का 37) के अधीन मामला रजिस्ट्रीकृत किया जाए।

उपहति के विषय में

114. उपहति-

जो कोई, किसी व्यक्ति को शारीरिक पीड़ा, रोग या अंग-शैथिल्य कारित करता है, वह उपहति करता है, यह कहा जाता है।

115. स्वेच्छया उपहति कारित करना -

1. जो कोई, किसी कार्य को इस आशय से करता है कि उसके द्वारा किसी व्यक्ति को उपहति कारित की जाए या इस ज्ञान के साथ करता है कि यह सम्भाव्य है कि वह उसके द्वारा किसी व्यक्ति को उपहति कारित करे और उसके द्वारा किसी व्यक्ति की उपहति कारित करता है, वह "स्वेच्छया उपहति करता है", यह कहा जाता है।

2. जो कोई, धारा 122 की उपधारा (1) के अधीन उपबन्धित मामले के सिवाय, स्वेच्छया उपहति कारित करता है, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा। 

116. घोर उपहति-

केवल निम्नलिखित उपहति को "घोर उपहति" के रूप में निर्दिष्ट किया गया है, अर्थात् :-

() पुंस्त्वहरण

() दोनों में से किसी भी नेत्र की दृष्टि का स्थायी विच्छेद;

() दोनों में से किसी भी कान की श्रवणशक्ति की स्थायी विच्छेद;

() किसी भी अंग या जोड़ का विच्छेद ;

() किसी भी अंग या जोड़ की शक्तियों का नाश या स्थायी ह्यस;

() सिर या चेहरे का स्थायी विद्रुपीकरण;

() अस्थि या दांत का भंग या विसंधान;

() कोई उपहति जो जीवन को संकट में डालती है या जिसके कारण उपहत व्यक्ति पन्द्रह दिन तक तीव शारीरिक पीड़ा में रहता है या अपने सामान्य कामकाज को करने में असमर्थ रहता है।

117. स्वेच्छया घोर उपहति कारित करना-

1. जो कोई, स्वेच्छया उपहति कारित करता है, यदि वह उपहति, जिसे कारित करने का उसका आशय है या जिसे वह जानता है कि उसके द्वारा उसका किया जाना सम्भाव्य है घोर उपहति है, और यदि वह उपहति, जो वह कारित करता है, घोर उपहति है, तो वह "स्वेच्छया घोर उपहति करता है", यह कहा जाता है।

स्पष्टीकरण

कोई व्यक्ति, स्वेच्छया घोर उपहति कारित करता है, यह नहीं कहा जाता है, सिवाय जबकि वह घोर उपहति कारित करता है और घोर उपहति कारित करने का उसका आशय हो या घोर उपहति कारित होना वह सम्भाव्य जानता हो। किन्तु यदि वह यह आशय रखते हुए या यह सम्भाव्य जानते हुए कि वह किसी एक किस्म की घोर उपहति कारित कर दे वास्तव में दूसरी ही किस्म की घोर उपहति कारित करता है, तो वह स्वेच्छया घोर उपहति कारित करता है, यह कहा जाता है।

दृष्टांत

, यह आशय रखते हुए या यह सम्भाव्य जानते हुए कि वह के चेहरे को स्थायी रूप से विद्रूपित कर देगा, के चेहरे पर प्रहार करता है जिससे का चेहरा स्थायी रूप से विद्रूपित तो नहीं होता, किन्तु को पंद्रह दिन तक तीव्र शारीरिक पीड़ा कारित होती है। ने स्वेच्छया घोर उपहति कारित की है।

2. जो कोई, धारा 122 की उपधारा (2) में उपबन्धित मामले के सिवाय, स्वेच्छया घोर उपहति कारित करता है, दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा, और जुर्माने का भी दायी होगा।

3. जो कोई, उपधारा (1) के अधीन कोई अपराध कारित करता है और ऐसे कारित करने के क्रम में किसी व्यक्ति को उपहति कारित करता है, जिससे उस व्यक्ति को स्थायी दिव्यांगता कारित हो जाती है या लगातार विकृतशील दशा में डाल देता है वह ऐसी अवधि के कठिन कारावास से, जो दस वर्ष से कम का नहीं होगा, किन्तु आजीवन कारावास, जिससे उस व्यक्ति के शेष प्राकृत जीवनकाल के लिए कारावास अभिप्रेत होगा, से दण्डनीय होगा।

4. जब पाँच या अधिक व्यक्तियों के समूह द्वारा, सामान्य मति से कार्य करते हुए, किसी व्यक्ति को उसके मूलवंश, जाति या समुदाय, लिंग, जन्म स्थान, भाषा, व्यक्तिगत विश्वास या किसी अन्य समरूप आधार पर, घोर उपहति कारित की जाती है, वहां ऐसे समूह का प्रत्येक सदस्य घोर उपहति कारित करने के अपराध का दोषी होगा और वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी दण्डनीय होगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

118. खतरनाक आयुधों या साधनों द्वारा स्वेच्छया उपहति या घोर उपहति कारित करना -

1. जो कोई, धारा 122 की उपधारा (1) में उपबन्धित दशा के सिवाय, गोली मारने, वेधने या काटने के किसी उपकरण द्वारा या किसी ऐसे उपकरण द्वारा जो यदि आक्रामक हथियार के तौर पर उपयोग में लाया जाए, जिससे मृत्यु कारित होना सम्भाव्य है, या अग्नि या किसी तप्त पदार्थ द्वारा, या किसी विष या किसी संक्षारक पदार्थ द्वारा या किसी विस्फोटक पदार्थ द्वारा या किसी ऐसे पदार्थ द्वारा, जिसका श्वास में जाना या निगलना या रक्त में पहुँचना मानव शरीर के लिए हानिकारक है, या किसी जीव-जन्तु द्वारा स्वेच्छया उपहति कारित करता है, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से जो बीस हजार रुपए तक हो सकेगा, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

2. जो कोई, धारा 122 की उपधारा (2) में उपबन्धित दशा के सिवाय, उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी साधन से स्वेच्छ्या घोर उपहति कारित करता है, वह आजीवन कारावास से या दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष से कम की नहीं होगी किन्तु दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डनीय होगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

119. सम्पत्ति उदापित करने के लिए या अवैध कार्य कराने को मजबूर करने के लिए स्वेच्छ्या उपहति या बोर उपहति कारित करना -

1. जो कोई, इस प्रयोजन से स्वेच्छया उपहति कारित करता है कि उपहत व्यक्ति से, या उससे हितबद्ध किसी व्यक्ति से, कोई सम्पत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति उद्दापित की जाए या उपहत व्यक्ति को या उससे हितबद्ध किसी व्यक्ति को कोई ऐसी बात, जो अवैध है, या जिससे किसी अपराध का किया जाना सुकर होता है, करने के लिए मजबूर किया जाए, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अर्वाध दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा 

2. जो कोई, उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी प्रयोजन के लिए स्वेच्छया घोर उपहति कारित करता है, वह आजीवन कारावास से या दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डनीय होगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

120. संस्वीकृति उद्दापित करने या विवश करके सम्पत्ति को वापस कराने के लिए स्वेच्छया उपहति या घोर उपहति कारित करना -

1. जो कोई, इस प्रयोजन से स्वेच्छया उपहति कारित करता है कि उपहत व्यक्ति से या उससे हितबद्ध किसी व्यक्ति से कोई संस्वीकृति या कोई जानकारी, जिससे किसी अपराध या कदाचार का पता चल सके, उद्दापित की जाए या उपहेत व्यक्ति या उससे हितबद्ध व्यक्ति को मजबूर किया जाए कि वह कोई सम्पत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति वापस करे, या करवाए, या किसी दावे या मांग की पुष्टि, या ऐसी जानकारी दे, जिससे किसी सम्पत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति को वापस कराया जा सके, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

दृष्टांत

() , जो एक पुलिस अधिकारी है, से यह संस्वीकृति कराने के लिए, कि उसने अपराध किया है उसे उत्प्रेरित करने के लिए यातना देता है। इस धारा के अधीन अपराध का दोषी है।

() , जो एक पुलिस अधिकारी है, से यह पता लगाने के लिए कि अमुक चुराई हुई सम्पत्ति कहाँ रखी है, उत्प्रेरित करने के लिए उसे यातना देता है। इस धारा के अधीन अपराध का दोषी है।

() , जो एक राजस्व अधिकारी है, राजस्व का वह बकाया, जो द्वारा देय है, देने के लिए को विवश करने के लिए उसे यातना देता है। इस धारा के अधीन अपराध का दोषी है।

2. जो कोई, उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी प्रयोजन के लिए स्वेच्छया घोर उपहति कारित करता है, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक हो सकेगी दण्डनीय होगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

121. लोक सेवक को अपने कर्त्तव्य से भयोपरत करने के लिए स्वेच्छ्या उपहति या घोर उपहति कारित करना -

1. जो कोई, किसी ऐसे व्यक्ति को, जो लोक सेवक है, उस समय जब वह वैसे लोक सेवक के नाते अपने कर्त्तव्य का निर्वहन कर रहा है या इस आशय से कि उस व्यक्ति को या किसी अन्य लोक सेवक को, वैसे लोक सेवक के नाते उसके अपने कर्तव्य के विधिपूर्ण निर्वहन से निवारित या भयोपरत करे या वैसे लोक सेवक के नाते उस व्यक्ति द्वारा अपने कर्तव्य के विधिपूर्ण निर्वहन में की गई या किए जाने के लिए प्रयत्न किए गए किसी बात के परिणामस्वरूप स्वेच्छया उपहति कारित करता है, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

2. जो कोई, किसी ऐसे व्यक्ति को, जो लोक सेवक है, उस समय जब वह वैसे लोक सेवक के नाते अपने कर्त्तव्य का निर्वहन कर रहा है या इस आशय से कि उस व्यक्ति को, या किसी अन्य लोक सेवक को वैसे लोक सेवक के नाते उसके अपने कर्त्तव्य के निर्वहन से निवारित या भयोपरत करे या वैसे लोक सेवक के नाते उस व्यक्ति द्वारा अपने कर्त्तव्य के विधिपूर्ण निर्वहन में की गई या किए जाने के लिए प्रयतित किसी बात के परिणामस्वरूप स्वेच्छया घोर उपहति कारित करता है, यह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष से कम की नहीं होगी, किन्तु दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

122. प्रकोपन पर स्वेच्छया उपहति या घोर उपहति कारित करना -

1. जो कोई, गम्भीर और अचानक प्रकोपन पर स्वेच्छया उपहति कारित करता है, यदि तो उसका आशय उस व्यक्ति से भिन्न, जिसने प्रकोपन दिया था, किसी व्यक्ति को उपहति कारित करने का है और तो अपने द्वारा ऐसी उपहति कारित किया जाना सम्भाव्य जानता है, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि एक मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

2. जो कोई, गम्भीर और अचानक प्रकोपन पर स्वेच्छया घोर उपहति कारित करता है, यदि तो उसका आशय उस व्यक्ति से भिन्न, जिसने प्रकोपन दिया था, किसी व्यक्ति को घोर उपहति कारित करने का है और तो अपने द्वारा ऐसी घोर उपहति कारित किया जाना सम्भाव्य जानता है, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

स्पष्टीकरण

यह धारा उसी परन्तुक के अध्यधीन है, जिनके अध्यधीन धारा 101 का अपवाद 1 है।

123. अपराध करने के आशय से विष इत्यादि द्वारा उपहति कारित करना-

जो कोई, इस आशय से कि किसी व्यक्ति की उपहति कारित की जाए या अपराध करने के, या किए जाने को सुकर बनाने के आशय से, या यह सम्भाव्य जानते हुए कि वह उसके द्वारा उपहति कारित करेगा, कोई विष या संवेदनशून्य करने वाली, नशा करने वाली या अस्वास्थ्यकर ओषधि या अन्य चीज उस व्यक्ति को देता है या उसके द्वारा लिया जाना कारित करता है, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

124. अम्ल, आदि का प्रयोग करके स्वेच्छया घोर उपहति कारित करना -

1. जो कोई, किसी व्यक्ति के शरीर के किसी भाग या किन्हीं भागों को, उस व्यक्ति पर अम्ल फेंककर या उसे अम्ल देकर या किन्हीं अन्य साधनों का प्रयोग करके, ऐसा कारित करने के आशय या ज्ञान से कि संभाव्य है उससे ऐसी क्षति या उपहति कारित हो, स्थायी या आंशिक नुकसान कारित करता है या अंगविकार करता है या जलाता है या विकलांग बनाता है या विद्रूपित करता है या निःशक्त बनाता है या घोर उपहति कारित करता है, या किसी व्यक्ति को स्थायी विकृतशील दशा में डालता है, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष से कम की नहीं होगी, किंतु जो आजीवन कारावास तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा :

परंतु ऐसा जुर्माना पीड़ित के उपचार के चिकित्सीय व्ययों को पूरा करने के लिए न्यायोचित और युक्तियुक्त होगा:

परंतु यह और कि इस उपधारा के अधीन अधिरोपित किसी भी जुर्माने का संदाय पीड़ित को किया जाएगा।

2. जो कोई, किसी व्यक्ति को स्थायी या आंशिक नुकसान कारित करने या उसका अंगविकार करने या जलाने या विकलांग बनाने या विद्रूपित करने या निःशक्त करने या घोर उपहति कारित करने के आशय से उस व्यक्ति पर अम्ल फेंकता है या फेंकने का प्रयत्न करता है या किसी व्यक्ति को अम्ल देता है या अम्ल देने का प्रयत्न करता है, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि पांच वर्ष से कम की नहीं होगी, किन्तु जो सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

स्पष्टीकरण 1 –

इस धारा के प्रयोजनों के लिए "अम्ल' में कोई ऐसा पदार्थ सम्मिलित है जो ऐसे अम्लीय या संक्षारक स्वरूप या ज्वलन प्रकृति का है, जो ऐसी शारीरिक क्षति करने योग्य है, जिससे क्षतचिह्न बन जाते हैं या विद्रूपता या अस्थायी या स्थायी निःशक्तता हो जाती है।

स्पष्टीकरण 2 –

इस धारा के प्रयोजनों के लिए, स्थायी या आंशिक नुकसान या अंगविकार या स्थायो विकृतशील दशा का अपरिवर्तनीय होना आवश्यक नहीं होगा।

125. कार्य, जिससे दूसरों का जीवन या वैयक्तिक सुरक्षा संकटापन्न हो-

जो कोई, इतने उतावलेपन या उपेक्षा से कोई ऐसा कार्य करता है कि उससे मानव जीवन या दूसरों का वैयक्तिक सुरक्षा संकटापन्न होती है, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो ढाई हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा, किन्तु -

() जहां उपहति कारित की जाती है, वहां दोनों में से किसी भांति के कारावास, जिसकी अवधि छह मास तक हो सकेगी या जुर्माने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा या दोनों से, दण्डित किया जाएगा;

() जहां घोर उपहति कारित की जाती है, वहां दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक हो सकेगी या जुर्माने से, जो दस हजार रुपए तक हो सकेगा या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

सदोष अवरोध और सदोष परिरोध के विषय में

126. सदोष अवरोध-

1. जो कोई, किसी व्यक्ति को स्वेच्छया ऐसी बाधा डालता है कि उस व्यक्ति को उस दिशा में, जिसमें उस व्यक्ति को जाने का अधिकार है, जाने से रोक दे, वह उस व्यक्ति का सदोष अवरोध करता है, यह कहा जाता है।

अपवाद

भूमि के या जल के ऐसे प्राइवेट मार्ग में बाधा डालना, जिसके सम्बन्ध में किसी व्यवित को सद्भावपूर्वक विश्वास है कि वहाँ बाधा डालने का उसे विधिपूर्ण अधिकार है, इस धारा के अर्थ के अन्तर्गत अपराध नहीं है।

दृष्टांत

एक मार्ग में, जिससे होकर जाने का का अधिकार है, स‌द्भावपूर्वक यह विश्वास रखते हुए कि उसको मार्ग रोकने का अधिकार प्राप्त है, बाधा डालता है। जाने से उसके द्वारा रोक दिया जाता है। , का सदोष अवरोध करता है।

2. जो कोई, किसी व्यक्ति का सदोष अवरोध करता है, वह सादा कारावास से, जिसकी अवधि एक मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

127. सदोष परिरोध -

1. जो कोई, किसी व्यक्ति का इस प्रकार सदोष अवरोध करता है कि उस व्यक्ति को निश्चित परिसीमा से परे जाने से रोक दे, वह उस व्यक्ति का "सदोष परिरोध" करता है, यह कहा जाता है।

दृष्टांत

() को दीवार से घिरे हुए स्थान में प्रवेश कराकर उसमें ताला लगा देता है। इस प्रकार दीवार की परिसीमा से परे किसी भी दिशा में नहीं जा सकता। ने का सदोष परिरोध किया है।

() एक भवन के बाहर जाने के द्वारों पर बन्दूकधारी मनुष्यों को बैठा देता है और से कह देता है कि यदि भवन के बाहर जाने का प्रयत्न करेगा तो वे को गोली मार देंगे। ने का सदोष परिरोध किया है।

2.  जो कोई, किसी व्यक्ति का सदोष परिरोध करता है, वह दोनों में से, किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

3. जो कोई, किसी व्यक्ति का सदोष परिरोध तीन या अधिक दिनों के लिए करता है, वह दोनों में से, किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

4.  जो कोई, किसी व्यक्ति का सदोष परिरोध दस या अधिक दिनों के लिए करता है, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी, जो दस हजार रुपए से कम का नहीं होगा, का भी दायी होगा।

5.  जो कोई, यह जानते हुए किसी व्यक्ति को सदोष परिरोध में रखता है कि उस व्यक्ति को छोड़ने के लिए रिट सम्यक् रूप से निकल चुकी है, वह किसी अवधि के उस कारावास के अतिरिक्त, जिससे कि वह इस अध्याय की किसी अन्य धारा के अधीन दण्डनीय हो, दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

6. जो कोई, किसी व्यक्ति का सदोष परिरोध इस प्रकार करता है जिससे यह आशय प्रतीत होता है कि ऐसे परिरुद्ध व्यक्ति से हितवद्ध किसी व्यक्ति को या किसी लोक सेवक को ऐसे व्यक्ति के परिरोध की जानकारी होने पाए या इसमें इसके पूर्व वर्णित किसी ऐसे व्यक्ति या लोक सेवक को, ऐसे परिरोध के स्थान की जानकारी होने पाए या उसका पता वह चला पाए, वह उस दण्ड के अतिरिक्त, जिसके लिए वह ऐसे सदोष परिरोध के लिए दण्डनीय हो, दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा, और जुर्माने का भी दायी होगा।

7. जो कोई, किसी व्यक्ति का सदोष परिरोध इस प्रयोजन से करता है कि उस परिरुद्ध व्यक्ति से, या उससे हितबद्ध किसी व्यक्ति से, कोई सम्पत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति उद्दापित की जाए, या उस परिरुद्ध व्यक्ति को या उससे हितबद्ध किसी व्यक्ति को, कोई ऐसी अवैध बात करने के लिए, या कोई ऐसी जानकारी देने के लिए जिससे अपराध का किया जाना सुकर हो जाए, मजबूर किया जाए, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

8. जो कोई, किसी व्यक्ति का सदोष परिरोध इस प्रयोजन से करता है कि उस परिरुद्ध व्यक्ति से, या उससे हितबद्ध किसी व्यक्ति से, कोई संस्वीकृति या कोई जानकारी, जिससे किसी अपराध या कदाचार का पता चल सके, उद्दापित की जाए, या वह परिरुद्ध व्यक्ति या उससे हितबद्ध कोई व्यक्ति मजबूर किया जाए कि वह किसी सम्पत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति को वापस करे या वापस करवाए या किसी दावे या मांग की तुष्टि करे या कोई ऐसी जानकारी दे जिससे किसी सम्पत्ति या किसी मूल्यवान प्रतिभूति को वापस कराया जा सके, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

आपराधिक बल और हमले के विषय में

128. बल-

कोई व्यक्ति, किसी अन्य व्यक्ति पर बल का प्रयोग करता है, यह कहा जाता है, यदि वह उस अन्य व्यक्ति में गति, गति-परिवर्तन या गतिहीनता कारित कर देता है या यदि वह किसी पदार्थ में ऐसी गति, गति-परिवर्तन या गतिहीनता कारित कर देता है, जिससे उस पदार्थ का स्पर्श उस अन्य व्यक्ति के शरीर के किसी भाग से या किसी ऐसी चीज से, जिसे वह अन्य व्यक्ति पहने हुए है या ले जा रहा है, या किसी ऐसी चीज से, जो इस प्रकार स्थित है कि ऐसे स्पर्श से उस अन्य व्यक्ति की संवेदन शक्ति पर प्रभाव पड़ता है:

परन्तु यह तब जबकि गतिमान, गति-परिवर्तन या गतिहीनता कारित करने वाला व्यक्ति उस गति, गति-परिवर्तन या गतिहीनता को इसमें इसके पश्चात् वर्णित तीन तरीकों में से किसी एक द्वारा कारित करता है, अर्थात् :-

() अपनी निजी शारीरिक शक्ति द्वारा ;

() किसी पदार्थ के इस प्रकार व्ययन द्वारा कि उसके अपने या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा कोई अन्य कार्य के किए जाने के बिना ही गति या गति-परिवर्तन या गतिहीनता घटित होती है;

() किसी जीव-जन्तु को गतिमान होने, गति-परिवर्तन करने या गतिहीन होने के लिए उत्प्रेरण द्वारा।

129. आपराधिक बल-

जो कोई, किसी व्यक्ति पर उस व्यक्ति की सम्मति के बिना बल का प्रयोग किसी अपराध को करने के लिए, या ऐसे बल के प्रयोग से कारित करने के आशय से, या ऐसे बल के प्रयोग से संभाव्यतः उस व्यक्ति को, जिस पर बल का प्रयोग किया गया है, क्षति, भय या क्षोभ, कारित करेगा यह जानते हुए साशय करता है, वह उस अन्य व्यक्ति पर आपराधिक बल का प्रयोग करता है, यह कहा जाता है।

दृष्टांत

() नदी के किनारे रस्सी से बंधी हुई नाव पर बैठा है। रस्सियों को खोल देता है और इस प्रकार नाव को धार में साशय बहा देता है। यहां , को साशय गतिमान करता है, और वह ऐसा उन पदार्थों को ऐसी रीति से व्ययनित करके करता है कि किसी व्यक्ति की ओर से कोई अन्य कार्य किए बिना ही गति उत्पन्न हो जाती है। अतएव, ने पर बल का प्रयोग साशय किया है, और यदि उसने की सम्मति के बिना ऐसा कार्य कोई अपराध करने के लिए या यह आशय रखते हुए, या यह सम्भाव्य जानते हुए किया है कि ऐसे बल के प्रयोग से वह को क्षति, भय या क्षोभ कारित करे, तो ने पर आपराधिक बल का प्रयोग किया है।

() एक रथ में सवार होकर चल रहा है। , के घोड़ों को चाबुक मारता है, और उसके द्वारा उनकी चाल को तेज कर देता है। यहां ने जीव-जन्तुओं को उनकी अपनी गति परिवर्तित करने के लिए उत्प्रेरित करके का गति-परिवर्तन कर दिया है। अतएव, ने पर बल का प्रयोग किया है; और यदि ने की सम्मति के बिना यह कार्य यह आशय रखते हुए या यह सम्भाव्य जानते हुए किया है कि वह उससे को क्षति, भय या क्षोभ उत्पन्न करे तो ने पर आपराधिक बल का प्रयोग किया है।

() एक पालकी में सवार होकर चल रहा है। को लूटने का आशय रखते हुए पालकी का डंडा पकड़ लेता है, और पालकी को रोक देता है। यहां, ने को गतिहीन किया है, और यह उसने अपनी शारीरिक शक्ति द्वारा किया है, अतएव, ने पर बल का प्रयोग किया है, और ने की सम्मति के बिना यह कार्य अपराध करने के लिए साशय किया है, इसलिए ने पर आपराधिक बल का प्रयोग किया है।

() सड़क पर साशय को धक्का देता है, यहां ने अपनी निजी शारीरिक शक्ति द्वारा अपने शरीर को इस प्रकार गति दी है कि वह के स्पर्श में आए। अतएव, उसने साशय पर बल का प्रयोग किया है, और यदि उसने की सम्मति के बिना यह कार्य यह आशय रखते हुए या यह सम्भाव्य जानते हुए किया है कि वह उससे को क्षति, भय या क्षोभ उत्पन्न करे, तो उसने पर आपराधिक बल का प्रयोग किया है।

() यह आशय रखते हुए या यह बात सम्भाव्य जानते हुए एक पत्थर फेंकता है कि वह पत्थर इस प्रकार , या के वस्त्र के या द्वारा ले जाई जाने वाली किसी वस्तु के स्पर्श में आएगा या यह कि वह पानी में गिरेगा और उछलकर पानी के कपड़ों पर या द्वारा ले जाई जाने वाली किसी वस्तु पर जा पड़ेगा। यहां, यदि पत्थर के फेंके जाने से यह परिणाम उत्पन्न हो जाए कि कोई पदार्थ , या के वस्त्रों के स्पर्श में जाए, तो ने पर बल का प्रयोग किया है; और यदि उसने की सम्मति के बिना यह कार्य उसके द्वारा को क्षति, भय या क्षोभ उत्पन्न करने का आशय रखते हुए किया है, तो उसने पर आपराधिक बल का प्रयोग किया है।

() किसी महिला का घूंघट साशय हटा देता है। यहां, ने उस पर साशय बल का प्रयोग किया है, और यदि उसने उस महिला की सम्मति के बिना यह कार्य यह आशय रखते हुए यह सम्भाव्य जानते हुए किया है कि उससे उसको क्षति, भय या क्षोभ उत्पन्न हो, तो उसने उस आपराधिक बल का प्रयोग किया है।

() स्नान कर रहा है। स्नान करने के टब में ऐसा जल डाल देता है जिसे वह जानता है कि वह उबल रहा है। यहां, उबलते हुए जल में ऐसी गति को अपनी शारीरिक शक्ति द्वारा साशय उत्पन्न करता है कि उस जल का स्पर्श से होता है या अन्य जल से होता है, जो इस प्रकार स्थित है कि ऐसे स्पर्श से की संवेदन शक्ति प्रभावित होती है; इसलिए ने पर साशय बल का प्रयोग किया है, और यदि उसने की सम्मति के बिना यह कार्य यह आशय रखते हुए या यह सम्भाव्य जानते हुए किया है कि वह उससे को क्षति, भय या क्षोभ उत्पन्न करे, तो ने आपराधिक बल का प्रयोग किया है।

() , की सम्मति के बिना, एक कुत्ते को पर झपटने के लिए भड़काता है। यहां यदि का आशय को क्षति, भय या क्षोभ कारित करने का है तो उसने पर आपराधिक बल का प्रयोग किया है।

130. हमला-

जो कोई, कोई अंगविक्षेप या कोई तैयारी इस आशय से करता है, या यह सम्भाव्य जानते हुए करता है कि ऐसे अंगविक्षेप या ऐसी तैयारी करने से किसी उपस्थित व्यक्ति को यह आशंका हो जाए कि जो वैसा अंगविक्षेप या तैयारी करता है, वह उस व्यक्ति पर आपराधिक बल का प्रयोग करने ही वाला है, वह हमला करता है, यह कहा जाता है।

स्पष्टीकरण

केवल शब्द हमले की कोटि में नहीं आते हैं। किन्तु जो शब्द कोई व्यक्ति प्रयोग करता है, वे उसके अंगविक्षेप या तैयारियों को ऐसा अर्थ दे सकते हैं जिससे वे अंगविक्षेप या तैयारियां हमले की कोटि में जाएं।

दृष्टांत

() पर अपना मुक्का इस आशय से या यह सम्भाव्य जानते हुए हिलाता है कि उसके द्वारा को यह विश्वास हो जाए कि , को मारने वाला ही है। ने हमला किया है।

() एक उग्र कुत्ते की मुखबन्धनी इस आशय से या यह सम्भाव्य जानते हुए खोलना आरम्भ करता है कि उसके द्वारा को यह विश्वास हो जाए कि वह पर कुत्ते से आक्रमण कराने ही वाला है। ने पर हमला किया है।

() से यह कहते हुए कि "मैं तुम्हें पीटूंगा" एक छड़ी उठा लेता है। यहां यद्यपि द्वारा प्रयोग में लाए गए शब्द किसी अवस्था में हमले की कोटि में नहीं आते और यद्यपि केवल अंगविक्षेप बनाना जिसके साथ किन्हीं अन्य परिस्थितियों का अभाव है, हमले की कोटि में भी आए, तथापि शब्दों द्वारा स्पष्टीकृत वह अंगविक्षेप हमले की कोटि में सकता है।

131. गम्भीर प्रकोपन होने से अन्यथा हमला करने या आपराधिक बल का प्रयोग करने के लिए दण्ड -

जो कोई, किसी व्यक्ति पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग उस व्यक्ति द्वारा गम्भीर और अचानक प्रकोपन दिए जाने पर करने से अन्यथा करता है, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

स्पष्टीकरण 1-

गम्भीर और अचानक प्रकोपन से इस धारा के अधीन किसी अपराध के दण्ड में कमी नही होगी,-

() यदि वह प्रकोपन अपराध करने के लिए प्रतिहेतु के रूप में अपराधी द्वारा वांछित या स्वेच्छया प्रकोपित किया गयां है; या

() यदि वह प्रकोपन किसी ऐसी बात द्वारा दिया गया है जो विधि के पालन में, या किसी लोक सेवक द्वारा ऐसे लोक सेवक की शक्ति के विधिपूर्ण प्रयोग में की गई है; या

() यदि वह प्रकोपन किसी ऐसी बात द्वारा दिया गया है जो प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के विधिपूर्ण प्रयोग में की गई है।

स्पष्टीकरण 2-

प्रकोपन, अपराध को कम करने के लिए पर्याप्त गम्भीर और अचानक था या नहीं, यह तथ्य का प्रश्न है।

132. लोक सेवक को अपने कर्त्तव्य के निर्वहन से भयोपरत करने के लिए हमला या आपराधिक बल का प्रयोग -

जो कोई, किसी ऐसे व्यक्ति पर, जो लोक सेवक है, उस समय जब वैसे लोक सेवक के नाते वह उसके अपने कर्तव्य का निष्पादन कर रहा है, या इस आशय से कि उस व्यक्ति को वैसे लोक सेवक के नाते अपने कर्तव्य के निर्वहन से निवारित करे या भयोपरत करे या ऐसे लोक सेवक के नाते उसके अपने कर्त्तव्य के विधिपूर्ण निर्वहन में की गई या की जाने के लिए प्रयत्न किए गए किसी बात के परिणामस्वरूप हमला करता है या आपराधिक बल का प्रयोग करता है, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

133. गम्भीर प्रकोपन होने से अन्यथा किसी व्यक्ति का अनादर करने के आशय से उस पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग -

जो कोई, किसी व्यक्ति पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग उस व्यक्ति द्वारा गम्भीर और अचानक प्रकोपन दिए जाने पर करने से अन्यथा, इस आशय से करता है कि उसके द्वारा उसका अनादर किया जाए, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

134. किसी व्यक्ति द्वारा ले जाई जाने वाली सम्पत्ति की चोरी के प्रयत्नों में हमला या आपराधिक बल का प्रयोग-

जो कोई, किसी व्यक्ति पर किसी ऐसी सम्पत्ति की चोरी करने के प्रयत्न में हमला या आपराधिक बल का प्रयोग करता है जिसे वह व्यक्ति उस समय पहने हुए है, या ले जा रहा है, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

135. किसी व्यक्ति का सदोष परिरोध करने के प्रयत्न में हमला या आपराधिक बल का प्रयोग -

जो कोई, किसी व्यक्ति पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग उस व्यक्ति का सदोष परिरोध करने का प्रयत्न करने में करता है, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

136. गम्भीर प्रकोपन पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग -

जो कोई, किसी व्यक्ति पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग उस व्यक्ति द्वारा दिए गए गम्भीर और अचानक प्रकोपन पर करता है, वह सादा कारावास से, जिसकी अवधि एक मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

स्पष्टीकरण

यह धारा उसी स्पष्टीकरण के अध्यधीन है, जिसके अध्यधीन धारा 131 है।

व्यपहरण, अपहरण, दासत्व और बलात् श्रम के विषय में

137. व्यपहरण-

1. व्यपहरण दो किस्म का होता है; भारत में से व्यपहरण और विधिपूर्ण संरक्षकता में से व्यपहरण-

() जो कोई, किसी व्यक्ति का, उस व्यक्ति की, या उस व्यक्ति की ओर से सम्मति देने के लिए वैध रूप से प्राधिकृत किसी व्यक्ति की सम्मति के बिना, भारत की सीमाओं से परे पहुँचा देता है, वह भारत में से उस व्यक्ति का व्यपहरण करता है, यह कहा जाता है।

() जो कोई, किसी शिशु को या किसी विकृतचित्त व्यक्ति को, ऐसे शिशु या विकृतचित्त व्यक्ति के विधिपूर्ण संरक्षकता में से ऐसे संरक्षक की सम्मति के बिना ले जाता है या बहका ले जाता है, वह ऐसे शिशु या ऐसे व्यक्ति का विधिपूर्ण संरक्षकता में से व्यपहरण करता है, यह कहा जाता है।

स्पष्टीकरण

इस खण्ड में "विधिपूर्ण संरक्षक" शब्दों के अन्तर्गत ऐसा व्यक्ति आता है, जिस पर ऐसे शिशु या अन्य व्यक्ति की देख-रेख या अभिरक्षा का भार विधिपूर्वक न्यस्त किया गया है।

अपवाद-

इस खण्ड का विस्तार किसी ऐसे व्यक्ति के कार्य पर नहीं है, जिसे सद्भावपूर्वक यह विश्वास है कि वह किसी अधर्मज शिशु का पिता है, या जिसे सद्भावपूर्वक यह विश्वास है कि वह ऐसे शिशु की विधिपूर्ण अभिरक्षा का हकदार है, जब तक कि ऐसा कार्य अनैतिक या विधिविरुद्ध प्रयोजन के लिए किया जाए।

2. जो कोई, भारत में से या विधिपूर्ण संरक्षकता में से किसी व्यक्ति का व्यपहरण करता है, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

138. अपहरण-

जो कोई, किसी व्यक्ति को किसी स्थान से जाने के लिए बल द्वारा विवश करता है, या किन्हीं छलयुक्त उपायों द्वारा उत्प्रेरित करता है, वह उस व्यक्ति का अपहरण करता है, यह कहा जाता है।

139. भीख मांगने के प्रयोजनों के लिए शिशु का व्यपहरण या विकलांगीकरण -

1. जो कोई, किसी शिशु का इसलिए व्यपहरण करता है या शिशु का विधिपूर्ण संरक्षक स्वयं होते हुए शिशु की अभिरक्षा इसलिए अभिप्राप्त करता है कि ऐसा शिशु भीख मांगने के प्रयोजनों के लिए नियोजित या प्रयुक्त किया जाए, वह कठिन कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष से कम नहीं होगी, किन्तु जो आजीवन कारावास तक की हो सकेगी, दण्डनीय होगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

2. जो कोई, किसी शिशु को विकलांग इसलिए करता है कि ऐसा शिशु भीख मांगने के प्रयोजनों के लिए नियोजित या प्रयुक्त किया जाए, वह कारावास से, जिसकी अवधि बीस वर्ष से कम नहीं होगी, किन्तु जो आजीवन कारावास, जिससे उस व्यक्ति के शेष प्राकृत जीवनकाल के लिए कारावास अभिप्रेत होगा, तक की हो सकेगी, और जुर्माने से भी, दण्डित किया जाएगा।

3. जहाँ कोई व्यक्ति, जो शिशु का विधिपूर्ण संरक्षक नहीं है, उस शिशु को भीख मांगने के प्रयोजनों के लिए नियोजित या प्रयुक्त करता है, वहां जब तक कि इसके प्रतिकूल साबित कर दिया जाए, यह उपधारगा की जाएगी कि उसने इस उद्देश्य से उस शिशु का व्यपहरण किया था या अन्यथा उसकी अभिरक्षा अभिप्राप्त की थी कि वह शिशु भीख मांगने के प्रयोजनों के लिए नियोजित या प्रयुक्त किया जाए।

4. इस धारा में "भीख मांगने से निम्नलिखित अभिप्रेत है-

i. लोक स्थान में भीख की याचना या प्राप्ति, चाहे गाने, नाचने, भाग्य बताने, करतब दिखाने या चीजें बेचने के बहाने या अन्यथा करना;

ii. भीख की याचना करने या प्राप्ति के प्रयोजन से किसी निजी परिसर में प्रवेश करना;

iii. भीख अभिप्राप्त या उद्दापित करने के उद्देश्य से अपना या किसी अन्य व्यक्ति का या जीव-जन्तु का कोई जख्म, घाव, क्षति, विरूपता या रोग अभिदर्शित या प्रदर्शित करना;

iv. भीख की याचना करने या प्राप्ति के प्रयोजन से शिशु का प्रदर्शन के रूप में प्रयोग करना।

140. हत्या करने के लिए या फिरौती, आदि के लिए व्यपहरण या अपहरण -

1. जो कोई, इसलिए किसी व्यक्ति का व्यपहरण या अपहरण करता है कि ऐसे व्यक्ति की हत्या की जाए या उसको ऐसे व्ययनित किया जाए कि वह अपनी हत्या होने के खतरे में पड़ जाए, वह आजीवन कारावास से या कठिन कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

दृष्टांत

() इस आशय से या यह सम्भाव्य जानते हुए कि किसी देव मूर्ति पर की बलि चढ़ाई जाए, भारत में से का व्यपहरण करता है। ने इस धारा में परिभाषित अपराध किया है।

() को उसके घर से इसलिए बलपूर्वक या बहकाकर ले जाता है कि की हत्या की जाए। ने इस धारा में परिभाषित अपराध किया है।

2. जो कोई, इसलिए किसी व्यक्ति का व्यपहरण या अपहरण करता है या ऐसे व्यपहरण या अपहरण के पश्चात् ऐसे व्यक्ति को अवरोध में रखता है और ऐसे व्यक्ति की मृत्यु या उसकी उपहति कारित करने की धमकी देता है या अपने आचरण से ऐसी युक्तियुक्त आशंका पैदा करता है कि ऐसे व्यक्ति की हत्या या उपहति कारित की जा सकती है या ऐसे व्यक्ति को उपहति या उसकी मृत्यु कारित करता है जिससे कि सरकार या किसी विदेशी राज्य या अन्तरराष्ट्रीय अन्तर-शासनात्मक संगठन या किसी अन्य व्यक्ति को किसी कार्य को करने या करने से विरत रहने के लिए या फिरौती देने के लिए विवश किया जाए, वह मृत्यु या आजीवन कारावास से दंडित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

3. जो कोई, इस आशय से किसी व्यक्ति का व्यपहरण या अपहरण करता है कि उसका गुप्त रूप से और सदोष परिरोध किया जाए, वह दोनों में से किसी भांति के कारवास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

4. जो कोई, किसी व्यक्ति का व्यपहरण या अपहरण इसलिए करता है कि उसे घोर उपहति या दासत्व का या किसी व्यक्ति की प्रकृति विरुद्ध काम वासना का विषय बनाया जाए या बनाए जाने के खतरे में पड़ सकता है वैसे उसे व्ययनित किया जाए या सम्भाव्य जानते हुए करता है कि ऐसे व्यक्ति को उपर्युक्त बातों का विषय बनाया जाएगा या उपर्युक्त रूप से व्ययनित किया जाएगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

141. विदेश से बालिका या बालक का आयात करना -

जो कोई, इक्कीस वर्ष से कम आयु की किसी बालिका को, या अठारह वर्ष से कम आयु के किसी बालक को, भारत के बाहर के किसी देश से, उस बालिका या बालक को, किसी अन्य व्यक्ति से अनुचित संभोग करने के लिए विवश या विलुब्ध करने के आशय से, या यह सम्भाव्य जानते हुए कि इसके द्वारा बालिका या बालक को विवश या विलुब्ध किया जा सकेगा, भारत में आयात करता है, वह कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

142. व्यपहृत या अपहृत व्यक्ति को सदोष छिपाना या परिरोध में रखना -

जो कोई, यह जानते हुए कि कोई व्यक्ति व्यपहृत या अपहृत किया गया है, ऐसे व्यक्ति को सदोष छिपाता है या परिरोध में रखता है, वह उसी प्रकार दण्डित किया जाएगा, मानो उसने उसी आशय या ज्ञान या प्रयोजन से ऐसे व्यक्ति का व्यपहरण या अपहरण किया है, जिससे उसने ऐसे व्यक्ति को छिपाया या परिरोध में निरुद्ध रखा है।

143. व्यक्ति का दुर्व्यापार-

1.  जो कोई, शोषण के प्रयोजन से, -

() धमकियों का प्रयोग करके या:

() बल, या किसी भी अन्य प्रकार के प्रपीड़न का प्रयोग करके ; या

() अपहरण द्वारा; या

() कपट का प्रयोग करके या प्रवंचना द्वारा; या

() शक्ति का दुरुपयोग करके ; या

() उत्प्रेरणा द्वारा, जिसके अंतर्गत ऐसे किसी व्यक्ति की, जो भर्ती किए गए, परिवहनित, संश्रित, स्थानांतरित या गृहीत व्यक्ति पर नियंत्रण रखता है, सम्मति प्राप्त करने के लिए भुगतान करना या फायदे देना या प्राप्त करना भी आता है,

किसी व्यक्ति या किन्हीं व्यक्तियों को भर्ती करता है, परिवहनित करता है, संश्रय देता है, स्थानांतरित करता है, या गृहीत करता है, वह दुर्व्यापार का अपराध करता है

स्पष्टीकरण 1 –

"शोषण" पद के अंतर्गत शारीरिक शोषण का कोई कृत्य या किसी प्रकार का लैंगिक शोषण, दासता, या दासता के समान व्यवहार, अधिसेविता, भिक्षावृत्ति या अंगों का बलात् अपसारण भी है।

स्पष्टीकरण 2 –

दुर्व्यापार के अपराध के अवधारण में, पीड़ित की सम्मति महत्वहीन है

2. जो कोई, दुर्व्यापार का अपराध करता है वह कठिन कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष से कम की नहीं होगी, किंतु जो दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

3. जहां अपराध में एक से अधिक व्यक्तियों का दुर्व्यापार अंतर्वलित है, वहां वह कठिन कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष से कम की नहीं होगी, किंतु जो आजीवन कारावास तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

4. जहां अपराध में किसी शिशु का दुर्व्यापार अंतर्वलित है, वहां वह कठिन कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष से कम की नहीं होगी, किंतु जो आजीवन कारावास तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

5. जहां अपराध में एक से अधिक शिशु का दुर्व्यापार अंतर्वलित है, वहां वह कठिन कारावास से, जिसकी अवधि चौदह वर्ष से कम की नहीं होगी, किंतु जो आजीवन कारावास तक की हो सकेगी, दण्डनीय होगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

6. यदि किसी व्यक्ति को किसी शिशु का एक से अधिक अवसरों पर दुर्व्यापार किए जाने के अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया जाता है तो ऐसा व्यक्ति आजीवन कारावास, जिससे उस व्यक्ति के शेष प्राकृत जीवनकाल के लिए कारावास अभिप्रेत होगा, से दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

7. जहां कोई लोक सेवक या कोई पुलिस अधिकारी, किसी व्यक्ति के दुर्व्यापार में अंतर्वलित है, वहां ऐसा लोक सेवक या पुलिस अधिकारी आजीवन कारावास, जिससे उस व्यक्ति के शेष प्राकृत जीवनकाल के लिए कारावास अभिप्रेत होगा, से दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

144. दुर्व्यापार किए गए किसी व्यक्ति का शोषण -

1. जो कोई, यह जानते हुए या इस बात का विश्वास करने का कारण रखते हुए कि किसी शिशु का दुर्व्यापार किया गया है, ऐसे शिशु को किसी भी रीति में लैंगिक शोषण के लिए रखता है, वह कठोर कारावास से, जिसकी अवधि पांच वर्ष से कम की नहीं होगी, किंतु जो दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

2. जो कोई, यह जानते हुए या इस बात का विश्वास करने का कारण रखते हुए कि किसी व्यक्ति का दुर्व्यापार किया गया है, ऐसे व्यक्ति को किसी भी रीति में लैंगिक शोषण के लिए रखता है, वह कठिन कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष से कम की नहीं होगी, किंतु जो सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

145. दासों का आभ्यासिक व्यौहार करना-

जो कोई, अभ्यासतः दासों को आयात करता है, निर्यात करता है, अपसारित करता है, खरीदता है, बेचता है या उनका दुर्व्यापार करता है या व्यौहार करता है, वह आजीवन कारावास से, या दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष से अधिक की नहीं होगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

146. विधिविरुद्ध अनिवार्य श्रम-

जो कोई, किसी व्यक्ति को उस व्यक्ति की इच्छा के विरुद्ध श्रम करने के लिए विधिविरुद्ध तौर पर विवश करता है, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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