
कोई बात अपराध नहीं है, जो किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा की जाए, जो उसे करने के लिए विधि द्वारा आबद्ध है या जो तथ्य की भूल के कारण, न कि विधि की भूल के कारण, सद्भावपूर्वक विश्वास करता है कि वह उसे करने के लिए विधि द्वारा आबद्ध है ।
(क) विधि के समादेशों के अनुरूप अपने वरिष्ठ अधिकारी के आदेश से एक सैनिक क भीड़ पर गोली चलाता है। क ने कोई अपराध नहीं किया।
(ख) न्यायालय का अधिकारी क, म को गिरफ्तार करने के लिए उस न्यायालय द्वारा आदेशित किए जाने पर और सम्यक् जांच करने के पश्चात्, यह विश्वास करके कि य ही म है, य को गिरफ्तार कर लेता है। क ने कोई अपराध नहीं किया ।
कोई बात अपराध नहीं हैं, जो न्यायिक रूप से कार्य करते हुए किसी न्यायाधीश द्वारा किसी ऐसी शक्ति के प्रयोग में की जाती है, जिसके बारे में उसे सद्भावपूर्वक विश्वास है। कि उसके पास वह है या उसे विधि द्वारा दी गई है।
कोई बात, जो किसी न्यायालय के निर्णय या आदेश के अनुसरण में की जाए या उसके द्वारा समर्थित हो, यदि वह उस निर्णय या आदेश के प्रवृत रहते की जाए, अपराध नहीं है, चाहे उस न्यायालय को ऐसा निर्णय या आदेश देने की अधिकारिता न रही हो, परन्तु यह तब जब कि वह कार्य करने वाला व्यक्ति सद्भावपूर्वक विश्वास करता हो कि उस न्यायालय को वैसी अधिकारिता थी।
कोई बात अपराध नहीं है, जो ऐसे व्यक्ति द्वारा किया जाए, जो उसे करने के लिए विधि द्वारा न्यायानुमत है, या तथ्य की भूल के कारण, न कि विधि की भूल के कारण सद्भावपूर्वक विश्वास करता है कि वह उसे करने के लिए विधि द्वारा न्यायानुमत है।
क, य को ऐसा कार्य करते हुए देखता है, जो क को हत्या प्रतीत होता है। क सद्भावपूर्वक काम में लाए गए अपने श्रेष्ठ निर्णय के अनुसार उस शक्ति को प्रयोग में लाते हुए, जो विधि ने हत्या करने वालों को उस कार्य में पकड़ने के लिए समस्त व्यक्तियों को दे रखी है, य को उचित प्राधिकारियों के समक्ष ले जाने के लिए य को अभिगृहीत करता है। क ने कोई अपराध नहीं किया है, चाहे तत्पश्चात् असल बात यह निकले कि य आत्म-रक्षा में कार्य कर रहा था।
कोई बात अपराध नहीं है, जो दुर्घटना या दुर्भाग्य से और किसी आपराधिक आशय या ज्ञान के बिना विधिपूर्ण रीति से विधिपूर्ण साधनों द्वारा तथा उचित सतर्कता और सावधानी के साथ विधिपूर्ण कार्य करने में हो जाती है।
क कुल्हाड़ी से काम कर रहा है कुल्हाड़ी का फल उसमें से निकल कर उछट जाता है, और निकट खड़ा हुआ व्यक्ति उससे मारा जाता है। यहां यदि क की ओर से उचित सावधानी का कोई अभाव नहीं था तो उसका कार्य माफी योग्य है और अपराध नहीं है।
कोई बात केवल इस कारण अपराध नहीं है कि वह यह जानते हुए की गई है कि उससे अपहानि कारित होना संभाव्य है, यदि वह अपहानि कारित करने के किसी आपराधिक आशय के बिना और व्यक्ति या संपति को अन्य अपहानि का निवारण या परिवर्जन करने के प्रयोजन से सद्भावपूर्वक की गई है।
ऐसे मामले में यह तथ्य का प्रश्न है कि जिस अपहानि का निवारण या परिवर्जन किया जाना है, क्या वह ऐसी प्रकृति की थी और इतनी आसन्न थी कि वह कार्य, जिससे यह जानते हुए कि उससे अपहानि कारित होना संभाव्य है, करने की जोखिम उठाना न्यायानुमत या माफी योग्य था ।
(क) क, जो एक जलयान का कप्तान है, अचानक और अपने किसी त्रुटि या उपेक्षा के बिना अपने आपको ऐसी स्थिति में पाता है कि यदि उसने जलयान का मार्ग नहीं बदला, तो इससे पूर्व कि वह अपने जलयान को रोक सके वह बीस या तीस यात्रियों से भरी नाव ख को अनिवार्यतः टकराकर डुबा देगा, और अपना मार्ग बदलने से उसे केवल दो यात्रियों वाली नाव ग को डुबाने की जोखिम उठानी पड़ती है, जिसको वह संभवतः बचाकर निकल जाए। यहां, यदि क नाव ग को डुबाने के किसी आशय के बिना और नाव ख के यात्रियों को संकट से बचाने के प्रयोजन से सद्भावपूर्वक अपना मार्ग बदल देता है, यद्यपि वह नाव ग को ऐसे कार्य द्वारा टकराकर डुबा सकती है, जिससे ऐसे परिणाम का उत्पन्न होना वह सम्भाव्य जानता था, तथापि तथ्यतः यह पाया जाता है कि वह संकट, जिसे बचाने का उसका आशय था, जिससे नाव ग को डुबाने की जोखिम उठाना माफी योग्य है, तो वह किसी अपराध का दोषी नहीं है।
(ख) क, एक बड़े अग्निकाण्ड के समय आग को फैलने से रोकने के लिए घरों को गिरा देता है। वह इस कार्य को मानव जीवन या सम्पत्ति को बचाने के आशय से सद्भावपूर्वक करता है। यहां, यदि यह पाया जाता है कि निवारण की जाने वाली अपहानि इस प्रकृति की थी और इतनी आसन्न थी कि क का कार्य माफी योग्य है, तो क उस अपराध का दोषी नहीं है।
कोई बात अपराध नहीं है, जो सात वर्ष से कम आयु के शिशु द्वारा की जाती है।
कोई बात अपराध नहीं है, जो सात वर्ष से ऊपर और बारह वर्ष से कम आयु के ऐसे शिशु द्वारा की जाती है जिसकी समझ इतनी परिपक्व नहीं हुई है कि वह उस अवसर पर अपने आचरण की प्रकृति और परिणामों का निर्णय कर सके ।
कोई बात अपराध नहीं है, जो ऐसे व्यक्ति द्वारा की जाती है, जो उसे करते समय, चित्त- विकृति के कारण उस कार्य की प्रकृति, या यह कि जो कुछ वह कर रहा है वह दोषपूर्ण या विधि के प्रतिकूल है, जानने में असमर्थ है।
कोई बात अपराध नहीं है, जो ऐसे व्यक्ति द्वारा की जाती है, जो उसे करते समय मत्तता के कारण, उस कार्य की प्रकृति, या यह कि जो कुछ वह कर रहा है, वह दोषपूर्ण या विधि के प्रतिकूल है, जानने में असमर्थ है, परन्तु वह चीज, जिससे उसकी मत्तता हुई थी, उसको अपने ज्ञान के बिना या इच्छा के विरुद्ध दी गई थी।
उन दशाओं में, जहां कि कोई किया गया कार्य अपराध नहीं होता जब तक कि वह किसी विशिष्ट ज्ञान या आशय से न किया गया हो, कोई व्यक्ति, जो वह कार्य मतता की स्थिति में करता है, इस प्रकार बरते जाने के दायित्व के अधीन होगा मानो उसे वही ज्ञान था जो उसे होता यदि वह मत्तता में न होता जब तक कि वह चीज, जिससे उसे मत्तता हुई थी, उसे उसके ज्ञान के बिना या उसकी इच्छा के विरुद्ध न दी गई हो।
कोई बात, जो मृत्यु या घोर उपहति कारित करने के आशय से न की गई हो और जिसके बारे में कर्ता को यह ज्ञात न हो कि उससे मृत्यु या घोर उपहति कारित होना सम्भाव्य है, किसी ऐसी अपहानि के कारण अपराध नहीं है जो उस बात से अठारह वर्ष से अधिक आयु के किसी व्यक्ति को, जिसने वह अपहानि सहन करने की चाहे अभिव्यक्त या विवक्षित सम्मति दे दी हो, कारित हो या कारित होना कर्त्ता द्वारा आशयित हो या जिसके बारे में कर्ता को ज्ञात हो कि वह ऐसे किसी व्यक्ति को, जिसने उस अपहानि की जोखिम उठाने की सम्मति दे दी है, उस बात द्वारा कारित होना सम्भाव्य है।
क और य आमोद-प्रमोद हेतु आपस में पट्टेबाजी करने को सहमत होते हैं। इस सहमति में किसी अपहानि को, जो ऐसी पट्टेबाजी के दौरान खेल के नियम के विरुद्ध न होते हुए कारित हो, सहन करने की प्रत्येक की सम्मति विवक्षित है, और यदि क, नियमानुसार पट्टेबाजी करते हुए य को उपहति कारित कर देता है, तो क कोई अपराध नहीं करता है।
कोई बात, जो मृत्यु कारित करने के आशय से न की गई हो, किसी ऐसो अपहानि के कारण अपराध नहीं है जो उस बात से किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसके फायदे के लिए वह सद्भावपूर्वक की जाए और जिसने उस अपहानि को सहने, या उस अपहानि की जोखिम उठाने के लिए चाहे अभिव्यक्त या विवक्षित सम्मति दे दी हो, कारित हो या कारित करने का कर्ता का आशय हो या कारित होने की सम्भाव्यता कर्ता को ज्ञात हो।
क, एक शल्यचिकित्सक, यह जानते हुए कि एक विशिष्ट शल्यक्रिया से य को, जो वेदनापूर्ण व्याधि से ग्रस्त है, मृत्यु कारित होने की सम्भाव्यता है, किन्तु य की मृत्यु कारित करने का आशय न रखते हुए और सद्भावपूर्वक य के फायदे के आशय से य की सम्मति से य पर वह शल्य क्रिया करता है। क ने कोई अपराध नहीं किया है।
कोई बात, जो बारह वर्ष से कम आयु के व्यक्ति या विकृतचित्त व्यक्ति के फायदे के लिए सद्भावपूर्वक उसके संरक्षक की या विधिपूर्ण भारसाधक किसी अन्य व्यक्ति द्वारा या तो अभिव्यक्त या विवक्षित सम्मति से की जाए, किसी ऐसी अपहानि के कारण, अपराध नहीं है जो उस बात से उस व्यक्ति को कारित हो, या कारित करने का कर्ता का आशय हो या कारित होने की सम्भाव्यता कर्ता को ज्ञात हो :
परन्तु इस अपवाद का विस्तार-
(क) साशय मृत्यु कारित करने या मृत्यु कारित करने का प्रयत्न करने पर नहीं होगा;
(ख) मृत्यु या घोर उपहति के निवारण के या किसी गंभीर रोग या अंगशैथिल्य से मुक्त करने से भिन्न किसी प्रयोजन के लिए किसी ऐसी बात के करने पर नहीं होगा जिसे करने वाला व्यक्ति जानता हो कि उससे मृत्यु कारित होना सम्भाव्य है;
(ग) स्वेच्छया घोर उपहति कारित करने या घोर उपहति कारित करने का प्रयत्न करने पर नहीं होगा, जब तक कि वह मृत्यु या घोर उपहति के निवारण के, या किसी गंभीर रोग या अंगशैथिल्य से मुक्त करने के प्रयोजन से न की गई हो;
(घ) किसी ऐसे अपराध के दुष्प्रेरण पर नहीं होगा जिस अपराध के किए जाने पर इसका विस्तार नहीं है ।
क सद्भावपूर्वक, अपने शिशु के फायदे के लिए अपने शिशु की सम्मति के बिना, यह सम्भाव्य जानते हुए कि शल्यक्रिया से उस शिशु की मृत्यु कारित होगी, न कि इस आशय से कि उस शिशु को मृत्यु कारित कर दे, शल्यचिकित्सक द्वारा पथरी निकलवाने के लिए अपने शिशु की शल्यक्रिया करवाता है। क का उद्देश्य शिशु को रोगमुक्त कराना था, इसलिए वह इस अपवाद के अन्तर्गत आता है।
कोई सम्मति ऐसी सम्मति नहीं है, जैसी इस संहिता की किसी धारा से आशयित है,-
(क) यदि वह सम्मति किसी व्यक्ति ने क्षति के भय के अधीन, या तथ्य के किसी भ्रम के अधीन दी है, और यदि कार्य करने वाला व्यक्ति यह जानता है, या उसके पास विश्वास करने का कारण है, कि ऐसे भय या भ्रम के परिणामस्वरूप वह सम्मति दी गई थी; या
(ख) यदि वह सम्मति ऐसे व्यक्ति ने दी है, जो चित्त-विकृति, या मत्तता के कारण, उस बात की, जिसके लिए वह अपनी सम्मति देता है, प्रकृति और परिणाम को समझने में असमर्थ हो ; या
(ग) जब तक कि संदर्भ से प्रतिकूल प्रतीत न हो, यदि वह सम्मति ऐसे व्यक्ति ने दी है, जो बारह वर्ष से कम आयु का है।
धारा 25, धारा 26 और धारा 27 के अपवादों का विस्तार उन कार्यों पर नहीं है, जो किसी अपहानि के बिना भी स्वतः अपराध हैं जो उस व्यक्ति को, जो सम्मति देता है या जिसकी ओर से सम्मति दी जाती है, उन कार्यों से कारित हो, या कारित किए जाने का आशय हो, या कारित होने की सम्भाव्यता ज्ञात हो।
गर्भपात कराना (जब तक कि वह उस महिला का जीवन बचाने के प्रयोजन से सद्भावपूर्वक कारित न किया गया हो) किसी अपहानि के बिना भी, जो उससे उस महिला को कारित हो या कारित करने का आशय हो, स्वतः अपराध है। इसलिए वह "ऐसी अपहानि के कारण" अपराध नहीं है; और ऐसा गर्भपात कराने की उस महिला की या उसके संरक्षक की सम्मति उस कार्य को न्यायानुमत नहीं बनाती।
कोई बात, जो किसी व्यक्ति के फायदे के लिए सद्भावपूर्वक, यद्यपि उसकी सम्मति के बिना की गई है, ऐसी किसी अपहानि के कारण अपराध नहीं है, जो उस बात से उस व्यक्ति को कारित हो जाए, यदि परिस्थितियां ऐसी हैं कि उस व्यक्ति के लिए यह असम्भव हो कि वह अपनी सम्मति प्रकट करे या वह व्यक्ति सम्मति देने के लिए असमर्थ हो और उसका कोई संरक्षक या उसका विधिपूर्ण भारसाधक कोई दूसरा व्यक्ति न हो जिससे ऐसे समय पर सम्मति अभिप्राप्त करना सम्भव हो कि वह बात फायदे के साथ की जा सके :
परन्तु, इस अपवाद का विस्तार-
(क) साशय मृत्यु कारित करने या मृत्यु कारित करने का प्रयत्न करने पर नहीं होगा;
(ख) मृत्यु या घोर उपहति के निवारण के या किसी घोर रोग या अंगशैथिल्य से मुक्त करने के प्रयोजन से भिन्न किसी प्रयोजन के लिए किसी ऐसी बात के करने पर नहीं होगा, जिसे करने वाला व्यक्ति जानता है कि उससे मृत्यु कारित होना संभाव्य है;
(ग) मृत्यु या उपहति के निवारण के प्रयोजन से भिन्न किसी प्रयोजन के लिए स्वेच्छया उपहति कारित करने या उपहति कारित करने का प्रयत्न करने पर नहीं होगा;
(घ) किसी ऐसे अपराध के दुष्प्रेरण पर नहीं होगा जिस अपराध के किए जाने पर इसका विस्तार नहीं है।
1. य अपने घोड़े से गिर गया और मूर्छित हो गया। क, एक शल्यचिकित्सक का यह विचार है कि य के कपाल पर शल्यक्रिया आवश्यक है। क, य की मृत्यु कारित करने का आशय न रखते हुए, किन्तु सद्भावपूर्वक य के फायदे के लिए, य के स्वयं किसी निर्णय पर पहुँचने की शक्ति प्राप्त करने से पूर्व ही कपाल पर शल्यक्रिया करता है। क ने कोई अपराध नहीं किया।
2. य को एक बाघ उठा ले जाता है। यह जानते हुए कि संभाव्य है कि गोली लगने से य मर जाए, किंतु य का वध करने का आशय न रखते हुए और सद्भावपूर्वक य के फायदे के आशय से क उस बाघ पर गोली चलाता हैI क की गोली से य को मृत्युकारक घाव हो जाता है। क ने कोई अपराध नहीं किया ।
3. क एक शल्यचिकित्सक, यह देखता है कि एक शिशु को ऐसी दुर्घटना हो गई है जिसका घातक साबित होना सम्भाव्य है, यदि शल्यक्रिया तुरन्त न कर दी जाए। इतना समय नहीं है कि उस शिशु के संरक्षक से आवेदन किया जा सके। क, सद्भावपूर्वक शिशु के फायदे का आशय रखते हुए शिशु के अनुनय-विनय करने के बावजूद भी शल्यक्रिया करता है। क ने कोई अपराध नहीं किया।
4. एक शिशु य के साथ क एक जलते हुए घर में है। घर के नीचे लोग एक कम्बल तान लेते हैं। क उस शिशु को यह जानते हुए कि सम्भाव्य है कि गिरने से वह शिशु मर जाए, किन्तु उन शिशु को मार डालने का आशय न रखते हुए और सद्भावपूर्वक उस शिशु के फायदे के आशय से छत पर से नीचे गिरा देता है। यहाँ यदि गिरने से वह शिशु मर भी जाता है, तो भी क ने कोई अपराध नहीं किया।
धारा 26, धारा 27 और इस धारा के अर्थ के अन्तर्गत केवल धन सम्बन्धी फायदा वह फायदा नहीं है।
सद्भावपूर्वक दी गई संसूचना किसी अपहानि के कारण अपराध नहीं है, जो उस व्यक्ति को हुई है, जिसे वह दी गई है, यदि वह उस व्यक्ति के फायदे के लिए दी गई है।
क, एक शल्यचिकित्सक, एक रोगी को सद्भावपूर्वक यह संसूचित करता है कि उसकी राय में वह जीवित नहीं रह सकता। इस आघात के परिणामस्वरूप उस रोगी की मृत्यु हो जाती है। क ने कोई अपराध नहीं किया है, यद्यपि वह जानता था कि उस संसूचना से उस रोगी की मृत्यु कारित होना सम्भाव्य है।
हत्या और मृत्यु से दण्डनीय राज्य के विरुद्ध अपराधों के सिवाय, कोई बात अपराध नहीं है, जो ऐसे व्यक्ति द्वारा की जाए, जो उसे करने के लिए ऐसी धमकियों से विवश किया गया हो, जिनसे उस बात को करते समय उसको युक्तियुक्त रूप से यह आशंका कारित हो गई हो कि अन्यथा परिणाम यह होगा कि उस व्यक्ति की तत्काल मृत्यु हो जाए :
परन्तु यह तब जबकि उस कार्य को करने वाले व्यक्ति ने अपनी ही इच्छा से या तत्काल मृत्यु से कम अपनी अपहानि की युक्तियुक्त आशंका से अपने को उस स्थिति में न डाला हो, जिसमें कि वह ऐसी मजबूरी में पड़ गया है।
कोई व्यक्ति, जो स्वयं अपनी इच्छा से, या पीटे जाने की धमकी के कारण, डाकुओं को टोली में उनके शोल को जानते हुए सम्मिलित हो जाता है, इस आधार पर हो इस अपवाद का फायदा उठाने का हकदार नहीं है कि वह अपने साथियों द्वारा ऐसी बात करने के लिए विवश किया गया था, जो विधि द्वारा अपराध है।
कोई व्यक्ति, जिसे डाकुओं को एक टोली द्वारा पकड़ा गया और तत्काल मृत्यु की धमकी द्वारा किसी बात को करने के लिए विवश किया गया, जो विधि द्वारा अपराध है, उदाहरण के लिए एक लोहार, जो अपने औजार लेकर किसी घर का द्वार तोड़ने को विवश किया जाता है. जिससे डाकू उसमें प्रवेश कर सकें और उसे लूट सकें, इस अपवाद का फायदा उठाने का हकदार है।
कोई बात इस कारण से अपराध नहीं है कि उससे कोई अपहानि कारित होती है या कारित की जानी आशयित है या कारित होने की संभाव्यता ज्ञात है, यदि वह अपहानि इतनी तुच्छ है कि मामूली समझ और स्वभाव वाला कोई व्यक्ति उसकी शिकायत नहीं करेगा ।
कोई बात अपराध नहीं है, जो प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के प्रयोग में की जाता है।
धारा 37 में अन्तर्विष्ट निर्बन्धनों के अधीन रहते हुए, प्रत्येक व्यक्ति को अधिकार है कि वह-
(क) मानव शरीर पर प्रभाव डालने वाले किसी अपराध के विरुद्ध अपने शरीर और किसी अन्य व्यक्ति के शरीर को प्रतिरक्षा करे;
(ख) किसी ऐसे कार्य के विरुद्ध, जो चोरी, लूट, रिष्टि या आपराधिक अतिचार की परिभाषा में आने वाला अपराध है, या जो चोरी, लूट, रिष्टि या आपराधिक अतिचार करने का प्रयत्न है. अपनी या किसी अन्य व्यक्ति को सम्पत्ति, चाड़े चल हो या अचल, उसको प्रतिरक्षा करे।
जब कोई कार्य, जो अन्यथा कोई अपराध होता, उस कार्य को करने वाले व्यक्ति के बालकपन, समझ की परिपक्वता के अभाव, चित्त- विकृति या मत्तता के कारण, या उस व्यक्ति के किसी भ्रम के कारण, अपराध नहीं है, तब प्रत्येक व्यक्ति उस कार्य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का वही अधिकार रखता है, जो वह उस कार्य के वैसा अपराध होने की दशा में रखता ।
(क) य, एक विकृतचित्त व्यक्ति, क को जान से मारने का प्रयत्न करता है। य किसी अपराध का दोषी नहीं है। किन्तु क को प्राइवेट प्रतिरक्षा का वही अधिकार है, जो वह य के स्वस्थचित्त होने की दशा में रखता।
(ख) क रात्रि में एक ऐसे घर में प्रवेश करता है, जिसमें प्रवेश करने के लिए वह वैध रूप से हकदार है। य, सद्भावपूर्वक क को गृहभेदक समझकर, क पर आक्रमण करता है। यहाँ य इस भ्रम के अधीन क पर आक्रमण करके कोई अपराध नहीं करता है। किन्तु क, य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का वही अधिकार रखता है जो वह तब रखता, जब य उस भ्रम के अधीन कार्य न करता।
1. प्राइवेट प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं है,-
(क) यदि कोई कार्य, जिससे मृत्यु या घोर उपहति की आशंका युक्तियुक्त रूप से कारित नहीं होती, सद्भावपूर्वक अपने पदाभास में कार्य करते हुए किसी लोक सेवक द्वारा किया जाता है या किए जाने का प्रयत्न किया जाता है, चाहे वह कार्य विधि द्वारा सर्वथा न्यायानुमत न भी हो;
(ख) यदि कोई कार्य, जिससे मृत्यु या घोर उपहति की आशंका युक्तियुक्त रूप से कारित नहीं होती, सद्भावपूर्वक अपने पदाभास में कार्य करते हुए किसी लोक सेवक के निदेश से किया जाता है, या किए जाने का प्रयत्न किया जाता है, चाहे वह निदेश विधि द्वारा सर्वथा न्यायानुमत न भी हो;
(ग) उन मामलों में, जिनमें संरक्षण के लिए लोक प्राधिकारियों की सहायता प्राप्त करने के लिए समय है।
2. किसी भी मामले में, प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार उतनी अपहानि से अधिक अपहानि करने पर नहीं है, जितनी प्रतिरक्षा के प्रयोजन से करना आवश्यक है।
कोई व्यक्ति किसी लोक सेवक द्वारा ऐसे लोक सेवक के नाते किए गए, या किए जाने के लिए प्रयत्न किए गए किसी कार्य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार से तब तक वंचित नहीं होता, जब तक कि वह यह न जानता हो, या विश्वास करने का कारण न रखता हो कि उस कार्य को करने वाला व्यक्ति ऐसा लोक सेवक है।
कोई व्यक्ति किसी लोक सेवक के निदेश से किए गए, या किए जाने के लिए प्रयत्न किए गए किसी कार्य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार से तब तक वंचित नहीं होता, जब तक कि वह यह न जानता हो, या विश्वास करने का कारण न रखता हो कि उस कार्य को करने वाला व्यक्ति ऐसे निदेश से कार्य कर रहा है, या जब तक कि वह व्यक्ति उस प्राधिकार का कथन न कर दे, जिसके अधीन वह कार्य कर रहा है, या यदि उसके पास लिखित प्राधिकार है, जो जब तक कि वह ऐसे प्राधिकार को मांगे जाने पर प्रस्तुत न कर दे।
शरीर की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार, धारा 37 में विनिर्दिष्ट निर्बन्धनों के अधीन रहते हुए, हमलावर की स्वेच्छया मृत्यु कारित करने या कोई अन्य अपहानि कारित करने तक है, यदि वह अपराध, जिसके कारण ऐसे अधिकार के प्रयोग का अवसर आता है, इसमें इसके पश्चात् प्रगणित भांतियों में से किसी भी भांति का है, अर्थात्:-
(क) ऐसा हमला, जिससे युक्तियुक्त रूप से यह आशंका कारित हो कि अन्यथा ऐसे हमले का परिणाम मृत्यु होगा;
(ख) ऐसा हमला जिससे युक्तियुक्त रूप से यह आशंका कारित हो कि अन्यथा ऐसे हमले का परिणाम घोर उपहति होगा;
(ग) बलात्संग करने के आशय से किया गया कोई हमला;
(घ) प्रकृति-विरुद्ध काम तृष्णा की तृप्ति के आशय से किया गया कोई हमला;
(ङ) व्यपहरण या अपहरण करने के आशय से किया गया कोई हमला;
(च) इस आशय से किया गया कोई हमला कि किसी व्यक्ति का ऐसी परिस्थितियों में सदोष परिरोध किया जाए, जिनसे उसे युक्तियुक्त रूप से यह आशंका कारित हो कि वह अपने को छुड़वाने के लिए लोक प्राधिकारियों की सहायता प्राप्त नहीं कर सकेगा;
(छ) अम्ल फेंकने या देने का कृत्य, या अम्ल फेंकने या देने का प्रयत्न करना जिससे युक्तियुक्त रूप से यह आशंका कारित हो कि ऐसे कृत्य के परिणामस्वरूप अन्यथा घोर उपहति कारित होगी।
यदि अपराध धारा 38 में विनिर्दिष्ट विवरणों में से किसी प्रकार का नहीं है, तो शरीर की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार हमलावर की मृत्यु स्वेच्छया कारित करने तक का नहीं होता, किन्तु इस अधिकार का विस्तार धारा 37 में विनिर्दिष्ट निर्बन्धनों के अधीन रहते हुए, हमलांवर की मृत्यु से भिन्न कोई अपहानि स्वेच्छया कारित करने तक का होता है।
शरीर की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार उसी क्षण प्रारम्भ हो जाता है, जब अपराध करने के प्रयत्न या धमकी से शरोर के संकट की युक्तियुक्त आशंका पैदा होती है, चाहे वह अपराध किया न गया हो, और वह तब तक बना रहता है जब तक शरीर के संकट की ऐसी आशंका बनी रहती है।
सम्पत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार, धारा 37 में विनिर्दिष्ट निर्बन्धनों के अधीन रहते हुए दोषकर्ता की मृत्यु या अन्य अपहानि स्वेच्छया कारित करने तक का है, यदि वह अपराध जिसके किए जाने के, या किए जाने के प्रयत्न के कारण उस अधिकार के प्रयोग का अवसर आता है, इसमें इसके पश्चात् प्रगणित भांतियों में से किसी भी भांति का है, अर्थात् ः-
(क) लूट;
(ख) सूर्यास्त के पश्चात् और सूर्योदय के पूर्व गृहभेदन;
(ग) अग्नि या किसी विस्फोटक पदार्थ द्वारा रिष्टि, जो किसी ऐसे भवन, तम्बू या जलयान को की गई है, जो मानव आवास के रूप में या सम्पत्ति की अभिरक्षा के स्थान के रूप में उपयोग में लाया जाता है,
(घ) चोरी, रिष्टि या गृह-अतिचार, जो ऐसी परिस्थितियों में किया गया है, जिनसे युक्तियुक्त रूप से यह आशंका कारित है कि यदि प्राइवेट प्रतिरक्षा के ऐसे अधिकार का प्रयोग न किया गया तो परिणाम मृत्यु या घोर उपहति होगा।
यदि वह अपराध, जिसके किए जाने या किए जाने के प्रयत्न से प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के प्रयोग का अवसर आता है, ऐसी चोरी, रिष्टि या आपराधिक अतिचार है, जो धारा 41 में विनिर्दिष्ट विवरणों में से किसी प्रकार का नहीं है, तो उस अधिकार का विस्तार स्वेच्छया मृत्यु कारित करने तक का नहीं होता, किन्तु उसका विस्तार धारा 37 में विनिर्दिष्ट निर्बन्धनों के अधीन रहते हुए, दोषकर्ता की मृत्यु से भिन्न कोई अपहानि स्वेच्छया कारित करने तक का होता है।
सम्पति की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार, -
(क) तब प्रारम्भ होता है, जब सम्पत्ति के संकट की युक्तियुक्त आशंका प्रारम्भ होती है;
(ख) चोरी के विरुद्ध अपराधी के सम्पत्ति सहित पहुंच से बाहर हो जाने तक अथवा, या तो लोक प्राधिकारियों की सहायता अभिप्राप्त कर लेने तक या सम्पत्ति बरामद हो जाने तक बना रहता है;
(ग) लूट के विरुद्ध तब तक बना रहता है, जब तक अपराधी किसी व्यक्ति की मृत्यु या उपहति, या सदोष अवरोध कारित करता रहता है या कारित करने का प्रयत्न करता रहता है, अथवा जब तक तत्काल मृत्यु का, या तत्काल उपहति का, या तत्काल वैयक्तिक अवरोध का, भय बना रहता है;
(घ) आपराधिक अतिचार या रिष्टि के विरुद्ध तब तक बना रहता है, जब तक अपराधी आपराधिक अतिचार या रिष्टि करता रहता है;
(ङ) सूर्यास्त के पश्चात् और सूर्योदय के पूर्व गृहभेदन के विरुद्ध तब तक बना रहता है, जब तक ऐसे गृहभेदन से आरम्भ हुआ गृह-अतिचार होता रहता है।
जिस हमले से मृत्यु की आशंका युक्तियुक्त रूप से कारित होती है, उसके विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग करने में यदि प्रतिरक्षक ऐसी स्थिति में है कि निर्दोष व्यक्ति की अपहानि की जोखिम के बिना वह उस अधिकार का प्रयोग कार्यसाधक रूप से नहीं कर सकता है, तो उसके प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार वह जोखिम उठाने तक का है।
क पर एक भीड़ द्वारा आक्रमण किया जाता है, जो उसकी हत्या करने का प्रयत्न करती है। वह उस भीड़ पर गोली चलाए बिना प्राइवेट प्रतिरक्षा के अपने अधिकार का प्रयोग कार्यसाधक रूप से नहीं कर सकता, और वह भीड़ में मिले हुए छोटे-छोटे शिशुओं की अपहानि करने की जोखिम उठाए बिना गोली नहीं चला सकता। यदि वह इस प्रकार गोली चलाने से उन शिशुओं में से किसी शिशु को अपहानि करे तो क कोई अपराध नहीं करता ।