पैरा 338 से 369 अध्याय 26 UP पुलिस रेगुलेशन

पैरा 338 से 369 अध्याय 26 UP पुलिस रेगुलेशन

अध्याय 27

विशेष विधियों और नियमों के अधीन कर्तव्य

338. पुलिस अधीक्षक और प्रत्येक धाने के कार्यालयों में, उन अधिनियमों या अधिनियमों के अंशों की जो पुलिस से सम्बन्ध रखते हैं और जिले या थाने के पूरे था किसी भाग पर उनका विस्तार हो, परन्तु जो प्रान्त भर में प्रवृत्त न हीं. एक सूची रखी जाना चाहिये।

उस स्थान को चतुर्सीमायें जिसमें किसी अधिनियम या उसके किसी अंश का विस्तार हो, सूची में वर्णित की जायेंगी, यदि उस अधिनियम या अधिनियम के अंश का सम्पूर्ण जिले या थाने में विस्तार न किया गया हो।

339. जब बल, नी या वायु सेना या भारतीय नाविक सेवा को छोड़कर भाग आया कोई यूरोपियन गिरफ्तार किया जाये, उसे शांति के न्यायाधीश के समक्ष ले जाना चाहिये, जिससे इन्डियन आर्मी एक्ट को धारा 167 (1) के द्वारा यथाअपेक्षित उसकी चतुर्थ अनुसूची द्वारा निर्धारित प्रारूप में वर्णनात्मक विवरण तैयार करने और हस्ताक्षर करने को कहा जाये। वर्णनात्मक विवरण को उस सैनिक जिले य स्टेशन के जिसमें न्यायालय स्थित हो, कमान्डिग अधिकारी के पास भेज दिया जावे। किसी भारतीय भगोड़े को प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट के समक्ष ले जाया जावे।

यदि उस सैनिक टुकड़ों, जिससे उसके भाग जाने का विश्वास किया जाता है, निवेप उसके पकड़े जाने के स्थान पर या उसके ठीक पड़ोस के स्थान पर हो, वह मजिस्ट्रेट के द्वारा सीधा उत्स सैनिक टुकड़ी को भेज दिया जावेगा। यदि सैनिक टुकड़ों का निवेष दूरस्थ हो, तो वह निकटतम स्टेशन के कमान्डिंग आफिसर को सौंप दिया जावेगा।

340. जब कोई सैनिक विधि के अध्याधीन व्यक्ति सेवा से भाग जावे, तो उस सैनिक टुकड़ों का. जिससे वह सम्बन्धित हो, कमान्डिंग आफिसर तत्काल स्थानीय और रेलवे पुलिस को सूचित करेगा। ऐसी सूचना के प्राप्त होने पर, अधीक्षक ऐसी कार्यवाही करेगा जो इष्टकर हो।

341. निम्नलिखित वर्गों के किसी व्यक्ति को, भगोड़ा हो या बिना अवकाश अनुपस्थित हो (किसी ऐसे व्यक्ति के अलावा स्वयं का आत्मसमर्पण कर दे) पकड़ने के लिये 5 रुपये का पारितोषिक अनुदत्त किया जावेगा-

(1) सुरक्षितों को सम्मिलित करते हुये लड़ने वाले।

(2) लड़ाकू न होने वाले (भर्ती किये गये) व्यक्तिः।

(3) भारतीय चिकित्सालय सैन्य दल के सिपाही (भारत में सेना के वेतन और भत्ते विनियमों का 1938 संस्करण का भाग दी, पैरा 233 देखें)

यदि किसी तृतीय पक्ष द्वारा की गई सूचना के परिणामस्वरूप कोई भगोड़ा पकड़ा जावे मंजूर किये गये पारितोषिक का अधांश उस व्यक्ति को दिया जावेगा, जिसने सूचना दी हो।

342. जब कोई भगोड़ा पुलिस के द्वारा पकड़ लिया जावे, पुलिस अधीक्षक को चाहिये के वह उसके कमान्डिंग आफिसर को उसका पकड़ा जाना अधिसूचित को और उसी के साथ ही कमान्डिंग आफिसर की उसका पकड़ा जाना अधिसूचित करे और उसी के साथ ही कमान्डिंग आफिसर को उसका पकड़ा जाना अधिसूचित करे और उसी के साथ ही कमान्डिग आफिसर को उस व्यक्ति के पूरे नाम और पते की सूचना दें, जिसको पारितोषिक भुगतान योग्य है। ज्यों हो भगोड़ा अपनी यूनिट तक पहुँच जाते, कमान्डिंग आफिसर तत्काल मनीआर्डर द्वारा पारितोषिक की राशि उसके अधिकारी व्यक्ति को भेज देगा, जिसके मनीआर्डर की अभिस्वीकृति सपरीक्षा अधिकारियों द्वारा पारितोषिक के रूप में भुगतान की गई धनराशि और मनीआर्डर फीस के लिये पर्याप्त प्रमाणक मानी जावेगी।

पुलिस अधिकारी यी सिपाही को, जिसके लिये पारितोषिक देय हो, पुलिस अधीक्षक के कार्यालय की, जब उसे पारितोषिक का मनीआर्डर प्राप्त हो जावे, सूचित कर देना चाहिये ताकि भुगतान में होने वाला विलम्ब सम्बन्धित यूनिट के कमान्डिंग आफिसर को निर्देशित किया जा सके।

यूनिटों के कमान्डिंग आफिसर यह सुनिश्चित करेंगे कि सेना के भगोड़ों के पकड़े जाने के कारण दिये जाने वाले पारितोषिक के रूप में भुगताई जाने वालो धनराशि के भेजने में कोई विलम्ब न हो और ज्योंही भगोड़ा यूनिट पुनः सम्मिलित हो जाये, पारितोषिक की राशि भेज दी जाये। यूनिटों के कमान्डिंग आफिसर अग्रिम धनराशि का प्रवर्तन करते हुये ऐसी धनराशि की अपने अग्रिम में से देंगे। उन मामलों, में जहाँ तत्काल धन उपलब्ध न होने के कारण तत्काल आवश्यक धन न भेजा जा सके,

339. जब बल, नी या वायु सेना या भारतीय नाविक सेवा को छोड़कर भाग आया कोई यूरोपियन गिरफ्तार किया जाये, उसे शांति के न्यायाधीश के समक्ष ले जाना चाहिये, जिससे इन्डियन आर्मी एक्ट को धारा 167 (1) के द्वारा यथाअपेक्षित उसकी चतुर्थ अनुसूची द्वारा निर्धारित प्रारूप में वर्णनात्मक बिवरण तैयार करने और हस्ताक्षर करने को कहा जाये। वर्णनात्मक विवरण को उस सैनिक जिले य स्टेशन के जिसमें न्यायालय स्थित हो, कमान्डिग अधिकारी के पास भेज दिया जावे। किसी भारतीय भगोड़े को प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट के समक्ष ले जाया जावे।

यदि उस सैनिक टुकड़ों, जिससे उसके भाग जाने का विश्वास किया जाता है, निवेप उसके पकड़े जाने के स्थान पर या उसके ठीक पड़ोस के स्थान पर हो, वह मजिस्ट्रेट के द्वारा सीधा उत्स सैनिक टुकड़ी को भेज दिया जावेगा। यदि सैनिक टुकड़ों का निवेष दूरस्थ हो, तो वह निकटतम स्टेशन के कम भगोड़ा अपनो यूनिट में पुनः सम्मिलित हो जाये, यूनिट के कमान्डिंग आफिसर पुलिस प्राधिकारी को प्राधिकृत कर सकते हैं कि वे राशि को भुगतान पुलिस निधि से 13 दिसम्बर सन् 1944 के पुलिस गजट, पृष्ठ 253 और 254 पर अधिसूचना क्रमांक छः/56-43, दिनांक 8 दिसम्बर, 1944 के अधीन प्रकाशित भारतीय आर्मी आर्डर्स क्रमांक 2095/44 के अधीन कर दें। इस प्रकार पुलिस निधि से भुगतान की गई धनराशि बाद में सम्बन्धित सैनिक लेखाओं के नियन्त्रक के नामें डाल दी जाये।

343. जब भगोड़ा पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया जावे और सैनिक अधिकारियों को सौंप दिया जावे, इन्डियन आर्मी एक्ट, 1911 की धारा 91--6 के अधीन प्रमाण-पत्र का प्रारूप पुलिस को पूर्ण करने भेजा जाता है, इस थाने के भारसाधक अधिकारी से न्यून पंक्ति से कम न होने वाले अधिकारी द्वारा पूर्ण और हस्ताक्षरित किया जाना चाहिये। यदि उससे निम्नतर पंक्ति के अधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित किया जावे तो भगोड़े का विचार करने वाले सैनिक न्यायालय के समक्ष वह साक्ष्य के लिये पूर्णतया अवैध होगा।

344. किसी भारतीय राज्य का बल या बल की किसी इकाई से भगोड़ों का दरबार के समक्ष समार्पित नहीं किया जाना चाहिये, जब तक कि राज्य के ऐसे बलों या बलों की संबंधित इकाई से भाग जीना इन्डियन एक्सट्रेडीशन एक्ट (1903 का पन्द्रहवाँ) का प्रथम अनुसूची के अधीन प्रत्यार्पण अपराध के रूप में भारत के राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट न कर दिया गया हो। प्रत्यार्पणहीन भगोड़े, यदि पुलिस की सूची में अंकित हों, पदच्युत कर दिये जायें, जब तक कि उनकी बल में रखे जाने की मन्जूरी पुलिस के महानिरीक्षक द्वारा न ले ली जावे।

345. ब्रिटिश भारत के बाहर जाने के सम्बन्ध में नियत गवर्नमेन्ट आर्डर की पुस्तिका में अन्तर्विष्ट है।

346. इन्डियन फैक्ट्रीज एक्ट (1911 का बारहवाँ) के अधीन नियम गवर्नमेन्ट आर्डर्स की पुस्तिका में पाये जायेंगे। इन नियमों के अधीन दुर्घटना की, जिसका परिणाम मृत्यु हो सूचना फैक्ट्री प्राधिकारियों द्वारा तार, टेलीफोन या विशेष सन्देश वाहक द्वारा उस क्षेत्र के थाने के भारसाधक अधिकारी को जिसके भीतर फैक्ट्री हो, उस स्थान में मृत्यु घटित होने से या अन्यन्त्र घटित होने का जान होने से, एक घन्टे के भीतर भेज दी जावेगी। यदि सूचना तार या टेलीफोन द्वारा भेज दी जावे, उसे विहित प्रारूप में लिखितं रिपोर्ट द्वारा संपुष्ट की जाना चाहिये। ऐसी सूचना प्राप्त होने पर थानेदार को इन विनियमों को अध्याय बारह में यथा निर्धारित रीति से कार्य करना चाहिये। उन दुर्घटनाओं की सूचना जिनका परिणाम मृत्यु न हो पुलिस को भेजने की आवश्यकता नहीं है।

यदि ऐसी कोई सूचना प्राप्त हो जावे, पुलिस द्वारा मजिस्ट्रेट की आज्ञा के बिना कोई कार्यवाही नहीं की जाना चाहिये, जब तक कि यह संदेह करने का कारण न हो कि कोई संज्ञेय अपराध घटित हुआ है। ऐसे मामलों में, अधीक्षक के माध्यम से रिपोर्ट को मजिस्ट्रेट के पास अग्रेषित कर देना चाहिये।

347. फेरिज अधिनियम (1878 का सत्रहवाँ) के अधीन नियम बनाने के लिये संभाग का आयुक्त सशक्त है। पुलिस अधीक्षक को नियमों का अध्ययन करना चाहिये और पुलिस द्वारा ध्यान देने के लिये अपेक्षित उपबन्धों को थाने के भारसाधक अधिकारियों के ध्यान में लाना चाहिये। मेले के अवसरों पर उस अवधि के भीतर जिसमें भारी भीड़ होने की आशा होती है, नावों की अत्यधिक भीड़ को रोकने के लिये फेरियों में सदैव ही पर्याप्त पुलिस तैनात रखी जानी चाहिए।

348. फेरिज एक्ट (1878 के सत्रहवें) के अधीन बनाये गये नियम गवर्नमेन्ट आर्डर्स पुस्तिका में अनाविष्ट है।

349. पुलिस अधीक्षक को थानों के भारसाधक अधिकारियों के, उनका ध्यान अपेक्षित करने वाले किन्हीं स्थानीय व नियमों को ध्यान में लाना चाहिये।

350. सार्वजनिक जुआ अधिनियम (1897 के चौथे) के अधीन सरकार ने निरीक्षकों और उप निरीक्षक से न्यून पति के न होने वाले थाने के भारसाधक अधिकारियों को उस धारा के अधीन जारी किये गये वारन्टों को निष्पादित करने के लिये प्राधिकृत कर दिया है।

351. सार्वजनिक रूप से आखेट खेलने की अनुज्ञा कभी भी अनुदत्त नहीं की जाना चाहिए। (गवर्नमेन्ट आर्डर्स की पुस्तिका देखें)

लाट्री चलाने के लिये कोई प्रोत्साहन नहीं दिया जाना चाहिये और लाट्री चलाने के लिये दिये गये सभी आवेदनों को अस्वीकार किये जाना चाहिये (गवर्नमेन्ट आर्डर्स पुस्तिका देखें)

352. ग्लेन्डर्स और फारसी एक्ट (1899 का तेरहा) सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश पर लागू किया गया है। इस अधिनियम की धारा 4 के अधीन पुलिस अधीक्षक को अपने जिले के भीतर उस अधिनियम द्वारा निरीक्षकों को प्रदत्त शक्तियों और आरोपित कर्त्तव्यों को आरोपित करने के लिये प्राधिकृत किया गया है। (गवर्नमेन्ट आर्डर्स पुस्तिका देखें)

353. उत्तर प्रदेश नगरपालिका अधिनियम, 1916 की धारा 317 के अधीन पुलिस से यह अपेक्षा की जाती है कि यह नगरपालिका बोर्ड अधिनियम के या उक्त अधिनियम की धारा 114 को उपधारा (1) के पद () में वर्णित अधिनियमों या उक्त अधिनियम के अधीन रचित किन्हीं नियमों के विरुद्ध किये गये अपराधों की सूचना दें, और उनके द्वारा विधिपूर्ण प्राधिकार प्रयोग करते हुये, परिषद के सभी सदस्यों, अधिकारियों और सेवकों को सहायता पहुँचाने के लिये आबद्ध हैं। पुलिस अधीक्षक को यह देखना चाहिये कि नगरपालिका सीमाओं के भीतर के सभी थानों को उन सभी अधिनियमों और नियमों को, जिनके निर्देश के इस बारा के अधीन पुलिस के कर्तव्य होते हैं, प्रतियाँ प्रदाय करें।

वह सूचना, जो पुलिस के द्वारा धारा 317 के अधीन दिये जाने के लिये अपेक्षित हैं. नगरपालिकाओं को इस बात के समर्थ बनाने के लिए है कि वह धारा 114 के अधीन जुर्माने वसूल कर सकें और यह तथ्य कि पुलिस द्वारा यह सूचना दिया जाना अपेक्षित है, यह विवक्षा नहीं करती कि वह कार्य जो इस प्रश्नाधीन अधिनियम पर निर्भर रहें बिना विधिपूर्ण रीति से कर सकते हैं नगरपालिका प्राधिकारियों के माध्यम से किये जाना चाहिये।

354. सरांय में आश्रय लेने वाले व्यक्तियों का सरांय अधिनियम (1867 के बाईसवें) की धारा 5 द्वारा विहित रजिस्टर तैयार किये जाने को तभी आवश्यकता है, जब जिला मजिस्ट्रेट निर्देशित करे। यदि ऐसे रजिस्टर को बनाये रखे जाने की आज्ञा दी जावे, अधीक्षक द्वारा सरांय को व्यवस्था करने वाले को प्रारूप (क्रमांक 265) के खाली फार्मो की पुस्तक दी जानी चाहिए।

355. स्टेट केरिजेज़ के, सम्बन्ध में नियम गवर्नमेन्ट आर्डर्स पुस्तिका में अन्तर्विष्ट हैं।

356. ट्रेजर ट्रोव से सम्बन्धित नियम गवर्नमेन्ट आर्डर्स पुस्तिका में अन्तर्विष्ट है।

357. गवर्नमेन्ट आर्डर्स पुस्तिका में अन्तर्विष्ट नियमों के अनुसार, पुलिस अधीक्षक से यह अपेक्षा की जाती है कि वह जिला मजिस्ट्रेट को ऐसे गम्भीर प्रकृति के मामले की सूचना दे, जिसमें सैनिकों को सम्बन्ध होने का, विश्वास किया जाता है। ऐसे मामले की इस विनियमों के पैरा 201 और आफिस मैनुअल के पैरा 67 के अभीन विशेष रूप से रिपोर्ट की जाना चाहिए। उन मामलों के अभियोजन, विचारण और अन्वेषण, विनियमों का पैरा 125 और गवर्नमेन्ट्स आर्डर्स मैनुअल देखिये। गवर्नमेंट आर्डर्स पुस्तिका द्वारा विहित की गई प्रक्रिया का यथासम्भव उस सभी मामलों में अनुमरण किया जार्च जिनमें यूरोपीय और भारतीयों के बीच विवाद उत्पन्न होता है और जिनमें भारतीयों को यूरोपियन द्वारा गोली मार दी जाती है या आहत कर दिया जाता है।

358. मेलों में कर्त्तव्यों को विहित करने वाले नियम गवर्नमेंट आर्डर्स पुस्तिका में अन्तर्विष्ट हैं।

359. पुलिस को पशुओं के कांजी हाउस के औपचारिक निरीक्षण का कोई प्राधिकार नहीं है. यद्यपि वह उनका विशुद्ध पुलिस प्रयोजन के लिये परिदर्शन कर सकते हैं।

360. पुलिस अधीक्षक के कार्यालय में जिले के भीतर सभी बड़े त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण केन्द्रों के अभिलेख रखे जायेंगे। ग्रामीण पुलिस के सिपाही केन्द्रों को जान-बूझकर पहुँचाई जाने वाली क्षति को रोकने के लिये आबद्ध हैं, उन्हें थाने के भारसाधक अधिकारी को किसी भी हानि की रिपोर्ट करना। चाहिए।

एक पुलिस अधिकारी को इन केन्द्रों की दशा का नियतकालिक रूप से परीक्षण करने के लिए परिदर्शन करना और किसी तात्कालिक मरम्मत की आवश्यकता की रिपोर्ट करना चाहिए (गवर्नमेन्ट आर्डर्स पुस्तिका देखें)

361. पुरातन निर्माण का संरक्षण करने और अनधिकृत खुदाई को रोकने के लिये ग्राम पुलिस के कर्त्तव्यों के लिए गवर्नमेन्ट आर्डर्स पुस्तिका देखिये। ग्रामीण पुलिस उत्तरदायी है कि वह भूमि के ऊपर पुरातत्व अवशेषों को बिगाड़ने से उनके स्थायित्व को संकटापन्न बनाने वाले किसी कार्य के प्रयास के किये जाने की रिपोर्ट करें और विध्वंश नगरों और भवनों के स्थल पर किसी अनधिकृत खुदाई के प्रयास की सूचना दें। जब कभी लागू हों, मूल्यवान पुरातत्व अवशेषों के साथ ट्रेजर्स ट्रोव्स एक्ट (1878 का छठां) के अधीन व्यवहार किया जाना चाहिये।

362. जिला या केन्द्रीय जेल से बंचकर भाग जाने वाले बन्दियों के बारे में की जाने वाली कार्यवाही के नियम उत्तर प्रदेश जेल पुस्तिका में अन्तर्विष्ट हैं। जब कभी कोई बन्दी जेल से बचकर भाग निकले, जेल अधीक्षक को तत्काल जिला मजिस्ट्रेट को सूचना देनी चाहिये और बन्दी को वर्णनात्मक नामावली को, बन्दी के निवास के स्थान और उसके पुनः पकड़े जाने के लिए पारितोषिक को सम्मिलित करते हुए सभी उपलब्ध सूचनाओं सहित, निम्नलिखित प्राधिकारियों को भेज दी जानी चाहिये :-

उस जिले का अधीक्षक जिसमें बचकर भाग निकलना घटित हुआ है, उस जिले का अधीक्षक जिसमें बन्दी का घर स्थित हो, उपरोक्त से लगे हुए जिलों के पुलिस अधीक्षक और रेलवे पुलिस उसे तत्काल बन्दी का वर्णनात्मक नामावली अपराध अन्वेषण विभाग के पुलिस उप-महानिरीक्षक, लखनऊ को क्रिमिनल इन्टेलीजेन्ट्स गजट में पारितोषिक की सूचना के साथ, प्रकाशनार्थ अग्रेषित कर देना चाहिये। यदि बन्दी दुबारा पकड़ लिया जाये तो उसके द्वारा इन प्राधिकारियों को पुनः सूचित किया जावेगा।

यह सबसे अधिक महत्वपूर्ण है कि पुलिस तत्काल बन्दी के 'घर की उसके द्वारा उसके परिवार को देखने के लिये जाते समय मुठभेड़ करने के लि निगरानी करे।

जेल पुस्तिका के अनुसार जेल मजिस्ट्रेट से इस बात की अपेक्षा की जाती है कि यह उसकी सूचना प्राप्त होते ही बचकर भाग जाने के हर मामलों की परिस्थितियों का अन्वेषण करे, परन्तु जैल के भीतर पुलिस के द्वारा जिला मजिस्ट्रेट की आज्ञा के सिवाय कोई अन्वेषण नहीं किया जा सकता। जिला मजिस्ट्रेट से यह अपेक्षा की जाती है कि वे मजिस्ट्रेट द्वारा इस पैरा के अधीन जाँच के कागजों को, जैसे आँच की प्रगति हो, पुलिस अधीक्षक को देखने दें। पुलिस अधीक्षक को इन कागजों को देखने की मांग करना चाहिए और किन्हीं विशेष विवरणों को सुनिश्चित करने की दृष्टि से जो पुलिस द्वारा पुनः गिरफ्तारी करने के लिए सहायक सिद्ध हो सकें, उनका परीक्षण करना या किसी राजपत्रित अधिकारी से करवाना चाहिए।

363. आबकारी अपराधों के सम्बन्ध में पुलिस के कर्त्तव्य उ०प्र० आबकारी अधिनियम (1910 के चौथे) और यथासंशोधित आबकारी अधिनियम की धारा 49, 50, 53 और 54 में अन्तर्विष्ट नियमों में निर्देशित किये गये हैं। (आबकारी अधीक्षक पुस्तिका का पृष्ठ 2 देखें)

364. अफीम और माफिया अपराधों के मामले में पुलिस की शक्तियाँ और कर्त्तव्य अफीम अधिनियम (1857 का तेरहवां) की धारा 23 और 24 और अफीम अधिनियम् (1878 का पहला) को धारा 14 से 22 तक में, जो आबकारी अफीम पुस्तिका और उस पुस्तिका के अध्याय तृतीय में पाये जावेंगे, निर्देशित किये गये हैं।

365. आबकारी निरीक्षक की नियुक्ति से पुलिस आबकारी अपराधों का पता लगाने और उनका अभियोजन करने के कर्तव्य से मुक्त नहीं हो जाती। आबकारी निरीक्षक और पुलिस अधिकारी दोनों ही इन निष्पादन के लिये उत्तरदायी हैं। पहले वालों से न केवल अपने द्वारा जांच करने और अपराधों का पता लगाने की, अपितु पुलिस द्वारा पता लगाये मामलों में पुलिस की सहायता और उसमें सहयोग करने की भी अपेक्षा की जाती है। पुलिस से यह अपेक्षा की जाती है कि वे आबकारी निरीक्षकों की महत्वपूर्ण और कठिन मामलों में और जब सहायता मांगी जावे तो तलाशी लेने में, सहायता करें।

366. नियम के तौर पर, अवैध रूप से शराब उत्तारने का अपराध किसी भी समय तक ग्राम के पटेलों, जमींदारों या चौकीदारों के कान में आये बिना नहीं किया जा सकता। शराब के अवैध निर्माण के सभी मामलों में, जिनमें वह चौकीदार जिसके फेरे के स्थान में अवैध शराब या उपकरण पाये गये हों, स्वयं ही सूचना देने वाला न हो, पुलिस अधीक्षक द्वारा चौकीदार के आचरण की जाँच की जानी चाहिये और यदि ऐसा विश्वास करने का कारण हो कि यह मौनानुकूलता का दोषी है. जिला मजिस्ट्रेट को उसकी पदच्युति की सिफारिश की जानी चाहिये। यदि वह असावधानी का दोषी पाया जावे, उसे कठोरता से दण्डित किया जावे।

367. उस ग्राम के मुखिया के बारे में, जो किसी आबकारी योग्य पदार्थ के अवैध निर्माण या मादक औषधि उत्पन्न करने वाले पौधों की, अवैध खेतों को, अवैध निर्माण या खेती के उसके ज्ञान में आते ही तत्काल सूचना देने में विफल रहे, तत्काल जिला मजिस्ट्रेट को आबकारी अधिनियम की धारा 68 के अधीन अधियोजित किये जाने की रिपोर्ट दी जानी चाहिये।

368. विशेष पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति पुलिस अधिनियम (1861 का पाँचवाँ) की धारा 17 से 19 के द्वारा विनियमित की जाती है। ऐसी नियुक्तियाँ, यथासम्भव आकस्मिक और गम्भीर आपातकाल के मामलों से निपटाने के लिये दबाव से नहीं, बल्कि ऐच्छिक भर्ती द्वारा की जानी चाहिए और उन्हें ज्यों ही आपातकालीन दशा समाप्त हो जावे, रद्द कर दो जाना चाहिये। विशेष पुलिस अधिकारियों की नियुक्तियों के लिये आवेदन करना तब उचित होगा, जब कोई विधि विरुद्ध जमाव, गम्भीर दंगे या परिशान्ति भंग हो चुकी हो या युक्तियुक्त या उसकी आशंका हो और (निरीक्षक से न्यून पंक्ति का न होने वाला) उपस्थित ज्येष्ठ अधिकारी का यह विचार हो कि व्यवस्था और शान्ति बनाये रखने के लिए साधारण रूप से सेवा में योजित पुलिस, उसको बनाये रखने या उस स्थानीय क्षेत्र के निवासियों के जीवन और सम्पत्ति के संरक्षण करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

नियुक्त किये जाने वाले व्यक्तियों का चुनाव करने में विशेष सतर्कता वर्ती जाना चाहिये। वरिष्ठ सामाजिक स्तर के प्रभावशाली व्यक्तियों को (जिनका वास्तव में व्यवस्था को बनाये रखने और पुनः स्थापित करने में सहायक होना सम्भाव्य हो) असंयत मिजाज या दुश्चरित्र के रूप में विख्यात व्यक्तियों से वरीयता में चुना जाये और नियुक्त किये गये व्यक्तियों को अपमानित करने के लिए चुनाव को प्रकट करने से रक्षा करने के लिये सतर्कता बर्ती जावे तथापि उत्तेजना के समय को कुछ अवसरों पर यह परामर्श योग्य हो सकता है कि परस्पर विरोधी गुटों के प्रमुख नेताओं की भर्ती की जावे ताकि उस निरोध के अधीन लाये जा सके जो उनकी विशेष पुलिस अधिकारी के रूप में नियुक्ति अन्तर्वलित करे। विशेष पुलिस अधिकारियों को बचाये ज सकने वाली कठिनाइयों या असुविधाओं को रोकने के प्रत्येक प्रयत्न करना चाहिये। विधि यह अपेक्षा करती है कि उन्हें शान्ति और व्यवस्था बनाए रखने, और क्षेत्र को विधि के पालन करने वाले नागरिकों के जीवन और सम्पत्ति का संरक्षण करने में अपने कर्त्तव्य का पालन करना चाहिये, परन्तु उनसे उससे अधिक कुछ करने की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए, जो उनके द्वारी दक्षतापूर्वक कत्र्तव्य पालन करने के लिये आवश्यक हो। इस प्रकार नियुक्त व्यक्तियों को इस रोति से सेवायोजित किया जावे कि वे सर्वोत्तम उपयुक्तता से अपने व्यक्तिगत प्रभाव का प्रयोग कर सकें और किसी भी परिस्थिति में उन्हें कोई मानसिक या युक्ति से असंगत कत्र्तव्य समानुदेशित न किया जावे। उन्हें, नियम के तौर पर कर्मचारी मण्डल पर तथा पर्यवेक्षण के कर्तव्यों पर सेवायोजित किया जावे और उसी प्रकार भता किये गये निम्नतर स्तर के व्यक्तियों की अपेक्षा उन्हें उच्चतर पंक्ति दी जायें।

अनुशासन के सम्बन्ध में अपेक्षाएँ साधारणतया होना चाहिए। कार्यालय की ऐसी शर्ते जो स्थानीय निवासियों द्वारा घृणास्पद या अनावश्यक रूप से त्रासदायक समझी जायें, बल न दिया जावे। विशेष पुलिस अधिकारियों से साधारणतया परेड में भाग लेने या छोटे अधिकारियों के अभिवादन करने की अपेक्षा नहीं की जाना चाहिए और उनकी उपस्थिति को, जय जह थाने में आवश्यक हो, इस प्रकार तिनियमित किया जावे कि कठिनाई होना बच जावे। वर्दी के बारें में जो कुछ अपेक्षित है वह यह है कि विशेष पुलिस अधिकारी कोई विशिष्ट पहचान का बैच उदाहरणार्थ बाँह पर रंगीन पट्टी धारण कर लें, और उन्हें प्राधिकार के प्रतीक स्वरूप तथा आवश्यकता की दशा में संरक्षण के लिये कोई सोंटा या भाला उपलब्ध कराया जावे।

369. कुछ जिलों में यातायात पुलिस नियुक्त की गई है।

कुछ क्षेत्रों में पुलिस के चलते-फिरते दस्ते मोटर हीकिल्स एक्ट के अधीन अपराधियों से व्यवहार करने के लिये निर्मित किये गये हैं। प्रत्येक चलता-फिरता दरखा एक निरीक्षक के प्रभार में रेन्ज़ के पुलिस उप-महानिरीक्षक के सीधे नियन्त्रण के अधीन रहता है,

कुछ पुलिस अधिकारी मीटर डीकिल एक्ट 1939 के अधीन पदेन रूप से परिवहन प्राधिकारों नियुक किये जाते हैं।

पुलिस मोटर होफिल एक्ट के अधीन पुलिस कर्तव्य के विस्तृत विवरण के लिये पृथक् पैम्फलेट देखिए।

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