धारा 37 से 67 अध्याय 4 भारतीय संविदा अधिनियम, 1872

धारा 37 से 67 अध्याय 4 भारतीय संविदा अधिनियम, 1872

अध्याय 4

संविदाओं के पालन के विषय में

संविदायें जिनका पालन करना होगा

37. संविदाओं के पक्षकारों की बाध्यता-

संविदा के पक्षकारों को या तो अपने-अपने वचनों का पालन करना होगा या करने की प्रस्थापना करनी होगी जब तक कि ऐसे पालन से इस अधिनियम के या किसी अन्य विधि के उपबन्धों के अधीन अभिमुक्ति या माफी न दे दी गई हो।

वचन, उनके पालन के पूर्व वचनदाताओं की मृत्यु हो जाने की दशा में, ऐसे वचनदाताओं के प्रतिनिधियों को आबद्ध करते हैं, जब तक कि तत्प्रतिकूल कारण संविदा से प्रतीत न हो।

दृष्टान्त

(क) क, 1,000 रुपये का संदाय किये जाने पर ख को अमुक दिन माल परिदत्त करने का वचन देता है। क उस दिन से पहले ही मर जाता है। क के प्रतिनिधि ख को माल परिदत्त करने के लिये आबद्ध हैं और क के प्रतिनिधियों को ख 1,000 रुपये देने के लिये आबद्ध है।

(ख) क, अमुक कीमत पर अमुक दिन तक ख के लिये एक रंगचित्र बनाने का वचन देता है। क उस दिन से पहले ही मर जाता है। यह संविदा के के प्रतिनिधियों द्वारा या ख द्वारा प्रवर्तित नहीं कराई जा सकती।

38. पालन की प्रस्थापना प्रतिगृहीत करने से इन्कार का प्रभाव-

जब कि किसी वचनदाता ने वचनगृहीता से पालन की प्रस्थापना की हो और वह प्रस्थापना प्रतिगृहीत नहीं की गई हो तो वचनदाता अपालन के लिये उत्तरदायी नहीं है और न तद्द्द्वारा वह संविदा के अधीन के अपने अधिकारों को खो देता है।

ऐसी हर प्रस्थापना को निम्नलिखित शर्तें पूरी करनी होंगी-

(1) वह अशर्त ही होगी;

(2) उसे उचित समय और स्थान पर और ऐसी परिस्थितियों के अधीन करना होगा कि उस व्यक्ति को, जिससे वह की जाये, यह अभिनिश्चित करने का युक्तियुक्त अवसर मिल जाये कि वह व्यक्ति, जिसके द्वारा वह की गई है, वह समस्त, जिसे करने को वह अपने वचन द्वारा आबद्ध है, वहीं और उसी समय करने के लिये योग्य और रजामन्द है;

(3) यदि वह प्रस्थापना वचनग्रहीता को कोई चीज परिदत्त करने के लिये हो तो वचनग्रहीता को यह देखने का युक्तियुक्त अवसर मिलना ही चाहिये कि प्रस्थापित चीज वही चीज है जिसे परिदत्त करने के लिये वचनदाता अपने वचन द्वारा आबद्ध है;

कई संयुक्त वचनग्रहीताओं में से एक से की गयी प्रस्थापना के विधिक परिणाम वे ही हैं जो उन सबसे की गई प्रस्थापना के

दृष्टान्त 

ख को उसके भाण्डागार में एक विशिष्ट क्वालिटी की रुई की 100 गांठें 1873 की मार्च की पहली तारीख को परिदत्त करने की संविदा के करता है। इस उद्देश्य से कि पालन की ऐसी प्रस्थापना की जाये जिसका प्रभाव वह हो, जो इस धारा में कथित है, क को वह रुई नियत दिन को ख के भाण्डागार में ऐसी परिस्थितियों के अधीन लानी होगी कि ख को अपना यह समाधान कर लेने का युक्तियुक्त अवसर मिल जाये कि प्रस्थापित चीज उस क्वालिटी की रुई है जिसकी संविदा की गई थी और यह कि 100 गांठें हैं।

 

39. वचन का पूर्णत: पालन करने से पक्षकार के इन्कार का प्रभाव -

जबकि किसी संविदा के एक पक्षकार ने अपने वचन का पूर्णतः पालन करने से इन्कार कर दिया हो या ऐसा पालन करने के लिये अपने को निर्योग्य बना लिया हो तब वचनग्रहीता संविदा का अन्त कर सकेगा, यदि उसने उसको चालू रखने की शब्दों द्वारा या आचरण द्वारा अपनी उपमति संज्ञापित न कर दी हो।

दृष्टान्त

(क) एक गायिका क एक नाट्यगृह के प्रबन्धक ख से अगले दो मास के दौरान में प्रति सप्ताह में दो रातं उसके नाट्यगृह में गाने की संविदा करती है और ख उसे हर रात के गाने के लिये 100 रुपये देने का वचनबन्ध करता है। छठीं रात को क नाट्यगृह से जान बूझ कर अनुपस्थित रहती है। ख संविदा का अन्त करने के लिये स्वतंत्र है।

(ख) एक गायिका के एक नाट्यगृह के प्रबन्धक ख से अगले दो मास के दौरान में प्रति सप्ताह में दो रात उसके नाट्यगृह में गाने की संविदा करती है और ख उसे प्रति रात के लिये 100 रुपये की दर से संदाय करने का वचनबन्ध करता है। छठी रात को क जानबूझकर अनुपस्थित रहती है। ख की अनुमति से क सातवीं रात को गाती है। ख ने संविदा के जारी रहने के लिये अपनी उपमति संज्ञापित कर दी है और अब वह उसका अन्त नहीं कर सकता। किन्तु छठी रात को क के न गाने से उठाये गये नुकसान के लिये वह प्रतिकर का हकदार है।

संविदा का पालन किसे करना होगा

40. वह व्यक्ति जिसे वचन का पालन करना है-

यदि मामले की प्रकृति से यह प्रतीत होता है कि किसी संविदा के पक्षकारों का यह आशय था कि उसमें अन्तर्विष्ट किसी वचन का पालन स्वयं वचनदाता द्वारा किया जाना चाहिये तो ऐसे वचन का पालन वचनदाता को ही करना होगा अन्य दशाओं में वचनदाता या उसके प्रतिनिधि उसका पालन करने के लिये किसी सक्षम व्यक्ति को नियोजित कर सकेंगे।

दृष्टान्त

(क) ख को एक धनराशि देने का वचन क देता है। क इस वचन का पालन ख को वह धन स्वयं देकर या उसे किसी और के द्वारा दिलवाकर कर सकेगा।और यदि संदाय के लिये नियत समय से पूर्व क मर जाये तो उसके प्रतिनिधियों को वचन का पालन करना होगा या उसके पालन के लिये किसी उचित व्यक्ति को नियोजित करना होगा।

(ख) ख के लिये एक रंगचित्र बनाने का वचन क देता है। क को इस वचन का पालन स्वयं करना होगा।

41. अन्य व्यक्ति से पालन प्रतिग्रहीत करने का प्रभाव -

जबकि वचनग्रहीता किसी अन्य व्यक्ति से वचन का पालन प्रतिगृहीत कर लेता है तब वह तत्पश्चात् उसे वचनदाता के विरुद्ध प्रवर्तित नहीं करा सकता।

42. संयुक्त दायित्वों का न्यागमन -

जबकि दो या अधिक व्यक्तियों ने कोई संयुक्त वचन दिया हो तब यदि तत्प्रतिकूल आशय संविदा से प्रतीत न हो तो यह वचन ऐसे सब व्यक्तियों को अपने संयुक्त जीवनों के दौरान में और उनमें से किसी की मृत्यु के पश्चात् उसके प्रतिनिधि को उत्तरजीवी या उत्तरजीवियों के साथ संयुक्त और अन्तिम उत्तरजीवी की मृत्यु के पश्चात् सबके प्रतिनिधियों को संयुक्ततः पूरा करना होगा।

43. संयुक्त वचनदाताओं में से कोई भी पालन के लिये विवश किया जा सकेगा –

जबकि दो या अधिक व्यक्ति कोई संयुक्त वचन दें तब तत्प्रतिकूल अभिव्यक्त करार के अभाव में वचनग्रहीता, ऐसे संयुक्त वचनदाताओं में से किसी एक या अधिक को समग्र वचन के पालन के लिये विवश कर सकेगा।

हर एक वचनदाता अभिदाय करने के लिये विवश कर सकेगा -

दो या अधिक संयुक्त वचनदाताओं में से हर एक अन्य संयुक्त वचनदाता को वचन के पालन में अपने समान अभिदाय करने के लिये विवश कर सकेगा, जब तक कि तत्प्रतिकूल आशय संविदा से प्रतीत न हो।

अभिदाय में व्यतिक्रम से हुई हानि में अंश बटाना -

यदि दो या अधिक संयुक्त वचनदाताओं में से कोई एक ऐसा अभिदाय करने में व्यतिक्रम करे तो शेष संयुक्त वचनदाताओं को ऐसे व्यतिक्रम से उद्भूत हानि को समान अंशों में सहन करना होगा।

स्पष्टीकरण –

इस धारा की कोई भी बात किसी प्रतिभू द्वारा मूलऋणी की ओर से किये गये संदायों को अपने मूलऋणी से उस प्रतिभू को वसूल करने से निवारित नहीं करेगी और न मूलऋणी द्वारा किये गये संदाय के कारण उसे उस प्रतिभू से कुछ भी वसूल करने का हकदार बनायेगी।

दृष्टान्त

(क) क, ख और ग 3,000 रुपये घ को देने का संयुक्ततः वचन देते हैं। घ चाहे क या ख या ग को विवश कर सकेगा कि वह उसे 3,000 रुपये दे ।

(ख) क, ख और ग 3,000 रुपये घ को देने का संयुक्ततः वचन देते हैं। ग पूर्ण राशि देने के लिये विवश किया जाता है। क दिवालिया है, किन्तु उसकी आस्तियाँ उसके ऋणों के अर्द्धांग के चुकाने के लिये पर्याप्त है। क की सम्पदा से 500 रुपये और ख से 1,250 रुपये पाने का ग हकदार है।

(ग) घ को 3,000 रुपये देने का संयुक्ततः वचन क, ख और ग ने दिया है। ग कुछ भी देने के लिये असमर्थ है, और क पूर्ण राशि देने के लिये विवश किया जाता है। ख से क 1,500 रुपये पाने का हकदार है ।

(घ) घ को 3,000 रुपये देने का संयुक्त वचन क, ख और ग ने दिया है। ग के लिये क और ख प्रतिभू मात्र हैं। ग रुपयों के संदाय में असफल रहता है। क और ख पूर्ण राशि देने के लिये विवश किये जाते हैं। वे उसे ग से वसूल करने के हकदार हैं।

44. संयुक्त वचनदाताओं में से एक की निर्मुक्ति का प्रभाव -

जहाँ कि दो या अधिक व्यक्तियों ने एक संयुक्त वचन दिया हो, वहां वचनग्रहीता द्वारा ऐसे संयुक्त वचनदाताओं में से एक की निर्मुक्ति अन्य संयुक्त वचनदाता या संयुक्त वचनदाताओं को उन्मोचित नहीं करती, और न वह ऐसे निर्मुक्त संयुक्त वचनदाता को अन्य संयुक्त वचनदाता या संयुक्त वचनदाताओं के प्रति उत्तरदायित्व से ही निर्मुक्त करती है।

45. संयुक्त अधिकारों का न्यागमन –

जबकि किसी व्यक्ति ने दो या अधिक व्यक्तियों को संयुक्ततः वचन दिया हो, तब यदि संविदा से तत्प्रतिकूल आशय प्रतीत न हो तो उसके पालन के लिये दावा करने का अधिकार, जहां तक कि उसका और उनका सम्बन्ध है, उनके संयुक्त जीवनों के दौरान में उनकी, और उनमें से किसी की मृत्यु के पश्चात् ऐसे मृत व्यक्ति के प्रतिनिधि को उत्तरजीवी या उत्तरजीवियों के साथ संयुक्तत: और अन्तिम उत्तरजीवी की मृत्यु के पश्चात् उन सबके प्रतिनिधियों को संयुक्तत: होता है।

दृष्टान्त

क अपने को ख और ग द्वारा उधार दिये गये 5,000 रुपयों के प्रतिफल में संयुक्तत: ख और ग को वह राशि ब्याज समेत विनिर्दिष्ट दिन प्रतिसंदत्त करने का वचन देता है। ख मर जाता है। पालन का दावा करने का अधिकार ग के जीवन के दौरान में ख के प्रतिनिधियों को ग के साथ संयुक्ततः और ग की मृत्यु के पश्चात् ख और ग के प्रतिनिधियों को संयुक्ततः होता है।

पालन के लिये समय और स्थान

46. वचन पालन के लिये समय, जहाँ कि पालन के लिये आवेदन न किया जाना हो और कोई समय विनिर्दिष्ट न हो –

जहाँ कि संविदा के अनुसार वचनदाता को अपने वचन का पालन वचनग्रहीता द्वारा आवेदन किये जाने के बिना करना हो और पालन के लिये कोई समय विनिर्दिष्ट न हो वहाँ वचनबन्ध का पालन युक्तियुक्त समय के भीतर करना होगा।

स्पष्टीकरण -

" युक्तियुक्त समय क्या है", यह प्रश्न हर एक विशिष्ट मामले में तथ्य का प्रश्न है।

47. वचन पालन के लिये समय और स्थान जहां कि पालन के लिये समय विनिर्दिष्ट हो और आवेदन न किया जाना हो-

जबकि किसी वचन का पालन अमुक दिन किया जाना हो और वचनदाता ने वचनग्रहीता द्वारा आवेदन किये जाने के बिना उसका पालन करने का वचन दिया हो तब कारबार के प्रायिक घण्टों के दौरान में किसी भी समय ऐसे दिन और स्थान पर, जिस पर उस वचन का पालन किया जाना चाहिये, वचनदाता उसका पालन कर सकेगा।

दृष्टान्त 

क वचन देता है कि वह पहली जनवरी को ख के भाण्डागार में माल परिदत्त करेगा। उस दिन क माल कोख के भाण्डागार में लाता है, किन्तु उसके बन्द होने के प्रायिक घण्टे के पश्चात् और माल नहीं लिया जाता । क ने अपने वचन का पालन नहीं किया।

48. अमुक दिन पर पालन के लिये आवेदन उचित समय और स्थान पर किया जायेगा –

जबकि किसी वचन का पालन अमुक दिन किया जाना हो और वचनदाता ने यह भार अपने ऊपर न ले लिया हो कि वह वचनग्रहीता के आवेदन के बिना उसका पालन करेगा तब वचनग्रहीता का यह कर्तव्य है कि पालन के लिये आवेदन उचित स्थान पर और कारबार के प्रायिक घण्टों के भीतर करे ।

स्पष्टीकरण -

" उचित समय और स्थान क्या है", यह प्रश्न हर एक विशिष्ट मामले में तथ्य का प्रश्न है।

 

49. वचन के पालन के लिये स्थान, जहाँ कि पालन के लिये, आवेदन न किया जाना हो और कोई स्थान नियत न हो—

जबकि किसी वचन का पालन वचनग्रहीता के आवेदन के बिना किया जाना हो और उसके पालन के लिये कोई स्थान नियत न हो तब वचनदाता का कर्तव्य है कि वह वचन के पालन के लिये युक्तियुक्त स्थान नियत करने के लिये वचनग्रहीता से आवेदन करे और ऐसे स्थान में उसका पालन करे।

दृष्टान्त

क एक हजार मन पटसन ख को एक नियत दिन परिदान करने का वचन देता है। क को ख से आवेदन करना होगा कि वह उसे लेने के लिये युक्तियुक्त स्थान नियत करे और क को ऐसे स्थान पर पटसन परिदत्त करना होगा। 

50. वचनग्रहीता द्वारा विहित या मंजूर किये गये प्रकार से या समय पर पालन –

किसी भी वचन का पालन उस प्रकार से और उस समय पर किया जा सकेगा, जिसे वचनग्रहीता विहित या मंजूर करे।

दृष्टान्त

(क) क को ख 2,000 रुपये का देनदार है क चाहता है कि ख उस रकम को एक बैंकार ग के यहाँ क के खाते में जमा करा दे। ख का भी ग के यहां खाता है और वह यह आदेश देता है कि वह रकम उसके खाते में से अन्तरित करके क के नाम जमा कर दी जाये और ग ऐसा कर देता है। तत्पश्चात् और उस अन्तरण का ज्ञान क को होने से पूर्व ग का कारबार बैठ जाता है। ख का संदाय ठीक है।

(ख) क और ख परस्पर ऋणी हैं। क और ख एक मद को दूसरी में से मुजरा करके लेखा का परिनिर्धारण कर लेते हैं और ऐसे परिनिर्धारण पर जो धन उससे शोध्य बाकी निकलता है उसे क को ख देता है। यह क और ख द्वारा एक-दूसरे को देय राशियों का संदाय क्रमशः एक दूसरे को हो जाता है।

(ग) क का ख 2,000 रुपये का देनदार है। उस ऋण में कमी करने के लिये क का कुछ माल ख प्रतिगृहीत करता है। माल के परिदान से भागिक संदाय हो जाता है।

(घ) क यह चाहता है कि ख, जो उसे 100 रुपये का देनदार है, उसे डाक द्वारा 100 रुपये का नोट भेजे। जैसे ही ख उस नोट सहित चिट्ठी को, जिस पर क का पता सम्यक् रूप से लिखा है, डाक में डालता है वैसे ही ऋण का सम्मोचन हो जाता है।

व्यतिकारी वचनों का पालन

51. वचनदाता पालन करने के लिये आबद्ध नहीं है तब तक कि व्यतिकारी वचनग्रहीता पालन के लिए तैयार और रजामन्द न हो—

जबकि कोई संविदा साथ-साथ पालन किये जाने वाले व्यतिकारी वचनों से गठित हो तब किसी भी वचनदाता के लिये अपने वचन का पालन करना आवश्यक नहीं है जब तक कि वचनग्रहीता अपने व्यतिकारी वचन का पालन करने के लिए तैयार और रजामन्द न हो।

दृष्टान्त

(क) क और ख संविदा करते हैं कि ख को क माल परिदत्त करेगा जिसके लिये संदाय माल के परिदान पर ख द्वारा किया जायेगा। माल का परिदान करना क के लिये आवश्यक नहीं है जब तक कि ख परिदान पर माल के लिये संदाय करने को तैयार और रजामन्द न हो।

माल के लिये संदाय करना ख के लिये आवश्यक नहीं है जब तक कि संदाय पर माल को परिदत्त करने के लिये क तैयार और रजामन्द न हो।

(ख) क और ख संविदा करते हैं कि क किस्तों में दी जाने वाली कीमत पर ख को माल परिदत्त करेगा, और पहली किस्त परिदान पर दी जानी है।

माल का परिदान करना क के लिये आवश्यक नहीं है जब तक कि ख परिदान पर पहली किस्त देने के लिये तैयार और रजामन्द न हो।

पहली किस्त देना ख के लिये आवश्यक नहीं है जब तक कि क पहली किस्त के संदाय पर माल परिदत्त करने के लिये तैयार और रजामन्द न हो।

 

52. व्यतिकारी वचनों के पालन का क्रम-

जहां कि वह क्रम, जिससे व्यतिकारी वचनों का पालन किया जाना है, संविदा द्वारा अभिव्यक्तत: नियत हो वहां उनका पालन उसी क्रम से किया जायगा और जहाँ कि वह क्रम संविदा द्वारा अभिव्यक्ततः नियत न हो वहां उनका पालन उस क्रम से किया जायेगा जो उस संव्यवहार की प्रकृति द्वारा अपेक्षित हो।

दृष्टान्त

(क) क और ख संविदा करते हैं कि के नियत कीमत पर ख के लिये एक गृह बनायेगा। क को गृह बनाने के वचन का पालन ख द्वारा उसके लिये संदाय के वचन के पालन से पहले करना होगा।

(ख) क और ख संविदा करते हैं कि क अपना व्यापार स्टाक एक नियत कीमत पर ख को दे देगा; और ख धन के संदाय के लिये प्रतिभूति देने का वचन देता है क के वचन का पालन किया जाना तब तक आवश्यक नहीं है जब तक प्रतिभूति न दे दी जाये, क्योंकि इस संव्यवहार की प्रकृति यह अपेक्षा करती है कि अपने व्यापार- स्टाक का परिदान करने से पूर्व क को प्रतिभूति मिलनी चाहिये।

53. जिस घटना के घटित होने पर संविदा प्रभावशील होनी है उसका निवारण करने वाले पक्षकार का दायित्व -

जब कि किसी संविदा में व्यतिकारी वचन अन्तर्विष्ट हो और संविदा का एक पक्षकार दूसरे को उसके वचन का पालन करने से निवारित करे तब वह संविदा इस प्रकार निवारित किये गये पक्षकार के विकल्प पर शून्यकरणीय हो जाती है, और वह किसी भी हानि के लिये, जो संविदों के अपालन के परिणामस्वरूप उसे उठानी पड़े दूसरे पक्षकार से प्रतिकर पाने का हकदार हैं।

दृष्टान्त

क और ख संविदा करते हैं कि ख 1,000 रुपये के बदले क के लिये अमुक काम निष्पादित करेगा। ख उस काम को तदनुसार निष्पादित करने के लिये तैयार और रजामन्द है, किन्तु क उसे वैसा करने से निवारित करता है। संविदा ख के विकल्प पर शून्यकरणीय है, और यदि वह उसे विखंडित करने का निर्वाचन करे तो वह किसी भी हानि के लिये, जो उसने उसके अपालन से उठाई हो, क से प्रतिकर वसूल करने का हकदार है।

54. व्यतिकारी वचनों से गठित संविदा में, उस वचन के व्यतिक्रम का प्रभाव जिसका पालन पहले किया जाना चाहिये-

जबकि कोई संविदा ऐसे व्यतिकारी वचनों से गठित हो जिनमें से एक का पालन या पालन का दावा तब तक नहीं किया जा सके जब तक दूसरे का पालन न कर दिया जाये और अन्तिम- वर्णित वचन का वचनदाता उसका पालन करने में असफल रहे तब ऐसा वचनदाता व्यतिकारी वचन के पालन का दावा नहीं कर सकता और उसे संविदा के दूसरे पक्षकार को, किसी भी हानि के लिये, जो ऐसा दूस पक्षकार संविदा के अपालन से उठाए, प्रतिकर देना होगा।

दृष्टान्त

(क) ख के पोत को क अपने द्वारा दिये जाने वाले स्थोरा को भरने और कलकत्ते से मॉरीशस तक प्रवहण करने के लिए भाड़े पर लेता है। उसके प्रवहण के लिए ख को अमुक ढुलाई मिलनी है। क पोत के लिये कोई स्थोरा नहीं देता । ख के वचन के पालन का दावा क नहीं कर सकता और ख को, उस हानि के लिये, जो ख उस संविदा के अपालन से उठाये, प्रतिकर देना होगा।

(ख) क एक नियत कीमत पर कोई निर्माण कर्म निष्पादित करने के लिये ख से संविदा करता है। उस कर्म के लिये आवश्यक पाड़ और काष्ठ ख द्वारा दिया जाना है। ख पाड़ या काष्ठ देने से इन्कार करता है, और कर्म निष्पादित नहीं किया जा सकता। कर्म का निष्पादन करना क के लिये आवश्यक नहीं है, और क को, किसी भी हानि के लिये जो उस संविदा के अपालन से कारित हो, प्रतिकर देने के लिये ख आबद्ध है।

(ग) ख से क संविदा करता है कि वह उस वाणिज्या को, जो एक ऐसे पोत पर है, जो एक मास तक नहीं पहुंच सकता, विनिर्दिष्ट कीमत पर उसे परिदत्त करेगा, और ख संविदा की तारीख से एक सप्ताह के भीतर उस वाणिज्या के लिये संदाय करने का वचनबन्ध करता है। ख उस सप्ताह के भीतर संदाय नहीं करता। परिदान करने के क के वचन का पालन आवश्यक नहीं है और ख को प्रतिकर देना होगा।

(घ) ख को क वाणिज्या की सौ गांठें बेचने का वचन देता है जिनका परिदान अगले दिन किया जाने वाला है और उनके लिये एक मास के भीतर संदाय करने का वचन क को ख देता है। क अपने वचन के अनुसार परिदान नहीं करता। संदाय करने के ख के वचन का पालन आवश्यक नहीं है और क को प्रतिकर देना होगा।

55. उस संविदा में जिसमें समय मर्मभूत है नियत समय पर पालन न करने का प्रभाव -

जबकि किसी संविदा का एक पक्षकार किसी बात को विनिर्दिष्ट समय पर या उसके पूर्व, या किन्हीं बातों को विनिर्दिष्ट समयों पर या उनसे पूर्व करने का वचन दे और ऐसी किसी भी बात को उस विनिर्दिष्ट समय पर या उससे पूर्व करने में असफल रहे, तब वह संविदा या उसमें से उतनी जितनी का पालन न किया गया हो, वचनग्रहीता के विकल्प पर शून्यकरणीय हो जायेगी, यदि पक्षकारों का आशय यह रहा हो कि समय संविदा का मर्म होना चाहिये ।

ऐसी असफलता का प्रभाव जब समय मर्मभूत नहीं है—

यदि पक्षकारों का यह आशय न रहा हो कि समय संविदा का मर्म होना चाहिये तो संविदा ऐसी बात को विनिर्दिष्ट समय पर या उससे पूर्व करने में असफल रहने से शून्यकरणीय नहीं होगी, किन्तु वचनग्रहीता ऐसी असफलता से उसे हुई किसी भी हानि के लिये वचनदाता से प्रतिकर पाने का हकदार है।

करारित समय से भिन्न समय पर किये गये पालन के प्रतिग्रहण का प्रभाव -

यदि ऐसी संविदा की दशा में, जो करारित समय पर वचन के पालन में वचनदाता की असफलता के कारण शून्यकरणीय हो, वचनग्रहीता ऐसे वचन का करारित समय से भिन्न किसी समय पर किया गया पालन प्रतिगृहीत कर ले तो वचनग्रहीता करारित समय पर वचन के अपालन से हुई किसी हानि के लिये प्रतिकर का दावा नहीं कर सकेगा जब तक कि उसने ऐसे प्रतिग्रहण के समय अपने ऐसा करने के आशय की सूचना वचनदाता को न दे दी हो।

56. असम्भव कार्य करने का करार -

वह करार, जो ऐसा कार्य करने के लिये हो, जो स्वतः असम्भव है, शून्य है।

उस कार्य को करने की संविदा जो तत्पश्चात् असम्भव या विधिविरुद्ध हो जाये-

ऐसा कार्य करने की संविदा, जो संविदा के किये जाने के पश्चात् असम्भव था किसी ऐसी घटना के कारण जिसका निवारण वचनदाता नहीं कर सकता था, विधिविरुद्ध हो जाये, तब शून्य हो जाती है जब वह कार्य असम्भव या विधिविरुद्ध हो जाये।

ऐसे कार्य के अपालन से हुई हानि के लिये प्रतिकर जिसका असम्भव या विधिविरुद्ध होना ज्ञात हो -

जहां कि एक व्यक्ति ने ऐसी कोई बात करने का वचन दिया हो जिसका असम्भव या विधिविरुद्ध होना वह जानता था या युक्तियुक्त तत्परता से जान सकता था और वचनग्रहीता नहीं जानता था, वहां जो कोई हानि ऐसे वचनग्रहीता को उस वचन के अपालन से हो, उसके लिये ऐसा वचनदाता ऐसे वचनग्रहीता को प्रतिकर देगा।

दृष्टान्त

(क) जादू से गुप्तनिधि का पता चलाने का ख से क करार करता है। यह करार शून्य है ।

(ख) क और ख आपस में विवाह करने की संविदा करते हैं; विवाह के लिये नियत समय से पूर्व क पागल हो जाता है। संविदा शून्य हो जाती है।

(ग) क, जो पहले से ही ग से विवाहित है और जिसके लिये बहुपत्नीत्व उस विधि द्वारा, जिसके वह अध्यधीन है, निषिद्ध है, ख से विवाह करने की संविदा करता है। उसके वचन के अपालन से ख को हुई हानि के लिये क को उसे प्रतिकर देना होगा।

(घ) क संविदा करता है कि वह एक विदेशी पत्तन पर ख के लिये स्थोरा भरेगा। तत्पश्चात् क की सरकार उस देश के विरुद्ध, जिसमें वह पत्तन स्थित है, युद्ध की घोषणा कर देती है। संविदा तब शून्य हो जाती है जब युद्ध घोषित किया जाता है ।

(ङ) ख द्वारा अग्रिम दी गयी राशि के प्रतिफल पर क छह मास के लिये एक नाट्यगृह में अभिनय करने की संविदा करता है। अनेक अवसरों पर क बहुत बीमार होने के कारण अभिनय नहीं कर सकता। उन अवसरों पर अभिनय करने की संविदा शून्य हो जाती है।

57. वैध बातों, और ऐसी अन्य बातों को भी, जो अवैध हों, करने का व्यतिकारी वचन -

जहां कि कोई व्यक्ति, प्रथमतः कुछ ऐसी बातें करने का, जो वैध हों, और द्वितीयतः विनिर्देशित परिस्थितियों में, कुछ अन्य बातें करने का, जो अवैध हों, व्यतिकारी वचन देते हैं, वहां वचनों का प्रथम संवर्ग, संविदा है किन्तु द्वितीय संवर्ग शून्य करार है।

दृष्टान्त

क और ख करार करते हैं कि ख को एक गृह के 10,000 रुपये में बेचेगा, किन्तु यदि ख उसे एक द्यूत-गृह के रूप में उपयोग में लाये तो वह क को उसके लिये 50,000 रुपये देगा।

व्यतिकारी वचनों का, अर्थात् गृह को बेचने का और उसके लिये 10,000 रुपये देने का प्रथम वचन- संवर्ग एक संविदा है।

द्वितीय संवर्ग एक विधिविरुद्ध उद्देश्य के लिए है, अर्थात् इस उद्देश्य के लिए है कि ख उस गृह को द्यूत-गृह के रूप में उपयोग में लाये, और वह शून्य करार है।

58. अनुकल्पी वचन जिसकी एक शाखा अवैध हो-

ऐसे अनुकल्पी वचन की दशा में, जिसकी एक शाखा वैध हो और दूसरी अवैध, केवल वैध शाखा का ही प्रवर्तन कराया जा सकता है।

दृष्टान्त

क और ख करार करते हैं कि ख को क 1,000 रुपये देगा, जिसके लिए क को ख तत्पश्चात् या तो चावल या तस्करित अफीम परिदत्त करेगा।

यह चावल परिदत्त करने की विधिमान्य संविदा है और अफीम के बारे में शून्य करार है।

संदायों का विनियोग

59. जहां कि वह ऋण उपदर्शित हो, जिसका उन्मोचन किया जाना है, वहां संदायों का उपयोजन -

जहाँ कि कोई ऋणी, जिस पर एक व्यक्ति के कई सुभिन्न ऋण हों, उस व्यक्ति को या तो अभिव्यक्त प्रज्ञापना सहित या ऐसी परिस्थितियों में, जिनसे विवक्षित हो कि वह संदाय किसी विशिष्ट ऋण के उन्मोचन के लिये उपयोजित किया जाना है, कोई संदाय करता है वहां, उस संदाय को यदि वह प्रतिगृहीत कर लिया जाये, तदनुसार उपयोजित करना होगा।

दृष्टान्त

(क) अन्य ऋणों के साथ-साथ एक वचनपत्र पर, जो पहली जून को शोध्य है, ख का क 1,000 रुपये का देनदार है। वह ख को उसी रकम के किसी अन्य ऋण का देनदार नहीं है। पहली जून को ख को क 1,000 रुपये देता है। यह संदाय वचनपत्र का उन्मोचन करने के लिये उपयोजित किया जाना हैं।

(ख) अन्य ऋणों के साथ-साथ ख को क 567 रुपये का देनदार है। क से ख इस राशि के संदाय की लिखित मांग करता है। ख को क 567 रुपये भेजता है। यह संदाय उस ऋण के उन्मोचन के लिये उपयोजित किया जाना है जिनके संदाय की मांग ख ने की थी।

60. जहाँ कि वह ऋण उपदर्शित न हो जिसका उन्मोचन किया जाना है, वहां संदाय का उपयोजन -

जहाँ कि ऋणी ने यह प्रज्ञापित नहीं किया है और कोई ऐसी परिस्थितियां नहीं हैं जिनसे यह उपदर्शित होता हो कि वह संदाय किस ऋण के लिये उपयोजित किया जाना है वहाँ लेनदार स्वविवेकानुसार उसे ऐसे किसी विधिपूर्ण ऋण मद्धे उपयोजित कर सकेगा जो ऋणी द्वारा उसे वस्तुतः शोध्य और देय हो, चाहे उसकी वसूली वादों की परिसीमा सम्बन्धी तत्समय प्रवृत्त विधि द्वारा वारित हो या न हो।

61. जहां कि दोनों पक्षकारों में से कोई भी विनियोग नहीं करता है वहां संदाय का उपयोजन -

जहाँ कि दोनों पक्षकारों में से कोई भी विनियोग नहीं करता वहाँ वह संदाय समयक्रमानुसार ऋणों के उन्मोचन में उपयोजित किया जायेगा, चाहे वे ऋण वादों की परिसीमा सम्बन्धी तत्समय प्रवृत्त विधि द्वारा वारित हों या न हों। यदि ऋण समकालिक हैं तो संदाय हर एक के उन्मोचन में अनुपातत: उपयोजित किया जायेगा।

वे संविदायें जिनका पालन करने की आवश्यकता नहीं है.

62. संविदा के नवीयन, विखण्डन और परिवर्तन का प्रभाव -

यदि किसी संविदा के पक्षकार उसके बदले एक नई संविदा प्रतिस्थापित करने या उस संविदा को विखण्डित या परिवर्तित करने का करार करें तो मूल संविदा का पालन करने की आवश्यकता न होगी।

दृष्टान्त

(क) क एक संविदा के अधीन ख को धन का देनदार है। क, ख और ग के बीच यह करार होता है कि ख तत्पश्चात् क के बजाय ग को अपना ऋणी मानेगा। क पर ख के पुराने ऋण का अन्त हो गया है और ग पर ख के एक नये ऋण की संविदा हो गई है।

(ख) ख का क 10,000 रुपये का देनदार है। ख से क ठहराव करता है और ख को 10,000 रुपये के ऋण के बदले 5,000 रुपये के लिये क की सम्पदा बन्धक करता है। यह नई संविदा है और पुरानी को निर्वापित कर देती है।

(ग) क एक संविदा के अधीन ख को 1,000 रुपये का देनदार है। ग का ख 1,000 रुपये का देनदार है। क को ख आदेश देता है कि वह अपनी बहियों में ग के नाम 1,000 रुपये जमा कर दे, किन्तु ग इस ठहराव के लिये अनुमति नहीं देता। ख अब भी ग का 1,000 रुपये का देनदार है और कोई नई संविदा नहीं की गयी है।

63. वचनग्रहीता वचन के पालन से अभिमुक्ति या उसका परिहार दे या कर सकेगा -

हर वचनग्रहीता अपने को दिये गये किसी वचन के पालन से अभिमुक्ति या उसका परिहार पूर्णतः या भागतः दे या कर सकेगा, या ऐसे पालन के लिये समय बढ़ा सकेगा, या उसके स्थान पर किसी तुष्टि को, जिसे वह ठीक समझे; प्रतिगृहीत कर सकेगा।

दृष्टान्त

(क) ख के लिये क एक रंगचित्र बनाने का वचन देता है। तत्पश्चात् ख उससे वैसा करने का निषेध कर देता है। क उस वचन के पालन के लिये अब आबद्ध नहीं है।

(ख) ख का क 5,000 रुपये का देनदार है। क उस समय और स्थान पर, जिस पर 5,000 रुपये देय थे, ख को 2,000 रुपये देता है और ख सम्पूर्ण ऋण की तुष्टि में उन्हें प्रतिगृहीत कर लेता है। सम्पूर्ण ऋण का उन्मोचन हो जाता है।

(ग) ख का क 5,000 रुपये का देनदार है। ख को ग 1,000 रुपये देता है और ख उन्हें क पर अपने दावे की तुष्टि में प्रतिगृहीत कर लेता है। यह संदाय सम्पूर्ण दावे का उन्मोचन है।

(घ) क एक संविदा के अधीन ख को ऐसी धनराशि का देनदार है जिसका परिमाण अभिनिश्चित नहीं किया गया है। क परिमाण अभिनिश्चित किये बिना, ख को 2,000 रुपये देता है और ख उसे उसकी तुष्टि में प्रतिगृहीत कर लेता है। यह सम्पूर्ण ऋण का उन्मोचन है चाहे उसका परिमाण कुछ भी हो।

(ङ) ख का क 2,000 रुपये का देनदार है और अन्य लेनदारों का भी ऋणी है। ख समेत अपने लेनदारों से क उनकी अपनी-अपनी मांगों का प्रशमन करने के लिये उन्हें रुपये में आठ आने देने का ठहराव करता है। ख को 1,000 रुपये का संदाय ख की मांग का उन्मोचन है।

64. शून्यकरणीय संविदा के विखण्डन के परिणाम -

जबकि कोई व्यक्ति, जिसके विकल्प पर कोई संविदा शून्यकरणीय है, उसे विखण्डित कर देता है तब उसके दूसरे पक्षकार को, उसमें अन्तर्विष्ट किसी वचन का, जिसका वह वचनदाता है, पालन करने की आवश्यकता नहीं है। शून्यकरणीय संविदा को विखण्डित करने वाले पक्षकार ने यदि ऐसी संविदा के किसी दूसरे पक्षकार से तदधीन कोई फायदा प्राप्त किया है, तो वह ऐसा फायदा, उस व्यक्ति को, जिससे वह प्राप्त किया गया था, यथासम्भव प्रत्यावर्तित कर देगा।

65. उस व्यक्ति की बाध्यता, जिसने शून्य करार के अधीन या उस संविदा के अधीन जो शून्य हो गई हो, फायदा प्राप्त किया हो-

जबकि किसी करार के शून्य होने का पता चले या कोई संविदा शून्य हो जाये तब वह व्यक्ति जिसने ऐसे करार या संविदा के अधीन कोई फायदा प्राप्त किया हो वह फायदा उस व्यक्ति को, जिससे उसने उसे प्राप्त किया था, प्रत्यावर्तित करने या उसके लिये प्रतिकर देने को आबद्ध होगा।

दृष्टान्त

(क) ख के यह वचन देने के प्रतिफलस्वरूप कि वह क की पुत्री ग से विवाह कर लेगा ख को क 1,000 रुपये देता है। वचन के समय ग मर चुकी है। करार शून्य है, किन्तु ख को वे 1,000 रुपये क को प्रतिसंदत्त करने होंगे।

(ख) ख से क उसे एक मई के पूर्व 250 मन चावल परिदत्त करने की संविदा करता है। क उस दिन के पूर्व केवल 130 मन परिदत्त करता है और तत्पश्चात् कुछ नहीं ख उस 130 मन को एक मई के पश्चात् रखे रखता है। वह क को उसके लिये संदाय करने को आबद्ध है।

(ग) एक गायिका क एक नाट्यगृह प्रबन्धक ख से अगले दो मास में प्रति सप्ताह में दो रात उसके नाट्यगृह में गाने की संविदा करती है और ख उसे हर रात के गाने के लिये एक सौ रुपये देने के लिये वचनबद्ध होता है। छठी रात को क उस नाट्यगृह से जानबूझकर अनुपस्थित रहती है, और परिणामस्वरूप ख उस संविदा को विखण्डित कर देता है। ख को उन पांचों रातों के लिये, जिनमें क ने गाया था, उसे संदाय करना होगा।

(घ) क एक संगीत समारोह में 1,000 रुपये पर, जो अग्रिम दिये जाते हैं, ख के लिये गाने की संविदा करती है। क इतनी रुग्ण है कि गा नहीं सकती। क उन लाभों की हानि के लिये प्रतिकर देने को आबद्ध नहीं है जो ख को होते यदि क गा सकती, किन्तु उसे अग्रिम दिये गये 1,000 रुपये ख को लौटाने होंगे।

66. शून्यकरणीय संविदा के विखण्डन की संसूचना या प्रतिसंहरण की रीति —

शून्यकरणीय संविदा का विखण्डन उसी प्रकार और उन्हीं नियमों के अध्यधीन संसूचित या प्रतिसंहत किया जा सकेगा जो प्रस्थापना की संसूचना या प्रतिसंहरण को लागू हैं।

67. पालन के लिये युक्तियुक्त सौकर्य वचनदाता को देने में वचनग्रहीता की उपेक्षा का प्रभाव -

यदि कोई वचनग्रहीता किसी वचनदाता को उसके वचन के पालन के लिये युक्तियुक्त सौकर्य देने में उपेक्षा या देने से इन्कार करे तो एतद्द्वारा कारित किसी भी अपालन के बारे में ऐसी उपेक्षा या इन्कार के कारण वचनदाता की माफी हो जाती है।

दृष्टान्त

ख के गृह की मरम्मत करने की ख से क संविदा करता है।

जिन स्थानों में उसके गृह की मरम्मत अपेक्षित है, ख उन्हें क को बताने में उपेक्षा या बताने से इन्कार करता है।

संविदा के अपालन के लिये क की माफी हो जाती है यदि वह ऐसी उपेक्षा या इन्कार से कारित हुआ हो ।

 

 

 

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