धारा 1 से 2 (प्रारम्भिक) भारतीय संविदा अधिनियम, 1872

धारा 1 से 2 (प्रारम्भिक) भारतीय संविदा अधिनियम, 1872

 

भारतीय संविदा अधिनियम, 1872

(1872 का अधिनियम सं० 9)

[25 अप्रैल, 1872]

उद्देशिका - 

संविदाओं से सम्बन्धित विधि के कतिपय भागों को परिभाषित और संशोधित करना समीचीन है अतः एतद्द्वारा यह निम्नलिखित रूप में अधिनियमित किया जाता है

प्रारम्भिक

1. संक्षिप्त नाम -

ह अधिनियम भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 कहा जा सकेगा।

विस्तार, प्रारम्भ –

इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है और यह 1872 के सितम्बर के प्रथम दिन को प्रवृत्त होगा।

 व्यावृत्ति -

इसमें अन्तर्विष्ट कोई भी बात, एतद्द्वारा अभिव्यक्त रूप से निरसित न किये गये किसी स्टेट्यूट, अधिनियम या विनियम के उपबन्धों पर, व्यापार की किसी प्रथा या रूढ़ि पर, अथवा किसी संविदा की किसी प्रसंगति पर, जो इस अधिनियम के उपबन्धों से असंगत न हो, प्रभाव न डालेगी।

2. निर्वचन खण्ड-

इस अधिनियम में, निम्नलिखित शब्दों और पदों का निम्नलिखित भावों में प्रयोग किया गया है, जब तक कि संदर्भ से प्रतिकूल आशय प्रतीत न हो-

(क) जब कि एक व्यक्ति, किसी बात को करने या करने से प्रविरत रहने की अपनी रजामन्दी किसी अन्य को इस दृष्टि से संज्ञापित करता है कि ऐसे कार्य या प्रविरति के प्रति उस अन्य की अनुमति अभिप्राप्त करे तब वह प्रस्थापना करता है, यह कहा जाता है;

(ख) जबकि वह व्यक्ति, जिससे प्रस्थापना की जाती है, उसके प्रति अपनी अनुमति संज्ञापित करता है तब वह प्रस्थापना प्रतिगृहीत हुई कही जाती है। प्रस्थापना प्रतिगृहीत हो जाने पर वचन हो जाती;

(ग) प्रस्थापना करने वाला व्यक्ति "वचनदाता" कहलाता है और प्रस्थापना प्रतिगृहीत करने वाला व्यक्ति " वचनगृहीता" कहलाता है;

(घ) जबकि वचनदाता की वांछा पर वचनगृहीता या कोई अन्य व्यक्ति कुछ कर चुका है या करने से विरत रहा है, या करता है या करने से प्रविरत रहता है, या करने का या करने से प्रविरत रहने का वचन देता है, तब ऐसा कार्य या प्रविरति या वचन उस वचन के लिये प्रतिफल कहलाता है;

(ङ) हर एक वचन और ऐसे वचनों का हर एक संवर्ग, जो एक-दूसरे के लिये प्रतिफल हो, करार है;

(च) वे वचन जो एक-दूसरे के लिये प्रतिफलं या प्रतिफल का भाग हों, व्यतिकारी वचन कहलाते हैं;

(छ) वह करार जो विधितः प्रवर्तनीय न हो, शून्य कहलाता है;

(ज) वह करार, जो विधितः प्रवर्तनीय हो, संविदा है;

(झ) वह करार, जो उसके पक्षकारों में से एक या अधिक के विकल्प पर तो विधि द्वारा प्रवर्तनीय हो, किन्तु अन्य पक्षकार या पक्षकारों के विकल्प पर नहीं, शून्यकरणीय संविदा है;

(ञ) जो संविदा विधितः प्रवर्तनीय नहीं रह जाती वह तब शून्य हो जाती है जब वह प्रवर्तनीय नहीं रह जाती।

 

 

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