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मुस्लिम विधि (Muslim Laws) |
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1. आतिका बेगम बनाम मोहम्मद इब्राहिम, (ए.आई.आर 1916 PC 250 |
यौनावस्था की उम्म्र : प्रिवी कौंसिल ने यह अभिनिर्धारित किया कि एक लड़की दो घटनाओं में से किसी एक के होने पर वयस्क बन जाती है- 1. 15 वर्ष आयु की पूर्णता, या 2. प्रारंभिक समय में यौवनावस्था की प्राप्ति पर। |
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2. अब्दुल कादिर बनाम सलीमा, (1886 ILR 8 ALL 149) |
मेहर वह धनराशि या अन्य संपत्ति हैं जिसे पति द्वारा विवाह के प्रतिफल के रूप में पत्नी को भुगतान या प्रदान करने का वादा किया जाता है और यद्यपि जहां मेहर स्पष्टता से नियत नहीं किया गया है वहां भी विधि पत्नी को मेहर का अधिकार विवाह के अनिवार्य प्रभाव के रूप में प्रदान करती है। (न्यायमूर्ति महमूद) |
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3. शायरा बानो बनाम भारत संघ, (2017) 9 एस.सी.सी 1 |
सर्वोच्च न्यायालय ने तीन तलाक की प्रथा को असंवैधानिक करार दिया। यह धारित किया कि तलाक का यह रूप स्पष्ट रूप से मनमानापूर्ण इस अर्थ में है कि मुस्लिम पुरुष द्वारा किसी सुलह समझौते के प्रयास के बिना, जिससे कि इसे बचाया जा सके, वैवाहिक बंधन को मनमानेपन व सनक पन से तोड़ा जा सकता है। तलाक का यह रूप भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में निहित मौलिक अधिकार का उल्लंघन अवधारित किया जाना आवश्यक है। न्यायालय ने यह धारित किया कि तीन तलाक इस्लाम के लिए मौलिक नहीं है। |
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4. बाई ताहिरा बनाम अली हुसैन, (ए.आई.आर 1979 एस.सी 362) |
सुप्रीम कोर्ट ने धारित किया कि तलाकशुदा मुस्लिम पत्नी भरण-पोषण प्राप्त करने की हकदार है, भले ही उसने पहले ही इसे अपने वैयक्तिक विधि के तहत पूरी रकम मिल चुकी हो। |
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5. मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम, (ए.आई.आर 1985 एस.सी 945) |
धारा 125 किसी भी व्यक्तिगत विधि से स्वतंत्र है और यह धर्मनिरपेक्ष प्रकृति की है। यह धारित किया गया कि सी.आर.पी.सी की धारा 125 तलाकशुदा मुस्लिम महिला पर लागू होता है, जब तक कि वह पुनर्विवाह नहीं कर लेती। सर्वोच्च न्यायालय ने यह धारित किया की धारा 125 और मुस्लिम व्यक्तिगत विधि के बीच कोई टकराव नहीं है। न्यायालय ने धारित किया कि मुस्लिम विधि पति के भरण- पोषण के दायित्व को सीमित करती है कि वह तलाकशुदा पत्नी को (iddat) इद्दत की अवधि तक प्रदान करे। |
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6. डेनियन लतीफी एवं अन्य बनाम भारत संघ, (2001) 7 एस.सी.सी 740 |
मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 की संवैधानिकता को चुनौती दी गयी। उच्चतम न्यायालय ने अधिनियम की संवैधानिक वैधता को मान्य ठहराया और निम्नलिखित अभिनिर्धारित किया कि- 1. मुस्लिम पुरूष का अपनी तलाकशुदा पत्नी के भरण-पोषण का दायित्व केवल इद्दत की अवधि तक सीमित नहीं हैं। यह उसकी सम्पूर्ण जिन्दगी तक विस्तारित है, कि इसका (मुस्लिम महिला) पुनर्विवाह न हो जाये। 2. पूर्व पति को इद्दत अवधि के भीतर तलाकशुदा पत्नी के भविष्य के लिए एक उचित प्रबंध करना चाहिए। (जो इद्दत की अवधि से आगे भी जारी रहेगा) 3. यह अधिनियम भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14,15 एवं 21 का उल्लंघन नहीं करता है। |
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7. मोहम्मद सलीम बनाम शमशुद्दीन एवं अन्य, (2019) 4 एस.सी.सी 130 |
सर्वोच्च न्यायालय ने धारित किया कि एक मुस्लिम पुरुष और उसकी हिंदू पत्नी के बीच विवाह से पैदा हुआ बच्चा अपने पिता की संपत्ति में अधिकार पाने का दावा कर सकता है। न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि एक मुस्लिम पुरुष, मूर्ति पूजक या अग्नि उपासक से विवाह करता है तो वो न ही वैध (सहीह) है, न. ही शून्य (बातिल) हैं, अपितु वह केवल एक अनियमित (फासिद) विवाह है। |
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8. रजिया बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2022)
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इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पुनः पुष्टि की कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 के तहत इद्दत की अवधि के बाद भी अपने पूर्व पति से भरण-पोषण का दावा करने की हकदार है, जब तक कि वह पुनर्विवाह नहीं करती। |
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9. शेख तस्लीम शेख हकीम बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य, 2022
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बॉम्बे हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि पारिवारिक न्यायालय मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत आपसी सहमति से मुस्लिम दंपत्ति के विवाह को कानूनी रूप से भंग कर सकता है। न्यायालय ने यह टिप्पणी दंपत्ति के बीच सौहार्दपूर्ण समझौते के बाद पति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द करते हुए की। |
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10. मोहम्मद सोनू उर्फ सोनू बनाम झारखंड राज्य और अन्य, 2022
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झारखंड उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत, किसी व्यक्ति को 15 वर्ष की आयु में यौवन प्राप्त कर लिया जाता है, और इस आयु तक पहुँचने पर, उन्हें बिना अभिभावक के हस्तक्षेप के अपनी पसंद के किसी भी व्यक्ति से विवाह करने का अधिकार है, भले ही उनका विवाह अन्य कानूनों के तहत अपराध माना जाता हो। |
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11. जावेद बनाम हरियाणा राज्य और अन्य, 2022
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पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने एक 16 वर्षीय मुस्लिम लड़की और उसके पति को संरक्षण प्रदान किया, जिनका विवाह मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत हुआ था। न्यायालय ने इस तर्क पर भरोसा किया कि एक मुस्लिम लड़की, जिसकी आयु 15 वर्ष मानी जाती है, यौवन प्राप्त कर चुकी है, अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह करने के लिए सक्षम है। न्यायालय ने यह भी कहा कि ऐसा विवाह बाल विवाह निषेध अधिनियम (पीसीएमए), 2006 की धारा 12 के तहत अमान्य नहीं होगा। |