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हिंदू विधियां (Hindu Laws) |
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सामान्य सिद्धांत (General Principles) |
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वाद |
निर्णीत तथ्य |
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1. गुरुनाथ बनाम कमलाबाई, (1951) एस.सी.आर 1135 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि हिंदू विधि के किसी नियम के अभाव में, न्यायालय को साम्य, न्याय तथा सद् विवेक के सिद्धांत के आधार पर मामलों का निर्णय करने का अधिकार है। किंतु ऐसा निर्णय हिन्दू विधि के किसी भी सिद्धांत के विरूद्ध नहीं होना चाहिए। |
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2. चंद्रशेखर बनाम कुलादैवेला, ए.आई.आर 1963 एस.सी 185 |
उच्चतम न्यायालय का निर्णय था कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू, बौद्ध या सिक्ख हो तो वह हिंदू हैं यदि- (1) वह इनमें से किसी भी धर्म का पालन करता है, अपनाता है या अनुसरण करता है, और; (2) वह हिंदू रहेगा, भले ही वह इन धमीं में से किसी के भी सिद्धांत का पालन या अनुसरण ना करता हो। हिंदू धर्म के अनुसार आचरण न करने मात्र से अथवा नास्तिकता में विश्वास करने से या हिंदू धर्म के केंद्रीय सिद्धांतों से मतभेद या हिंदू धर्म की रूढ़िवादी प्रथाओं के अभाव से अथवा पाश्चात्य सभ्यता के अनुसार जीवन व्यतीत करने से कोई व्यक्ति हिंदू होने से वंचित नहीं हो जाता है। |
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3. पीरूमल बनाम पुन्नुस्वामी, ए.आई.आर 1971 एस.सी 2352
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एक गैर हिंदू धर्म परिवर्तन के द्वारा निम्नलिखित परिस्थितियों में हिंदू बन जाएगा- (1) यदि वह एक औपचारिक समारोह से गुजरता है जो उस जाति या समुदाय द्वारा परिवर्तन हेतु निर्धारित है जिसमें वह धर्मान्तरित या पुनःधर्मान्तरित होता है। (2) यदि वह हिंदू बनने के सद्भावनापूर्वक आशय (bona fide intention) को स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त करते हुए किसी विशेष हिंदू संप्रदाय या जाति के आचरण का पालन करता है, इरादतन उस संप्रदाय अथवा जाति के लोग उसे हिंदू स्वीकार करने लग जाते हैं तो वह हिंदू मान लिया जाएगा। |
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4. सुराजमनी स्टेला कुजूर बनाम दुर्गा चरण हंसदा, ए.आई.आर 2001 एस.सी 938 |
हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 2(2) के तहत, अनुसूचित जनजातियों को अधिसूचना जारी करके अधिनियम के दायरे में लाया जा सकता है। दूसरे मामलों में उन्हें अपने प्रथाओं का अनुसरण करना पड़ता है और ऐसी प्रथाओं को स्पष्ट साक्ष्यों से साबित करना होता है। |
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5. हीराचंद्र श्रीनिवास मनगांवकर बनाम सुनंदा, ए.आई.आर 2001 एस.सी 1285 |
इस अधिनियम का उद्देश्य पति-पत्नी के बीच वैवाहिक संबंध को बनाए रखना है, और इस तरह के वैवाहिक संबंधों को ख़त्म ना करने के लिए प्रोत्साहित करना है। |
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विवाह की शर्तें, शून्य एवं शून्यकरणीय विवाह (Conditions of Marriage, Void & Voidable Marriages) |
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6. यमुनाबाई बनाम अनंतराव, ए.आई.आर 1988 एस.सी 644
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सर्वोच्च न्यायालय ने निर्धारित किया कि दूसरे विवाह में 'दूसरी पत्नी' को पत्नी का दर्जा नहीं दिया जा सकता क्योंकि दूसरा विवाह अकृत व शून्य है। |
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7. प्रिया बाला बनाम सुरेश चंद्र, ए.आई.आर 1971 एस.सी 1153
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उच्चतम न्यायालय ने यह निर्धारित किया कि अभियोजन पक्ष को यह स्थापित करना चाहिए कि दूसरा विवाह सम्पन्न हुआ था और अभियुक्त के केवल स्वीकार करने से कि उसने दूसरे विवाह की संविदा की थी, पर्याप्त नहीं है। |
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8. सरला मुद्गल बनाम भारत संघ, लिली थॉमस बनाम भारत संघ, (2006)6 एस.सी.सी 224
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सर्वोच्च न्यायालय ने यह धारित किया कि पति या पत्नी द्वारा किसी दूसरे धर्म के लिए स्वधर्म त्याग के द्वारा स्वतः विवाह विच्छेद नहीं हो जाता। प्रथम विवाह के निर्वाह के दौरान किसी हिंदू धर्म त्यागी द्वारा इस्लाम में धर्मांतरण करके द्वितीय विवाह हिंदू विवाह अधिनयम का उल्लंघन है। लिली थॉमस के मुक़दमे में सरला मुद्गल के मामले के निर्णय की समीक्षा की गई। न्यायालय ने निर्धारित किया कि पक्षकारों के धर्म परिवर्तन के कारण एक व्यक्तिगत विधि के अनुसार संपन्न विवाह अन्य व्यक्तिगत विधि के द्वारा विघटित नहीं किया जा सकता। |
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9. भाऊराव बनाम महाराष्ट्र राज्य, ए.आई.आर 1965 एस.सी 1564 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि जब तक किसी विवाह को सम्यक रीति और समारोह से मनाया या संपन्न नहीं किया जाता तब तक इसे मान्यता नहीं दी जा सकती। |
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10. सीमा बनाम अश्वनी कुमार, ए.आई.आर 2006 एस.सी 1158
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उच्चतम न्यायालय ने आदेशित किया कि विवाहों का अनिवार्य पंजीकरण पक्षकारों के धर्मों से अपेक्षित नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि वे इस संबंध में प्रासंगिक नियम बनाए। |
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11. गुल्लीपिल्ली सोरिया राज बनाम बंडारू पावनी, (2009)1 एस.सी.सी 714
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धारा 5 में स्पष्ट किया गया है कि यदि उक्त धारा की शर्तों को पूरा किया जाए तो किसी भी दो हिन्दुओं के बीच विवाह सम्पन्न हो सकता है। धारा के शुरुआती पैरा में 'जा सकेगा' शब्द का प्रयोग धारा 5 को वैकल्पिक प्रावधान नहीं बनाती है। दूसरी ओर, यह, सकारात्मक शब्दों में, इंगित करता है कि यदि उल्लिखित शर्तों का पालन किया जाए तो दो हिंदुओं के बीच विवाह सम्पन्न किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में, यदि उक्त शर्तें अधूरी रह जाती हैं, तो दो हिंदुओं के बीच विवाह संपन्न नहीं किया जा सकता।
नोट: हिंदू विवाह के लिए शर्तें- दो हिंदुओं के बीच विवाह अनुष्ठापित किया जा सकेगा यदि निम्नलिखित शर्तों पूरी हो जाएं, अर्थात् - (i) विवाह के समय दोनों पक्षकारों में से, न तो वर की कोई जीवित पत्नी हो और न वधू का कोई जीवित पति हो; (ii) विवाह के समय दोनों पक्षकारों में से कोई पक्षकार - (क) चित्त विकृति के परिणामस्वरूप विधिमान्य सम्मति देने में असमर्थ न हो; या (ख) विधिमान्य सम्मति देने में समर्थ होने पर भी इस प्रकार के या इस हद तक मानसिक विकार से पीड़ित न रहा हो कि वह विवाह और संतानोत्पत्ति के लिए, अयोग्य हो, या (ग) उसे उन्मत्तता का बार-बार दौरा न पड़ता हो। (iii) विवाह के समय वर ने 21 वर्ष की आयुं जबकि वधू ने 18 वर्ष की आयु पूरी कर ली हो; (iv) जब तक कि दोनों पक्षकारों में से हर एक को शामिल करने वाली रूढ़ि या प्रथा से उन दोनों के बीच विवाह अनुज्ञात न हो, वे प्रतिसिद्ध नातेदारी डिग्रियों के भीतर न हों; (v) जब तक कि दोनों पक्षकारों में से हर एक को शासित करने वाली रूढ़ि या प्रथा से उन दोनों के बीच विवाह अनुज्ञात न हो, वे एक-दूसरे के सपिण्ड न हों। |
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12. रथनम्म्मा बनाम सुजाथम्मा, सिविल अपील संख्या 3050/2010; 15. 11. 2019 को निर्णीत |
उच्च्चतम न्यायालय ने कहा कि विवाह के करार का पंजीकरण ही मात्र विवाह को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। |
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13. भाउराव शंकर लोखंडे बनाम महाराष्ट्र राज्य, ए.आई.आर 1965 एस.सी 1364
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विवाह के उचित अनुष्ठापन के लिए इसे 'उचित समारोहों और सम्यक ढंग के साथ संपत्र किया जाना चाहिए'। द्विविवाह के गठन के लिए सम्यक तरीके से द्वितीय विवाह का अनुष्ठापन अनिवार्य है। |
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दाम्पत्य-अधिकारों का प्रत्यास्थापन, न्यायिक पृथक्करण एवं तलाक (Restitution of Conjugal Rights, Judicial Separation & Divorce) |
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14. सरोज रानी बनाम सुदर्शन कुमार, ए.आई. और 1984 एस.सी 1562 |
उच्चतम न्यायालय ने धारा 9 की संवैधानिकता का समर्थन किया। दाम्पत्य अधिकार विवाह में अंतर्निहित है। धारा 9 केवल पूर्ववर्ती विधियों को संहिताबद्ध करती है। धारा 9 के दुरुपयोग के विरुद्ध अंतर्निहित सुरक्षा 'उचित अपवर्जन' का प्रावधान है। |
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15. रसेल बनाम रसेल, (1897) ए.सी. 395
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'क्रूरता' शब्द को पहली बार परिभाषित किया गया था। न्यायालय ने निर्णय दिया कि क्रूरता ऐसे चरित्र का आचरण है जिससे जीवन, अंग या स्वास्थ्य, शारीरिक या मानसिक खतरा पैदा होता है या ऐसे आचरण की युक्तियुक्त आशंका पैदा होती हो। |
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16. दास्ताने बनाम दास्ताने, (1975)2 एस.सी.सी 326
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उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि क्रूरता एक ऐसा आचरण है जो युक्तियुक्त आशंका पैदा करता हो की एक पति या पत्नी का एक दूसरे का साथ रहना अहितकर या हानिकारक है। |
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17. शोभा रानी बनाम मधुकर रेड्डी, ए.आई.आर 1988 एस.सी 121 |
सर्वोच्च न्यायालय ने धारित किया कि दहेज की मांग भी क्रूरता का गठन करती है। |
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18. सावित्री पांडे बनाम प्रेम चन्द्र पांडे, ए.आई.आर 2002 एस.सी 591
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अभित्याग के आधार पर तलाक की मांग करने वाले पक्षों को यह दिखाना आवश्यक है कि वह अपने स्वयं की गलती का लाभ नहीं ले रहे/रही है। |
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19. राम नारायण गुप्ता बनाम श्रीमती रामेश्वरी गुप्ता, ए.आई.आर 1988 एस.सी 2260 |
उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि मानसिक विकार का स्तर ऐसा होना चाहिए कि उपचार की मांग करने वालें पति/पत्नी एक दूसरे के साथ उचित तरीके से रहने की अपेक्षा न करते हों। |
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20. अमरदीप सिंह बनाम हरवीन कौर, (2017)8 एस.सी.सी 746
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उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि धारा 13 ब (2) में उल्लेखित छः मास की अवधि आज्ञापक न होकर निर्देशित है। न्यायालय प्रत्येक मामलों के तथ्यों और परिस्थितियों में, जहां मध्यस्थता और सुलह के सभी प्रयासों के समाप्त होने के बाद पक्षकारों द्वारा पुनः सहवास की कोई संभावना नहीं हो तो वहां अपने विवेकाधिकार का प्रयोग कर सकती है। |
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21. दिग्विजय सिंह बनाम प्रताप कुमारी, ए.आई.आर 1970 एस.सी 137 |
नपुंसकता का विधिक अर्थ, एक शारीरिक या मानसिक अवस्था है, जो विवाह को व्यावहारिक रूप से असंभव बना देती है। |
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22. आर. लक्ष्मी नारायण बनाम संथी, ए.आई.आर 2001 एस.सी 2110
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किसी व्यक्ति को विवाह या प्रसव के लिए मानसिक विकार के कारण अयोग्य करार करने के लिए यह साबित करना होगा कि उसकी बीमारी इस प्रकार है कि उसका वैवाहिक जीवन सहज नहीं है। प्रमाण का मानक कठोर होगा है। |
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23. टी. सरीथा बनाम टी. वी. सुब्बैया, ए.आई.आर 1983 ए. पी 356
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आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने धारित किया कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 असंवैधानिक है क्योंकि यह अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त व प्रत्याभूत और मानवीय गरिमा का उल्लंघन करती है। नोट- दाम्पत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापना : जब कि पति या पत्नी ने अपने को दूसरे के साहचर्य से किसी युक्तियुक्त प्रतिहेतु के बिना प्रत्याहृत कर लिया हो तब व्यथित पखकार दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन के लिए जिला न्यायालय में अर्जी द्वारा आवेदन कर सकेगा और न्यायालय ऐसी अर्जी में किये गये कथनों के सत्य के बारे में तथा इस बात के बारे में कि इसके लिए कोई वैध आधार नहीं है आवेदन मंजूर क्यों न कर लिया जाए अपना समाधान हो जाने पर दाम्पत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन डिक्री दे सकेगा। |
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24. सरोज रानी बनाम सुदर्शन कुमार, ए.आई.आर 1984 एस. सी 1562 |
उच्चतम न्यायालय ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 की संवैधानिकता को प्रदान की। |
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25. रवि कुमार बनाम जुल्मी देवी, (2010)4 एस.सी.सी 476,
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क्रूरता को निर्धारित करने के लिए मामलों के सभी तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार किया जाना चाहिए। इसके लिए कोई पूर्व-निर्धारित सूत्र नहीं है। वैवाहिक संबंधों में क्रूरता का अर्थ है कि वैवाहिक जीवन में आपसी सम्मान तथा आपसी समझ का अभाव जो रिश्तों में कड़वाहट पैदा कर देते हैं। कुछ परिस्थितियों में मौन भी क्रूरता के बराबर हो सकती है। |
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26. शोभा रानी बनाम एम. रेड्डी, ए.आई.आर 1988 एस. सी 121
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जब न्यायालय के समक्ष क्रूरता का प्रश्न आता है तो वह दो चीजों की जांच करती है- (1) परिवाद में आचरण की प्रकृति, (2) परिवाद करने वाले दंपति पर इसका प्रभाव, कुछ मामलों में आचरण ही इतना बुरा होता है कि इसके प्रभाव पर विचार करने की आवश्यकता नहीं होती है। क्रूरता की अवधारणा पक्षकारों के जीवन, आर्थिक तथा सामाजिक परिस्थितियों के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। |
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27. वी. भगत बनाम डी. भगत, ए.आई.आर 1994 एस. सी 710
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मानसिक क्रूरता को सामान्य तौर पर ऐसे आचरण के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो दूसरे पक्ष को ऐसे मानसिक कष्ट और पीड़ा देता है कि दूसरे पक्ष को एक दूसरे के साथ रहना असंभव कर देता है। मानसिक क्रूरता की प्रकृति ऐसी होनी चाहिए कि जिसके कारण पक्षकार उचित तरीके से साथ रहने की अपेक्षा न करते हों। |
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28. प्रवीन मेहता बनाम इंद्रजीत मेहता, (2002)5 एस.सी.सी 706 |
मानसिक क्रूरता पति-पत्नी का एक-दूसरे से व्यवहार या व्यवहारगत स्वरूप की मानसिक दशा एवं अनुभूति होती है। मानसिक क्रूरता को प्रत्यक्ष सत्य से स्थापित करना कठिन है। यह मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के अनुमान से निकाली जानी चाहिए। |
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29. विजय कुमार रामचंद्र भाटी बनाम नीला विजय कुमार भाटी, ए.आई.आर 2003 एस. सी 2462 |
तलाक की कार्यवाही में या उसके दौरान शील का हनन क्रूरता माना जाता है। |
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30. नवीन कोहली बनाम नीलू कोहली (2006)4 एस.सी.सी 558 |
विवादास्पद (Irretrievable) विवाह का टूटना क्रूरता ही माना जाता है। |
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31. सुमन कपूर बनाम सुधीर कपूर, ए.आई.आर 2009 एस. सी 589 |
दुराशय (mens rea) क्रूरता में एक आवश्यक तत्व नहीं है। विधिक क्रूरता की संकल्पना, सामाजिक अवधारणा के उत्कर्ष एवं जीवन स्तर के सुधार के अनुसार बदलती रहती है। |
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32. बिपिन चंद्र बनाम प्रभावती, ए.आई.आर 1957 एस. सी 176
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अभित्याग के आशय के बिना अभित्याग नहीं हो सकता (There can be no desertion without animus deserdendi)। यह साबित करना होगा कि परित्यक्त पति-पत्नी दो साल की वैधानिक अवधि के दौरान अभित्यजन का आशय बना रहे थे। |
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33. मनीष गोयल बनाम रोहिणी गोयल, ए.आई.आर 2010 एस. सी 1099 |
संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विवाह के अवश्यंभावी विच्छेद के आधार पर तलाक को मंजूरी दी जा सकती है। |
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34. हीराचंद श्रीनिवास मनगांवकर बनाम सुनंदा, ए.आई.आर 2001 एस. सी 1285
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याची के पास तलाक से उपचार पाने का निहित अधिकार केवल यह दिखाने पर नहीं है कि मांगी गई राहत का समर्थन मौजूद है। यदि वह अवैध या अनैतिक कार्य करता है तो वह वैवाहिक मामलों में उपचार नहीं पा सकता है। |
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भरण-पोषण (Maintenance) |
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35. चांद धवन बनाम जवाहरलाल धवन, (1993) 3 एस.सी.सी 406 |
उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि धारा 25 के तहत 'डिक्री पारित करना' वाक्यांश से संकेत मिलता है कि स्थायी निर्वाह-व्यय और भरण-पोषण का आदेश तभी दिया जा सकता है जब कोई आदेश अधिनियम के तहत कोई स्थायी निर्वाह-व्यय देता है और उस स्थिति में नहीं जहां मुख्य याचिका को बखीस्त या वापस लिया जाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया कि जब विवाह कायम है, तो हिन्दू दत्तक ग्रहण एवम् भरण पोषण अधिनियम की धारा 18 लागू होगी और यदि विवाह कायम नहीं रहा है, तो हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 लागू होगी। |
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36. रमेशचंद्र डागा बनाम रामेश्वरी डागा, ए.आई.आर 2005 एस. सी 422 |
उच्चतम न्यायालय यह धारित किया कि एक दंपत्ति जिनका विवाह अकृत व शून्य हो, प्रथम विवाह के दौरान लंबित वाद में शून्यता की डिक्री पारित करने पर भरण-पोषण के हकदार हैं। |
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37. मोहिनी बनाम वीरेंद्र कुमार, (1977)3 एस.सी.सी 513
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उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि बच्चे की अभिरक्षा के निर्णय में नियंत्रक विचार माता-पिता के अधिकारों की बजाय अवयस्क का कल्याण होना चाहिए। |
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38. सुमेधा नागपाल बनाम दिल्ली राज्य, (2000) 9 एस.सी.सी 745
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सर्वोच्च न्यायालय ने धारित किया कि बच्चों की अभिरक्षा में पिता का अधिकार न तो पूर्ण है और न ही अनिश्चित। बच्चे के कल्याण का उच्च दर्जे का महत्व है। |
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39. गौरव नागपाल बनाम सुमेधा नागपाल, (2009)1 एस.सी.सी 42
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इस प्रश्न का निर्धारण करते हुए कि एक अप्राप्तवय बच्चे की अभिरक्षा किसको दी जाये, सर्वोपरि विचार 'बच्चे का कल्याण' होना चाहिए और तात्कालिक प्रवृत्त किसी संविधि के तहत अभिभावक का अधिकार नहीं है। |
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40. पद्मजा शर्मा बनाम रतन लाल शर्मा, ए.आई.आर 2000 एस. सी 1398
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माता की तरह अवयस्क बच्चे के भरण-पोषण का अधिक दायित्व पिता का है। यदि दोनों काम कर रहे हैं तो वेतन के अनुपात में उन्हें अपने बच्चों के भरण-पोषण के लिए अंशदान देना अनिवार्य है। |
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संयुक्त परिवार की संपत्ति एवं सहदायकी (Joint Family Property & Coparcenary) |
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41. नोपानी इन्वेस्टमेंट्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम संतोख सिंह (HUF), (2008)2 एस.सी.सी 728
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यदि हिंदू अविभाज्य परिवार (Hindu Undivided Family: HUF) का कर्ता दूरवर्ती स्थान पर (इस मामले में विदेश में) गया था और उचित समय के भीतर उसकी वापसी की संभावना नहीं थी, तो हिंदू अविभाज्य परिवार का कनिष्ठ सदस्य, परिवार के कर्ता के रूप में कार्य कर सकता है।
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42. अर्शनूर सिंह बनाम हरपाल कौर एवं अन्य, सिविल अपील नं. 5124 ऑफ 2019; 1.07.2019 को निर्णीत |
उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया है कि मिताक्षरा विधि के अधीन नियम है कि जब भी कोई पुरुष पूर्वज अपने पैतृक पूर्वजों से किसी संपत्ति को अपने पिता के ऊपर तीन डिग्री तक उत्तराधिकार में प्राप्त करता है तब उसके पुरुष विधिक उत्तराधिकारियों को उसके नीचे तीन डिग्री तक समान अधिकार प्राप्त होगा जैसा कि उस संपत्ति में उत्तराधिकार के मामले में सहदायिकी के रूप में लागू होगा, जो हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 से पूर्व अस्तित्व में था। इस नियम को लागू करते हुए न्यायालय ने अर्शनूर सिंह द्वारा दायर अपील की अनुमति दी, जिससे वर्ष 1999 में उनके पिता धरम सिंह द्वारा निष्पादित विक्रय विलेख (Sale Deed) को रद्द किया जा सके। इस विक्रय विलेख के अनुसार धरम सिंह द्वारा संयुक्त परिवार की संपत्ति को प्रतिवादी हरपाल कौर को दे दिया गया था, जिसे उन्होंने बाद में दूसरी पत्नी के रूप में शादी की। वर्ष 2003 में वयस्कता हासिल करने के बाद वर्ष 2004 में दायर एक वाद में अर्शनूर सिंह द्वारा विक्रय विलेख को चुनौती दी गई थी। उन्होंने दावा किया था कि संपत्तियां सहदायिक की थीं, जिन्हें धर्म सिंह ने बिना किसी विधिक आवश्यकता के और बिना प्रतिवादी से कोई प्रतिफल प्राप्त किये, दे दिया था। |
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43. गोविंद भाई छोटा भाई पटेल और अन्य बनाम पटेल रमन भाई माथुर भाई, 2019 एस.सी.सी on line 1245 |
उच्च्चतम न्यायालय ने धारित किया कि मिताक्षरा विधि के अनुसार उत्तराधिकार, वसीयत/उपहार के रूप में पुत्र को दी गई पिता की स्वयं अर्जित संपत्ति, अपने स्वयं अर्जित संपत्ति का चरित्र बनाए रखेगी और वह पैतृक संपत्ति नहीं मानी जाएगी जब तक विपरीत आशय वसीयतनामा में व्यक्त नहीं किया जाएगा। |
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44. राधाम्मा और अन्य बनाम मुहूकृष्ण और अन्य, (2019)3 एस.सी.सी 611
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उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि किसी संयुक्त परिवार संपत्ति में, हिंदू का अविभाज्य हित, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 30 के अनुसार वसीयत द्वारा निपटाया जा सकता है। |
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45. डोडामुनियप्पा थू LRS बनाम मुनिस्वामी और अन्य, (2019) 4 एस.एल.टी 294 |
उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया है कि पिता द्वारा विरासत में मिली संपत्ति पुत्रों के लिए एक संयुक्त पारिवारिक संपत्ति बन जाती है। |
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46. खुशी राम बनाम नवल सिंह, (सिविल अपील संख्या 5167/20104) LL 2021 SC 106 |
इस वाद में न्यायालय ने कहा "धारा 15(1)(डी) के अवलोकन से संकेत मिलता है कि पिता के वारिसों में वो शमिल हैं, जो उत्तराधिकारी हो सकते हैं। जब एक महिला के पिता के उत्तराधिकारी को ऐसे व्यक्ति के रूप में शामिल किया जाता है जो संभवतः वो वारिस हो सकता है, यह नहीं माना जा सकता कि वो अपरिचित है और परिवार की महिला को सदस्य की योगयता नहीं देते हैं। "एक हिंदू महिला अपने माता-पिता की ओर अपने उत्तराधिकारी के साथ पारिवारिक समझौते में शामिल हो सकती है।" |
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47. रुखमाबाई बनाम लक्ष्मी नारायण, ए.आई.आर 1960 एस. सी 335 |
प्रत्येक हिंदू परिवार की सामान्य स्थिति यह है कि यह एक संयुक्त परिवार है और इसे भोजन, पूजा और संपत्ति में संयुक्त मान लिया जाता है और यह संयुक्त बने रहते हैं। |
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48. सीता बाई बनाम रामचंद्र, ए.आई.आर 1970 एस. सी 343
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एक मात्र जीवित सहदायिक की मृत्यु होने पर भी संयुक्त हिन्दू परिवार का अंत तब तक नहीं हो जाता जब तक इसमें पुरुष सदस्य को जोड़ना विधिक अथवा प्राकृतिक रूप से संभव है। |
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49. कालिवी दामोदर गर्दै (डी) बनाम मनोहर लक्ष्मण कुलकर्णी, सिविल अपील नं. 6642-6643/2010 |
सर्वोच्च न्यायालय ने इस वाद में कहा कि गोद लिए गए किसी व्यक्ति के ऐसे बच्चे जो उसके गोद लेने से पहले जन्मे हैं, उन्हें गोद लेने वाले परिवार से अपने पिता को मिली संपत्ति में अधिकार मिलेगा। |
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50. के. ओ. रेड्डी बनाम वेंकट नारायण रेड्डी, ए.आई.आर 1984 एस. सी 1171 |
ऐसी कोई उपधारणा नहीं है कि संयुक्त परिवार के पास संयुक्त संपत्ति है। |
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51. इनकम टैक्स कमिश्नर बनाम गोमदाल्ली लक्ष्मीनारायण, ए.आई.आर 1935 बॉम्बे 412 |
एकल जीवित सहदायिक के संपत्ति पर हिन्दू अविभाज्य परिवार की तरह कर लगाया जा सकता है। |
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52. कृष्ण प्रसाद बनाम सी.आई. टी. बेंगलुरु ए.आई.आर. 1975 एस.सी 498 |
संयुक्त हिन्दू परिवार में हिन्दू पुरुष और उसकी पत्नी सम्मिलित हो सकते हैं। इसमें दो महिला सदस्य भी हो सकते हैं किंतु कम से कम दो सदस्य इसके गठन हेतु होने चाहिए। |
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53. माखन सिंह बनाम कुलवंत सिंह, ए.आई.आर. 2007 एस.सी 1808; डी.एस. लक्ष्मैया बनाम एल. बालासुब्रमण्यम, (2003) 10 एस.सी.सी 310 |
किसी संपत्ति को केवल संयुक्त हिन्दू परिवार के अस्तित्व के कारण संयुक्त हिन्दू परिवार की संपत्ति उपधारित नहीं की जा सकती है जो यह दावा करता है उसे यह साबित करना होगा है कि संपत्ति एक संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति है। |
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54. श्रीमती दीपू बनाम वासन सिंह, ए.आई.आर. 1983 एस.सी 846
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एकल जीवित सहदायिक द्वारा धारित संपत्ति उसकी अलग संपत्ति हो सकती है और उसकी मृत्यु पर यह उसके उत्तराधिकारियों पर उत्तराधिकार द्वारा देय होगी और संपार्शविक (collaterals) को वरीयता देने वाली कोई भी प्रथा शून्य होगी। |
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55. मकतूल बनाम मनभरी, ए.आई.आर. 1958 एस.सी 241
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उच्च्चतम न्यायालय ने धारित किया कि उसके नाना के किसी व्यक्ति द्वारा विरासत में ली गई संपत्ति उसके वंशजों के लिए पैतृक नहीं है। |
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56. अरुणाचलम बनाम मुरूगनथा, ए.आई.आर. 1953 एस.सी 495
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मीताक्षरा पिता किसी अपरिचित को अपने बेटे की सहमति के बिना अपनी संपत्ति बेचने में सक्षम है। दूसरों के अपकार के लिए वह अपने बेटों में से एक को भी ऐसी संपत्ति दान कर सकता है। ऐसे मामलों में यह धारण करना संभव नहीं है कि ऐसी सम्पत्ति वसीयत में दी गई या दान में दी गई, जिसका स्थान पैतृक संपत्ति के रूप में बहुत आवश्यक हो। |
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57. त्रिभुवन दास बनाम गुजरात राजस्व अधिकरण, (1991)3 एस.सी.सी 442
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संयुक्त हिंदू संपत्ति का सबसे छोटा सदस्य निम्न परिस्थितियों में संयुक्त परिवार की संपत्ति के प्रबंधक के रूप में कार्य कर सकता है- (1) यदि वरिष्ठ सदस्य या कर्ता उपलब्ध नहीं है। (2) जहां कर्ता ने अभिव्यक्त या विवक्षित रूप से अधिकार छोड़ दिए हैं। (3) अपवादात्मक और असाधारण परिस्थितियों में जो सारे परिवार को प्रभावित करती हो। रानी बनाम शांता, ए.आई.आर. 1971 एस.सी 1028 विधिक आवश्यकता के आधार पर हिंदू संयुक्त परिवार की संपत्ति के हस्तांतरण के लिए ऐसी आवश्यकता एकमात्र कसौटी नहीं है बल्कि संपदा पर दबाव गंभीर और पर्याप्त माना जा सकता है। |
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58. बालमुकुंद बनाम कमलावती, ए.आई.आर. 1964 एस.सी 1385
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जब कर्ता द्वारा संयुक्त परिवार की संपत्ति का हस्तांतरण किसी विधिक आवश्यकता या लाभ के लिए नहीं किया था, तो उक्त संक्रमण अन्य सहदायिकों के विकल्प पर शून्यकरणीय है। |
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विविध (Miscellaneous) |
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59. भागवत शरण (मृत द्वारा विधिक प्रतिनिधिगण) बनाम पुरुषोत्तर एवं अन्य, 3 अप्रैल, 2020 |
न केवल परिवार की संयुक्तता को सिद्ध किया जाना आवश्यक है बल्कि उसे सिद्ध करने का भार उस व्यक्ति पर भी है जिसने संयुक्त परिवार की विद्यमानता का अभिकथन किया है कि वह सम्पत्ति हिंदू परिवार की है जब तक कि यह दर्शित करने के लिए अभिलेख में कोई भी सामग्री न हो कि सम्पत्ति संयुक्त हिंदू परिवार का केंद्रक है अथवा उसे इस केंद्रक से आने वाली निधियों द्वारा क्रय किया गया था। |
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60. श्रुति कौशल बनाम कौशल आर बिस्ट, 2020 एस. सी. सी. ऑनलाइन एस.सी. 913 |
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 21 क (2) (ख) के तहत वाक्यांश "बाद में प्रस्तुत याचिका" में वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए अधिनियम की धारा 9 के तहत दाखिल एक याचिका शामिल नहीं है। धारा 21 ए की उपधारा (1) उस स्थिति का निपटान करती है जिसमें विवाह के लिए एक पक्ष ने धारा 10 के तहत न्यायिक पृथक्करण के लिए या अधिकारिता रखने वाले जिला न्यायालय के समक्ष धारा 13 के तहत तलाक की डिक्री के लिए याचिका दायर की है और तत्पश्चात् विवाह के लिए दूसरा पक्ष या तो धारा 10 के अधीन या धारा 13 के अधीन, उसी जिला न्यायालय में या किसी भिन्न जिला न्यायालय में उसी राज्य में या किसी दूसरे राज्य में याचिका दायर करता है।
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61. राजेश बनाम नेहा, 2020 एस. सी. सी. ऑनलाइन एस.सी. 903 |
सर्वोच्च न्यायालय ने पत्नी के रख-रखाव के मुद्दे पर दिशनिर्देश तैयार किए, रखरखाव का भुगतान करने के लिए विभिन्न अधिनियमों के अधीन अतिव्यापी अधिकारिता को कवर करने, अंतरिम रखरखाव, रखरखाव की मात्रा निर्धारित करने के लिए मापदंड, जिस तारीख से रखरखाव अधिनिर्णीत किया जाना है, और रखरखाव के आदेश का प्रवर्तन किया जाना है। (i) जहाँ विभिन्न संविधियों के तहत एक पक्ष द्वारा भरण-पोषण के लिए उत्तरोत्तर दावे किए जाते हैं, न्यायालय पिछली कार्यवाही में अधिनिर्णित राशि का समायोजन या निर्धारित करने पर विचार करेगा, जबकि यह निर्धारित करते हुए कि आगे की कार्यवाही में कोई और राशि अधिनिर्णित की जानी चाहिए। (ii) आवेदक के लिए पूर्व कार्यवाही प्रकट करना और उसमें पारित आदेश को पश्चात्वर्ती कार्यवाही में प्रकट करना अनिवार्य बना दिया गया है। यदि पूर्व कार्यवाही में पारित आदेश में किसी संशोधन या परिवर्तन की आवश्यकता होती है, तो उसे उसी कार्यवाही में करने की आवश्यकता होगी। (iii) रखरखाव के लिए दावा करने वाले आवेदक को आस्तियों के प्रकटीकरण के शपथ-पत्र के साथ एक संक्षिप्त आवेदन दाखिल करना होगा। (iv) प्रत्यर्थी को अधिकतम चार सप्ताह की अवधि के भीतर प्रकटीकरण के शपथ-पत्र के साथ जवाब प्रस्तुत करना होगा। संपत्ति और दायित्वों के प्रकटीकरण की शपथ-पत्र दोनों पक्षों द्वारा रखरखाव की कार्यवाही में दाखिल की जाएगी, जिसमें पूरे देश के, जैसा भी मामला हो, संबंधित परिवार न्यायालय/जिला न्यायालय/मजिस्ट्रेट न्यायालय के समक्ष लंबित कार्यवाही शामिल है। (v) न्यायालय प्रत्यर्थी के प्रति आस्तियों और दायित्वों के प्रकटीकरण के शपथ-पत्र प्रस्तुत करने के दो से अधिक अवसर प्रदान नहीं कर सकते हैं। यदि प्रत्यर्थी शपथ-पत्र के साथ उत्तर दाखिल करने में विलंब करता है और इस प्रयोजन के लिए दो से अधिक स्थगन चाहता है तो न्यायालय प्रत्यर्थी की प्रतिरक्षा को खत्म करने की शक्ति का प्रयोग करने पर विचार कर सकता है, यदि कार्यवाही अविलम्ब करने में आचरण इच्छित और कठोर पाया जाता है। (vi) निर्धारित समय के भीतर शपथ-पत्र दाखिल करने में असफल रहने पर, परिवार न्यायालय आवेदक द्वारा दाखिल शपथ-पत्र और अभिलेख पर अभिवचन के आधार पर भरण-पोषण के लिए आवेदन का निर्णय ले सकता है। (vii) एक पक्ष की आय अक्सर दूसरे पति या पत्नी के ज्ञान के भीतर नहीं होती है। इसलिए, न्यायालय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 106 का आह्वान कर सकता है, यदि आवश्यक हो, क्योंकि पति/पत्नी की आय, संपत्ति और दायित्व संबंधित पक्ष के व्यक्तिगत ज्ञान के भीतर हैं। (viii) यदि कार्यवाही के दौरान किसी पक्ष की वित्तीय स्थिति में परिवर्तन हो या किसी प्रासंगिक परिस्थिति में कोई परिवर्तन हो, या कोई नई जानकारी प्रकाश में आए तो पक्षकार एक संशोधित/पूरक शपथ-पत्र प्रस्तुत कर सकता है, जिस पर अंतिम निर्धारण के समय न्यायालय द्वारा विचार किया जाएगा। (ix) भरण-पोषण और जवाब के लिए आवेदन में दी गई अभिवचन उत्तरदायी अभिवचन होना चाहिए, यदि मिथ्या बयान और गलत बयान दिए जाते हैं तो न्यायालय धारा 340 सी. आर. पी. सी. के अधीन कार्यवाही शुरू करने और न्यायालय की अवमानना पर विचार कर सकता है। (x) यदि पक्ष आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग ("ई डब्ल्यू एस") से संबंधित हों या गरीबी रेखा ("बीपीएल) से नीचे रह रहे हों या आकस्मिक मजदूर हों, तो शपथ-पत्र दाखिल करने की आवश्यकता समाप्त कर दी जाएगी। (xi) संबंधित परिवार न्यायालय/जिला न्यायालय/मजिस्ट्रेट के न्यायालय को प्रकटीकरण के हलफनामे दाखिल किए जाने के बाद, नवीनतम पर चार से छह महीने की अवधि के भीतर अंतरिम भरण-पोषण के लिए आवेदन का निर्णय करने का प्रयास करना चाहिए। (xii) पक्ष पति/पत्नी को स्थायी भत्ते का निर्धारण करने के लिए संबंधित न्यायालय के समक्ष आय, व्यय, जीवन स्तर आदि के संबंध में मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य का नेतृत्व कर सकते हैं। (xiii) समकालीन समाज में, जहां कई विवाह उचित अवधि तक नहीं टिकता है, अपने विवाहिता पति या पत्नी को उसके शेष जीवन के लिए स्थायी निर्वाह का निदेश देना न्यायसंगत नहीं होगा। भुगतान किए जाने वाले स्थायी भत्ते का निर्धारण करने के लिए विवाह की अवधि को ध्यान में रखना प्रासंगिक कारक होगा। (xiv)बच्चों के लिए विवाह के लिए उचित खर्च देने के लिए प्रावधान स्थायी भत्ते का निर्धारण करने के समय किया जाना चाहिए जहां पत्नी के पास अभिरक्षा है। खर्च का निर्धारण पति की वित्तीय स्थिति और परिवार की रीति-रिवाजों को ध्यान में रखकर किया जाएगा। (xv) आवेदक को देय भरण-पोषण की मात्रा निर्धारित करने के लिए, कारक जो न्यायालय के साथ तौलेगा, अन्य बातों के साथ, वे हैं- पक्षों की स्थिति; पत्नी और आश्रित बच्चों की समुचित आवश्यकताएं; क्या आवेदक शिक्षित और व्यावसायिक रूप से योग्य है; क्या आवेदक के पास आय का कोई स्वतंत्र स्रोत है; जो आमदनी उसे जीवन के उस स्तर को बनाये रखने के लिए काफी है और जिस तरह वह अपने वैवाहिक घर में रहने की अभ्यस्त थी; क्या आवेदक को उसकी शादी से पहले नियोजित किया गया था; क्या वह शादी के निर्वाह के दौरान काम कर रही थी; विधि की यह सुनिश्चित प्रस्थापना है कि सभी विधियों को उत्तरव्यापी रूप से लागू करना समझा जाता है, यदि उन नियमों को पूर्वव्यापी रूप से लागू करने के लिए स्पष्ट रूप से विनिर्दिष्ट न किया गया हो या विधानमंडल ऐसा करने का आशय रखता हो। |
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62. रिजवान खान बनाम छत्तीसगढ़ राज्य, 2020 एस. सी. सी. ऑनलाइन एस सी 730
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स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (Narcotic Drugs and Psychotropic Substance Act, 1985) (एनडीपीएस अधिनियम) के तहत मामले को साबित करने के लिए, वाहन के स्वामित्व की स्थापना और सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है। यह स्थापित करने और साबित करने के लिए पर्याप्त है कि निषिद्ध वस्तु आरोपी से आरोपी द्वारा खरीदे गए वाहन से पाया गया। वाहन का स्वामित्व महत्वहीन है। जिसकी स्थापना और साबित करने की जरूरत है वह है निषिद्ध लेखों की वसूली और एन डी पी एस अधिनियम के तहत एक अपराध का घटित होना। |
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63. मुकेश बनाम राज्य (दिल्ली की मादक शाखा), 2020 एस. सी. सी. ऑनलाइन एस.सी. 700 |
स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (Narcotic Drugs and Psychotropic Substance Act, 1985) (एन.डी.पी.एस. अधिनियम) के तहत अभियुक्त एक पूर्ण नियम के रूप में दोषमुक्ति का हकदार नहीं है, केवल इसलिए कि शिकायतकर्ता जांच अधिकारी है। |
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64. रामबाबू सिंह ठाकुर बनाम सुनील अरोरा, 2020 एस. सी. सी. ऑनलाइन एस.सी. 178 |
उच्चतम न्यायालय ने सभी राजनीतिक दलों को चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के खिलाफ लंबित आपराधिक वादों के विवरण को अपने वेबसाईट पर अपलोड करने का निर्देश दिया। न्यायालय ने निर्णय दिया कि राजनीतिक दलों के लिए लंबित आपराधिक मामलों वाले व्यक्तियों (अपराध की प्रकृति और संबंधित ब्यौरे जैसे कि क्या आरोप लगाये गए हैं, संबंधित न्यायालय, मुकदमा संख्या आदि) के संबंध में अपने वेबसाइट पर विस्तृत जानकारी अपलोड करना अनिवार्य होगा, इनके चयन के कारणों के साथ, साथ ही क्यों अन्य आपराधिक पूर्ववर्तियों के बिना व्यक्तियों को उम्मीदवारों के रूप में नहीं चुना जा सकता है। |
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65. पृथ्वीराज चौहान बनाम भारत संघ, 2020 एस. सी. सी. ऑनलाइन एस.सी. 159 |
उच्चतम न्यायालय ने अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचारों की रोकथाम) संशोधन अधिनियम, 2018 की संवैधानिक वैधता को सही ठहराया और अभिनिर्धारित किया कि न्यायालय केवल उन मामलों में प्रत्याशित जमानत प्रदान कर सकता है जहां प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनाया गया है। |