
सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 (1955 का 22) की धारा 10क के उपबंध, जहां तक हो सकें, इस अधिनियम के अधीन सामूहिक जुर्माना अधिरोपित करने और उसे वसूल करने के प्रयोजनों के लिए (1 और उससे संबद्ध सभी अन्य विषयों के लिये लागू होंगे।
यदि जिला मजिस्ट्रेट या उपखंड मजिस्ट्रेट या किसी अन्य कार्यपालक मजिस्ट्रेट या किसी पुलिस अधिकारी को, जो पुलिस उप-अधीक्षक की पंक्ति से नीचे का न हो, इत्तिला प्राप्त होने पर और ऐसी जांच करने के पश्चात् जो यह आवश्यक समझे, यह विश्वास करने का कारण है कि किसी ऐसे व्यक्ति या ऐसे व्यक्तियों के समूह द्वारा, जो अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के नहीं हैं और जो उनकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर किसी स्थान पर निवास करते हैं या बार-बार आते-जाते हैं, इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध करने की संभावना है या उन्होंने अपराध करने की धमकी दी है और उसकी यह राय है कि कार्यवाही करने के लिये पर्याप्त आधार है तो वह उस क्षेत्र को अत्याचार ग्रस्त क्षेत्र घोषित कर सकेगा तथा शांति और सदाचार बनाए रखने तथा लोक व्यवस्था और प्रशांति बनाए रखने के लिये आवश्यक कार्रवाई कर सकेगा और निवारक कार्रवाई कर सकेगा।
(2) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अध्याय 9, अध्याय 11 और अध्याय 12 के उपबंध, जहां तक हो सके, उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिये लागू होंगे।
(3) राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, एक या अधिक स्कीमें वह रीति विनिर्दिष्ट करते हुए बना सकेगी जिसका उपधारा (1) में निर्दिष्ट अधिकारी अत्याचारों के निवारण के लिये तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों में सुरक्षा की भावना पुनः लाने के लिये स्कीम या स्कीमों में विनिर्दिष्ट समुचित कार्रवाई करेंगे।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 482 की कोई बात इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध करने के अभियोग पर किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी के किसी मामले के सम्बन्ध में लागू नहीं होगी।
(1) इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, -
(1. अधिनियम क्रमांक 27 सन् 2018 की धारा 2 द्वारा दिनांक 20-8-2018 से अंतः स्थापित।)
(क) किसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध प्रथम इत्तिला रिपोर्ट के रजिस्ट्रीकरण के लिए किसी प्रारंभिक जांच की आवश्यकता नहीं होगी, या
(ख) किसी ऐसे व्यक्ति की गिरफ्तारी, यदि आवश्यक हो, से पूर्व अन्वेषक अधिकारी को किसी अनुमोदन की आवश्यकता नहीं होगी,
जिसके विरुद्ध इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के किए जाने का अभियोग लगाया गया है और इस अधिनियम या संहिता के अधीन उपबंधित प्रक्रिया से भिन्न कोई प्रक्रिया लागू नहीं होगी।
(2) किसी न्यायालय के किसी निर्णय या आदेश या निदेश के होते हुए भी, भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 438 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 482) के उपबंध इस अधिनियम के अधीन किसी मामले को लागू नहीं होंगे।
19. इस अधिनियम के अधीन अपराध के लिए दोषी व्यक्तियों को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 401 या अपराधी परिवीक्षा अधिनियम के उपबन्ध का लागू न होना. -
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 401 के उपबन्ध और अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 (1958 का 20) के उपबन्ध अठारह वर्ष से अधिक आयु के ऐसे व्यक्ति के संबंध में लागू नहीं होंगे जो इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध करने का दोषी पाया जाता है।
इस अधिनियम में जैसा अन्यथा उपबन्धित है उसके सिवाय, इस अधिनियम के उपबन्ध, तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि या किसी रूढ़ि या प्रथा या किसी अन्य विधि के आधार पर प्रभाव रखने वाली किसी लिखत में उससे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे।
(1) राज्य सरकार, ऐसे नियमों के अधीन रहते हुए जो केन्द्रीय सरकार इस निमित्त बनाए, इस अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन के लिये ऐसे उपाय करेगी जो आवश्यक हों।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे उपायों के अंतर्गत निम्नलिखित हो सकेगा, -
(i) ऐसे व्यक्तियों को, जिन पर अत्याचार हुआ है, न्याय प्राप्त करने में समर्थ बनाने के लिए पर्याप्त सुविधाओं की, जिनके अंतर्गत विधिक सहायता भी है, व्यवस्था;
(ii) इस अधिनियम के अधीन अपराध के अन्वेषण और विचारण के दौरान साक्षियों, जिनके अंतर्गत अत्याचार से पीड़ित व्यक्ति भी हैं, यात्रा और भरणपोषण के व्यय की व्यवस्था;
(iii) अत्याचारों से पीड़ित व्यक्तियों के आर्थिक और सामाजिक पुनरुद्धार की व्यवस्था;
(iv) इस अधिनियम के उपबंधों के उल्लंघन के लिए अभियोजन प्रारम्भ करने या उनका पर्यवेक्षण करने के लिए अधिकारियों की नियुक्तिः
(v) ऐसे समुचित स्तरों, पर, जो राज्य सरकार, ऐसे उपायों की रचना या उनके क्रियान्वयन में के लिए उस सरकार की सहायता करने के लिए ठीक समझे, समितियों की स्थापना करना;
(vi) इस अधिनियम के उपबन्धों के बेहतर क्रियान्वयन करने के लिए उपायों को सुझाव देने की दृष्टि से इस अधिनियम के उपबन्धों के कार्यकरण का समय-समय पर सर्वेक्षण करने की व्यवस्था;
(vii) उन क्षेत्रों की पहचान जहां अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों पर अत्याचार होने की संभावना हो और ऐसे उपाय करना जिससे ऐसे सदस्यों की सुरक्षा अभिनिश्चित की जा सके।
(3) केन्द्रीय सरकार, ऐसे उपाय करेगी जो उपधारा (1) के अधीन राज्य सरकारों द्वारा किये गये उपायों में समन्वय करने के लिए आवश्यक हों।
(4) केन्द्रीय सरकार, प्रत्येक वर्ष, संसद् के प्रत्येक सदन के पटल पर इस धारा के उपबन्धों के अनुसरण में स्वयं उसके द्वारा और राज्य सरकारों द्वारा किये गये उपायों के संबंध में एक रिपोर्ट रखेगी।
इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक बैंक की गई या की जाने के लिये आशयित किसी बात के लिये कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही केंद्रीय सरकार के विरुद्ध या राज्य सरकार या सरकार के किसी अधिकारी या प्राधिकारी या किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध नहीं होगी।
(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, बना सकेगी।
(2) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाये जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जायेगा। यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी। यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो वह तत्पश्चात् ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जायेगा। किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभावी होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
1[ अनुसूची
[धारा 3(2) (vक)]
(1.अधिनियम क्रमांक 1 सन् 2016 की धारा 12 द्वारा दिनांक 26-1-2016 से अंत:स्थापित।)
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भारतीय दंड संहिता/ भारतीय न्याय संहिता, 2023 के अधीन धारा |
अपराध का विवरण |
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120क / 61(1) |
आपराधिक षड्यंत्र की परिभाषा। |
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120ख / 61(2) |
आपराधिक षड्यंत्र का दंड। |
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141 / 189 (1) |
विधिविरुद्ध जमाव । |
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142 / 189 (2) |
विधिविरुद्ध जमाव का सदस्य होना। |
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143 / 189 (2) |
विधिविरुद्ध जमाव के लिए दंड। |
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144/ 189 (4) |
घातक आयुध से सज्जित होकर विधिविरुद्ध जमाव में सम्मिलित होना। |
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145/ 189 (3) |
किसी विधिविरुद्ध जमाव में यह जानते हुए कि उसके बिखर जाने का समादेश दे दिया गया है, सम्मिलित होना या उसमें बने रहना। |
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146 / 191 (1) |
बल्वा करना। |
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147 / 191 (2) |
बल्वा करने के लिए दंड। |
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148 / 191 (3) |
घातक आयुध से सज्जित होकर बल्वा करना। |
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217 / 255 |
लोक सेवक द्वारा किसी व्यक्ति को दंड से या किसी संपत्ति के समपहरण से बचाने के आशय से विधि के निदेश की अवज्ञा। |
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319 / 114 |
उपहति। |
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320 / 116 |
घोर उपहति। |
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323 / 115(2) |
स्वेच्छ्या उपहति कारित करने के लिए दंड। |
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324 / 118 |
खतरनाक आयुधों या साधनों द्वारा स्वेच्छया उपहति कारित करना। |
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325 / 117(1) |
स्वेच्छया घोर उपहति कारित करने के लिए दंड। |
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326 / 118 |
स्वेच्छ्या अम्ल फेकना या फेकने का प्रयत्न करना। |
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332 / 121 |
लोक सेवक को अपने कर्तव्य से भयोपरत करने के लिए स्वेच्छ्या उपहति कारित करना। |
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341 / 126 |
सदोष अवरोध के लिए दंड। |
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354 / 74 |
स्त्री की लज्जा भंग करने के आशय से उस पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग। |
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354 क / 75 |
लैंगिक उत्पीड़न और लैंगिक उत्पीड़न के लिए दंड। |
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354 ख / 76 |
विवस्त्र करने के आशय से स्त्री पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग। |
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354 ग / 77 |
दृश्यरतिकता। |
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354 घ / 78 |
पीछा करना। |
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359 / 137 |
व्यपहरण। |
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363 / 137 |
व्यपहरण के लिए दंड। |
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365 / 140 |
किसी व्यक्ति का गुप्त रीति से और सदोष परिरोध करने के आशय से व्यपहरण या अपहरण। |
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376 ख / 66 |
पति द्वारा अपनी पत्नी के साथ पृथक्करण के दौरान मैथुन। |
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376 ग / 67 |
प्राधिकार में किसी व्यक्ति द्वारा मैथुन। |
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447 / 329 (2) |
आपराधिक अतिचार के लिए दंड। |
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506 / 351(2) |
आपराधिक अभित्रास के लिए दंड। |
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509 / 79 |
शब्द, अंगविक्षेप या कार्य जो किसी स्त्री की लज्जा का अनादर करने के लिए आशयित है।] |
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