
जो कोई, इस अधिनियम के किसी उपबंध या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम या निकाले गए किसी आदेश या दी गई किसी अनुज्ञप्ति की शर्त के उल्लंघन में पोस्त तृण का उत्पादन, कब्जा, परिवहन, अंतरराज्यिक आयात, अंतरराज्यिक निर्यात, विक्रय, क्रय, उपयोग करेगा या उसको भांडागारण में रखने का लोप करेगा या भांडागारित पोस्त तृण को हटाएगा या उसकी बाबत कोई कार्य करेगा, वह, -(1. अधिनियम क्र० 9 सन् 2001 द्वारा दिनांक 2-10-2001 से प्रतिस्थापित।)
(क) जहां उल्लंघन अल्प मात्रा से संबंधित है, वहां कठोर कारावास से, जिसकी अवधि 2[ एक वर्ष] तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा, अथवा दोनों से; (2. अधिनियम क्र० 16 सन् 2014, धारा 6 द्वारा "छह मास" शब्दों के स्थान पर दिनांक 1-5-2014 से प्रतिस्थापित।
(ख) जहां उल्लंघन वाणिज्यिक मात्रा से कम किंतु अल्प मात्रा से अधिक मात्रा से संबंधित है, वहां कठोर कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से जो एक लाख रुपए तक का हो सकेगा;
(ग) जहां उल्लंघन वाणिज्यिक मात्रा से संबंधित है, वहां कठोर कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष से कम की नहीं होगी किंतु बीस वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से भी, जो एक लाख रुपए से कम का नहीं होगा किंतु दो लाख रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा :
परंतु न्यायालय, ऐसे कारणों से, जो निर्णय में लेखबद्ध किए जाएंगे, दो लाख रुपए से अधिक का जुर्माना अधिरोपित कर सकेगा।]
जो कोई, इस अधिनियम के किसी उपबंध या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम या निकाले गए किसी आदेश या दी गई अनुज्ञप्ति की शर्त के उल्लंघन में किसी कोका के पौधे की खेती करेगा या कोका के पौधे के किसी भाग का संग्रह या कोका की पत्तियों का उत्पादन, कब्जा, विक्रय, क्रय, परिवहन, अंतरराज्यिक आयात, अंतरराज्यिक निर्यात या उपयोग करेगा, वह कठोर कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने से, जो एक लाख रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा।] (3. अधिनियम क्र० 9 सन् 2001 द्वारा दिनांक 2-10-2001 से प्रतिस्थापित।)
जो कोई, इस अधिनियम के किसी उपबंध या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम या निकाले गए किसी आदेश या दी गई अनुज्ञप्ति की शर्त के उल्लंघन में निर्मित अफीम का विनिर्माण, कब्जा, क्रय, विक्रय, परिवहन, अंतरराज्यिक आयात, अंतरराज्यिक निर्यात्त या उपयोग करेगा, वह,一 (1.अधिनियम क्र० 9 सन् 2001 द्वारा दिनांक 2-10-2001 से प्रतिस्थापित।)
(क) जहां उल्लंघन अल्प मात्रा से संबंधित है, वहां कठोर कारावास से, जिसकी अवधि 2[ एक वर्ष] तक की हो सकेगी, या जुर्माने से जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा अथवा दोनों से; या (2. अधिनियम क्र० 16 सन् 2014, धारा 7 द्वारा "छह मास" शब्दों के स्थान पर दिनांक 1-5-2014 से प्रतिस्थापित।)
(ख) जहां उल्लंघन वाणिज्यिक मात्रा से कम किंतु अल्प मात्रा से अधिक मात्रा से संबंधित है, वहां कठोर कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से, जो एक लाख रुपए तक का हो सकेगा; या
(ग) जहां उल्लंघन वाणिज्यिक मात्रा से संबंधित है, वहां कठोर कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष से कम की नहीं होगी किंतु बीस वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से भी, जो एक लाख रुपए से कम का नहीं होगा कितु दो लाख रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा :
परंतु न्यायालय, ऐसे कारणों से, जो निर्णय में लेखबद्ध किए जाएंगे, दो लाख रुपए से अधिक का जुर्माना अधिरोपित कर सकेगा।]
जो कोई, इस अधिनियम के किसी उपबंध या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम या निकाले गए किसी आदेश या दी गई अनुज्ञप्ति की शर्त के उल्लंघन में निर्मित अफीम पोस्त की खेती या अफीम का उत्पादन, विनिर्माण, कब्जा, विक्रय, क्रय, परिवहन, अंतरराज्यिक आयात, अंतरराज्यिक निर्यात या उपयोग करेगा, वह, -(3. अधिनियम क्र० 9 सन् 2001 द्वारा दिनांक 2-10-2001 से प्रतिस्थापित।)
(क) जहां उल्लंघन अल्प मात्रा से संबंधित है, वहां कठोर कारावास से, जिसकी अवधि 4[एक वर्ष] तक की हो सकेगी, या जुर्माने से जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा अथवा दोनों से; (4. अधिनियम क्र० 16 सन् 2014, धारा 8 द्वारा "छह मास" शब्दों के स्थान पर दिनांक 1-5-2014 से प्रतिस्थापित।)
(ख) जहां उल्लंघन वाणिाज्यिक मात्रा से संबंधित है, वहां कठोर कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष से कम की नहीं होगी किंतु बीस वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से भी, जो एक लाख रुपए से कम का नहीं होगा किंतु दो लाख रुपए तक का हो सकेगाः
परंतु न्यायालय ऐसे कारणों से, जो निर्णय में लेखबद्ध किए जाएंगे, दो लाख रुपए से अधिक का जुर्माना अधिरोपित कर सकेगा;
(ग) किसी अन्य मामले में, कठोर कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने से भी, जो एक लाख रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा।]
केन्द्रीय सरकार के लिए अफीम पोस्त की खेती करने के लिए अनुज्ञप्त जो कोई खेतिहर उत्पादित अफीम या उसके किसी भाग का गबन करेगा या उसका अन्यथा अवैध व्ययन करेगा वह कठोर कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष से कम की नहीं होगी किन्तु बौस वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने से भी, जो एक लाख रुपए से कम का नहीं होगा किन्तु दो लाख रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा :
परन्तु न्यायालय, ऐसे कारणों से, जो निर्णय में लेखबद्ध किए जाएंगे, दो लाख रुपए से अधिक का जुर्माना अधिरोपित कर सकेगा।
जो कोई, इस अधिनियम के किसी उपबंध या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम या निकाले गए किसी आदेश या दी गई अनुज्ञप्ति की शर्त के उल्लंघन में, -
(क) किसी कैनेबिस के पौधे की खेती करेगा; या
(ख) कैनेबिस का उत्पादन, विनिर्माण, कब्जा, विक्रय, क्रय परिवहन, अंतरराज्यिक आयात, अंतरराज्यिक निर्यात या उपयोग करेगा-
1[(1) जहां उल्लंघन खंड (क) के संबंध में है वहां, कठोर कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से भी, जो एक लाख रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा; और (1. अधिनियम क्र० 9 सन् 2001 द्वारा दिनांक 2-10-2001 से प्रतिस्थापित।।)
(ii) जहां उल्लंघन खंड (ख) के संबंध में है, -
(अ) और अल्पमात्रा से संबंधित है, वहां कठोर कारावास से, जिसकी अवधि 2[ एक वर्ष] तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा, अथवा दोनों से, (2. अधिनियम क्र० 16 सन् 2014, धारा 9 द्वारा "छह मास" शब्दों के स्थान पर दिनांक 1-5-2014 से प्रतिस्थापित।)
(आ) और जहां वाणिज्यिक मात्रा से कम किंतु अल्प मात्रा से अधिक मात्रा से संबंधित है, वहां कठोर कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने से, जो एक लाख रुपए तक का हो सकेगा,
(इ) और जहां वाणिज्यिक मात्रा से संबंधित है, वहां, कठोर कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष से कम की नहीं होगी किंतु बीस वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने से भी, जो एक लाख रुपए से कम का नहीं होगा कितु जो दो लाख रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा:
परंतु न्यायालय, ऐसे कारणों से, जो निर्णय में लेखबद्ध किए जाएंगे, दो लाख रुपए से अधिक का जुर्माना अधिरोपित कर सकेगा।]
जो कोई, इस अधिनियम के किसी उपबंध या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम या निकाले गए किसी आदेश या दी गई अनुज्ञप्ति की शर्त के उल्लंघन में किसी विनिर्मित ओषधि का या किसी विनिर्मित ओषधि को अंतर्विष्ट करने वाली किसी निर्मिति का विनिर्माण, कब्जा, विक्रय, क्रय, परिवहन, अंतरराज्यिक आयात, अंतरराज्यिक निर्यात या उपयोग करेगा, वह, -
(क) जहां उल्लंघन अल्प मात्रा से संबंधित है, वहां कठोर कारावास से, जिसकी अवधि 1[एक वर्ष] तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा अथवा दोनों से; (1.अधिनियम क्र० 16 सन् 2014, धारा 10 द्वारा "छह मास" शब्दों के स्थान पर दिनांक 1-5-2014 से प्रतिस्थापित।)
(ख) जहां उल्लंघन वाणिज्यिक मात्रा से कम किंतु अल्प मात्रा से अधिक मात्रा से संबंधित है, वहां कठोर कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने से, जो एक लाख रुपए तक का हो सकेगा;
(ग) जहां उल्लंघन वाणिज्यिक मात्रा से संबंधित है वहां, कठोर कारावास से जिसकी अवधि दस वर्ष से कम की नहीं होगी किंतु बीस वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने से भी, जो एक लाख रुपए से कम का नहीं होगा, किंतु दो लाख रुपए तक का हो सकेगा,
दंडनीय होगा :
परंतु न्यायालय, ऐसे कारणों से, जो निर्णय में लेखबद्ध किए जाएंगे, दो लाख रुपए से अधिक का जुर्माना अधिरोपित कर सकेगा।]
जो कोई इस अधिनियम के किसी उपबंध या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम या निकाले गए किसी आदेश या दी गई अनुज्ञप्ति की शर्त के उल्लंघन में किसी मनःप्रभावी पदार्थ का विनिर्माण, कब्जा, विक्रय, क्रय, परिवहन, अंतरराज्यिक आयात, अंतरराज्यिक निर्यात या उपयोग करेगा, वह, - (2. अधिनियम क्र० 9 सन् 2001 द्वारा दिनांक 2-10-2001 से प्रतिस्थापित।)
(क) जहां उल्लंघन अल्प मात्रा से संबंधित है, वहाँ कठोर कारावास से, जिसकी अवधि 3[एक वर्ष] तक की हो सकेगी या जुर्माने से, जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा अथवा दोनों से; (3. अधिनियम क्र० 16 सन् 2014, धारा 11 द्वारा "छह मास" शब्दों के स्थान पर दिनांक 1-5-2014 से प्रतिस्थापित।)
(ख) जहा उल्लंघन वाणिज्यिक मात्रा से कम किन्तु अल्प मात्रा से अधिक मात्रा से संबंधित है, वहाँ, कठोर कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने से, जो एक लाख रुपए तक का हो सकेगा ;
(ग) जहाँ उल्लंघन वाणिज्यिक मात्रा से संबंधित है वहाँ, कठोर कारावास से जिसकी अवधि दस वर्ष से कम की नहीं होगी किन्तु बीस वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने से भी, जो एक लाख रुपए से कम का नहीं होगा, किन्तु दो लाख रुपए तक का हो सकेगा,
दण्डनीय होगाः
परन्तु न्यायालय, ऐसे कारणों से, जो निर्णय में लेखबद्ध किए जाएंगे, दो लाख रुपए से अधिक का जुर्माना अधिरोपित कर सकेगा।]
4[23. स्वापक ओषधियों और मनः प्रभावी पदार्थों के अवैध रूप से भारत में आयात, भारत से निर्यात या यानांतरण के लिए दण्ड. -
जो कोई, इस अधिनियम के किसी उपबन्ध या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम या निकाले गए किसी आदेश या दी गई अनुज्ञप्ति या अनुज्ञापत्र की शर्त या उसके अधीन जारी किए गए प्रमाणपत्र या प्राधिकार के उल्लंघन में किसी स्वापक ओषधि या मनःप्रभावी पदार्थ का भारत में आयात करेगा या भारत से निर्यात करेगा या यानान्तरण करेगा, वह, - (4. अधिनियम क्र० 9 सन् 2001 द्वारा दिनांक 2-10-2001 से प्रतिस्थापित।)
(क) जहाँ उल्लंघन अल्प मात्रा से संबंधित है वहाँ, कठोर कारावास से, जिसकी अवधि 1[एक वर्ष] तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो हजार रुपए तक का हो सकेगा अथवा दोनों से; (1. अधिनियम क्र० 16 सन् 2014, धारा 12 द्वारा "छह मास" शब्दों के स्थान पर दिनांक 1-5-2014 से प्रतिस्थापित।)
(ख) जहाँ उल्लंघन वाणिज्यिक मात्रा से कम किन्तु अल्प मात्रा से अधिक मात्रा से संबंधित है, वहाँ कठोर, कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से, जो एक लाख रुपए तक का हो सकेगा।
(ग) जहाँ उल्लंघन वाणिज्यिक मात्रा से संबंधित है वहाँ, कठोर कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष से कम की नहीं होगी किन्तु बीस वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने से भी, जो एक लाख रुपए से कम का नहीं होगा, किन्तु दो लाख रुपए तक को हो सकेगा,
दण्डनीय होगा :
परन्तु न्यायालय, ऐसे कारणों से, जो निर्णय में लेखबद्ध किए जाएँगे, दो लाख रुपये से अधिक का जुर्माना अधिरोपित कर सकेगा।]
जो कोई, किसी ऐसे व्यापार में लगेगा या उसका नियंत्रण करेगा, जिसके द्वारा कोई स्वापक ओषधि या कोई मनःप्रभावी पदार्थ केन्द्रीय सरकार के पूर्व प्राधिकार के बिना या धारा 12 के अधीन दिए गए ऐसे किसी प्राधिकार की शर्तों से (यदि कोई हों) अन्यथा भारत के बाहर अभिप्राप्त किया जाता है और उसका भारत से बाहर किसी व्यक्ति को प्रदाय किया जाता है, वह कठोर कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष से कम की नहीं होगी किन्तु बीस वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने से भी, जो एक लाख रुपए से कम का नहीं होगा किन्तु दो लाख रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा :
परन्तु न्यायालय, ऐसे कारणों से, जो निर्णय में लेखबद्ध किए जाएंगे, दो लाख रुपए से अधिक का जुर्माना अधिरोपित कर सकेगा।
- जो कोई, किसी गृह, कक्ष, अहाते, जगह, स्थान, जीव-जन्तु या प्रवहण का स्वामी या अधिभोगी होते हुए अथवा उसका नियंत्रण या उपयोग करते हुए उसकी किसी अन्य व्यक्ति द्वारा इस अधिनियम के किसी उपबन्ध के अधीन दण्डनीय कोई अपराध करने के लिए उपयोग किए जाने की जानबूझकर अनुज्ञा देगा, वह उस अपराध के लिए उपबंधित दण्ड से दण्डनीय होगा।] (2. अधिनियम क्र० 9 सन् 2001 द्वारा दिनांक 2-10-2001 से प्रतिस्थापित।)
यदि कोई व्यक्ति धारा 9क के अधीन किए गए किसी आदेश का उल्लंघन करेगा जो कठोर कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने से भी, जो एक लाख रुपए तक का हो सकेगा दंडनीय होगा :
परन्तु न्यायालय, ऐसे कारणों से जो निर्णय में लेखबद्ध किए जाएंगे, एक लाख रुपए से अधिक का जुर्माना अधिरोपित कर सकेगा।]
यदि इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम या निकाले गए किसी आदेश के अधीन दी गई किसी अनुज्ञप्ति या अनुज्ञापत्र प्राधिकार का धारक अथवा उसके नियोजन में का और उसकी ओर से कार्य करने वाला कोई व्यक्ति –
(क) इस अधिनियम के उपबंधों या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम के अनुसार लेखा रखने या विवरणी प्रस्तुत करने का किसी युक्तियुक्त हेतुक के बिना लोप करेगा;
(ख) केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा उस निमित्त प्राधिकृत किसी अधिकारी की मांग पर ऐसी अनुज्ञप्ति, अनुज्ञापत्र या प्राधिकार पेश करने में किसी युक्तियुक्त हेतुक के बिना असफल रहेगा।
(ग) ऐसा कोई लेखा रखेगा या ऐसा कोई कथन करेगा जो मिथ्या है अथवा जिसके बारे में वह जानता है या उसे विश्वास करने का कारण है कि वह गलत है; या
(घ) ऐसी अनुज्ञप्ति, अनुज्ञापत्र या प्राधिकार की किसी शर्त को, जिसके लिए इस अधिनियम में अन्यत्र कोई शास्ति विहित नहीं की गई है, भंग करके, जानबूझकर और जानते हुए, कोई कार्य करेगा,
तो वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से, या दोनों से, दंडनीय होगा।
जो कोई, किसी स्वापक ओषधि या मनः प्रभावी पदार्थ का उपभोग करेगा, वह- (1. अधिनियम क्र० 9 सन् 2001 द्वारा दिनांक 2-10-2001 से प्रतिस्थापित।)
(क) जहाँ ऐसी स्वापक ओषधि या मनःप्रभावी पदार्थ, जिसका उपभोग किया गया है, कोकेन, मार्फिन, डाइऐसीटल मार्फिन या ऐसी कोई अन्य स्वापक ओषधि या ऐसा कोई मनःप्रभावी पदार्थ है, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट किया जाए, वहाँ, कठोर कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो बीस हजार रुपए तक का हो सकेगा, अथवा दोनों से ; और
(ख) जहाँ ऐसी स्वापक ओषधि या मनः प्रभावी पदार्थ का उपभोग किया गया है, जो खण्ड (क) में विनिर्दिष्ट ओषधि या पदार्थ से भिन्न है वहाँ, कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा, अथवा दोनों से,
दण्डनीय होगा।]
जो कोई प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः 3[धारा 2 के खंड (viii ख)] के उपखंड (i) से उपखंड (v) तक में विनिर्दिष्ट किसी क्रियाकलाप का वित्तपोषण करने में या पूर्व वर्णित क्रियाकलापों में से किसी क्रियाकलाप में लगे किसी व्यक्ति को संश्रय देने में संलग्न होगा, वह कठोर कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष से कम की नहीं होगी किन्तु जो बीस वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने से भी, जो एक लाख रुपए से कम का नहीं होगा किंतु जो दो लाख रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगाः(2. अधिनियम क्र० 2 सन् 1989 द्वारा दिनांक 29-5-89 से अन्तः स्थापित।)
परन्तु न्यायालय, ऐसे कारणों से जो निर्णय में लेखबद्ध किए जाएंगे; दो लाख रुपए से अधिक का जुर्माना अधिरोपित कर सकेगा।] (3. अधिनियम क्र० 48 सन् 2021 द्वारा दिनांक 1-5-2014 से भूतलक्षी प्रभाव से "धारा 2 के खंड (viii क)" के स्थान पर प्रतिस्थापित।)
जो कोई, धारा 8क के उपबंध का उल्लंघन करेगा, ऐसी अवधि के, जो तीन वर्ष से कम की नहीं होगी, किन्तु जो दस वर्ष तक की हो सकेगी, कठोर कारावास से दंडनीय होगा और 'जुर्माने के लिए भी दायी होंगा।] (4. अधिनियम क्र० 16 सन् 2014, धारा 13 द्वारा दिनांक 1-5-2014 से अंतःस्थापित।)
जो कोई इस अध्याय के अधीन दंडनीय कोई अपराध करने का या ऐसे अपराध का किया जाना कारित करने का प्रयत्न करेगा और ऐसा प्रयत्न करने में उस अपराध के संबंध में कोई कार्य करेगा, वह उस अपराध के लिए उपबंधित दंड से दंडनीय होगा।
(1) जो कोई इस अध्याय के अधीन दंडनीय किसी अपराध का दुष्प्रेरण करेगा या ऐसा कोई अपराध करने के आपराधिक षड्यंत्र का पक्षकार होगा, वह चाहे ऐसा अपराध ऐसे दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप, या ऐसे आपराधिक षडयंत्र के अनुसरण में किया जाता है या नहीं किया जाता है और भारतीय दंड संहिता, 1860 (1860 का 45) की धारा 116 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की 135 में किसी बात के होते हुए भी, उस अपराध के लिए उपबंधित दंड से दंडनीय होगा।
(2) वह व्यक्ति इस धारा के अर्थ में किसी अपराध का दुष्प्रेरण करता है या ऐसा कोई अपराध करने के आपराधिक षड्यंत्र का पक्षकार होता है जो भारत में, भारत से बाहर और परे किसी स्थान में ऐसा कोई कार्य किए जाने का भारत में दुष्प्रेरण करता है या ऐसे आपराधिक षड्यन्त्र का पक्षकार होता है, जो-
(क) यदि भारत के भीतर किया जाता तो, अपराध गठित करता, या
(ख) ऐसे स्थान की विधियों के अधीन स्वापक ओषधियों या मनःप्रभावी पदार्थों से संबंधित ऐसा अपराध है, जिसमें उसे ऐसा अपराध गठित करने के लिए अपेक्षित वैसी ही या उसके समरूप सभी विधिक शर्त है जैसी उसे इस अध्याय के अधीन दंडनीय अपराध गठित करने के लिए अपेक्षित विधिक शर्तें होर्ती यदि ऐसा अपराध भारत में किया जाता।
यदि कोई व्यक्ति, ऐसा कोई कार्य, जो 1[ धारा 19, धारा 24 और धारा 27क के किसी उपबन्ध के अधीन दण्डनीय अपराध और किसी ऐसे अपराध के लिए जो किसी स्वापक ओषधि या मनःप्रभावी पदार्थ की वाणिज्यिक मात्रा से सम्बन्धित है], गठित करता है, करने की तैयारी करेगा या करने का लोप करेगा और मामले की परिस्थितियों से युक्तियुक्त रूप में यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वह उस अपराध को करने के अपने आशय को कार्यान्वित करने के लिए दृढ़ संकल्प था किंतु उसे उसकी इच्छा से स्वतंत्र परिस्थितियों द्वारा रोका गया था तो वह कठोर कारावास से, जिसकी अवधि ऐसे कारावास की, जिससे यदि वह ऐसा अपराध करता तो दंडनीय होता, न्यूनतम अवधि (यदि कोई हो) के आधी से कम की नहीं होगी किन्तु ऐसे कारावास की, अधिकतम अवधि के आधे तक की हो सकेगी, और जुर्माने से भी, जो ऐसे जुर्माने की जिससे वह पूर्वोक्त दशा में दंडनीय होता, न्यूनतम रकम (यदि कोई हो) के आधे से कम का नहीं होगा किन्तु ऐसे जुर्माने की, जिससे वह साधारणतया (अर्थात् विशेष कारणों के अभाव में) दंडनीय होता, अधिकतम रकम के आधे तक का हो सकेगा, दंडनीय होगाः (1. अधिनियम क्र० 9 सन् 2001 द्वारा दिनांक 2-10-2001 से प्रतिस्थापित।)
परन्तु न्यायालय ऐसे कारणों से, जो निर्णय में लेखबद्ध किए जाएंगे, उच्चतर जुर्माना अधिरोपित कर सकेगा।
(1) यदि कोई व्यक्ति, जिसको इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय कोई अपराध करने या करने का प्रयत्न करने या उसका दुष्प्रेरण करने या करने का आपराधिक षड्यंत्र करने के लिए सिद्धदोष ठहराया गया है, तत्पश्चात् इस अधिनियम के अधीन उतने ही दण्ड से दण्डनीय कोई अपराध करने या करने का प्रयत्न या उसका दुष्प्रेरण करने या करने का अपाराधिक षड्यंत्र करने के लिए सिद्धदोष ठहराया जाता है तो वह, द्वितीय और प्रत्येक पश्चात्वतर्ती अपराध के लिए कठोर कारावास से, जिसकी अवधि कारावास की 1[अधिकतम अवधि के डेढ़ गुणे तक ] की हो सकेगी और जुर्माने से भी, जो जुर्माने की 2[ अधिकतम रकम के डेढ़ गुणे तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा। (1. अधिनियम क्र० 16 सन् 2014, धारा 14 (क) (1) द्वारा "अधिकतम अवधि के आधे तक" शब्दों के स्थान पर दिनांक 1-5-2014 से प्रतिस्थापित।)
(2. अधिनियम क्र० 16 सन् 2014, धारा 14 (क) (ii) द्वारा "अधिकतम रकम के आधे तक" शब्दों के स्थान पर दिनांक 1-5-2014 से प्रतिस्थापित।)
(2) जहाँ उपधारा (1) में निर्दिष्ट व्यक्ति कारावास की, न्यूनतम अवधि और जुर्माने की न्यूनतम रकम से दण्डित किए जाने का भागी है, वहाँ ऐसे व्यक्ति के लिए न्यूनतम दण्ड, कारावास की 3[न्यूनतम अवधि का डेढ़ गुणा] और जुर्माने की 4[ न्यूनतम रकम का डेढ़ गुणा] होगा : (3. अधिनियम क्र० 16 सन् 2014, धारा 14 (ख) (i) द्वारा "न्यूनतम अवधि का आधा" शब्दों के स्थान पर दिनांक 1-5-2014 से प्रतिस्थापित।
4. अधिनियम क्र० 16 सन् 2014, धारा 14 (ख) (ii) द्वारा "न्यूनतम रकम का आधा" शब्दों के स्थान पर दिनांक 1-5-2014 से प्रतिस्थापित।)
परन्तु न्यायालय, ऐसे कारणों से, जो निर्णय में लेखबद्ध किए जाएंगे, उस जुर्माने से अधिक का जुर्माना अधिरोपित कर सकेगा जिसके लिए कोई व्यक्ति दायी है।
(3) जहाँ कोई व्यक्ति, तत्स्थानी किसी विधि के अधीन भारत से बाहर दाण्डिक अधिकारिता वाले किसी सक्षम न्यायालय द्वारा सिद्धदोष ठहराया जाता है वहाँ, ऐसे व्यक्ति से, ऐसी दोषसिद्धि की बाबत, उपधारा (1) और उपधारा (2) के प्रयोजनों के लिए, इस प्रकार बरता जाएगा मानो वह भारत में किसी न्यायालय द्वारा सिद्धदोष ठहराया गया हो।]
(1) धारा 31 में किसी बात के होते हुए भी, 6[ धारा 19, धारा 24, धारा 27 क के अधीन दण्डनीय किसी अपराध के किए जाने या करने का प्रयत्न करने या दुष्प्रेरण करने या करने का आपराधिक षड्यंत्र करने के लिए और उन अपराधों के लिए जो किसी स्वापक ओषधि या मनःप्रभावी पदार्थ की वाणिज्यिक मात्रा से सम्बन्धित हैं], के लिए सिद्धदोष कोई व्यक्ति, यदि वह निम्नलिखित से संबंधित अपराध के किए जाने या करने का प्रयत्न करने या दुष्प्रेरण करने या करने के आपराधिक षड़यंत्र के लिए तदनंतर सिद्धदोष ठहराया जाता है तो, 7[ ऐसे दंड से जो धारा 31 में विनिर्दिष्ट दंड से कम का नहीं होगा या मृत्यु दंड से, दंडित किया जाएगा), अर्थात् :-
(5. अधिनियम क्र० 2 सन् 1989 द्वारा दिनांक 29-5-89 से अन्त: स्थापित।
6. अधिनियम क्र० 9 सन् 2001 द्वारा दिनांक 2-10-2001 से प्रतिस्थापित।
7. अधिनियम क्र० 16 सन् 2014, धारा 15 द्वारा "मृत्यु दंड से दंडनीय होगा" शब्दों के स्थान पर दिनांक 1-5-2014 से प्रतिस्थापित। )
(क) नीचे दी गई सारणी के स्तम्भ (1) के अधीन विनिर्दिष्ट स्वापक ओषधियों या मनः प्रभावी पदार्थों और उनमें अंतर्वलित मात्रा के, जो उक्त सारणी के स्तंभ (2) में यथा विनिर्दिष्ट ऐसी प्रत्येक ओषधि या पदार्थ के सामने उपदर्शित मात्रा के बराबर या उससे अधिक है, उत्पादन, विनिर्माण, कब्जा, परिवहन, भारत में आयात, भारत से निर्यात या यानांतरण में लगे रहने से संबंधित अपराध :
सारणी
स्वापक ओषधियों/मनः प्रभावी पदार्थों की विशिष्टियां मात्रा
| (i) अफीम | 10 किलोग्राम |
| (ii) मार्फीन | 1 किलोग्राम |
| (iii) हिरोइन | 1 किलोग्राम |
| (iv) कोडीन | 1 किलोग्राम |
| (v) थिबेन | 1 किलोग्राम |
| (vi) कोकेन | 500 ग्राम |
| (vii) हशीश | 20 किलोग्राम |
| (viii) उपरोक्त ओषधियों में से किसी ओषधि की निष्प्रभावी सामग्री सहित या उससे रहित कोई मिश्रण | 1[ऊपर वर्णित सम्मिश्रण के भागरूप सम्बन्धित ऐसो स्वापक ओषधियों या मनः प्रभावी पदार्थों के सामने जो मात्राएं दी गई हैं उनसे कम मात्रा] |
| (ix) एल. एस. डी., एल. एस. डी-25 (+) एन, एन-डाइ-एथिललाइसरजैमाईड (डी-लाइसर्जिक अम्ल डाइथिएलमाइड) | 500 ग्राम |
| (x) टी. एच. सी. [ट्रेट्राहाइड्रोकेनाबिनोल्स, निम्नलिखित समाव्यपी 6ए (10ए), 6 ए (7), 7, 8, 9, 10, 9 (11) और उनके त्रिविम रासायनिक रूप भेद] | 500 ग्राम |
| (xi) मेथेमफेटामिन (+) -2 -मेथिलामाइन-1-फेनिलप्रोपेन | 1,500 ग्राम |
| (xii) मेथाक्वेलोन (2-मेथिल-3-ओ-टोलिल-4- (3 एच)-क्विनेजोलिनोन) | 1,500 ग्राम |
| (xiii) एम्फटेमिन (+)-2-2-एमिनो-1-फेनिलप्रोपेन | 1,500 ग्राम. |
| (xiv) (xi) से (xii) में वर्णित मनः प्रभावी पदार्थों के लवण और निर्मितियां | 1,500 ग्राम |
(ख) खंड (क) में विनिर्दिष्ट क्रियाकलापों में से किसी क्रियाकलाप का, प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः वित्तपोषण करना।
(2) जहां कोई व्यक्ति 2[धारा 19, धारा 24 या धारा 27क के उपबन्धों के तत्समान किसी विधि के अधीन और किसी स्वापक ओषधि या मनः प्रभावी पदार्थ की वाणिज्यिक मात्रा से संबंधित अपराधों के लिए] भारत के बाहर किसी दांडिक अधिकारिता वाले सक्षम न्यायालय द्वारा सिद्धदोष ठहराया जाता है, वहां ऐसी दोषसिद्धि की बाबत ऐसे व्यक्ति के बारे में उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए ऐसी कार्यवाही की जाएगी मानो वह भारत में किसी न्यायालय द्वारा सिद्धदोष ठहराया गया हो।] (2. अधिनियम क्र० 9 सन् 2001 द्वारा दिनांक 2-10-2001 से प्रतिस्थापित।)
जो कोई इस अधिनियम के किसी उपबंध या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम या निकाले गए किसी आदेश या दी गई किसी अनुज्ञप्ति, अनुज्ञापत्र या प्राधिकार की किसी शर्त का, जिसके लिए इस अध्याय में पृथक् रूप से किसी दंड का उपबंध नहीं किया गया है, उल्लंघन करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दंडनीय होगा।
दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, किन्तु धारा 33 के उपबंधों के अधीन रहते हुए इस अधिनियम के अधीन (धारा 27 से भिन्न) दिए गए किसी दंडादेश का निलंबन या परिहार या लघुकरण नहीं किया जाएगा।] (1. अधिनियम क्र० 2 सन् 1989 द्वारा दिनांक 29-5-89 से अन्तःस्थापित।)
जहाँ इस अधिनियम के अधीन किए गए किसी अपराध के लिए कारावास की कोई न्यूनतम अवधि या जुर्माने की रकम विहित है, वहाँ न्यायालय, कारावास की न्यूनतम अवधि या जुर्माने की रकम से उच्चतर कोई दण्ड अधिरोपित करने के लिए ऐसी बातों के अतिरिक्त जिन्हें वह ठीक समझे, निम्नलिखित बातों को विचार में ले सकेगा, अर्थात् :-
(क) अपराधी द्वारा हिंसा या आयुध का उपयोग या उसके उपयोग की धमकी ;
(ख) यह तथ्य कि अपराधी लोक पद धारण करता है और उसने अपराध करने में उस पद का लाभ उठाया है:
(ग) यह तथ्य कि अपराध द्वारा अवयस्क प्रभावित होते हैं या उस अपराध के किए जाने के लिए अवयस्कों का उपयोग किया जाता है;
(घ) यह तथ्य कि अपराध किसी शिक्षा संस्था या सामाजिक सेवा संकाय में या ऐसी संस्था या संकाय के ठीक निकट या ऐसे अन्य स्थान में, जिसमें विद्यालय के बालक और छात्र शिक्षा, क्रीड़ा और सामाजिक क्रियाकलापों के लिए आते-जाते हैं, किया जाता है।
(ङ) यह तथ्य कि अपराधी संगठित अन्तर्राष्ट्रीय या किसी ऐसे अन्य अपराधी समूह का है जो अपराध करने में लगा हुआ है; और
(च) यह तथ्य कि अपराधी अपराध करके सुकर बनाए गए अन्य अवैध क्रियाकलापों में लगा हुआ है।] (2. अधिनियम क्र० 9 सन् 2001 द्वारा दिनांक 2-10-2001 से अंतःस्थापित।)
दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 360 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 401 या अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 (1958 का 20) की कोई बात इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के लिए सिद्धदोष किसी व्यक्ति को तब तक लागू नहीं होगी जब तक वह व्यक्ति अठारह वर्ष से कम आयु का नहीं है अथवा वह अपराध, जिसके लिए उस व्यक्ति को सिद्धदोष ठहराया जाता है धारा 26 या धारा 27 के अधीन दंडनीय नहीं है।
(1) जब कभी कोई व्यक्ति अध्याय 4 के किसी उपबंध के अधीन दंडनीय किसी अपराध का सिद्धदोष ठहराया जाता है और उसे सिद्धदोष ठहराने वाले न्यायालय की यह राय है कि ऐसे व्यक्ति से इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध करने से प्रविरत रहने के लिए बंधपत्र निष्पादित करने की अपेक्षा की जानी आवश्यक है तो वह न्यायालय ऐसे व्यक्ति को दंड पारित करते समय उसे आदेश दे सकेगा कि वह तीन वर्ष से अनधिक की ऐसी अवधि के दौरान, जिसे नियत करना वह न्यायालय ठीक समझे, अध्याय 4 के अधीन कोई अपराध करने से प्रविरत रहने के लिए प्रतिभुओं सहित या उनके बिना, अपने साधनों की आनुपातिक राशि के लिए बंधपत्र निष्पादित करे।
(2) बंधपत्र ऐसे प्ररूप में होगा जो केंद्रीय सरकार विहित करे और दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023) के उपबंध, जहां तक वे लागू होते हैं, ऐसे बंधपत्र से संबंधित सभी बातों को इस प्रकार लागू होंगे मानो वे परिशांति बनाए रखने के लिए उस संहिता की धारा 106 के अधीन निष्पादित किए जाने के लिए आदिष्ट बंधपत्र हों।
(3) यदि दोषसिद्धि, अपील पर या अन्यथा, अपास्त कर दी जाती है तो इस प्रकार निष्पादित बंधपत्र शून्य हो जाएगा।
(4) इस धारा के अधीन कोई आदेश किसी अपील न्यायालय द्वारा या उच्च न्यायालय द्वारा या सेशन न्यायाधीश द्वारा भी, जब वह पुनरीक्षण की शक्तियों का प्रयोग कर रहा हो, किया जा सकेगा।
(1) इस अधिनियम के अधीन किसी ऐसे अपराध के किसी अभियोजन में, जिसमें अभियुक्त की मानसिक दशा अपेक्षित है, न्यायालय यह उपधारणा करेगा कि अभियुक्त की ऐसी मानसिक दशा है किन्तु अभियुक्त के लिए यह तथ्य साबित करना एक प्रतिरक्षा होगी कि उस अभियोजन में अपराध के रूप में आरोपित कार्य के बारे में उसकी वैसी मानसिक दशा नहीं थी।
इस धारा में "आपराधिक मानसिक दशा" के अंतर्गत आशय, हेतु, किसी तथ्य का ज्ञान और किसी तथ्य में विश्वास या उस पर विश्वास करने का कारण है।
(2) इस धारा के प्रयोजन के लिए कोई तथ्य केवल तभी साबित किया गया कहा जाता है जब न्यायालय युक्तियुक्त संदेह से परे यह विश्वास करे कि वह तथ्य विद्यमान है और केवल इस कारण नहीं कि उसकी विद्यमानता अधिसंभाव्यता की प्रबलता के कारण सिद्ध होती है।
(1) सरकार, इस अधिनियम के अधीन अपराधों का शीघ्र विचारण करने के प्रयोजन के लिए, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, उतने विशेष न्यायालयों का, जितने इस क्षेत्र या क्षेत्रों के लिए आवश्यक हों, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं, गठन कर सकेगी।
(2) विशेष न्यायालय में एकल न्यायाधीश होगा जिसे सरकार द्वारा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति की सहमति से नियुक्त किया जाएगा। (1. अधिनियम क्र० 2 सन् 1989 द्वारा दिनांक 29-5-89 से प्रतिस्थापित।)
इस उपधारा में, "उच्च न्यायालय" से राज्य का ऐसा उच्च न्यायालय अभिप्रेत है जिसमें किसी विशेष न्यायालय का सेशन न्यायाधीश या अपर सेशन न्यायाधीश ऐसे न्यायाधीश के रूप में उसकी नियुक्ति के ठीक पहले कार्य कर रहा था।
(3) कोई भी व्यक्ति किसी विशेष न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए तब तक अर्हित नहीं होगा जब तक वह ऐसी नियुक्ति के ठीक पहले सेशन न्यायाधीश या अपर सेशन न्यायाधीश न हों।
(1) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023) में किसी बात के होते हुए भी, - (2. अधिनियम क्र० 9 सन् 2001 द्वारा दिनांक 2-10-2001 से प्रतिस्थापितः।)
(क) इस अधिनियम के अधीन ऐसे सभी अपराध, जो तीन वर्ष से अधिक की अवधि के कारावास से दण्डनीय हैं, उस क्षेत्र के लिए, जिसमें अपराध किया गया है, गठित विशेष न्यायालय द्वारा ही या जहाँ ऐसे क्षेत्र के लिए एक से अधिक विशेष न्यायालय हैं वहाँ, उनमें से ऐसे एक के द्वारा ही, जिसे सरकार द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट किया जाए, विचारणीय होंगे;
(ख) जहाँ इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के अभियुक्त या उसके किए जाने के संदेहमुक्त किसी व्यक्ति को दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 167 की उपधारा (2) या उपधारा (2क) (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 187 की उपधारा (2) या उपधारा (3) के अधीन किसी मजिस्ट्रेट को भेजा जाता है, वहाँ ऐसे मजिस्ट्रेट ऐसे व्यक्ति को ऐसी अभिरक्षा में, जो वह उचित समझे, कुल मिलाकर पन्द्रह दिन से अनधिक की अवधि के लिए, जहाँ ऐसा मजिस्ट्रेट न्यायिक मजिस्ट्रेट है और कुल मिलाकर सात दिन की अवधि के लिए, जहाँ ऐसा मजिस्ट्रेट, कार्यपालक मजिस्ट्रेट है, निरोध के लिए प्राधिकृत कर सकेगा:
परन्तु ऐसे मामलों में, जो विशेष न्यायालय द्वारा विचारणीय हैं, जहाँ ऐसे मजिस्ट्रेट का-
(i) जब ऐसे व्यक्ति पूर्वोक्त रूप में उसको भेजा जाता है, या
(ii) उसके द्वारा प्राधिकृत निरोध की अवधि की समाप्ति पर या उसके पूर्व किसी भी समय,
यह विचार है कि ऐसे व्यक्ति का निरोध अनावाश्यक है, वहाँ वह ऐसे व्यक्ति को अधिकारिता रखने वाले विशेष न्यायालय को भेजे जाने का आदेश करेगा;
(ग) विशेष न्यायालय, खण्ड (ख) के अधीन उसको भेजे गए व्यक्ति के सम्बन्ध में, उसी शक्ति का प्रयोग कर सकेगा जिसका प्रयोग किसी मामले का विचारण करने की अधिकारिता रखने वाला मजिस्ट्रेट, दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 167(भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 187) के अधीन, ऐसे मामले में किसी अभियुक्त व्यक्ति के सम्बन्ध में, जिसे उस धारा के अधीन उसको भेजा गया है, कर सकता है;
(घ) विशेष न्यायालय, इस अधिनियम के अधीन अपराध गठित करने वाले तथ्यों की पुलिस रिपोर्ट का परिशीलन करने या केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार के इस निमित्त प्राधिकृत किसी अधिकारी द्वारा किए गए परिवाद पर, अपराधी को विचारण के लिए उसको सुपुर्द न किए जाने की दशा में भी उस अपराध का संज्ञान कर सकेगा।
(2) इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का विचारण करते समय, विशेष न्यायालय, इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध से भिन्न ऐसे अपराध का भी विचारण कर सकेगा जिसके लिए अभियुक्त को, दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2)( भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023) के अधीन उसी विचारण में आरोपित किया जाए।
(3) इस धारा की कोई बात दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 439 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 483 के अधीन जमानत से सम्बन्धित उच्च न्यायालय की विशेष शक्तियों को प्रभावित करने वाली नहीं समझी जाएगी और उच्च न्यायालय ऐसी शक्तियों का प्रयोग, जिनके अन्तर्गत उस धारा की उपधारा (1) के खण्ड (ख) के अधीन शक्ति भी है, ऐसे कर सकेगा मानो उस धारा में "मजिस्ट्रेट" के प्रति निर्देश के अन्तर्गत धारा 36 के अधीन गठित "विशेष न्यायालय" के प्रति निर्देश भी है।
(4) धारा 19 या धारा 24 या धारा 27 क के अधीन दण्डनीय किसी अपराध के अभियुक्त व्यक्तियों के संबंध में या वाणिज्यिक मात्रा से सम्बन्धित अपराधों के लिए, दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 (1974 का 2) की धारा 167 की उपधारा (2) (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 187 की उपधारा (2) में "नब्बे दिन" के प्रति निर्देशों का, जहाँ-जहाँ वे आते हैं, यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे "एक सी अस्सी दिन" के प्रति निर्देश है:
परन्तु यदि अन्वेषण को, उक्त एक सौ अस्सी दिन की अवधि के भीतर पूरा करना सम्भव नहीं है, तो विशेष न्यायालय उक्त अवधि को लोक अभियोजक की अन्वेषण की प्रगति और उक्त एक सौ अस्सी दिन की अवधि से परे अभियुक्त के निरोध के लिए विनिर्दिष्ट कारणों को उपदर्शित करने वाली रिपोर्ट पर एक वर्ष तक बढ़ा सकेगा।
(5) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023) में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के अधीन तीन वर्ष से अनधिक की अवधि के कारावास से दण्डनीय अपराधों का संक्षिप्त विचारण किया जा सकेगा।]
उच्च न्यायालय, जहां तक लागू हो सके, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023) के अध्याय 29 और अध्याय 30 द्वारा उच्च न्यायालय को प्रदत्त सभी शक्तियों का प्रयोग ऐसे कर सकेगा, मानों उच्च न्यायालय की अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर कोई विशेष न्यायालय, उच्च न्यायालय की अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर मामलों का विचारण करने वाला सेशन न्यायालय है।]
इस अधिनियम में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023) के उपबंध (जिसके अंर्तगत जमानत और बंधपत्रों से संबंधित उपबंध भी हैं) किसी विशेष न्यायालय के समक्ष कार्याहियों को लागू होंगे और उक्त उपबंधों के प्रयोजनों के लिए विशेष न्यायालय, एक सेशन न्यायालय समझा जाएगा, और विशेष न्यायालय के समक्ष अभियोजन संचालित करने वाला व्यक्ति लोक अभियोजक समझा जाएगा।] (1. अधिनियम क्र० 2 सन् 1989 द्वारा दिनांक 29-5-89 से अंतःस्थापित।)
(1) धारा 36 के अधीन किसी विशेष न्यायालय का गठन होने तक, स्वापक ओषधि और मनः प्रभावी पदार्थ (संशोधन) अधिनियम, 1988 (1989 का 2) के प्रारम्भ पर या उसके पश्चात् इस अधिनियम के अधीन किए गए किसी ऐसे अपराध का जो किसी विशेष न्यायालय द्वारा विचारणीय है, विचारण, दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023) में किसी बात के होते हुए भी, सेशन न्यायालय द्वारा किया जाएगा। (2. अधिनियम क्र० 9 सन् 2001 द्वारा दिनांक 2-10-2001 से प्रतिस्थापित।)
(2) जहाँ स्वापक ओषधि और मनःप्रभावी पदार्थ (संशोधन) अधिनियम, 1988 (1989 का 2) के प्रारम्भ पर या उसके पश्चात् इस अधिनियम के अधीन किए गए किसी अपराध से सम्बन्धित कोई कार्यवाही किसी सेशन न्यायालय के समक्ष लम्बित है वहां, उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, ऐसी कार्यवाही की सेशन न्यायालय द्वारा सुनवाई की जाएगी और उसका निपटान किया जाएगा :
परन्तु इस उपधारा की किसी बात से दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 407) (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 447 ) के अधीन उच्च न्यायालय की, किसी सेशन न्यायालय द्वारा उपधारा (1) के अधीन संज्ञान किए गए किसी मामले या मामलों के वर्ग को अन्तरित करने की, शक्ति प्रभावित नहीं होगी।]]
(1) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023) में किसी बात के होते हुए भी, - (3. अधिनियम क्र० 2 सन् 1989 द्वारा दिनांक 29-5-89 से प्रतिस्थापित।)
(क) इस अधिनियम के अधीन दंडनीय प्रत्येक अपराध संज्ञेय होगा;
(ख) 4[धारा 19 या धारा 24 या धारा 27क के अधीन अपराधों के लिए और वाणिज्यिक मात्रा से संबंधित अपराधों के लिए भी दण्डीय किसी अपराध] के अभियुक्त किसी भी व्यक्ति को जमानत पर या मुचलके पर तभी नियुक्त किया जाएगा जब- (4. अधिनियम क्र० 9 सन् 2001 द्वारा दिनांक 2-10-2001 से प्रतिस्थापित।)
(i) लोक अभियोजक को ऐसी निर्मुक्ति के लिए किए गए आवेदन का विरोध करने का अवसर दे दिया गया है, और
(ii) जहां लोक अभियोजक आवेदन का विरोध करता है वहां न्यायालय का या समाधान हो गया है कि यह विश्वास करने के युक्तियुक्त आधार हैं कि वह ऐसे अपराध का दोषी नहीं है और जमानत पर होने के दौरान उसके द्वारा कोई अपराध किए जाने की संभावना नहीं है।
(2) उपधारा (1) के खंड (ख) में विनिर्दिष्ट जमानत मंजूर करने के संबंध में ये परिसीमाएं दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन जमानत मंजूर करने की बाबत परिसीमाओं के अतिरिक्त हैं।]
(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है वहां प्रत्येक व्यक्ति, जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कंपनी के कारबार के संचालन के लिए उस कंपनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कंपनी भी, उस अपराध के दोषी समझे जाएंगे तथा तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगे:
परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी व्यक्ति को किसी दंड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लि सभी सम्यक् तत्परता बरती थी।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध कंपनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उसको किसी उपेक्षा के कारण हुआ माना जा सकता है वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, या सचिव या अन्य अधिकारी भी, उस अपराध का दोषी समझा जाएगा तथा तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा।
इस धारा के प्रयोजन के लिए -
(क) "कंपनी से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम है; और
(ख) फर्म के संबंध में "निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है।
(1) जब किसी व्यसनी को 1[ धारा 27 के अधीन या किसी स्वापक ओषधि या मनः प्रभावी पदार्थ की अल्प मात्रा से संबंधित अपराधों के लिए] दंडनीय किसी अपराध का दोषी पाया जाता है और यदि उस न्यायालय की, जिसके द्वारा वह दोषी पाया जाता है, अपराधी की आयु, चरित्र, पूर्ववृत्त अथवा शारीरिक या मानसिक दशा को ध्यान में रखते हुए, यह राय है, कि ऐसा करना समीचीन है, तब इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, न्यायालय उसे तत्काल किसी कारावास से दंडादिष्ट करने के बजाय, उसकी सहमति से यह निदेश दे सकेगा कि उसे सरकार द्वारा चलाए जा रहे या मान्यता प्राप्त किसी अस्पताल या संस्था से निराविषीकरण या निराव्यसन के लिए चिकित्सीय उपचार कराने के लिए और न्यायालय के समक्ष एक वर्ष से अनधिक की अवधि के भीतर हाजिर होने और अपने चिकित्सीय उपचार के परिणाम के बारे में रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए या इस बीच अध्याय 4 के अधीन किसी अपराध को करने से प्रविरत रहने के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित प्ररूप में प्रतिभुओं सहित या उसके बिना, बंधपत्र निष्पादित करने पर निर्मुक्त किया जाए। (1. अधिनियम क्र० 9 सन् 2001 द्वारा दिनांक 2-10-2001 से प्रतिस्थापित।)
(2) यदि चिकित्सीय उपचार के परिणाम के बारे में उपधारा (1) के अधीन प्रस्तुत की गई रिपोर्ट को ध्यान में रखते हुए न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि ऐसा करना समीचीन है तो न्यायालय अपराधी को उसके द्वारा तीन वर्ष से अनधिक की ऐसी अवधि के दौरान, जो न्यायालय विनिर्दिष्ट करना ठीक समझे, अध्याय 4 के अधीन कोई अपराध करने से प्रविरत रहने के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित प्ररूप में प्रतिभुओं सहित या उनके बिना बंधपत्र निष्पादित किए जाने पर, सम्यक् भर्त्सना के पश्चात् निर्मुक्त किए जाने, अथवा उसके इस प्रकार प्रविरत रहने में असफल रहने पर न्यायालय के समक्ष हाजिर होने और ऐसी अवधि के दौरान जब अपेक्षा की जाए दंडादेश प्राप्त करने के लिए निदेश दे सकेगा।
(1) जहां किसी व्यक्ति को, धारा 15 से धारा 25 (दोनों सहित), धारा 28. धारा 29 या धारा 30 के अधीन दंडनीय किसी अपराध का सिद्धदोष ठहराया जाता है वहां उस व्यक्ति को सिद्धदोष ठहराने वाला न्यायालय ऐसे व्यक्ति का नाम और कारबार का स्थान या निवासस्थान, उल्लंघन की प्रकृति, यह तथ्य कि उस व्यक्ति को इस प्रकार सिद्धदोष ठहराया गया है और ऐसी अन्य विशिष्टियां, जो न्यायालय मामले की परिस्थितियों में समुचित समझे, ऐसे व्यक्ति के व्यय पर ऐसे समाचारपत्रों में या ऐसी रीति से, जो न्यायालय निर्दिष्ट करे, प्रकाशित कराने के लिए सक्षम होगा।
(2) उपधारा (1) के अधीन कोई प्रकाशन तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि न्यायालय के आदेशों के विरुद्ध अपील करने की अवधि का कोई अपील किए बिना अवसान नहीं हो जाता है या ऐसी अपील किए जाने पर उसका निपटान नहीं कर दिया जाता है।
(3) उपधारा (1) के अधीन किसी प्रकाशन का व्यय सिद्धदोष ठहराए गए व्यक्ति से इस प्रकार वसूलीय होगा मानो वह न्यायालय द्वारा अधिरोपित जुर्माना हो।