धारा 1 से 4 अध्याय 1 संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882

धारा 1 से 4 अध्याय 1 संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882

संपत्ति-अंतरण अधिनियम, 1882

(1882 का अधिनियम संख्यांक 4)

पक्षकारों के कार्य द्वारा किए गए संपत्ति - अंतरण से सम्बन्धित विधि को संशोधित करने के लिए अधिनियम

उद्देशिका —

पक्षकारों के कार्य द्वारा किए गए संपत्ति अंतरण से संबंधित विधि के कतिपय भागों को परिभाषित और संशोधित करना समीचीन है; अतः एतद्द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता है :

अध्याय 1

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम –

यह अधिनियम संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 कहा जा सकेगा।

प्रारम्भ – यह जुलाई, 1882 के प्रथम दिन को प्रवृत्त होगा।

विस्तार - प्रथमत: इसका विस्तारः सम्पूर्ण भारत पर है सिवाय उन राज्यक्षेत्रों के जो 1 नवम्बर, 1956 से अव्यवहित पूर्व भाग ख राज्यों में या मुम्बई,पंजाब और दिल्ली के राज्यों में समाविष्ट थे।

किन्तु इस अधिनियम या इसके किसी भाग का विस्तार उक्त सम्पूर्ण राज्यक्षेत्रों या उनके किसी भाग पर सम्पृक्त राज्य सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा कर सकेगी।

और कोई भी राज्य सरकार अपने द्वारा प्रशासित राज्यक्षेत्रों के किसी भी भाग को निम्नलिखित सब उपबन्धों से या उनमें किसी से भी चाहे भूतलक्षी या चाहे भविष्यलक्षी रूप से छूट शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा समय-समय पर दे सकेगी, अर्थात् :–

धारा 54, पैरा 2 और धाराएं 3, 59, 107 और 123

इस धारा के पूर्ववर्ती भाग में किसी बात के होते हुए भी, धारा 54 पैरा 2 और 3 और धाराएं 59, 107 और 123 का विस्तार किसी ऐसे जिले या भू-भाग पर न तो होगा और न किया जाएगा, जो भारतीय रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) के प्रवर्तन से उस अधिनियम की प्रथम धारा द्वारा प्रदत्त शक्ति के या अन्यथा तत्समय अपवर्जित हों।

2. अधिनियमों का निरसन किन्हीं अधिनियमितियों, प्रसंगतियों, अधिकारों, दावित्यों इत्यादि की व्यावृत्ति -

उन राज्यक्षेत्रों में, जिन पर इस अधिनियम का तत्समय विस्तार हो, वे अधिनियमितियां, जो एतद् उपाबद्ध अनुसूची में विनिर्दिष्ट हैं उनमें वर्णित विस्तार तक निरसित हो जाएंगी। किन्तु एतस्मिन् अन्तर्विष्ट कोई भी बात निम्नलिखित पर प्रभाव डालने वाली न समझी जाएगी—

(क) एतद्द्वारा अभिव्यक्त रूप से न निरसित किसी भी अधिनियमिति के उपबन्ध;

(ख) किसी संविदा के या सम्पत्ति संघटन के कोई भी निबंन्धन और प्रसंगतियां, जो इस अधिनियम के उपबन्धों से संगत और तत्समय-प्रवृत्त-विधि द्वारा अनुज्ञात है;

(ग) इस अधिनियम के प्रवृत्त होने से पूर्व गठित किसी विधिक सम्बन्ध से उत्पन्न कोई अधिकार या दायित्व या किसी ऐसे अधिकार या दायित्व के बारे में कोई अनुतोष; अथवा

(घ) इस अधिनियम की धारा 57 और अध्याय 4 द्वारा यथा उपबन्धित के सिवाय विधि की क्रिया द्वारा या सक्षम अधिकारितायुक्त न्यायालय की डिक्री या आदेश के द्वारा या उसके निष्पादन में हुआ कोई अन्तरण, और इस अधिनियम के दूसरे अध्याय की कोई भी बात मुस्लिम विधि के किसी नियम पर प्रभाव डालने वाली नहीं समझी जाएगी।

3. निर्वचन खंड -

इस अधिनियम में, जब तक कि विषय या संदर्भ में कोई बात विरुद्ध न हो-

"स्थावर संपत्ति” के अन्तर्गत खड़ा काष्ठ, उगती फसलें या घास नहीं आती;

"लिखत" से अवसीयती लिखत अभिप्रेत है;

किसी लिखत के सम्बन्ध में "अनुप्रमाणित" से ऐसे दो या अधिक साक्षियों द्वारा अनुप्रमाणित अभिप्रेत है और सर्वदा अभिप्रेत रहा होना समझा जाएगा जिनमें से हर एक ने निष्पादक को लिखत पर हस्ताक्षर करते या अपना चिह्न लगाते देखा है या निष्पादक की उपस्थिति में और उसके निदेश द्वारा किसी अन्य व्यक्ति को लिखत पर हस्ताक्षर करते देखा है या निष्पादक से उसके अपने हस्ताक्षर या चिह्न की या ऐसे अन्य व्यक्ति के हस्ताक्षर की वैयक्तिक अभिस्वीकृति पाई है, और जिनमें से हर एक ने निष्पादक की उपस्थिति में लिखत पर हस्ताक्षर किए हैं, किन्तु यह आवश्यक न होगा कि ऐसे साक्षियों में से एक से अधिक एक ही समय उपस्थित रहे हों और अनुप्रमाणन का कोई विशिष्ट प्ररूप आवश्यक न होगा

"रजिस्ट्रीकृत" से ऐसे किन्हीं राज्यक्षेत्रों के,जिन पर इस अधिनियम का विस्तार है, किसी भी भाग में, दस्तावेजों के रजिस्ट्रीकरण को विनियमित करने वाली तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत अभिप्रेत है;

"भूबद्ध" से अभिप्रेत है-

(क) भूमि में मूलित, जैसे पेड़ और झाड़ियाँ

(ख) भूमि में निविष्ट, जैसे भित्तियां या निर्माण अथवा

(ग) ऐसी निविष्ट वस्तु से इसलिए वद्ध कि जिससे यह बद्ध है उसका स्थायी लाभप्रद उपभोग किया जा सके;

"अनुयोज्य दावे" से स्थावर सम्पत्ति के बन्धक द्वारा या जंगम सम्पत्ति के आडमान या गिरवी द्वारा प्रतिभूत ऋण से भिन्न किसी ऋण का या उस जंगम सम्पत्ति में, जो दावेदार के वास्तविक या आन्वयिक कब्जे में नहीं है लाभप्रद हित का ऐसा दावा अभिप्रेत हैं, जिसे सिविल न्यायालय अनुतोष देने के लिए आधार प्रदान करने वाला मानता हो, चाहे ऐसा ऋण या फायदाप्रद हित वर्तमान, प्रोद्भवमान, सशर्त या समाश्रित हो;

किसी तथ्य की "किसी व्यक्ति को सूचना है” यह तब कहा जाता है, जब वह वास्तव में उस तथ्य को जानता है, अथवा यदि ऐसी जांच या तलाश, जो उसे करनी चाहिए थी, करने से जानबूझकर प्रविरत न रहता या घोर उपेक्षा न करता, तो वह उस तथ्य को जान लेता।

स्पष्टीकरण 1 –

जहां कि स्वावर सम्पत्ति से सम्बन्धित कोई संव्यवहार रजिस्ट्रीकृत लिखत द्वारा किया जाना विधि द्वारा अपेक्षित है, और वह रजिस्ट्रीकृत लिखत द्वारा किया गया है वहां यह समझा जाएगा कि ऐसे व्यक्ति को, जो ऐसी सम्पत्ति को या ऐसी सम्पत्ति के किसी भाग या ऐसी सम्पत्ति में किसी अंश या हित को अर्जित करता है, ऐसी लिखत की सूचना उस तारीख से है, जिस तारीख को रजिस्ट्रीकरण हुआ है, या जहां कि एक ही उपजिले में सब सम्पत्ति स्थित नहीं है या जहां कि रजिस्ट्रीकृत लिखत भारतीय रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16 ) की धारा 30 की उपधारा (2) के अधीन रजिस्ट्रीकृत की गई है, वहां उस पूर्वतम तारीख से है, जिसको ऐसे रजिस्ट्रीकृत लिखत का कोई ज्ञापन उस उप रजिस्ट्रार के पास फाइल किया गया है, जिसके उप जिले में उस सम्पत्ति को, जो अर्जित की जा रही है या उस सम्पत्ति का, जिसमें अंश या हित अर्जित किया जा रहा है, कोई भाग स्थित है:

परन्तु यह तब जबकि

(1) उस लिखत का रजिस्ट्रीकरण और उसके रजिस्ट्रीकरण की पूर्ति भारतीय रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) द्वारा और तद्धीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित रीति से की जा चुकी हो;

(2) लिखत या ज्ञापन को उन पुस्तकों में, यथास्थिति, सम्यक् रूप से प्रविष्ट या फाइल कर दिया गया हो जो उस अधिनियम की धारा 51 के अधीन रखी जाती हैं; तथा

(3) उस संव्यवहार के बारे में, जिससे वह लिखत सम्बन्धित है, विशिष्टियां उन अनुक्रमणिकाओं में ठीक-ठीक प्रविष्ट कर दी गई हों, जो उस अधिनियम की धारा 55 के अधीन रखी जाती हैं।

स्पष्टीकरण 2 -

जो व्यक्ति किसी स्थावर सम्पत्ति को या किसी ऐसी सम्पत्ति में के किसी अंश या हित को अर्जित करता है, यह समझा जाएगा कि उसे उस सम्पत्ति में उस व्यक्ति के हक की, यदि कोई हो, सूचना है, जिसका तत्समय उस पर वास्तविक कब्जा है।

स्पष्टीकरण 3 -

यदि किसी व्यक्ति के अभिकर्ता को किसी तथ्य की उस कारबार के अनुक्रम में, जिसके लिए वह तथ्य तात्त्विक है, उस व्यक्ति की ओर से कार्य करते हुए सूचना मिल जाती है तो यह समझा जाएगा कि उस तथ्य की सूचना उस व्यक्ति को थी:

परन्तु यदि अभिकर्ता कपटपूर्वक तथ्य को छिपा लेता है तो जहां तक कि उस व्यक्ति का सम्बन्ध है जो उस कपट में पक्षकार था या अन्यथा उसका संज्ञान रखता था, उसकी सूचना मालिक पर आरोपित न की जाएगी।

4. संविदाओं से सम्बन्धित अधिनियमितियों का संविदा अधिनियम का भाग और रजिस्ट्रीकरण अधिनियम का अनुपूरक समझा जाना-

 इस अधिनियम के वे अध्याय और धाराएं, जो संविदाओं से सम्बन्धित हैं, भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 (1872 का 9) का भाग मानी जाएंगी।

तथा धारा 54, पैरा 2 और 3 और धाराएं 59, 107 और 123 भारतीय रजिस्ट्रीकरण अधिनियम,1908 (1908 का 16) के अनुपूरक के रूप में पनी जाएंगी।

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