छत्तीसगढ़ भाड़ा नियंत्रण अधिनियम, 2011

छत्तीसगढ़ भाड़ा नियंत्रण अधिनियम, 2011

छत्तीसगढ़ भाड़ा नियंत्रण अधिनियम, 2011

क्रमांक 19 सन् 2012

[राष्ट्रपति कि स्वीकृति दिनांक 5 अक्टूबर, 2012 तथा राज्यपाल की स्वीकृति दिनांक 23 मई, 2011 को प्राप्त हुई, अधिनियम छत्तीसगढ़ राजपत्र (असाधारण) दिनांक 6 नवम्बर, 2012 को प्रकाशित।]

भाड़े से संबंधित विषयों पर अधिकरण द्वारा न्यायनिर्णयन तथा भवन स्वामी और किरायेदारों के हितों को संतुलित रखते हुए वास सुविधा को भाड़े (किराये) पर दिये जाने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करने हेतु अधिनियम

भारत गणराज्य के बासठवें वर्ष में छत्तीसगढ़ विधान मंडल द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार तथा प्रारंभ -

(1) यह अधिनियम छत्तीसगढ़ भाड़ा नियंत्रण अधिनियम, 2011 कहलाएगा।

(2) इसका विस्तार प्रथमतः ऐसे नगरपालिक क्षेत्रों में होगा जो राज्य में जिला मुख्यालय के रूप में समाविष्ट हैं, तदुपरांत ऐसे नगरपालिक क्षेत्रों या राज्य के भीतर किसी अन्य क्षेत्रों में होगा जिन्हें राज्य शामन, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा समय-समय पर विनिर्दिष्ट करे।

(3) यह राजपत्र में इसके प्रकाशन की तारीख से प्रवृत्त होगा।

2. परिभाषाएं. -

इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित हो, -

(1) "वास सुविधा" से अभिप्रेत है, कोई भवन या भवन का भाग, चाहे आवासीय हो या गैर आवासीय हो, भवन स्वामी द्वारा किरायेदार को किराये पर दिया गया हो, तथा जिसमें सम्मिलित हैं, कृषि प्रयोजनों के लिये उपयोग में लाई जाने वाली कोई भूमि , खुला स्थान, सीढ़ी, मैदान, बगीचा, गैरेज तथा समस्त सुविधायें एवं साधन जो उनके बीच हुए करारनामे में अंगभूत हों,

(2) "करारनामा" से अभिप्रेत है, इस अधिनियम के अधीन अपेक्षित किये गये अनुसार, भवन स्वामी तथा किरायेदार द्वारा निष्पादित लिखित करारनामा;

(3) "जिला" से अभिप्रेत है छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 के अर्थानुसार जिला;

(4) "आदतन व्यतिक्रमी" से अभिप्रेत है, ऐसा किरायेदार जो 12 माह की कालावधि में तीन या तीन से अधिक बार, भवन स्वामी को करारनामा के अनुसार देय तिथि पर पूर्ण किराया एवं समस्त देयकों का भुगतान करने में विफल रहता है।:

(5) "भवन स्वामी" से अभिप्रेत है ऐसा व्यक्ति जो किसी वास सुविधा का भाड़ा (किराया), चाहे अपने स्वयं के लेखे या किसी अन्य व्यक्ति के लेखे या उसकी ओर से या उसके लाभ के लिए या किसी अन्य व्यक्ति के न्यासी, पालक अथवा रिसीवर की हैसियत से तत्समय प्राप्त कर रहा है, या प्राप्त करने का हकदार है, या यदि अभिधारी (किरायेदार) को वास सुविधा भाड़े (किराये) पर दिया गया है तो इस प्रकार भाड़ा (किराया) प्राप्त करेगा या भाड़ा (किराया) प्राप्त करने का हकदार होगा,

(6) "नगरपालिक क्षेत्र" से अभिप्रेत है, नगरपालिक क्षेत्र या नगर पंचायत क्षेत्र जैसा कि छत्तीसगढ़ नगरपालिक निगम अधिनियम, 1956 (क्र० 23 सन् 1956) या छत्तीसगढ़ नगरपालिका अधिनियम, 1961 (क्र० 37 सन् 1961) के अधीन यथास्थिति परिभाषित हो;

(7) "अधिसूचना" से निर्दिष्ट है, राजपत्र में यथा प्रकाशित शासन की सुसंगत अधिसूचना;

(8) "पुराना अधिनियम" ये अभिप्रेत है, छत्तीसगढ़ स्थान नियंत्रण अधिनियम, 1961 (क्र. 41 सन् 1961) सहित समस्त संशोधन अधिनियम;

(9) "भाड़ा (किराया)" से अभिप्रेत है, वास सुविधा के लिये किरायेदार द्वारा भवन स्वामी को देय प्रतिफल;

(10) "भाड़ा नियत्रक" से अभिप्रेत है, अधिनियम की धारा 7 की उप-धारा (1) के अंतर्गत इस प्रकार नियुक्त अधिकारी;

(11) "भाड़ा नियंत्रण अधिकरण" से अभिप्रेत है, अधिनियम की धारा 6 (1) के अंतर्गत गठित निकाय;

(12) "निरसित अधिनियम" से निर्दिष्ट है, छत्तीसगढ़ स्थान नियंत्रण अधिनियम, 1961 (क्र. 41 सन् 1961) सहित इस अधिनियम की धारा 10 (1) के अंतर्गत प्रवृत्त निरसन के दिनांक तक के समस्त संशोधित अधिनियम;

(13) "सामाजिक उपताप" से अभिप्रेत है, ऐसा किरायेदार जो सामान्यतः वास सुविधा का उपयोग, अनुसूची 4 के सरल क्रमांक 10 में सूचीबद्ध कोई या समस्त क्रियाओं हेतु करता हो;

(14) "किरायेदार" से अभिप्रेत है-

(एक) कोई व्यक्ति जिसके द्वारा या जिसके लेखे या जिसकी ओर से भाड़ा (किराया) देय है या किसी अभिव्यक्त या विवक्षित संविदा के होने की दशा में, किसी वास सुविधा के लिये उसके भवन स्वामी को देय होता, तथा इसके अन्तर्गत कोई ऐसा व्यक्ति सम्मिलित है, जो इस अधिनियम के प्रावधानों के अन्तर्गत पारित बेदखली संबंधी आदेश या डिक्री से अन्यथा भी अभिधृति की समाप्ति के पश्चात् कब्जा निरंतर बनाये रखता हो;

(दो) उप-खण्ड (एक) में निर्दिष्ट व्यक्ति की मृत्यु होने की स्थिति में-

() आवासीय प्रयोजन के लिये वास सुविधा को किराये पर दिये जाने के मामले में, उसका उत्तरजीवी पति या पत्नी, पुत्र, पुत्री, माता और पिता जो सामान्यतः उसके साथ ऐसे वास सुविधा में उसके परिवार के सदस्य के रूप में उसकी मृत्युकाल तक रहते हों;

() व्यावसायिक या व्यापारिक प्रयोजन के लिये वास सुविधा को किराये पर दिये जाने के मामले में, उसका उत्तरजीवी पति या पत्नी, पुत्र, पुत्री, माता और पिता जो सामान्यतः ऐसे वास सुविधा में उसके मृत्युकाल तक उसके परिवार के सदस्य के रूप में उसके साथ मिलकर व्यवसाय करते हों।

3. छूट. -

इस अधिनियम की कोई भी बात निम्न पर लागू नहीं होगी:-

(1) शासन के किसी विभाग का तथा/या शासन द्वारा प्रायोजित तथा/या स्वामित्व के किसी मंडल तथा/या निगम से संबंधित या उसके स्वामित्व का कोई वास स्थान;

(2) शासन द्वारा लोकहित में अधिसूचना द्वारा विशेष रूप से छूट प्रदान किए गए कोई अन्य भवन तथा/या भवन (भवनों) की श्रेणी।

4. अभिधृति अनुबंध. -

(1) संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 (केन्द्रीय अधिनियम 1882 का 4) की धारा 107 में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, लिखित में अनुबंध (करार) निष्पादित किये जाने के सिवाय, कोई भी व्यक्ति, इस अधिनियम के प्रारंभ होने के पश्चात् किसी भी वास सुविधा को भाड़े पर नहीं देगा या नहीं लेगा।

(2) इस अधिनियम के प्रारंभ होने के पूर्व जहां अभिधृति प्रारंभ हुई हो, तो इसके संबंध में-

() यदि कोई अनुबंध पहले ही निष्पादित हो गया हो तो उसे भाड़ा नियंत्रक के समक्ष दर्ज (फाइल) किया जायेगा।

() यदि कोई अनुबंध निष्पादित नहीं हुआ तो भवन स्वामी और किरायेदार, उस अभिधृति से संबंधित अनुबंध लिखित में निष्पादित करेंगे और उसे भाड़ा नियंत्रक के समक्ष यथावत् दर्ज (फाइल) करेंगे:

परन्तु जहां खण्ड () के अधीन भवन स्वामी और किरायेदार संयुक्त रूप से अनुबंध दर्ज करने में विफल रहते हों, या खण्ड () के अनुसार अनुबंध निष्पादित करने में विफल रहते हों, तो ऐसे भवन स्वामी और किरायेदार पृथक-पृथक रूप से ऐसी अभिधृति के बारे में जानकारी दर्ज करेंगे।

(3) उप-धारा (1) में निर्दिष्ट या उप-धारा (2) के अधीन निष्पादन के लिए अपेक्षित प्रत्येक अनुबंध, ऐसे रूपविधान (फारमेट) में होगा तथा ऐसी रीति में एवं ऐसी समयावधि के भीतर दर्ज किया जायेगा जैसा कि विहित किया।

5. भाड़ा सहमति के अनुसार होगा -

(1) किसी भी वास सुविधा के लिये देय भाड़ा, इस अधिनियम के अन्य प्रावधानों के अध्यधीन रहते हुए, ऐसा होगा जैसा कि भवन स्वामी और किरायेदार के बीच तय किया जाये, तथा इसमें सुविधाएं जो पृथक तौर पर तय की जाएं, के लिए देय प्रभार शामिल नहीं होगा, तथा तद्नुसार देय होगा।

(2) जब तक कि अन्यथा सहमति हो तब तक प्रत्येक किरायेदार, भाड़े (किराये) का भुगतान ठौक आगामी माह जिस माह के लिए भाड़ा देय हो, के पंद्रहवें दिन तक करेगा।

6. भाड़ा नियंत्रण अधिकरण का गठन. -

(1) इस अधिनियम के प्रभावशील होने के 30 दिनों के भीतर इस अधिनियम के प्रावधानों को प्रभावी बनाने तथा भाड़े (किराये) से संबंधित विवादों, शिकायतों एवं अपराधों के न्यायनिर्णयन तथा विचारण हेतु तथा अभिधृति मुद्दे जिसमें भवन स्वामी तथा किरायेदारों के अधिकार, स्वत्व एवं दायित्व भी सम्मिलित हैं, के विनियमन एवं नियंत्रण हेतु राज्य शासन, अधिसूचना द्वारा संविधान के अनुच्छेद 323- के अनुसार एक अधिकरण गठित करेगा, जो छत्तीसगढ़ भाड़ा नियंत्रण अधिकरण कहलायेगा।

स्पष्टीकरण - सम्पति के अन्तरण तथा/या किसी सम्पत्ति पर स्वामित्व के विवादों से संबंधित विषयों पर, विधि न्यायालयों द्वारा सुसंगत विधियों के अन्तर्गत विचार किया जाता रहेगा।

(2) राज्य शासन, उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश या सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश को भाड़ा नियंत्रण अधिकरण के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त करेगा।

(3) अधिकरण में ऐसे अन्य सदस्य होंगे, जैसा कि राज्य शासन समय-समय पर विनिश्चित करे, किन्तु किसी भी समय 2 सदस्यों से कम नहीं होंगे।

(3) किन्हीं कारणों से अध्यक्ष का पद रिक्त होने पर, राज्य शासन, सदस्यों में से किसी सदस्य को कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त कर सकेगा।

(4) राज्य शासन, ऐसे अधिकारी को अधिकरण का रजिस्ट्रार नियुक्त करेगा जो व्यवहार न्यायाधीश वर्ग-एक के प्रवर्ग अथवा राज्य शासन में उप सचिव की श्रेणी से निम्न का नहीं होगा।

(5) अधिकरण के क्रियाशील होने की तिथि से, जो तिथि राज्य के राजपत्र में प्रकाशित को जायेगी, संविधान के अनुच्छेद 136 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय तथा अनुच्छेद 226 एवं 227 के अंतर्गत उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र के अलावा, समस्त न्यायालयों का कार्यक्षेत्र, प्रत्येक ऐसे विषयों के संबंध में जो अधिकरण के अधिकार क्षेत्र के भीतर आता हो, अपवर्जित माना जायेगा:

परन्तु, तथापि कि अधिकरण की स्थापना के तत्काल पूर्व, किसी भी न्यायालय या प्राधिकारी के समक्ष लंबित समस्त प्रकरणों में, समय-समय पर यथासंशोधित पुराने अधिनियम के अंतर्गत कार्यवाही जारी रहेगी।

(6) अधिकरण का मुख्यालय रायपुर में होगा तथा राज्य शासन, अधिकरण द्वारा मामलों की सुनवाई के लिए, अधिसूचना द्वारा, ऐसे अन्य स्थान नियत कर सकेगा, जैसा कि उचित समझे।

(7) अधिकरण के अध्यक्ष एवं सदस्यों की निबंधन एवं सेवा की शर्तें ऐसी होंगी, जैसा कि राज्य शासन द्वारा विहित किया जाये।

 

7. भाड़ा नियंत्रक की स्थापना -

(1) प्रत्येक जिले के लिए राज्य शासन, एक या एक से अधिक अधिकारियों को, जो उप जिलाधीश की श्रेणी से निम्न का हो, भाड़ा नियंत्रक के रूप में नियुक्त करेगा तथा उनका कार्य क्षेत्र ऐसा होगा जैसा कि जिला कलेक्टर द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाये।

(2) भाड़ा नियंत्रक, भाड़ा नियंत्रण अधिकरण के अधीनस्थ होगा।

8. भाड़ा नियंत्रण अधिकरण की शक्तियां एवं कृत्य -

(1) भाड़ा नियंत्रण अधिकरण को ऐसी शक्तियां प्राप्त होंगी जैसा कि शासन उसे अधिसूचना द्वारा प्रदान करे, जिसमें निम्नलिखित सम्मिलित होंगे:-

() यह सुनिश्चित करना और संभव करना कि सदैव इस अधिनियम के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु भाड़ा नियत्रक कार्यशील हो।

() भाड़ा नियंत्रक के किसी आदेश से व्यथित समस्त व्यक्ति (व्यक्तियों) के आवेदनों पर विचार करने हेतु अपीलीय प्राधिकरण के रूप में कार्य करना।

स्पष्टीकरण - भाड़ा नियंत्रण अधिकरण, ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेंगे जैसी कि उच्च न्यायालय द्वारा निरसित अधिनियम के अंतर्गत विषयों के न्यायनिर्णयन हेतु प्रयुक्त की जाती थी।

(2) भाड़ा नियंत्रण अधिकरण को अपनी अवमानना के लिए दण्ड देने की ऐसी शक्तियां प्राप्त होंगी जैसे कि वह उच्च न्यायालय हो।

 

9. भाड़ा नियंत्रक की शक्तियां एवं कृत्य-

(1) भाड़ा नियंत्रक, अपने कार्यक्षेत्र में ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेगा, ऐसे कृत्यों का निष्पादन करेगा तथा ऐसे दायित्वों का निर्वहन करेगा जैसा कि शासन, अधिसूचना द्वारा उसे प्रदान करे, जिसमें निम्नलिखित सम्मिलित होंगेः-

() भवन स्वामी और किरायेदार के बीच विवाद (विवादों) का निराकरण।

() भवन स्वामी तथा किरायेदारों को प्राप्त अधिकार सुनिश्चित कराना, जैसा कि इस अधिनियम के अन्तर्गत उनके लिए उपलब्ध है।

() इस अधिनियम के अंतर्गत भवन स्वामी तथा किरायेदारों की बाध्यता प्रवर्तित करना।

(2) प्रकरण में प्रत्यर्थी की उपस्थिति के लिए जारी सम्मन के प्रतिउत्तर में प्रत्यर्थी की प्रथम उपस्थिति अथवा प्रत्यर्थी को जिस तिथि से एक पक्षीय घोषित किया गया है, उस तिथि से भाड़ा नियंत्रक के समक्ष सभी कार्यवाही, सामान्यतः छः माह के भीतर पूर्ण कर ली जायगी।

 

10. भाड़ा नियंत्रक (नियंत्रकों) तथा भाड़ा नियंत्रण अधिकरण द्वारा अपनायी जाने वाली प्रक्रिया.-

(1) भाड़ा नियंत्रक तथा भाड़ा नियंत्रण अधिकरण, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (केन्द्रीय अधिनियम 1908 का 5) में नियत प्रक्रिया से बाध्य नहीं होंगे, किन्तु वे नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करते हुए तथा इस अधिनियम या इसके अन्तर्गत बनाये गये नियमों के अन्य प्रावधानों के अध्यधीन रहते हुए, उन्हें स्वयं की प्रक्रिया विनियमित करने की शक्ति होगी, तथा इस अधिनियम के अंतर्गत उनके कृत्यों के निर्वहन के प्रयोजन के लिए, उन्हें ऐसा समतुल्य अधिकार प्राप्त होगा जैसा कि सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (केन्द्रीय आंधनियम 1908 का 5) में निहित है, वाद या अपील के विचारण के लिए निम्नलिखित विषय संबंधित होंगे :-

() किसी भी व्यक्ति को समन करना तथा उपस्थिति प्रवर्तित करना तथा शपथ दिलाकर उसका परीक्षण करना;

() दस्तावेजों की खोज तथा प्रस्तुति की अपेक्षा करना;

() अपने निर्णय का पुनरीक्षण करना;

() गवाहों या दस्तावेजों के परीक्षण हेतु कमीशन जारी करना;

() व्यतिक्रम या एक पक्षीय कार्यवाही हेतु याचिका खारिज करनाः

() व्यतिक्रम के लिए किसी याचिका को खारिज करने के किसी आदेश या इसके द्वारा एक पक्षीय पारित किसी आदेश को अपास्त करना;

() विधिक प्रतिनिधियों को अभिलेख पर लाना;

() अन्य कोई विषय जैसा कि विहित किया जाए।

(2) भाड़ा नियंत्रण अधिकरण, लिखित में आवेदन तथा उसके लिए कारणों को अभिलिखित किये बिना, कोई भी स्थगन प्रदान नहीं करेगा।

(3) भाड़ा नियंत्रक या भाड़ा नियंत्रण अधिकरण के समक्ष कोई भी कार्यवाही, भारतीय दण्ड संहिता, 1860 (केन्द्रीय अधिनियम 1860 का 45) की धारा 193 और 228 के अर्थ के अन्तर्गत तथा धारा 196 के प्रयोजन के लिए, विधिक कार्यवाही मानी जायेगी तथा भाड़ा नियंत्रक को दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 (केन्द्रीय अधिनियम 1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय छब्बीस के प्रयोजन के लिए सिविल कोर्ट माना जायेगा।

11. आदेश का निष्पादन. -

(1) किसी पक्षकार के आवेदन पर, भाड़ा नियंत्रक द्वारा विहित रीति में अंतिम आदेश अथवा अन्य कोई भी आदेश, जो इस अधिनियम के अंतर्गत पारित किया गया हो, का निष्पादन निम्नलिखित कोई एक या एक से अधिक तरीके अपनाते हुए किया जाएगा, अर्थात् :-

() विरोधी पक्षकार की चल या अचल सम्पत्ति की कुर्की और विक्रय;

() विरोधी पक्षकार की गिरफ्तारी और निरोध;

() विरोधी पक्षकार के किसी एक या अधिक बैंक खातों की कुर्की तथा ऐसे खाते की जमा राशि से आदेश की राशि का समायोजन किया जाना;

() शासकीय सेवक या किसी भी राष्ट्रीयकृत बैंक, स्थानीय प्राधिकरण, निगम, शासकीय कम्पनी के कर्मचारी के वेतन और भत्ते की कुर्की;

() आदेश के निष्पादन हेतु किसी अधिवक्ता को ऐसे पारिश्रमिक पर आयुक्त के रूप में नियुक्त करना, जैसा कि निर्धारित किया जाए या अधिकरण या स्थानीय प्रशासन या स्थानीय निकाय के किसी अधिकारी को प्रतिनियुक्त करना,

() आवेदक को परिसर का कब्जा परिदान करना

(2) अंतिम आदेश के निष्पादन हेतु आदेश में अथवा इस अधिनियम के अंतर्गत पारित किसी अन्य आदेश में, स्थानीय प्रशासन या स्थानीय निकाय या पुलिस की सहायता की अपेक्षा, भाड़ा नियंत्रक कर सकेगा।

(3) कब्जे की रिकवरी (प्राप्ति) हेतु प्रमाण पत्र जारी किये जाने की तिथि से तीन माह के भीतर यदि किरायेदार परिसर रिक्त नहीं करता है, तो वह कब्जे के रिकवरी (प्राप्ति) हेतु प्रमाण पत्र जारी किये जाने की तिथि से अंतःकालीन लाभ का भुगतान करने के लिये दायी होगा, जो आवासीय प्रयोजन हेतु प्रदत्त वास सुविधा के मामले में भाड़े की दर का दोगुना होगा, व्यावसायिक प्रयोजनों हेतु प्रदत्त वास सुविधा पर भाड़े की दर का तीन गुना होगा और यदि कब्जे की त्वरित प्राप्ति हेतु प्रमाण पत्र जारी किया गया हो तो भाड़े की दर का तीन गुना होगा।

(4) भाड़ा नियंत्रक, अंतिम आदेश या इस अधिनियम के अंतर्गत पारित किसी अन्य आदेश के संबंध में, कार्यवाहियों का निष्पादन संक्षिप्त तरीके से संचालित करेगा तथा इस धारा के अधीन किये गये निष्पादन के लिये प्रस्तुत आवेदन का निराकरण, विरोधी पक्षकार को सूचना तामील होने की तिथि से पैतालीस दिनों के भीतर करेगा।

स्पष्टीकरण - कब्जे या कब्जे की त्वरित प्राप्ति हेतु प्रमाण-पत्र जारी करने के आदेश के विरुद्ध अपील या अन्य कार्यवाहियां दर्ज (फाईल)कर देने से हो किरायेदार को उप-धारा (3) के अधीन विनिर्दिष्ट दर से अंतःकालीन लाभ भुगतान करने के अपने दायित्व से मुक्ति नहीं मिलेगी, जब तक कि अपीलीय भाडा नियंत्रक अथवा ऐसे न्यायालय द्वारा जिसके समक्ष उस आदेश को चुनौती दी गई हो, विशेष रूप से अन्यथा आदेश नहीं दिया गया हो, और यदि रिकवरी प्रमाण पत्र जारी करने के आदेश को अंततः यथावत रखा जाता है तो किरायेदार, उस तिथि से जिस तिथि पर रिकवरी प्रमाण-पत्र मूलतः जारी किया गया था, उप-धारा (3) के अधीन विनिर्दिष्ट दरों पर अंतः कालीन लाभ का भुगतान करने के लिए दायी होगा।

12. भवन स्वामी तथा किरायेदारों के अधिकार और बाध्यताएं.-

(1) प्रत्येक किरायेदार को अनुसूची 1 के अनुसार अधिकार प्राप्त होगा। अधिकरण तथा भाड़ा नियंत्रक, सदैव किरायेदार को इन अधिकारों को सुनिश्चित कराने हेतु कार्य करेंगे।

(2) प्रत्येक भवन स्वामी को अनुसूची 2 के अनुसार अधिकार प्राप्त होगा। अधिकरण तथा भाड़ा नियंत्रक, सदैव भवन स्वामी को इन अधिकारों को सुनिश्चित कराने हेतु कार्य करेंगे:

परन्तु -

() यदि भाड़े (किराये) से सबंधित किसी भी विषय में भवन स्वामी और किरायेदार के हितों में सघर्ष की स्थिति प्रकट हो, तथा/या संशय का कोई विन्दु हो, तो उसका लाभ किरायेदार को प्राप्त होगा।

() यदि वास सुविधा के कब्जे के प्रत्यावर्तन से सबंधित किसी भी विषय में भवन स्वामी और किरायेदार के हितों में संघर्ष की स्थिति प्रकट हो, तथा/या संशय का कोई बिन्दु हो, तो उसका लाभ भवन स्वामी को प्राप्त होगा।

(3) प्रत्येक भवन स्वामी पर अनुसूची 3 के अनुसार बाध्यताएं होंगी। अधिकरण तथा भाड़ा नियंत्रक, सदैव भवन स्वामी पर, इन बाध्यताओं को प्रवर्तित करने का कार्य करेंगे।

(4) प्रत्येक किरायेदार पर अनुसूची 4 के अनुसार बाध्यताएं होंगी। अधिकरण तथा भाड़ा नियंत्रक, सदैव किरायेदार पर, इन बाध्यताओं को प्रवर्तित करने का कार्य करेंगे।

(5) भवन स्वामी द्वारा, अनुसूची 1 के अंतर्गत किरायेदार को प्राप्त अधिकारों से उसे वंचित करने का जानबूझकर किया गया कोई भी प्रयास या कार्य, इस अधिनियम के अंतर्गत अपराध होगा जो 5000/- रुपये से अनधिक के जुर्माने से या तीन माह से अनधिक कालावधि के साधारण कारावास से या दोनों से दण्डनीय होगा।

(6) यदि किरायेदार द्वारा, अनुसूची 2 के अंतर्गत भवन स्वामी को प्राप्त अधिकारों से उसे वंचित करने का जानबूझकर किया गया कोई भी प्रयास या कार्य, इस अधिनियम के अंतर्गत अपराध होगा जो 5000/- रुपये से अनधिक के जुर्माने से या तीन माह से अनधिक कालावधि के साधारण कारावास से या दोनों से दण्डनीय होगा।

(7) अनुसूची 3 के अन्तर्गत यदि किसी भवन स्वामी द्वारा सारहीन तथा/या अपर्याप्त कारणों से बाध्यताओं को उपेक्षा करने का कोई भी प्रयास, इस अधिनियम के अंतर्गत अपराध होगा जो 5000/- रुपये से अनधिक के जुर्माने से या तीन माह से अनधिक कालावधि के साधारण कारावास से या दोनों से दण्डनीय होगा।

(8) अनुसूची 4 के अन्तर्गत यदि किसी किरायेदार द्वारा सारहीन तथा/या अपर्याप्त कारणों से बाध्यताओं की उपेक्षा करने का कोई भी प्रयास, इस अधिनियम के अंतर्गत अपराध होगा जो 5000/- रुपये से अनधिक के जुर्माने से या तीन माह से अनधिक कालावधि के साधारण कारावास से या दोनों से दण्डनीय होगा।

13. अपील.-

(1) इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, भवन स्वामी तथा/या किरायेदार जो भाड़ा नियंत्रक के किसी आदेश से व्यथित हो, को विहित रीति में, विहित समयावधि के भीतर, भाड़ा नियंत्रक अधिकरण को अपील करने का अधिकार होगा।

(2) 1[***]

छत्तीसगढ़ अधिनियम क्रमांक 6 सन 2021 द्वारा दिनांक 10 -3 -2021 से विलुप्त। पूर्व में उपधारा (2) निम्नवत थी:-

(2) भाड़ा नियंत्रण अधिकरण के आदेश के विरुद्ध अपील, उच्चतम न्यायलय में प्रस्तुत जाएगी

13-. नियम बनाने की शक्ति-.

(1) राज्य शासन, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों में से समस्त या किसी प्रयोजन के क्रियान्वयन के लिए नियम बना सकेगा।

(2) इस अधिनियम के अधीन निर्मित प्रत्येक नियम, इसके निर्मित किये जाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र, राज्य विधान मंडल के सदन के पटल पर, जब वह सत्र में कुल तीस दिवस की अवधि के लिए हो, जो एक ही सत्र में या दो या अधिक उत्तरवर्ती सत्रों में पूरी हो सकती हो, और यदि उस सत्र जिसमें इसे पटल पर रखा गया है अथवा उसके ठीक उत्तरवर्ती सत्र के अवसान के - पूर्व, सदन यदि नियम में किसी प्रकार के उपान्तरण की सहमति देता है अथवा यदि सदन सहमत होता है कि नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तथा राजपत्र में ऐसा विनिश्चय अधिसूचित करता है, तो ऐसा नियम ऐसी अधिसूचना के प्रकाशन की तारीख से, यथास्थिति, केवल ऐसे उपान्तरित रूप में ही प्रभावी होगा या कोई प्रभाव नहीं रखेगा, तथापि ऐसा कोई उपान्तरण या विलोपन, उस नियम के अधीन पूर्व में किये गये किसी कार्य की विधिमान्यता या विलोपन पर, प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगा।

14. निरसन एवं व्यावृत्ति.-

(1) इस अधिनियम के राजपत्र में अधिसूचना के माध्यम से कानून बन जाने पर, छत्तीसगढ़ स्थान नियंत्रण अधिनियम, 1961 (क्रमांक 41 सन् 1961) जो छत्तीसगढ़ राज्य में लागू है, एतद्वारा निरस्त किया जाता है।

(2) उप-धारा (1) के अधीन निरसन, इस प्रकार निरसित अधिनियमिति के पूर्व प्रवर्तन को प्रभावित नहीं करेगा तथा की गई कोई बात या की गई कोई कार्यवाही (किसी नियुक्ति या किये गये प्रत्यायोजन, अधिसूचना, आदेश, निर्देश, जारी सूचना, या निर्मित नियम सहित) ऐसे निरसित अधिनियमिति के उपबंधों द्वारा या उसके अधीन किया गया या की गई समझी जायेगी, जहां तक वह इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत हो, इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन किया गया या की गई समझी जायेगी, तथा तब तक प्रवृत्त रहेगी जब तक कि इस अधिनियम के अधीन की गई किसी बात या की गई किसी भी कार्यवाही द्वारा निलंबित नहीं कर दिया जाता।

 

अनुसूची 1

[अधिनियम की धारा 12 (1) देखिए]

अधिनियम के अंतर्गत किरायेदार को प्राप्त अधिकार

स० क्र०                                                                         अधिकार

1. अभिधृति प्रारंभ होने पर करारनामा की एक प्रति प्राप्त करने का अधिकार।

2. भवन स्वामी को किये गये भुगतान के लिए पावती प्राप्त करने का अधिकार, चाहे यह भुगतान सुरक्षा निधि, भाड़ा या अन्य किसी से संबंधित हो।

3. प्रवेश के पूर्व वास सुविधा अच्छी और वासयोग्य स्थिति में प्राप्त करने का अधिकार

4. भाड़ा नियमित रूप से भुगतान किये जाने के अध्यधीन तथा वास सुविधा का उसी प्रयोजन हेतु जिसके लिए वह भाड़े पर प्रदान किया गया था, उपयोग किये जाने के अध्यधीन, वास सुविधा के कब्जे का निर्विघ्न भोग का अधिकार परन्तु किरायेदार की मृत्यु अथवा मानसिक रोग से पीड़ित होने की स्थिति में उसकी विधवा/पत्नी को, उसके पति द्वारा निष्पादित करारनामा में अंतर्विष्ट समस्त अधिकार एवं बाध्यता अपने पर लेने के लिए एक उप-करारनामा के माध्यम से उसके द्वारा उल्लेख करने पर, स्वमेव किरायेदार माना जायेगा।

5. समस्त सुविधायें तथा साधन जो वास सुविधा का भाग हों, को सर्वथा कार्यशील एवं क्रियाशील स्थिति में पाने का अधिकार।

6. भवन स्वामी द्वारा वास सुविधा का वार्षिक रख-रखाव एवं अनुरक्षण कराये जाने का अधिकार या भवन स्वामी द्वारा वास्तविक व्यय की प्रतिपूर्ति कर वार्षिक रखरखाव हेतु कार्य करवाने का अधिकार, ऐसी प्रतिपूर्ति, अधिभोग के ग्यारह माह के प्रत्येक खण्ड के पश्चात् एक माह के भाड़े से अधिक नहीं होगी।

7. बिजली और जल जैसे आवश्यक आपूर्ति, भवन स्वामी या उसके अभिकर्ता द्वारा जानबूझकर नहीं रोके जाने की गारंटी।

8. अभिधृति की सुरक्षा, यदि अनुसूची 2 में सम्मिलित भवन स्वामी के अधिकारों का हनन हो रहा हो।

अनुसूची 2

[अधिनियम की धारा 12(2) देखिए]

अधिनियम के अंतर्गत भवन स्वामी को प्राप्त अधिकार

स० क्र०                                                                                         अधिकार  

1. वास सुविधा पर स्वामित्व की सुरक्षा, चाहे किरायेदार की अभिधृति की अवधि जो भी हो।

2. सुरक्षा निधि, जो तीन माह के भाड़े से अधिक राशि की नहीं होगी, मांगने और प्राप्त करने का अधिकार।

3. करारनामे में सहमति के अनुसार, देय तिथि पर या उसके पूर्व नियमित रूप से पूरा भाड़ा प्राप्त करने का अधिकार।

4. करारनामे के अनुसार भाड़े में वार्षिक वृद्धि प्राप्त करने का अधिकार, जहां मासिक भाड़ा 2000/- रुपये या इससे कम हो, ऐसे प्रकरणों में 5% से अधिक नहीं होगा तथा अन्य समस्त प्रकरणों में 10% से अधिक नहीं होगा।

5. बिजली, पानी आदि आपूर्तियों के किसी मूल्यवृद्धि की तत्स्थानी राशि किरायेदार से मांगने तथा प्राप्त करने का अधिकार।

6. दिन के समय वास सुविधा के निरीक्षण का अधिकार, यदि किरायेदार से पहले से ही नियत किया गया हो, किरायेदार या उसके परिवार के किसी वयस्क पुरुष सदस्य जिसे जानता हो कि वह उसके साथ रहता है, की उपस्थिति में किया जा रहा हो।

7. वास सुविधा में वृद्धि करना तथा/या सुधार करना तथा/या विस्तार करना तथा/या सुविधाओं में वृद्धि का अधिकार। परन्तु यदि यह वृद्धि/विस्तार किरायेदार की सहमति के बिना किया गया हो तो भवन स्वामी को भाड़े में वृद्धि प्रवर्तन का अधिकार नहीं होगा।

8. वास सुविधा के वार्षिक रख-रखाव, अपनी सुविधा के अनुसार कराने का अधिकार, या व्यय की प्रतिपूर्ति के विरुद्ध किरायेदार को वास सुविधा के वार्षिक रख-रखाव कराने की अनुमति देने के विकल्प का अधिकार, ऐसी प्रतिपूर्ति, एक माह के भाड़े से अधिक नहीं होगी।

9. न्याय संगत और ठोस आधार पर कभी भी भाड़ा नियंत्रक को भाड़ा तथा/या सुरक्षा निधि में पुनरीक्षण करवाने हेतु आवेदन प्रस्तुत करने का अधिकार।

10. किरायेदार द्वारा जानबूझकर उपेक्षापूर्वक या अन्य कारणों से जिसमें किरायेदार का दोष हो, वास सुविधा को क्षति पहुँचाये जाने पर भाड़ा नियंत्रक को उचित क्षतिपूर्ति हेतु आवेदन प्रस्तुत करने का अधिकार।

11. निम्नलिखित आधार पर किरायेदार को बेदखल करवाने हेतु भाड़ा नियंत्रक से प्रार्थना करने का अधिकार:

() यदि किरायेदार भाड़ा तथा/या अन्य देयकों के भुगतान करने में आदतन व्यतिक्रमी है।

() यदि किसी भी कारण से किरायेदार वास सुविधा को व्यापक क्षति पहुँचाता है या ऐसे किये जाने की अनुमति देता है।

() यदि किरायेदार वास सुविधा का उपयोग, जिस प्रयोजन (प्रयोजनों) के लिए भाड़े पर दिया गया था उससे भिन्न किसी प्रयोजन हेतु करता है।

() यदि किरायेदार सामाजिक उपताप बन जाता है।

() यदि किरायेदार भारतीय दण्ड संहिता को किसी धारा के अन्तर्गत दोषसिद्ध हो जाता है।

() वृहद् स्तर पर सुधार कार्य करने हेतु, जो किरायेदार के मकान में रहते हुए करना संभव नहीं होगा।

() किरायेदार को 3 माह पूर्व लिखित सूचना देकर, यदि वास सुविधा स्वयं के अधिभोग के लिए या परिवार के किसी सदस्य जिसमें पति/पत्नी, माँ/बाप, पुत्र, पुत्री, दामाद, पुत्र-वधू सम्मिलित हैं, के अधिभोग के लिए अपेक्षित हो।

() किरायेदार को 6 माह पूर्व लिखित सूचना देकर, कोई कारण बताने की बाध्यता के बिना, किन्तु इस शर्त पर कि वास सुविधा को तत्पश्चात् कम से कम 12 माह तक ऊंचे भाड़े पर अन्य किसी को किराये पर नहीं देगा :

परन्तु, तथापि, निम्नलिखित विशेष श्रेणी के भवन स्वामियों को तथा/या उनके पति/पत्नी को यदि अपनी वास सुविधा स्वयं के उपयोग के लिए वापस चाहिए हो, तो ऐसी स्थिति में सूचना की अवधि मात्र एक माह की होगी: सेवारत या सेवानिवृत्त शासकीय सेवक, विधवा, सशस्त्र बलों के कार्मिक, शारीरिक या मानसिक विकलांगता को प्राप्त व्यक्ति, वरिष्ठ नागरिक (65 वर्ष की आयु के ऊपर)

12. अभिधृति अवधि के अंत में मौसमी और समय के कारण होने वाली घिसावट (दोषों) के संतुलन के लिए रक्षण (भत्ता) देते हुए, अच्छे आकार में तथा अच्छी स्थिति में जैसा अभिधृति के प्रारंभ होने पर था, उसी अवस्था में वास सुविधा वापस प्राप्त करने का अधिकार।

अनुसूची 3

[अधिनियम की धारा 12 (3) देखिए]

अधिनियम के अंतर्गत भवन स्वामी की बाध्यता

स० क्र०                                                                                                              बाध्यता

1. इस अधिनियम के अधीन अपेक्षित अनुसार सम्यक् रूप से नोटरी कृत करारनामा निष्पादित कर लेने के पश्चात् ही किरायेदार को प्रवेश प्रदान करना।

2. किरायेदार के प्रवेश के 7 दिवस के भीतर स्थानीय पुलिस थाने में ऐसे प्ररूप में जैसा कि विहित किया जाये पर जानकारी प्रस्तुत करना।

3. किरायेदार से प्राप्त समस्त भुगतान की उचित पावती प्रदान करना।

4. किरायेदार को, जब तक कि वह अनुसूची 4 में निर्दिष्ट अपनी बाध्यताओं को पूरा नहीं करता, वास सुविधा का अनुसूची 1 में सम्मिलित समस्त अधिकार का सुखमय भोग करने की अनुमति देना।

5. वास सुविधा तथा परिसर को अच्छी अवस्था में तथा समय पर सुधार कर वासयोग्य बनाये रखना।

6. नगरीय निकाय द्वारा निर्धारित रीति से घरेलू कूड़ा का निराकरण कराना तथा किरायेदारी के प्रारंभ में किरायेदार को इस व्यवस्था (रीति) की जानकारी देना।

7. निर्माण में त्रुटियों से तथा/या आवास में समय के कारण आने वाली प्राकृतिक घिसावट (प्राकृतिक दोषों) के समस्त संरचनाओं में तत्परता से उचित सुधार करना।

8. राज्य विद्युत मंडल द्वारा जहां कहीं भी अनुमति दी जाये, किरायेदार द्वारा उपभोग किये गये विद्युत के अभिलेखन के लिए पृथक एवं सही मीटर उपलब्ध कराना।

9. किसी भी स्थिति में जानबूझकर वास सुविधा के विद्युत एवं जल जैसी आवश्यक आपूर्ति को बंद नहीं करना, ही किसी दूसरे से ऐसा करवाना।

10. कभी भी जब किरायेदार उपस्थित हो, या केवल परिवार के महिला सदस्य उपस्थित हों और ऐसे प्रवेश हेतु आपत्ति कर रही हों तो निरीक्षण हेतु वास सुविधा में अपने प्रवेश के अधिकार का प्रयोग नहीं करना।

11. वास सुविधा के वार्षिक रख-रखाव का कार्य करना, या अधिकतम एक माह के किराये की राशि के बराबर, वास्तविक आधार पर उसके व्यय की अनुमति देकर किरायेदार को कार्य करवाने की अनुमति देना।

12. वास सुविधा को खाली कराने हेतु किरायेदार को बेदखल करने का दबाव बनाने के लिए कभी भी गैर कानूनी तरीकों का प्रयोग नहीं करना।

13. अभिधृति की समाप्ति के पूर्व किरायेदार को सुरक्षा निधि की वापसी करना।

अनुसूची 4

[अधिनियम की धारा 12 (4) देखिए]

अधिनियम के अंतर्गत किरायेदार की बाध्यता

स० क्र०                                                               बाध्यतायें

1. वास सुविधा पर भवन स्वामी के स्वामित्व को सदैव मान्यता देना, तथा अनुसूची 2 में निर्दिष्ट उसके अधिकारों का बिना आपत्ति के सम्मान करना।

2. वास सुविधा जिस प्रयोजन हेतु भाड़े पर प्रदान किया गया है, केवल उसी हेतु उसका उपयोग करना।

3. भवन स्वामी की अनुमति से या बिना अनुमति के, धन संबंधी प्रतिफल (भाड़ा) के लिये या धन संबंधी प्रतिफल (भाड़ा) के बिना, औपचारिक या अनौपचारिक रूप से, कभी भी वास सुविधा के किसी भी भाग को उप-अभिधृति (उप किराया) पर प्रदान नहीं करना।

4. वास सुविधा का भाग जिसमें समस्त विद्युत, स्वच्छता एवं अन्य उपकरणों का संरक्षण एवं सुरक्षा करना।

5. भवन स्वामी से प्रतिपूर्ति की चाह रखे बिना, छोटे-मोटे सुधार कार्य और आवर्ती प्रतिस्थापनायें आवश्यक होने पर समय-समय पर करना।

6. वास सुविधा को सर्वथा साफ और स्वच्छ रखना, वायु, जल तथा/या ध्वनि प्रदूषण करना तथा वास सुविधा में वातावरण को शांत, सहजीविका के अनुकूल बनाये रखना।

7. वास सुविधा के कूड़े को नगरपालिका द्वारा निर्धारित रीति के अनुसार विसर्जित करना तथा बाहर रास्तों पर या सार्वजनिक स्थलों पर कूड़ा नहीं फेंकना।

8. भवन स्वामी के साथ तय की गई व्यवस्था की रीति में सुरक्षा निधि, भाड़ा तथा अन्य देयकों का पूरा और नियमित भुगतान करना।

9. मौसमी या समय के कारण होने वाली प्राकृतिक घिसावट (प्राकृतिक दोषों) को छोड़कर, जानबूझकर या अन्यथा वास सुविधा में हुई किसी क्षति के लिए भवन स्वामी को क्षतिपूर्ति प्रदान करना।

10. अभिधृति की अवधि में सामाजिक उपताप नहीं बनना।

स्पष्टीकरण - "सामाजिक उपताप" से अभिप्रेत है, निम्नलिखित में से कोई ऐसे समस्त कृत्य करना या करवाना, नशा कर झगड़ना, पत्नी को पीटना, वेश्यावृति, आदतन देर रात तक हल्ला करते रहना या/एवं अन्यथा अत्यधिक शोर-शराबा करना जो आस-पड़ोस को परेशान करें, सामान्य सुविधायें जैसी सीढ़ी आदि स्थानों पर थूकना, घर के भीतर खतरनाक पदार्थ या बेहद बदबूदार या ऐसे पदार्थ जिनसे कीड़े बढ़ते हों जमा करना, कूड़ा यहां-वहां बिखेरना या गन्दा पानी फैला देना, अनियमित स्थानों पर लघु/दीर्घ शका करना या कराना जिससे वातावरण दूषित होता हो, या/एवं अन्य कोई कृत्य जिससे आस-पड़ोस को क्षति तथा बुरा सामाजिक प्रभाव पड़ता हो।

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